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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 508 में से

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पृष्ठ 171

मेरे लिए कौतुक का विषय होगा । इसलिए तुम यहाँ मत रहो । जानकी को साथ लेकर
जाओ ।' (इन बातो को सुनकर) लक्ष्मण सीता को साथ लेकर पर्वत-गुफा में चले गये ।
तब राम प्रलयकाल के रुद्र के समान क्रुद्ध होकर अपना प्रताप प्रकट करते हुए,
कृपाण, कवच, धनुष-बाण धारणकर, श्रेष्ठ तूणीर-युगल (पीठ पर) बाँधकर और पर्वत
को भी धनुष के आकार में झुकानेवाले शिव की तरह, अपने धनुष पर प्रत्यचा चढाकर,
उस प्रत्यचा की टकार करने लगे । उस धनुष की टकार की ध्वनि सारे आकाश में गूँजने
लगी । इन्द्र, दिक्पाल और अन्य देवता अपने रत्न-खचित विमानो पर आसीन हो यह
देखने की उत्सुकता प्रकट करने लगे कि राम अकेले खर तथा दूषण आदि अत्यन्त पराक्रमी
चौदह सहस्र राक्षसो का वध कैसे करते हैं ? सभी देवर्षि स्वर्ग से कई बार आशीर्वाद
देने लगे कि महात्मा राम इन मायावी राक्षसो का वध करने में सफल हो । राम का तेज
सभी वन, वृक्ष, पृथ्वी तथा आकाश में ऐसा व्याप्त हुआ, मानो दस सहस्र कोटि सूर्यो का
तेज समस्त लोको में व्याप्त हो गया हो ।
इस प्रखर तेज के कारण जडवत् हो, सभी उत्साह को खोकर, आँखें चौंधिया जाने
के कारण अत्यत दीन दीखनेवाले राक्षस-समूह को देखकर, खर ने दूषण से कहा—' (हे
भाई), क्या कारण है कि हमारी सेना की गति मंद पड गई है । क्या शत्रु-सेना ने
उसका सामना किया है ? या कोई नदी बीच में पड़ गई है ?'
तब दूषण ने सारा समाचार जानकर कहा—'हे दनुजेश्वर, राम का उद्दण्ड तेज
सारे संसार में व्याप्त हो गया है । इसलिए हमारी सेना की गति मद पड गई है ।'
यह बात सुनकर खर अत्यत क्रुद्ध हुआ और सेना को डाँट-फटकार बताते हुए,
भयंकर रीति से सारी सेना का सचालन करते हुए वह आगे बढा । अत्यधिक भुजबल,
आटोप तथा पराक्रम से समन्वित उस राक्षस-सेना ने गज, रथ, तुरग आदि से युक्त हो,
अत्यत वेग से काकुत्स्थ-वशज राम को इस तरह घेर लिया, जैसे अग्नि-समूह एक साथ
प्रचण्ड दावानल पर आक्रमण कर दे । (इस प्रकार राम को चारो ओर से घेरकर) वे
उन पर, शर, खड्ग, त्रिशूल, करवाल, भाले, मुद्गर, परशु, गँडासा, गदा, पाश, चक्र आदि
विविध आयुधो की वर्षा करने लगे । देवता भयभीत हो उठे । मेघो से आच्छादित भास्कर
के समान थोडी देर के लिए राम दिखाई भी नही पडे । किन्तु तुरन्त उन्होने ऐन्द्रजालिक
की तरह राक्षसो के द्वारा चलाये गये सभी विविध शस्त्रास्त्रो को नष्ट कर दिया । इससे
हर्षित होकर सभी देवता उनकी प्रशसा करने लगे । अविरल गति से राक्षसो के द्वारा
बरसाये जानेवाले शस्त्रास्त्रो को बीच में ही नष्ट करते हुए (राम ने) परिवेश (मडल)
से घिरे हुए मध्याह्न-सूर्य के समान अपने चारो ओर अपने प्रखर तेज का घेरा बनाये हुए,
कोदण्ड को कुडलाकार में झुकाकर, युद्ध के उत्साह से फडकनेवाली भुजाओ से युक्त हो,
अपने तूणीर के अनगिनत बाणो का एक साथ सधान करके, अपने आगे-पीछे तथा
दोनो पार्श्व-भागो में व्याप्त राक्षस-सेना पर उनका प्रयोग किया । उनके इस शर-प्रयोग से
मत्त हाथी और योद्धा कट मरे, अश्व और घुडसवारो के टुकड़े-टुकड़े हो गये, पदचर
सैनिक और उनके आयुध नष्ट-भ्रष्ट हो गये । शिर और शर उनके सामने कट-कटकर