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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

१५८ रंगनाथ रामायण
तेरे बंधुजनों तथा तेरी लंका को भस्मीभूत कर देंगी। जान-बूझकर क्यों विष पी रहा है ?
क्रोधी सर्प के ऊपर पैर क्यों रखता है ? साठ सहस्र वर्ष की आयुवाले मुझे जानता है
या नहीं ? मैं जटायू हूँ । इस पुण्य साध्वी को मुझे सौंपकर चला जा, अन्यथा मैं तेरा वध
कर दूँगा, अपनी चोंच से तेरे धनुष के टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा और वर्म तथा मर्म को
भेदकर तेरे प्राण ले लूँगा और साथ ही जानकी को मुक्त करूँगा।'
तब उस भयंकर राक्षसश्रेष्ठ ने अपना रथ रोका, क्रोधोन्मत्त हो धनुष की टकार की
और लक्ष्य साधकर जटायु पर घोर अस्त्र चलाये। किन्तु उस वीर विहग ने रुष्ट
होकर उसके बाणों को तोड़ दिया और अपने पक्षों से उसके वक्ष पर आघात किया, ललाट
पर चोंच मारी, कंधों पर पद-प्रहार किया और अपने तेज नखों से उसे अत्यधिक पीड़ा
पहुँचाई। तब उस राक्षसकुलेश्वर ने उस खगराज के पक्षों का लक्ष्य करके दस उग्र
बाण चलाये। जटायु ने अपनी चोंच से रावण के धनुष के टुकड़े-टुकड़े कर दिये, उसकी
ध्वजाओं को नीचे गिराकर उसके मुकुट को भी पृथ्वी पर गिरा दिया, सारथी से जूझकर उसका
पेट चीर दिया, आगे बढ़कर उस राक्षस के रथ के अश्वों को मार डाला और अत्यधिक
क्रोध से उसके रथ को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। तब राक्षसराज कंपित होकर पृथ्वी पर
गिरकर फिर उठा और धरणिजा (सीता) को उठाये हुए अपनी माया की शक्ति से आकाश
में और भी ऊँचा उड़ गया। उसे जाते हुए देखकर जटायु ने उसको रोका और
आकाश-मार्ग में महान् वेग से उस पर आक्रमण किया और कहने लगा—'हे पापी, तू
लुक-छिपकर भले ही किसी भी लोक में चला जा, मैं तुझे तिनके की तरह पकड़कर तेरा
वध कर दूंगा।'
तब अत्यंत रोष से दैत्यराज ने अति भयङ्कर मुद्गर उस पर फेंका। जटायु ने
उसे अपनी चोंच से तोड़ दिया और उसके सिर पर चलते हुए उसे कुचल-सा दिया और
उसके सर के केशों को चुनने लगा। रावण ने क्रोध से, बिना भय या संकोच के, उस पक्षीराज
को दृढ़ता से पकड़कर नीचे अपने सामने रखा, और अपनी भयंकर शक्ति को प्रकट करते हुए
अपनी मुष्टियों के प्रहार से उसे पीड़ित करने लगा। दनुजेन्द्र और विहगेन्द्र के बीच
के उस युद्ध को देख देवता आश्चर्यचकित हुए। तब रावण अपने अद्वितीय पराक्रम को
प्रकट करते हुए अपने अति भयंकर खड्ग को खींचकर जटायु के पंखों और पैरों को
काट दिया। तुरत खगपति धरती पर गिर पड़ा।
उसे इस प्रकार गिरते देख वैदेही दुःखी हो किसी वृक्ष के नीचे खड़ी होकर राम का
नाम ले-लेकर विलाप करने लगी। रावण उस परम पतिव्रता को उठाकर बड़े हर्ष से
आकाश के मार्ग से अत्यंत शीघ्र जाने लगा। ब्रह्मादि देवता तथा मुनि आपस में यह कह-
कर हर्षित होने लगे कि अब दशकंठ अवश्य ही राम के हाथों मारा जायगा और हमारे
मनोरथ सफल होंगे।
आकाश-मार्ग से जब रावण अत्यधिक वेग से जाने लगा, तब सीता के चरण का
नूपुर इस प्रकार पृथ्वी पर गिरा, मानो मुरवैरी के लिए उत्पात की सूचना देनेवाली
उल्का हो। उस रमणी के कुचों पर विहार करनेवाले हार टूटकर इस प्रकार जहाँ-तहाँ

पृथ्वी पर गिरने लगे, मानो जाह्नवी की जल-धारा हो । सीता हाहाकार करती हुई मन-
ही-मन कुढती जाती थी । ऋष्यमूक पर्वत पर सीता ने पाँच बलिष्ठ वानरो को देखा, तो
तुरत अपने वस्त्र का थोडा सा भाग फाडा, उसमें अपने आभूषणो को बाँधा और सोचने
लगी कि कम-से-कम ये मेरे आभूषण राम भूपाल को मेरे हरण का समाचार देंगे, तो
राम के द्वारा दशकंठ का वध शीघ्र होगा । इस प्रकार सोचकर उन्होंने उस पोटली को
उनके बीच गिरा दिया । उन (वानरो) ने उस पोटली को तुरत छिपा दिया ।
दनुजाधिपति (यह सोचकर) भय से व्याकुल हो रहा था कि दशरथात्मज उसका
पीछा करेंगे । इसलिए वह पीछे की ओर देखते हुए, भय-विह्वल होते हुए, शीघ्र ही समुद्र
पार कर गया और लका में जा पहुँचा । उस समय कितने ही मृत्युसूचक अपशकुन दिखाई
पडने लगे । वह लका पहुँचकर अनुपम तथा विविध भोगो का आगार अपने महल में गया
और बडे गर्व के साथ जानकी को अपनी सारी संपत्ति दिखाई ।

२२. जानकी को अशोक-वन में रखना
तत्पश्चात् रावण ने बडे हर्ष से सीता से कहा—'हे कमलोचनी, ये मेरे भवन हैं,
यह मेरा धन है, ये मेरे तुरग हैं, ये मेरे गज हैं । यह वे मेरे दिव्य आभूषण हैं,
जिन्हें मैंने सभी देवताओ को परास्त करके प्राप्त किया था, यह पुष्पक-विमान है, जिसे
मैंने कुबेर को जीतकर प्राप्त किया था, ये चारण, अमर, सिद्ध तथा साधको की पत्नियाँ हैं,
जो अलग-अलग मेरी सेवा करती रहती हैं । ये स्त्रियाँ वे हैं, जो घमंडी होकर मेरी
बात स्वीकार नहीं करने के कारण कारागार में तडप रही हैं । वह देखो, नाट्यशाला है,
वह क्रीडा-वन है, ये चन्द्रशालाएँ हैं । तुम इन सब की स्वामिनी होकर अनुपम गति
से समस्त वैभवो का उपभोग करो ।'
तब सीता एक तृण-खंड को हाथ में लेकर, रावण की उपेक्षा करती हुई कहने
लगी—'अरे मूर्ख, तुम्हारा यह पाप तुम्हें यो ही नहीं छोडेगा । वह भयंकर अग्नि बनकर
तुम्हें दग्ध कर देगा । तुम और तुम्हारे बंधु-बांधव अब बहुत दिनों तक जीवित नहीं
रह सकेंगे । अवश्य ही नष्ट हो जायँगे । यह सत्य है । जबतक राम की बाणाग्नि की राशि
में गिरकर तुम्हारा शरीर जल नहीं जायगा, तबतक तुम्हारे ये पाप कैसे कटेंगे ?' फिर
सीता बार-बार परिताप करती हुई बोली—'तुमने आज मुझे ऐसे कलुषित वाक्य सुनाये,
जिनसे मेरा सारा महत्त्व जाता रहा । मेरे गर्व ने मुझे ऐसा कर दिया, मैं अपने भाग्य
को कैसे रोऊँ ?' यो कहती हुई वह उच्च स्वर में रुदन करने लगी । (यह देखकर)
राक्षस-वल्लभ मन-ही-मन बहुत क्रुद्ध हुआ और त्रिजटा आदि स्त्रियो को बुलाकर उन्हें
सीता को दिखाते हुए कहा—'तुम लोग बडी सावधानी से इसकी रक्षा करती रहो और
मुझसे विवाह कर लेने का उपदेश देती रहो । उचित यत्न के साथ इस रमणी को अशोक-
वन में रखो ।' यो कहकर उसने उन्हें भेज दिया और काम-पीडित मन से व्याकुल रहने लगा ।

२३. श्रीराम का दुःख
माया-मृग का वध करने के पश्चात् राम ने और एक हिरन का वध किया और
उसके मांस तथा चर्म को लेकर बड़े हर्ष से लौट रहे थे । सियारो का चिल्लाना सुनकर,

१६० रंगनाथ रामायण
-(मन-ही-मन) वे व्याकुल होते हुए बडी तेजी के साथ निश्वास भरते हुए आ रहे थे कि
वन के मध्य में उन्होने लक्ष्मण को देखा । लक्ष्मण को देखते ही वे अत्यत भय-विह्वल
हुए और बोले—'हाय लक्ष्मण, अत्यत धीर तथा विवेकी होकर भी मेरी आज्ञा के बिना,
सीता को वन में अकेली छोडकर तुम कैसे आये ? तुम इस तरह क्यो आये ? क्या, तुम
नही जानते कि इस पृथ्वी पर रहनेवाले सभी राक्षस हमारे शत्रु है ? भाई, क्या तुम्हें
वंश-मर्यादा, धर्म तथा गुरुजनो की हानि का विचार नही करना चाहिए था ?'
इन बातो को सुनकर लक्ष्मण अत्यत भयभीत हुए । काँपते हुए उन्होने हाथ जोडकर
कहा—'हे प्रभो, त्रिलोकीनाथ, मैं जानता हूँ कि मेरा इस प्रकार चला आना उचित नही है।
जिस कुटिल राक्षस ने माया-मृग के रूप में आपको भटकाकर निदान आपके दिव्य
बाणो की अग्नि-शिखाओ से प्राणत्याग किये, उसने मरते समय 'हाय लक्ष्मण' कहकर
आर्त्तनाद किया । वह आर्त्तनाद जब सीताजी के कानो में पडा, तब वे अत्यत भयभीत हुई
और आपकी श्रेष्ठता को सर्वथा भुलाकर कहने लगी—'भाई लक्ष्मण, क्या बात है ? कुछ
पता लगाओ । हे सौमित्र, तुम्हारे भाई कभी ऐसा दीन आलाप नही करते ।' तब मैने
उनसे कहा—'माताजी, हमारे मन में भय उत्पन्न करने के निमित्त ही क्रूर राक्षस ने ऐसी
पुकार मचाई होगी । कहाँ सूर्य-वंश के अधीश्वर और कहाँ दीन वचन, माताजी आप
विचलित मत होइए ।' तब देवी मुझे अपशब्द सुनाती हुई कोसने लगी और मैं मन ही मन
दुःखी हुआ और वन-देवताओ के सरक्षण में उन्हें छोड़कर यहाँ चला आया । इसलिए प्रभो,
आप इसे मेरी त्रुटि न मानें ।'
इस प्रकार कहते हुए अश्रुपूरित नयनो से लक्ष्मण ने अपने भाई को प्रणाम किया ।
राम ने अपने अनुज को बड़े स्नेह से उठाया, आँखो से गिरनेवाले अश्रुजल को पोछा, और
अत्यत दुःखी होते हुए बोले—'हे तात, आजन्म पवित्र, सर्वज्ञ जनक महाराज की पुत्री होती
हुई, उस प्रख्यात पुण्यशीला सीता का ऐसे वचन कहना ही सभी विपत्तियो का
कारण है—ऐसा विचार करके तुम्हें तो वही ठहर जाना चाहिए था । तुम्हारे जैसे व्यक्ति को
विचलित नही होना चाहिए था ।'
इस प्रकार, सौमित्र को सात्वना देकर राम ने अपनी आश्रम-भूमि में प्रवेश किया और
(उसे सर्वथा निस्तब्ध पाकर) बोले—'हे लक्ष्मण, यह कैसी बात है कि यह आश्रम सर्वथा
शून्य दीख रहा है । वन-देवताओ के हर्ष भरे वचनो की ध्वनि सुनाई नही पड रही है ?
पक्षियो का कलरव नही सुनाई पड़ रहा है । मुनिजनो का सचार यहाँ नही दीख
रहा है ? सीता (मेरे स्वागतार्थ) आगे आती नही दीख रही है ? मेरा मन अत्यत दीन
तथा व्याकुल हो रहा है । आज मेरी बाईं आँख न जाने क्यो फड़क रही है । हाय,
इस वन में न जाने हम दोनो कैसा दुख भोगेंगे ?'
इस प्रकार कहते हुए वे पर्णशाला के पास पहुँचे और दिनकर-रहित दिन-लक्ष्मी के
समान, निशाकर-विहीन रात्रि के समान, सारिका-रहित पिंजडे के समान, कोयल-रहित
आम्र-वृक्ष के समान, देखने में विवर्ण तथा कांतिहीन दीखनेवाले उस पर्णशाला को देखकर
वे मन-ही-मन बहुत अधीर हुए । व्याकुलता के कारण उनका मुख विवर्ण हो गया,

अरण्यकाण्ड १६१
आँखो से अश्रु ऐसे बहने लगे, मानो शोक-रस ही प्रवाहित हो रहा है। वे अपने सूखे
ओठो को आर्द्र करते हुए भग्न हृदय से अपने अनुज को देखकर बोले--'हे लक्ष्मण मैने
अच्छी तरह देख लिया, पर्णशाला में कही भी भूमिसुता का पता नही है। कदाचित्
पुष्प-चयन के लिए गई हो अथवा हमें ढूँढ़ती हुई किसी दूसरे मार्ग से चली गई हो।
पता नही, सरोवर में जल-क्रीडा करने गई हो या अत्यत भयभीत हो कही सतप्त हो रही हो,
निकट पहुँचनेवाले वाघो के भय से कही छिप गई हो अथवा क्रोध से कही अकेली
चली गई हो। मुझे तो कुछ भी मालूम नही हो रहा है कि वह कहाँ गई, जो भी
हो यहाँ तो नही है।'
इस प्रकार तर्क-वितर्क करते हुए उन्होने पर्णशाला के भीतर प्रवेश करके सब स्थानो
में ढूँढ़ा। किन्तु कही भी जानकी को न पाकर उनका मन अत्यधिक सतप्त होने लगा,
शरीर निश्चेष्ट हो गया, ज्ञान-रूपी रवि-शोक-समुद्र में अस्त होने से भ्रान्ति-रूपी अधकार ने
व्याप्त होकर उनके अंतरग तथा नेत्रो को ढक लिया, धैर्य को आवृत कर लिया और
अभिमान को घेर लिया। वे व्याकुल होकर भूमि पर लोट गये। उन्होने यह भी नही
सोचा कि मै पहले ही सीता के (वनवास) दुख से चिंतित हूँ, अब मुझे यह दुख भी
सहना पडा। यह दुख मुझे कैसे प्राप्त हुआ ? कैसे मै इस दुख को पार करूँगा ? हम
क्यो इस वन में आये ? अब मै इससे (लक्ष्मण से) क्या वात कर सकता हूँ ? मै इसका
अग्रज हूँ, यह मेरा अनुज है, हम दोनो इस दुख का भार कैसे वहन करेंगे ?'
इन बातो का विचार किये बिना वे मन-ही-मन क्षुब्ध होकर मदन-पीडित उन्मत्त की
तरह चारो ओर निरुद्देश्य दृष्टि से देखते हुए, अपने महत्त्व को भी भूलकर प्रलाप करने लगे।
वे कभी चिल्लाते—'हे तनुमध्ये (पतली कमरवाली) । इतनी देर तक तुम कहाँ हो ?
शीघ्र आओ।' फिर ऐसी चेष्टाएँ करते, मानो वे आ गई हो और उनका आलिंगन
कर रहे हो। तुरन्त दुखी होते, फिर धीरे-धीरे उनको साल्वना देते। थोडी देर में जब
किंचित् चेतना लौट आती तो कहते--'हाय सौमित्र, अवनिसुता न जाने कहाँ चली गई ?
क्या हो गया उसे, उसके पद-चिह्नो के अनुसार चलकर ढूँढ़ने पर भी वह दिखाई नही
देती, वह पर्णशाला में भी नही है। वह कमललोचनी न जाने किस दिशा में गई है ?
क्या यह दण्डकवन नही है ? क्या यह (हमारा) निवास-स्थान नही है ? क्या यह (हमारी)
पर्णशाला नही है ? क्या मै राम नही हूँ ? तब तो उस चचलाक्षी से विछुडकर मेरे प्राण
अभी क्यो टिके हुए हैं ? उसके वियोग-दुख से यदि मै प्राणो का मोह त्यागकर मर जाऊँ,
तो महाराज दशरथ तो यही सोचेंगे कि यह कैसा पुत्र है, जो व्रत को पूर्ण किये बिना ही
चला आया है ? ऐसी दशा में क्या वे मेरा आदर करेंगे ? ऐसा नही करके यदि मै
व्रत को पूर्ण करके, राज्य करने के लिए राजधानी को लौट जाऊँ और मिथिलेश्वर वहाँ
आयें तो, उन्हें देखकर क्या मै लज्जित नही होऊँगा ? इसलिए तुम मुझे इस कानन में
ही छोडकर राजधानी को लौट जाओ और भरत से कहो कि वह अपनी इच्छा से समस्त
पृथ्वी का शासन करे और माता कैकेयी, सुमित्रा तथा कौशल्या को जानकी के खो जाने
का तथा मेरा समाचार कहो। मेरी बात मानो।'
२१

१६२ रंगनाथ रामायण
इस प्रकार कहते हुए राघव ने अपनी आँखें ऐसे वद कर ली, मानो वे इस समाचार
को मन से वाहर जाने नही देना चाहते थे कि सीता पर्णशाला से अदृश्य हो गई हैं ।
तब लक्ष्मण सारी स्थिति देखकर अत्यधिक शोक से विलाप करने लगे—'मैं अब
किस माता की सेवा करूँगा ? किस माता की आज्ञा का पालन करूँगा ? किसे मैं अपनी
माता के समान मानूँगा ? सूर्यवंश-तिलक के शोक को कैसे शान्त करूँगा ? सभी माताओ
तथा भाइयो के लिए, इनके साथ का जीवन ही जीवन है (ये यदि न रहें, तो दूसरे कैसे
रह सकेंगे) । हाय ! अब तो मनुवंश का ही अंत हो गया ।'
इतने में राम की चेतना लौट आई । उन्होंने उमड़ते हुए शोक से दण्डकवन के
चारो ओर एक वार दृष्टि दौड़ाई, और आँखो में आँसू भर लिये । सीता का स्मरण
करते ही उनका दुःख दुगुना हो गया, धैर्य के छूट जाने से मन और भी शोकाकुल हुआ।
वे बोले—"हाय सीता, तुम चली गईं । तुम अपने शरीर को मेरे इस शरीर से अलग
करके इसे यहीं छोड़कर चली गईं ? सुर तथा असुरो के लिए पूजनीय है, इसका भी
विचार नहीं करके मैंने तुम्हारे लिए शिव-धनुष को भंग कर दिया था । परशुराम ब्राह्मण हैं
इसका भी विचार नहीं करके मैंने उन्हें शत्रु समझकर उनका गर्व भग किया था ।
हे कमलाक्षी, तुम्हारे लिए मैंने इन दोनो निंदाओ को अपने ऊपर ले लिया है । अत मैं
क्रूर दैव ने तुम्हें मुझसे अलग किया है । मैं तो केवल निंदा प्राप्त करने के लिए
रह गया । तुम्हारे मन की अभिलापा देखकर, उसे पूर्ण करके तुम्हें आनन्दित करने के लिए
मैं गया, उस माया-मृग का वध करके उसका चर्म लाया हूँ । अब मैं प्रेम से वह (चर्म)
किसको दूँ ? सब सुखो को भुलाकर, मेरा विश्वास करके मेरे साथ वन में आई हुई
तुम्हारी रक्षा मैं नही कर सका । तुम्हारे जाने का मार्ग जानकर, तुमसे शीघ्र आकर मिल
न सका । समस्त जगत् का गासन करने की महान् शक्ति रखनेवाले के समान शर-चाप
धारण करके इस घोर वन में रहने आया और मूर्ख मति से अपने पूर्वजो की महत्ता को
भी भुलाकर, आज तुम्हें खो बैठा हूँ । हे मृगलोचनी, तुमसे बिछुड़कर मैं इस शरीर में
अपने प्राण कैसे रोक सकूँगा ? हे भूमिसुते ! इस भूमि को छोड़कर मैं और किस स्थान
पर इस शरीर को धारण कर सकूँगा ? हे सुंदरी, तुम्हारी विरहाग्नि तुम्हारे सौंदर्य-सागर
में डूबे विना बुझेगी नही । तुम्हारे शरीर-रूपी नौका के बिना, इस शोक-समुद्र को कैसे
तर सकूँगा ? तुम्हारे कुचो की आड के विना मैं कामदेव की शर-वृष्टि को कैसे सह सकूँगा ?
भगवान् मुझे उस तरफ ले गया और तुम्हें इस तरफ । हम दोनों को अलग करनेवाले
भगवान् के लिए क्या असंभव है ? हे कोमलागी, तुम्हें उठाकर ले जाते समय; तुमने
क्या कहकर विलाप किया था ? तुमने मुझे क्या कहा था ? तुम किस देश में चली गई हो ?
कहाँ रहती हो ? कैसा दुःख भोग रही हो ? क्या कर रही हो ? कौन तुम्हें ले
गया है ? किस मार्ग से गई हो ? हाय, हमारी कैसी दशा हो गई है । तुम्हारी जैसी
निपुणा, तुम्हारी जैसी मुग्धा, तुम्हारी जैसी सौंदर्य-निधि कहाँ है ? तुम्हारे साथ रहते
एक दिन जी भरकर सुख भोगने का सौभाग्य (अब) मिलेगा क्या ? हे जलजनयनी,
तुम्हारे साथ रहने पर मैं यही अनुभव करता था कि साकेतपुरी में ही रह रहा हूँ ।

हे पिकवयनी, तुम्हारे सग रहने पर मै अपने को स्वर्ण-महलो में रहनेवाले के समान ही
समझता था । हे सुदरी, मै तुम्हारे सहवास में अपने को समस्त भोगो को प्राप्त करता
हुआ-सा अनुभव करता था । तुम्हारे साथ रहते हुए सब प्रकार के सुख-भोगो को भोगता
हुआ-सा मानता था । आज ही मुझे ज्ञात हो रहा है कि यह महाकानन है, यह पर्ण-
शाला है, यह तपस्या है, यह दुखमय जीवन है । हे राजकुमारी, हे मृगनयनी, हे कमलाक्षी,
हे लतागी, मै कैसे सतप्त हो रहा हूँ । फिर भी तुम सहानुभूति का एक शब्द भी नही
कहती हो ? आज दैव ने तुम्हारे मद गमन की शोभा हंसो को, ललित चरणो की कान्ति
प्रवालो को, उन्नत कुचो की शोभा चक्रवालो को, करो का अरुण राग पद्मो को,
तन की कान्ति नये जलद की बिजली को, आंखो का वैभव मछलियो को,
शीतल मुख की शोभा चद्र को, उज्ज्वल हँसी चद्रिका को, मधुर भाषण तोते को,
केशो की कान्ति भ्रमरो को, कटि की कृशता आकाश को, देकर तुम्हें निगल लिया है ।
हे वामलोचनी ! हे पद्मगंधी ! हे कमलमुखी ! हे सीते !" कहते हुए दुख-विवश हो
राम भूपाल अत्यधिक व्याकुल हुए । उसके पश्चात् अत्यत दीन होकर वे अपने अनुज को
देखकर बोले- 'हे लक्ष्मण, वह इदीवराक्षी न जाने किस ओर गई है । क्या हम उसे
खोजते हुए चलें ? वह इन लता-समूहो में न जाने कहाँ लीन हो गई है, क्या हम उसे
पुकारें ? वह पृथ्वी की कुमारी न जाने किन पेडों की आड में छिप गई है, क्या हम
चलकर देखें ? वह शुक- जुवाणी न जाने किन सरोवरों में (स्नान करने) गई है, क्या
हम उसका पता लगाने जायें ?' इस प्रकार बार-बार अत्यत दीनालाप करते हुए,
मन-ही-मन खिन्न होते हुए वे असह्य वेदना से पीडित होने लगे ।
(तत्पश्चात्) वे गौतमी के किनारे पहुँचे और उसे सबोधित करके कहने लगे-
'हे लोकपावनी, हे लोकमाता, लोकपावनी सीता का पता क्या आप जानती हैं ? हे लोक-
वधु, हे कर्मसाक्षी (सूर्य), क्या आप जानते है कि सीता कहाँ है ? हे जगत्प्राण, हे सब
स्थानो में सचार करनेवाले (पवन) क्या आप भी नही जानते कि सीता कहाँ है ? हे
लताकुमारी, क्या तुम नही जानती कि वह लतागी कहाँ है ? हे जलज, क्या तुमने उस
जलजातगधी को नही देखा ? हे सिंह, क्या, तुमने उस सिंहमध्या (क्षीण कटिवाली) को
नही देखा ? हे गजराज, क्या तुमने उस गजगामिनी को नही देखा ? हे हरिण, क्या
तुमने उस हरिणाक्षी को नही देखा ? हे पिक, क्या तुमने उस पिकवयनी को नही देखा ?
हे भ्रमर, क्या तुमने उस नीलवेणी को नही देखा ? हे तिलकवृक्ष, क्या तुमने उस तिलक
से अलकृत मुखवाली को नही देखा ?' इस प्रकार भ्रान्त हो, राघव जहाँ-तहाँ जाकर सीता
को ढूंढने लगे, पर कही भी वैदेही का पता न मिलने से, विरहाकुल तथा विवश होकर
रह गये ।
२४. लक्ष्मण का राम को सांत्वना देना
ऐसे दुःखी होनेवाले अपने भाई को देखकर लक्ष्मण ने उनसे कहा- 'हे भाई, आप
समस्त लोको के लिए आराध्य है, उदात्त चित्तवाले है, महान् बलशाली हैं, अपनी स्त्री
के लिए इस प्रकार आप शोक करें, यह उचित नही । हे सूर्यवशाधिप, इस प्रकार का मोह

१६४ रंगनाथ रामायण
तथा शोक आपको क्यो ? यह संसार तो तमोगुण से आवृत है । आप यदि धनुष अपने
हाथ में लें, तो देवता भी आपको देखकर दूर जायेंगे । हे अखिलेग, आप अद्वितीय शक्ति-
शाली हैं । मेरे जैसा व्यक्ति आपका सेवक है । आपके लिए असाध्य क्या हो सकता है ?
आप अपने महत्त्व का विचार क्यो नही करते ?'
तब राम ने अपने आपको सँभाल, शोक तज दिया और अपने भाई को देखकर
बोले—'अब मै जानकी का वियोग किसी भी प्रकार सहन नही कर सकता । मैं अपने
दुर्वार बाणो के सतत प्रयोग से सारी पृथ्वी को चीरकर, पातालवासियो को पीडित करके,
चंद्रमुखी सीता को प्राप्त करूँगा या सप्त समुद्रो को आलोडित करके भूधरो को चूर-
चूर करके, दिग्गजो के कुंभ-स्थलों को फाडकर भूमिसुता को प्राप्त करूँगा । या सभी दिक्-
पालों के हृदयो को चीरकर, सूर्यविम्ब को तोडकर, नक्षत्रो को चूर-चूर करके सारी
पृथ्वी को अधकार में डुबोकर अपनी स्त्री को प्राप्त करूँगा-या अपने दिव्यास्त्रो का
प्रयोग करके सभी राक्षसो को भस्म कर दूँगा, पृथ्वी को राक्षस-रहित कर दूँगा और
वैदेही को साध लूँगा (प्राप्त कर लूँगा) । या समस्त ब्रह्मलोक को छानकर, आदि ब्रह्मा
का सहार करके, सभी प्राणियो में भय उत्पन्न करके, अपने पराक्रम से अपनी स्त्री को
प्राप्त करूँगा । यदि मै अपने बाहुवल का प्रदर्शन नही करूँ, तो क्या, यो ही सुरगण सीता
का पता बतायेंगे ? यह देखो, सभी भुवनो को कँपाती हुई मेरे बाणो की अग्नि-ज्वाला
दीप्त हो रही है । लो, सीता को देखो, मै अभी सीता को ऐसे प्राप्त करूँगा कि सभी
देवता मेरी प्रशसा करने लगेंगे ।'
इस प्रकार कहते हुए उनकी भौंहें ऐसी तन गईं, मानो वे सभी लोको के लिए
उत्पात की सूचना दे रही हो । सभी जीवो के साथ समस्त ब्रह्माण्ड को चूर-चूर करनेवाला
मकर्षण रूप उन्होने धारण किया और प्रलयकाल के रुद्र की भाँति क्रुद्ध होकर धनुष
हाथ में ले लिया । तभी सभी जीव भयभीत हुए, सारी पृथ्वी थरथराने लगी, सभी लोक
व्याकुल हुए, आकाश हिलने लगा, ब्रह्माण्ड मानो टूटने लगा, ब्रह्मा का मत्र मिट गया,
रवि पथ-भ्रष्ट हो गया; नक्षत्र टूटने लगे, शिव भी भयभीत हुए और यक्ष, देव तथा
असुर विचलित हुए ।
तब लक्ष्मण राम के निकट पहुँचकर अत्यधिक भय से, हाथ जोडकर बोले—
'हे प्रभो, आप करुणानिधि हैं; लोक रक्षण-कला में प्रवीण हैं । जनकजा के लिए सभी लोको
का समूल नाश कर देना, क्या आपके लिए उचित है ? एक-एक वन में, सभी समुद्रो में,
जनाकीर्ण नगरों में तथा समस्त देशो में वैदेही को बिना थके ढूँढन के उपरान्त
भी यदि वे नहीं मिली, तब आप अपने क्रोध तथा पराक्रम से उनको प्राप्त कर
सकते हैं ।'
इस प्रकार लक्ष्मण के कहने पर राम ने उनकी बातें बडे स्नेह से मान ली, क्रोध
तजा और धनुष को रख दिया । उनके पश्चात् अखिलेग राम अपने अनुज के साथ दक्षिण
दिशा की ओर चल पड़े । उस समय मार्ग में जहाँ-तहां मीता की वेणी से गिरे हुए फूल,
उस तन्वी के वक्षोजों पर विलसित हारों के रत्न, उनके मणिमय चरण-नूपुर पृथ्वी पर

पड़े हुए देखकर राम अत्यधिक शोक से अभिभूत हुए । उन्होंने विचार करके निश्चय कर
लिया—हाय, निश्चय ही कोई क्रूर दानव उस कुटिल-कुंतला सीता को उठाकर ले गया है ।
यो चिंतित होते हुए वे मार्ग में अन्वेषण करते हुए थोड़ी दूर आगे बढ़े । मार्ग में
जहाँ-तहाँ राक्षस के चरण-चिह्नों को देखते तथा उनका अनुसरण करते हुए वे कुछ दूर
गये । वहाँ उन सूर्यवंशजो ने एक स्थान पर कटे हुए पख, रक्त के कीचड में मृत पड़े
हुए सारथी, उसपर टूटकर गिरे हुए रथ, रथ के पास कटकर गिरे हुए अश्व, पृथ्वी पर
बिखरे हुए पताका के खंड, उनके सामने ही गिरे हुए धनुष के खंड, छितराये हुए अस्त्र-
शस्त्र देखे । (इन सब वस्तुओ को) लक्ष्मण के दिखाने पर राम विस्मित हुए और सोचने
लगे कि किन्ही ने यहाँ पर युद्ध के आनन्द का उपभोग किया है ।
२५. जटायु का अग्नि-संस्कार करना
उक्त योद्धा का पता लगाने के उद्देश्य से रघुराम उस मार्ग में जहाँ-तहाँ ध्यान से देखते
हुए आगे बढे । उस स्थान के निकट ही पख और पैर कटे हुए, रक्त में डूबे, वज्र के
आघात से गिरेहुए मैनाक पर्वत की भाँति विवश पड़े हुए विहगेन्द्र (पक्षिराज) को देखकर
राम ने कहा—'हे लक्ष्मण, देखा तुमने ? चपलराक्षस सीता को निगलकर, अपना निज
रूप दिखाने से डरकर पक्षी के रूप में यहाँ पडा हुआ है । भय से तडपनेवाले इसका वध
मैं कर डालूँगा ।' यो कहते हुए वे धनुष हाथ में लिये उस पक्षी पर आक्रमण करने को
उद्यत हुए । उन्हें देखकर पक्षिराज ने रक्त का वमन करते हुए, लबी साँस भरते हुए,
गद्गद कठ से कहा—'हे राजन्, मैं आपके पिता का मित्र हूँ, कश्यप ब्रह्म का पौत्र हूँ,
अरुण का पुत्र हूँ तथा जटायु नामधारी हूँ । मै इन घने वन तथा शैल-शृंगो पर निवास
करता हूँ । मैंने अपना सारा वृत्तान्त आपको इसके पहले स्पष्ट रूप से निवेदन कर ही
दिया था । हे पुण्यात्मा, ऐसे मुझे यह विपत्ति क्यो कर आई, उसका भी विवरण सुन
लीजिए । आज रावण आपकी देवी को चुराकर लिये जा रहा था, तो मैने उसको रोका
और अपनी अमित शक्ति के साथ उससे युद्ध करके बुरी तरह घायल होकर पृथ्वी पर पड़ा हूँ ।
यह उसका केतु, सूत तथा अश्वो से युक्त रथ है । युद्ध में मेरे द्वारा ये नष्ट
हुए है । तब क्रोध से वह क्रूर राक्षस सीता को उठाकर आकाश-मार्ग से चला गया ।
आप तो आये नही । (अब) मै आपको यह समाचार सुना सका, आपकी शुभ मूर्ति के
दर्शन कर सका । मै पुण्यवान् हुआ ।'
तब राघव का शोक द्विगुण हो उठा । उन्होंने धनुष को फेंक दिया और मूच्छित
होकर धरती पर गिर पड़े । सौमित्र की परिचर्या के उपरान्त उनकी चेतना लौटी, तो वे
बोले—'हाय, महात्मा जटायु ! मेरे कारण आप पर यह विपत्ति आई है ।' उन्होंने
जटायु के शरीर पर हाथ फेरा, और सारा रक्त स्वय पोछा और अपने अनुज को देखकर
बोले—'लक्ष्मण, इन्होंने हमारे लिए रावण का सामना करके इस प्रकार युद्ध किया है ।
ऐसे पुण्यात्मा कहाँ मिल सकते है ? इनके स्वर्ग सिधारने के पहले ही तुम इनसे पूछ लो
कि रावण की राजधानी को जाने का क्या मार्ग है, उसकी शक्ति आदि कितनी है ।'
तुरन्त लक्ष्मण ने रघुराम के कार्य में सहायक जटायु से उस सुरवैरी की शक्ति आदि

१६६ रंगनाथ रामायण

के संबंध में कई उचित प्रश्न किये । तब जटायु ने कुछ बातें बताईं, किन्तु कंठ से फिर
से रक्त बहने के कारण आगे बोल न सके । तब उन्होंने अतुल पुण्यात्मा राम को देखा
और मन में उनका सतत स्मरण करते हुए बड़े आनन्द से मोक्ष-मार्ग को सामने देख
पुलकित होकर प्राण त्याग दिये । राजकुमार उनकी मृत्यु पर, महाराज दशरथ की मृत्यु
से भी अधिक दुःखी हुए और वेद-विधि से उस पक्षिराज का दाह-संस्कार किया ।
२६. कबंध का वध
वहाँ से वे दोनो क्रौंचवन की ओर बढ़े और वहाँ नाना लता, वृक्ष, नग तथा
मृग से भरी एक घाटी में से होकर जाने लगे । वहाँ एक स्थान पर 'अयोमुखी' नामक
एक राक्षसी को देखा । उसके केश पके हुए थे, दाढ़ें लंबी थीं, उदर विशाल था, मुँह
बहुत बड़ा था, आँखें उभरी हुई थीं और कुच घुटनों तक लटक रहे थे । उसकी चेष्टाएँ
पागलो की-सी थीं । उसने सुंदर आकार तथा शुभ लक्षणो से समन्वित लक्ष्मण को देखा,
तो उनपर आसक्त हो गई और उनका हाथ पकडकर रति-क्रीडा के लिए उनसे आग्रह
करने लगी । उन्होंने उस राक्षसी को तलवार की सहायता से वही सुख दिया, जो उन्होंने
शूर्पणखा को दिया था ।
इसके पश्चात् उन्होंने दुंदुभि, पटह तथा तूर्य आदि की ध्वनि से भी अधिक ध्वनि
अपने आगे सुनी । उसके संबंध में जानने के लिए दोनो राजकुमार आगे बढे । वहाँ उन्होंने
एक ऐसे राक्षस को देखा, जिसकी बाँहें एक योजन लंबी थी । वह अपनी बाँहो को फैला-
कर उनके बीच फँसनेवाले किसी भी जंतु को पकडकर तुरंत ही निगल जाता था और
डकार लेता था । उसका सिर बहुत छोटा था और उसका पेट ही उसका मुँह था । इस
प्रकार का आकारवाला, बहुत से जीव-जतुओ का नाश करनेवाला, देवताओ को कष्ट
पहुँचानेवाला मदांध कबध नामक राक्षस को देखकर राम-लक्ष्मण आश्चर्यचकित हुए ।
उसने भी अपने दोनो करो से उन दोनो को पकड़ लिया और अपनी ओर खींचने लगा ।
उस समय अपने अग्रज को देखकर लक्ष्मण ने कहा- 'हे भाई, आप मुझे इस राक्षस का आहार
बनाकर सीता के अन्वेषण में चले जाइए और उन्हें प्राप्त करके समस्त ससार का शासन
करने के लिए (अयोध्या) लौट जाइए ।'
लक्ष्मण की बातो पर विचार करते हुए राम उस राक्षस के हाथो के साथ थोडी
दूर गये । उसके पश्चात् राम तथा उनके भाई दोनो ने खूब सोच-विचार करके अपनी
म्यानो से खड्ग खींचे और उन तेज खड्गो से उस राक्षस के दोनो हाथ काट डाले ।
राक्षस का सारा गर्व चूर-चूर हो गया । वह धरती पर लोट गया और
थोडी देर के बाद सँभलकर उसने उन लोगो से पूछा कि आप कौन हैं ? तब लक्ष्मण ने
श्रीराम का सारा वृत्तांत कह सुनाया, तो उसे (अपने पूर्व जन्म का) ज्ञान हो आया और
वह अपना वृत्तांत सुनाने लगा । (उसने कहा) - "महाराज, मैं दनु नामक स्वर्ग का निवासी हूँ ।
एक महात्मा मुनि के शाप के कारण मै ऐसा हो गया हूँ । मैंने ब्रह्मा से कामरूपत्व
(इच्छानुसार रूप बदलने की शक्ति) तथा चिरायु प्राप्त की और उस गर्व मे ऐसा रूप
धारण करके सभी संयमी जनो को दुख देने लगा । इस सिलसिले में स्थूलशिर नामक

मुनि का अपकार करके मैंने यह भयकर रूप प्राप्त किया । फिर मेरे प्रार्थना करने पर
उस मुनि ने कहा कि आपके द्वारा मेरी शाप-मुक्ति होगी । मैने उस वचन को स्मरण
रखा और इस रूप को धारण करके इन्द्र को युद्ध के लिए न्योता दिया । उसने अपने
वज्र के प्रहार से कठ-सहित मेरे सिर को मेरे पेट में दवा दिया ।”
तब रामचंद्र ने उससे पूछा, 'हे अनघ ! क्या तुम रावण की शक्ति के बारे में
जानते हो ?' तब उसने कहा—'मै तो जानता हूँ, लेकिन मुनींद्र के शाप के कारण मेरा
ज्ञान कुंठित हो गया । आप मेरे शरीर को अग्नि में जलाइए, तो उसके पश्चात् मै सब
कुछ आपको सुना सकता हूँ ।'
उन्होंने अपने धनुष की सहायता से ही उसके शरीर का अग्नि-सस्कार किया ।
तब वह देवता का रूप धारण करके आकाश-मार्ग में एक सुन्दर विमान पर बैठे हुए इस
प्रकार कहने लगा—"हे रघुराम, हे युद्धप्रवीण, हे करुणानिलय, हे गंभीर, हे काकुत्स्थ-
श्रेष्ठ, आपकी करुणा-पूरित दृष्टि के प्रताप से मैने अपनी पूर्व दशा प्राप्त की है। मै अब
आपसे रावण के सबंध में स्पष्ट रूप से कहूँगा, सुनिए—'रावण कुबेर का भाई है ।
पुलस्त्य ब्रह्मा का प्रिय पोता है । उसने अपनी तपस्या की महिमा से ब्रह्मा को प्रसन्न
करके श्रेष्ठ वरदान तथा औन्नत्य प्राप्त किया है । उसने दिग्विजय किया है । वह दानवो
का स्वामी, देवो का शत्रु, दस बड़े शिरोवाला, बीस भुजाओवाला, लवण-सागर से परि-
वृत, लकापुर का राजा है । उसने गर्व से रजत-पर्वत को भी उखाड दिया था ।” इतना
कहकर उसने वह मार्ग भी बताया जिससे होकर रावण सीता को ले गया था, उस मार्ग
के चिह्न बताये और रास्ते में पड़नेवाली सभी वस्तुओ के नाम बताये । उसने यह भी
कहा कि पपा के आस-पास श्रेष्ठ ज्ञानी मतंग मुनि का आश्रम है, उनकी शिष्या शबरी
आपका आदर-सत्कार करेगी । उस स्त्री के निवास के पास यदि आप जायें, तो सूर्यपुत्र से
आपकी मित्रता होगी, जिसकी सहायता से आप जानकी को प्राप्त कर सकेंगे और निदान
साम्राज्य का लाभ भी करेंगे । इस प्रकार कहकर वह स्वर्ग चला गया ।
२७. राम-लक्ष्मण की शबरी से भेंट
दूसरे दिन मनुवश-तिलक वहाँ से निकले और पपा सरोवर के पश्चिंम भाग में
स्थित तरु-लता-समूह से विलसित, प्रबल पुण्यो का आवास, शबरी के आश्रम-स्थल में पहुँचे ।
शबरी उनके स्वागतार्थ सामने आई और बड़ी भक्ति के साथ रामचंद्र के चरणो
पर गिरकर साष्टांग प्रणाम किया । उसके पश्चात् वह श्रीरामचंद्र की स्तुति यो करने
लगी—'हे दशरथ के वरपुत्र, ताडकाविजयी, कौशिक के यज्ञ के रक्षक, मुनियो के ध्येय,
ताडका के पुत्रो को दड देनेवाले, परम पवित्र गगानदी के तट पर पैदल चलनेवाले, निर्मल
पद-रजवाले, अहल्या के उद्धारक, हर के प्रचंड तथा विशाल कोदंड को भग करनेवाले,
भयंकर भार्गव राम का गर्व तोडनेवाले, अभिराम नामवाले, पितृ-वचन का पालन करने-
वाले, सत्कीर्त्तिवाले, विराध के कुकर्मों को रोकनेवाले, सफल मुनित्राता, सत्यसपन्न, खर-
दूषणादि राक्षसो का शिरच्छेदून करनेवाले, मरणार्थी मारीच का वध करनेवाले, सीता-वियोग-
जनित मोह से अभिभूत होनेवाले, खगेन्द्र को मोक्ष प्रदान करनेवाले, महान् विक्रम के

१६६ रंगनाथ रामायण
धाम, अति पुण्यप्रद नामवाले, हे रघुराम, में आज आपके दर्शन कर सकी। मेरी तपस्या
आज सफल हुई। मैंने अद्वितीय पुण्यों को प्राप्त किया। हे काकुत्स्थ, मार्ग के श्रम से
आप बहुत क्लात हुए होंगे, कही और न जाकर आज हमारे आश्रम में ठहर जाइए।
हे अनघात्म, मैंने अपने गुरु मतंग मुनि के द्वारा आपका वृत्तांत सुना है। आप आदिदेव हैं,
सर्वनिगम-वेद्य हैं, अत., आपकी स्तुति करना असंभव है। यह मतंग मुनींद्र का
आश्रम है; तपश्चर्या से परिपूर्ण तथा विश्रामदायक है।
इस प्रकार (उस आश्रम का) महत्त्व बताकर उसने बड़े प्रेम से वन के कंद, मूल,
फल ले आकर उन्हें दिये और राम ने उन फलों को खाया। राम उस रात को वही
ठहर गये और दूसरे दिन घनी जटा-जूट की कवरी धारण करनेवाली शबरी को देखकर
बोले—'सीता की वियोगाग्नि से मैं अत्यंत व्याकुल हूँ, अत, एक स्थान पर ठहर नहीं
पा रहा हूँ; अब मुझे उस उत्फुल्लकमलमुखी सीता को ढूँढने के निमित्त जाना है।
आप कृपया मुझे आज्ञा दें।'
तब शबरी अत्यंत संतुष्ट होकर बोली—'दनु नामक देवता ने आपको भविष्य में
करने योग्य सभी विषयों के सबंध में कहा ही है। फिर भी मैं कहूँगी। हे राजन्, आप
अवश्य ही रावण का वध करेंगे और सीता को प्राप्त करेंगे। इसमें संदेह करने की कोई
आवश्यकता नही है। फिर भी आप अकेले मत जाइए। हे भानुकुलाधिप, यहाँ से आप
ऋष्यमूक पर्वत के निकट जाइए। उस पर्वत पर तीक्ष्ण बुद्धिवाले, सूर्य-पुत्र सुग्रीव नामक
वानर राजा रहता है। वह अपने अग्रज के हाथों अपना राज्य तथा अपनी स्त्री को खो
चुका है। वह शोकातुर है। उसकी वानर-सेना अनंत है। इसलिए आप उसका उपकार
कीजिए जिससे कि उसके मन में आपके प्रति विश्वास उत्पन्न हो जाय। उसके पश्चात्
आप उसके साथ लंका जाइए और अति शक्तिशाली रावण को युद्ध में मारकर अपने बल-
विक्रम की ख्याति चारों ओर फैलाते हुए अपनी स्त्री सीता को प्राप्त कीजिए।
इस प्रकार शबरी ने उन्हें भविष्य में करने योग्य सभी कार्य बतलाकर अपने गुरु
के वचनों का स्मरण किया और तुरंत अग्नि प्रज्ज्वलित करके उसमें अपना शरीर भस्म कर
देने के लिए तैयार हो गई। उस समय आकाश में इन्द्रादि देवता मणियो के प्रकाश से
देदीप्यमान होनेवाले विमानों पर आरूढ होकर इस दृश्य को देखने लगे। नारद, सनक
सनंदन आदि प्रमुख मुनींद्र अत्यंत हर्षित हुए। तब शबरी ने परमधाम, परमकल्याण-
गुण-संपन्न, पूर्णस्वरूप, अव्यय, अविकार, अङ्गिल अंतरात्मा, अव्यक्त अखिलेण, आघात-रहित,
ब्रह्मा ने भी स्तुत्य, संसार के रोगों के वैद्य, और रघुकुल-रूपी समुद्र के लिए चंद्र के
समान शोभित होनेवाले, रघुराम चन्द्र को अपने मन में प्रतिष्ठित करके, बड़ी भक्ति से
उनकी स्तुति की और उस प्रभु के समक्ष ही रामार्पण के रूप में अपने शरीर को अग्नि
में भस्म कर दिया। उसके पश्चात् वह देवताओं के लिए मान्य दिव्य विमान पर आरूढ
होकर देवताओं की विविध सेवाओं को प्राप्त करती हुई बड़े हर्ष से देवलोक को चली गई।
२८. श्रीराम का ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचना
इस प्रकार शबरी अग्नि-मुख के द्वारा स्वर्ग-सुख को प्राप्त हुई। यह देखकर रमणीय

आकारवाले महाबलशाली राम-लक्ष्मण उस स्थान को छोड़कर आगे बढे और उस ऋष्यमूक
पर्वत के निकट पहुँच गये, जो सतत आलोकमय, तया श्रेष्ठमपन्न मुनियो का निवास था ।
उस पर्वत के झरने ऐसे दीख रहे थे, मानो त्रिलोकीनाथ के आगमन के कारण
आनद से उमड़कर, वह पर्वत आनदाश्रु बहा रहा हो । उस पर्वत की तराइयों में अत्यधिक
सख्या में देदीप्यमान चद्रकात मणियो की काति ऐसी दीख रही थी, मानो मेरु, मदर तथा
हिमाचलो का उपहास करनेवाली उस पर्वत की हँसी हो । उस पर्वत की ऊँची चोटियो
पर चमकनेवाले नक्षत्र इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे, मानो ब्रह्मा ने इस पृथ्वी के पर्वत-
राज्य का अभिषेक करके उसके सिर पर मन्त्राक्षत छीट दिये हो ।
उस पर्वत पर उज्ज्वल रूप से दीप्त होनेवाली सूर्यकात मणियो की दीप्ति ऐसी
दीख रही थी, मानो उस पर्वत की शरण में आये हुए सुग्रीव पर अत्याचार करनेवाले वालि
पर क्रुद्ध होकर वह अपने प्रताप की अग्नि दिखा रही हो । उस पर्वत पर विचरण करनेवाले
दतो से युक्त मत्त गज ऐसी शोभा दे रहे थे, मानो नील मेघ उस पर्वत पर विचरण
करते हुए अपनी विजलियो को चमका रहे हो । उस पर्वत के शिखर के निकट ही बहने-
वाली आकाश-गगा, (मन्मथवैरी) शिव के जटा-जूटो पर शोभायमान गगा के समान थी,
उसके आस-पास क्रीडा करनेवाले हसो की पवित शिव का शिरोभूषण चद्र के समान थी ।
उस पर्वत पर रहनेवाले अत्यधिक शृग, वृक्ष तथा पल्लव-समूह शिव के बिखरे जटा-जूट के
समान सुशोभित थे और वह पर्वत सिद्धो की सेवाएँ प्राप्त करते रहनेवाले शिव के सदृश
ही दीख रहा था । उस पर्वत पर रहनेवाले कल्प-वृक्ष, कामधेनुएँ, देव-कन्याएँ, विविध
औषधियाँ, चितामणि जैसी श्रेष्ठ मणियो का समूह, कभी नष्ट न होनेवाली निधियाँ और
सतान-वृक्ष (एक प्रकार का कल्प-वृक्ष) आदि ऐसे दीख रहे थे, मानो इद्रादि देवता, समुद्र-
मथन-से प्राप्त वस्तुओ को (उनके वितरण के समय इद्रादि देवताओ के बीच झगडा
उत्पन्न होने के कारण लाकर यहाँ पर रख दिया हो), या अमृत-पान से बेसुध होकर
भूल से यहीं छोड़ दिया हो, या योग्य स्थान होने के कारण उन्हें यहाँ छिपा रखा हो ।
इस पर्वत को देखकर राघव अत्यत विस्मित हुए और उसकी प्रशसा करने लगे ।
अपने अनुज की अकलक भक्ति-युक्त सेवा प्राप्त करते हुए वे उस शैल के निकटवर्ती
पपा सरोवर के पास पहुँचे और उस सरोवर में नियमानुसार स्नान किया । उसके पश्चात्
वे उस सरोवर के चारो ओर की शोभा का अवलोकन करके अत्यत मुग्ध-से हो गये ।
अपनी क्लान्ति मिटाने के निमित्त वे एक आम के वृक्ष की छाया में बैठे, तो लक्ष्मण उनका
शीतलोपचार करने में प्रवृत्त हुए ।
कुछ समय के पश्चात् राघव ने उस आम के वृक्ष को ध्यान से देवा और लक्ष्मण
से बोले—'हे अनुज, जबसे हमने वन के लिए प्रस्थान किया, तबसे कितने ही ऊँचे पर्वत
और पुण्य नदियाँ देखीं, किन्तु हमने इस वृक्ष के जोड का वृक्ष कही नहीं देखा । कदाचित्
सुरपति आदि देवताओ ने मिलकर इस वृक्ष का निर्माण किया हो, ब्रह्मा ने स्वय प्राण
देकर इसे यहाँ पर प्रतिष्ठित किया हो, या रविमुत (सुग्रीव) की तपस्या से संतुष्ट होकर
ब्रह्मा ने इस वृक्ष को यहाँ उत्पन्न किया हो, या अमृत को प्राप्त करने के बाद सुरो ने सूर्य-
२२

पुत्र का पक्ष लेकर अमृत से सींचकर इस वृक्ष को वर्द्धित किया हो । सूर्य के साथ प्रेम
बढाने के निमित्त इस वृक्ष ने आठो दिशाओ में अपनी उन्नत शाखाओ को फैलाया है ।
इच्छित फल प्रदान करने के निमित्त मानो इसने अपनी शाखाओ की कांति चारो ओर फैला
रखी है । यह अपने पत्तो को फैलाकर, उसकी कान्ति को विकीर्ण करते हुए, सूर्य की रश्मि
भी नीचे आने नही देता; रात्रि के समय यह शशि के प्रेम से अनुरक्त हो उनकी चाँदनी
को पृथ्वी पर पडने नही देता । इसके फल अमृत-फलो की अपेक्षा सौगुने अधिक स्वादिष्ट हैं ।
ऐसा लगता है कि देवताओ ने इस पृथ्वी के वृक्षो के राजा के रूप में इसका अभिषेक
कर दिया है ।
लक्ष्मण ने अपने अग्रज के चित्त का भाव जानकर उनके कथन का अनुमोदन किया
और उनके लिए पत्रो की मृदु शय्या का प्रबंध किया । तब राम ने उस शय्या पर शयन
किया, तो लक्ष्मण रघुराम के चरण दबाने लगे । इस प्रकार अत्यंत शोभा-समन्वित हो उनके वहाँ
रहते हुए कुछ समय व्यतीत हुआ । तब अनघ रघुराम को सबोधित करके लक्ष्मण ऊँचे
स्वर में बोले- 'हे देव, अभी-अभी छिपकली की बोली मुझे सुनाई पडी है कि आप युद्ध में
शत्रु-सेना को जीतकर अवश्य अपनी देवी को प्राप्त करेंगे । सर्वत्र आपकी विजय ही होगी ।'
तब राम ने कहा- 'अब वानरेश्वर बडी श्रद्धा के साथ यहाँ आकर हम से मिलेगा
और हम शीघ्र ही लका जायेंगे । युद्ध में रावण मरेगा और सीता हमें मिल जायगी और
उसके पश्चात् मै राज्य-भार ग्रहण करूँगा ।' इस प्रकार राम के कहने के पश्चात् राम तथा
लक्ष्मण बडी प्रसन्नता से वहाँ रहने लगे ।
आन्ध्र-भाषा के सम्राट्, श्रेष्ठ काव्य तथा आगम आदि के ज्ञाता, आचारवान्, अपार
धैर्य-सागर, भूलोक-निधि गोन बुद्ध राजा ने अपने पिता महनीय गुणसपन्न, मेरु पर्वत के
समान धीर, विट्ठल राजा के नाम पर, आचद्रार्क पृथ्वी पर स्थायी रहनेवाली, असमान
तथा ललित शब्द तथा अर्थों से विलसित रामायण के, अलकार तथा भावो से भरे अरण्य-
काण्ड की रचना इस प्रकार की कि वह इस पृथ्वी पर आचद्रार्क लोगो की प्रशसा प्राप्त
करती रहे । रसिकजनो को सतत आनद देनेवाले, श्रेष्ठ, आर्ष, आदि काव्य-रूपी इस पुण्य
चरित को जो पढेंगे, या सुनेंगे, उन्हें सामादि वेद-समूहो का आधार, रामनाम-रूपी चिंता-
मणि, नव-भोग, परहित-वृद्धि, उन्नत विचार, परिपूर्ण शक्ति, राज्य-सुख, निर्मल कीर्त्ति,
नित्य सुख, धर्म में निष्ठा, दान में आसक्ति, चिरायु, आरोग्य तथा ऐश्वर्य सतत संप्राप्त
होंगे । इसे सुनते रहने से पाप-क्षय, पुत्र-प्राप्ति, शत्रुओ का नाश, धन-धान्य की समृद्धि,
विघ्न-बाधारहित सुन्दर स्त्रियो के साथ जीवन और पुत्रो के साथ सहजीवन सिद्ध होगे ।
सब विपत्तियाँ दूर होंगी, बंधु-बांधवों का सहवास रहेगा, अभिलषित वस्तुओ का वियोग
न होगा, (घरो में) देवता-तर्पण तथा पितरो की तृप्ति होती रहेगी । इस पुण्य चरित
के लिखनेवालों को श्रेष्ठ तथा शुभ उन्नति तथा इद्रलोक का निवास प्राप्त होगा । जब-
तक कुलपर्वत, नक्षत्र, रवि तथा चद्र, दिशाएँ, वेद, पृथ्वी तथा समस्त लोक स्थित रहेंगे,
तबतक यह कथा अक्षय आनंद-समूह का आधार रहेगी ।
ः अरण्यकांड समाप्त ः

श्रीरंगनाथ रामायण
(किष्किंधाकांड)

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१. पंपासर-दर्शन
श्रीराम ने तब शीतल जल तथा कमल, उत्पल एव कुमुदो से सुशोभित पपा सरोवर
को और उसके तटवर्त्ती, वसत ऋतु के कारण, फूल और फल के भार से युक्त चपक तथा
सहकार वृक्षो की शोभा को देखकर जानकी के विरह से कपित होते हुए लक्ष्मण से कहा—
“हे सौमित्र, यह पपा सरोवर इतना मनोहर है कि यह देवताओ की कामिनियो के लिए
भी जल-क्रीडा करने की इच्छा करने योग्य है । इस सरोवर की समता करनेवाला कोई
दूसरा सरोवर वताना, क्या शेषनाग के लिए भी सभव हो सकता है ? इसका महत्त्व
जानने के पश्चात् क्या मानसरोवर भी तुच्छ नही प्रतीत होगा ? पवित्र जीवन का आधार
इस सरोवर की समता, क्या स्वर्गलोक का कोई भी जलाशय कर सकता है ? (जल के)
वाहर निकले हुए मृणालो के ऊपर दीखनेवाली कर्णिकाओ पर (बीजकोष) विकसित श्वेत
कमल, मरकत के स्तम्भो पर स्थित स्वर्ण-कलशो पर आधारित छत्रो की भाँति दीखते हैं ।
दोनो पार्श्वभागो में भ्रमरो के पखो से उत्पन्न शीतल वायु के कारण तरगायमान होनेवाली
लहरो पर डोलनेवाले राजहसो के फैलाये हुए पख चामरो की भाँति सुशोभित हैं ।
इनके कारण यह सरोवर शोभा-रूपी साम्राज्य के लिए अभिषिक्त सा अत्यत मनोहर दीख
रहा है । वसतकाल के समान यौवन की काति से परिपूर्ण हो, छोटे-छोटे पल्लव-रूपी

१७४ रंगनाथ रामायण
माणिक्य के आभूषण पहने हुए ये पेड़ों की फैली हुई शाखाएँ इस स्निग्ध सरोवर रूपी
दर्पण में उझक-उझककर (अपना मुंह) देख रही है । उनकी शिखाएँ मद पवन में इस
तरह हिल रही है, मानो वे अपने सौंदर्य को देखकर प्रसन्नता से अपना सिर हिला रही है ।
यहाँ की शुक-सारिकाएँ इस प्रकार बोल रही है, मानो एक दूसरे की प्रशंसा कर रही है ।
इस सरोवर के तीर की वन-स्थली को देखकर मेरा संताप, मन्मथ के प्रताप के समान,
उद्दीप्त हो उठा है । मेरी धृति भी नष्ट हो गई है ।
"हे सौमित्र, विचार करने पर ऐसा लगता है कि यह वन-भूमि नहीं है, बल्कि
कामदेव का शस्त्रागार है, वे आम्र-पल्लव नहीं हैं, बल्कि मन्मथ के तेज खड्ग है, यह
भ्रमरों का गुजार नहीं है, बल्कि निकट पहुँचनेवाले मन्मथ के धनुष्टंकार है, वे फूलों के
गुच्छ नहीं है, बल्कि मन्मथ के तीक्ष्ण बाण हैं, यह कोयल की मीठी बोली नहीं है, बल्कि
उसके (कामदेव के) कर्णकटु हुकार है । मेरे जैसे स्त्री-विरही इस कानन में कैसे रात्रि
बितायेंगे ? इस वन में सुनाई पड़नेवाला कोयल का कल-कूजन वर्षा ऋतु के बादलों के
घोर गर्जन के समान लगता है, वृक्षों से गिरनेवाले पुष्प-रज का प्रकाश, नये बादलों की
बिजली के समान लगता है, पल्लव-युक्त शाखाएँ इन्द्र-धनुष के समान लगती है, पृथ्वी
पर गिरनेवाले फूल ओले के समान लगते हैं, सतत झरनेवाला मकरद वर्षा के समान
दीखता है । (इन कारणों से) यह वसंत ऋतु भी वर्षा ऋतु के समान दिखाई पड़ती है ।
इस पर भी पल्लव-रूपी अग्नि-ज्वालाओं से, भ्रमर रूपी धुएँ से, वकुल के पुष्परज-रूपी
राख से, सेमर के फूल-रूपी अंगारों से प्रकट होकर, यह ऋतु विरहियों के लिए अग्नि के
समान दीखती है और मन्मथ के प्रताप की अग्नि का भी तिरस्कार करती हुई, मेरे मन
को जला रही है । हाय ! अब मैं क्या करूँ ? कैसे मैं इसे सहन करूँ ? कामिनी-कुल-
भूषणा सीता को मैं कब देखूँगा ? क्या कभी मैं सीता के साथ उस प्रकार मिलकर रह
सकूँगा, जैसे पपा सरोवर के तटवर्त्ती वन की शोभा के साथ वसंत रहता है । इस पपा के
कमलों के समान दीखनेवाले सीता के मुख का मैं कब अवलोकन कर सकूँगा ? यहाँ की
मछलियो की आंखो के समान उस इंदुवदनी की आँखें मैं कब देख सकूँगा ? भ्रमर यहाँ
के पद्मो का मकरद जैसे पान करते है, वैसे ही मैं कब उस सुदरी का अधर-पान करूँगा ?
यहाँ के जलपक्षी जैसे जोड़ों में रहते हैं, वैसे ही उस कमलाक्षी के संग मैं कब रह सकूँगा ?
हाय, यह कैसा विचार है ! अब वह सीता कहाँ ? कहाँ यह विरह ? इन दोनों का मेल
कैसे संभव है ? हे अनुज, अब तुम अयोध्या लौट जाओ । मैं अब अपने प्राणों को रख
नहीं सकूँगा ।",
इस प्रकार अनाथ की तरह शोक करनेवाले राम को देखकर लक्ष्मण बोले—'हे
रघुराम, आप समस्त लोकों का सामना करने की क्षमता रखनेवाले पुरुषोत्तम हैं । ऐसे
मोहजन्य शोक में आप क्यों पीड़ित हो रहे हैं ? सीता को छल से ले जानेवाले रावण
के संहार का उपक्रम कीजिए ।' तभी भासंत नामक पक्षी (शकुन-पक्षी) बोल उठा ।
इतने में उस ऋष्यमूक पर्वत की तराइयों में विचरण करते हुए सुग्रीव ने निकट
ही राम तथा लक्ष्मण को देखा । वह अत्यधिक भयभीत होकर, चीत्कार करते हुए, अपने

मार्ग में पडनेवाले भाड-झखाड की परवाह किये बिना अधाधुध पर्वत पर चढने लगा ।
उसने वानरो को एकांत में बुलाकर उन्हें राम और लक्ष्मण को दिखाते हुए कहा—
'वह देखो, पपा के पास दो व्यक्ति धनुष धारण किये हुए, विविध शस्त्रास्त्रो से सज्जित
होकर ठहरे हुए है । ये प्रच्छन्न वेशधारी, वालि के भेजने पर, हमारा सहार करने आये है ।
अन्यथा, मुनियो को खड्ग, तूणीर, धनुप-बाण आदि की क्या आवश्यकता है ? इनके
पवित्र मुनिवेश देखकर मेरा चित्त व्याकुल हो रहा है । अव हमें यहाँ से कही चला जाना
चाहिए; यहाँ रहना उचित नही है ।'
जब सुग्रीव ने मंत्रियो से इस प्रकार के वचन कहे, तब उन्हे सुनकर विमल विचारो
से भरे हनुमान् बोले—'इन्हें देखने पर ऐसा लगता है कि ये कोई पुण्यात्मा है, ये कपट-
वेशधारी नही है । रवि-चन्द्र के समान दीखनेवाले, ये दयालु व्यकित ही हैं । पता नही कि
इस रूप में वे यहाँ क्यो आकर रहते हैं ? उनका महत्त्व जाने बिना हमें भयभीत होने
की क्या आवश्यकता है ?' तब सुग्रीव ने हनुमान् से कहा--'हमें शका होती है कि ये
वालि के भेजने पर यहाँ आये है, पता नही कि क्रोध से भरा हुआ वालि हमें कब कैसी
हानि पहुँचायेगा । हमें कभी अपने शत्रु का विश्वास नही करना चाहिए । अत हे पवन-पुत्र,
तुम किसी कौशल से उनसे जाकर मिलो और इस बात का पता लगाओ कि ये क्यो
आये हैं । उनके मन की बात जानकर मेरे मन के भय का निवारण करो । शीघ्र जाओ ।'
२. हनुमान् की राम से भेंट
इस प्रकार हनुमान् को विदा करके सुग्रीव अपने मंत्रियो के साथ वहाँ रहने से
डरकर मलयाद्रि पर चला गया । तब अत्यंत शूर, उत्तम गुणवान्, शीलवान्, बाहुबली,
तेजस्वी, कमनीय रूपवाले, वानरों के रक्षक, धर्मार्थमोक्ष के इच्छुक, अतुल गुरु-भक्त, अत्यंत
कुशल, तथा कीर्तिवान्, अजन-सुत हनुमान् उस पर्वत से धीरे-धीरे ऐसे उतरा, मानो वालि को
अमरलोक भेजकर सुग्रीव को राज्य पर प्रतिष्ठित करने, सुरो की रक्षा करने, रावण की
विजय-लक्ष्मी राम को देने, सीता के दुख को दूर करने तथा रवि-पुत्र (सुग्रीव) के
चित्त को मोद-मग्न करने के लिए जा रहा हो । इस प्रकार वह वानरेश्वर पर्वत से
उतरकर आया और वटु का वेश धारण करके पंपा सरोवर के निकट पहुँचा । महात्माओ के
दर्शनार्थ जाते हुए रिक्त हस्तो से जाना उचित नही है, इसलिए राम के देने योग्य एक फल
हाथ में लिये हुए, वह उनके निकट जाने लगा । इस प्रकार आते हुए अनिल-कुमार को
देखकर राम अपने अनुज से बोले—'हे लक्ष्मण, सुनहला रग, मुज की सुंदर करधनी, रत्न-
कुंडलो से विलसित कर्ण, श्रेष्ठ हार, यज्ञोपवीत, कौपीन, तथा हस्त-कंकण धारण किये हुए
किसी मनुष्य ने क्या अनुपम कपि का रूप धारण किया है ? इस रूप को धारण करने
की इच्छा से स्वयं रुद्र ने इस रूप में जन्म तो नही लिया है ? अन्यथा इस पृथ्वी पर
कपिमात्र को ऐसी प्रभा कैसे प्राप्त हो सकती है ?'
इस प्रकार प्रशसा करनेवाले राजकुमार को देखकर पुलकित गात्र से हनुमान् उनके
निकट पहुँचा और बडी प्रीति के साथ फल उनको भेंट किया, मानो कह रहा हो कि में साध्वी
सीता का शिरोरत्न आप को शीघ्र ही ला दूंगा । इसके पश्चात् वह बोला—'हे प्रभो,

१७६ रंगनाथ रामायण
आप ही शरण हैं । आपकी दृष्टि ने मेरा स्पर्श किया । मे विभूषित हुआ । मे कृतार्थ
हुआ । धन्य हुआ । मे आपका प्रिय सेवक हूँ । मेरा नाम हनुमान् है; मे वायु-पुत्र हूँ,
और सूर्य-पुत्र का मंत्री हूँ । अञ्जना-सुत हूँ । मैं भय तजकर भिक्षुक के रूप में आपके विषय
में जानने के लिए आपके पास आया हूँ । आप सुनिए । यशस्वी सुग्रीव वानरों के राजा हैं ।
और परम बलवान् है । वे सूर्य-पुत्र है और सूर्य-सम तेजस्वी है, वे अभिमानी तथा असमान
पराक्रमी है । अपने भाई वालि के द्वारा अपना सारा राज्य खोकर, अत्यंत व्याकुल हो,
वे इस पर्वत पर रहते हैं । वे दुखी है और आपके सखा बनकर रहने योग्य है ।'
इस प्रकार कहकर उसने हाथ जोड़कर राम-लक्ष्मण को प्रणाम किया और बड़ी
भक्ति के साथ आगे कहा—'हे महात्माओ ! इस पृथ्वी के इन्द्र तथा उपेन्द्र के समान,
अश्विनीकुमारों के समान, रवि-चन्द्रों के समान मनोहर रूप, उन्नत स्कंध, चंद्र के समान मंद
हास से युक्त मुख, कमल-दलों को भी परास्त करनेवाले नेत्र, स्वर्ग के निवासियों की भी
प्रशंसा प्राप्त करने योग्य वाहुवलवाले, दुर्लभ राजचिह्नो से सुशोभित, धनुप धारण करनेवाले, आपने
यह मुनिवेश क्यों धारण किया है ? आप कौन हैं ? यहाँ क्यों आये हैं ?'
इस प्रकार के सुधा-मधुर वाक्यों से अत्यंत नम्र होकर जब हनुमान् ने उनसे प्रश्न
किया, तब राम उसकी वाक्-पटुता, बुद्धि-चातुरी, आकृति, मन की प्रीति तथा नीति से प्रसन्न
होकर अपने भाई से बोले—'हे लक्ष्मण, ऐसे वचन कहना ब्रह्मा के लिए या उनकी पत्नी
के लिए ही संभव है, अन्यों के लिए नहीं । कदाचित् यह (वानर) व्याकरण, निगम,
शास्त्रादि का ज्ञाता है । इसके संभाषण तथा रूप अतुल शुभ लक्षणों से समन्वित हैं ।
ऐसा दूत यदि हमें मिल जाय, तो हमारे सभी कार्य सफल होने में कोई संदेह नहीं रहेगा ।
इसलिए तुम इसे मेरे सभी कार्यों का विवरण क्रमशः सुना दो ।'
तब रामानुज ने अत्यंत प्रसन्न होकर हनुमान् को संबोधित करके कहा—'हे अनघ,
हम इक्ष्वाकु-वंश में उत्पन्न दोनों भाई हैं । ये मेरे भाई राम हैं और मैं लक्ष्मण हूँ ।
हम दोनों महाराज दशरथ के पुत्र हैं । राजा दशरथ की आज्ञा से तपस्वियों का-सा जीवन
व्यतीत कर रहे हैं । दुर्मति रावण हमें धोखा देकर राम की स्त्री, भूमिसुता को ले गया है ।
उसके मार्ग का अन्वेषण करते हुए हम वन में फिर रहे थे तो एक स्थान पर शबरी ने
हमें सुग्रीव का समाचार सुनाया था । वह महाबली हमारा मित्र बन जाय, ऐसी कामना
करके हम यहाँ आये हैं । अब तुम हमें स्पष्ट रूप से बताओ कि तुम कौन हो और
तुम्हारा क्या परिचय है ?'
३. हनुमान् का अपने जन्म का वृत्तांत सुनाना
तब हनुमान् ने उन रघुवंशियों को प्रणाम करके निवेदन किया—"हे महात्माओ,
अपनी प्रिय माता के गर्भ से जन्म लेने के कुछ वर्षों के पश्चात् मैंने किसी उद्देश्य से ब्रह्मा
की तपस्या की थी । तब मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर सरसिजभव ने मुझे दर्शन दिये और
बोले—'कोई इच्छा हो तो कहो ।' तब मैंने उनकी परिक्रमा करके उन्हें प्रणाम किया,
सहस्रों प्रकार से उनकी स्तुति की और फिर कहा—'हे विमलात्मा, इस पृथ्वी पर मेरे
मोक्ष तथा इच्छित कार्यों की सिद्धि का आधार तथा मेरा आराध्य कौन है ? मैं किसकी

किष्किन्धाकांड १७७
प्रार्थना तथा सेवा करूँ ?' तब कमलसभव ने अपने मन में विचार करक कहा—'जो
तुम्हारे शरीर के आभूषणो को देख सकेगा, वही तुम्हारा स्वामी और प्रभु होगा । (भाव
यह है कि हनुमान् के आभूषण दूसरो के लिए अदृश्य थे ।) वही हम सब के इष्टदेव,
समस्त प्राणियो तथा इस ससार के कर्त्ता हैं, वे ही विष्णु हैं । जान लो, वे ही तुम्हारे
त्राता तथा प्रभु हैं ।'
'इस प्रकार आदेश देकर ब्रह्मा चले गये । तब से मैं समस्त लोक में विचरण
करता रहता हूँ । हे राजन् ! मेरे आभूषणो की दीप्ति स्वर्ग के निवासी भी नही देख सकते ।'
'तब सौमित्र ने मारुति को देखकर कहा—'हे अनघ, सुनो, राघव की शक्ति लोक-
विख्यात है । वे अनुपम दिव्यास्त्र के ज्ञाता तथा अतुल साहसी हैं, वे करुणा के समुद्र हैं
और गंभीर प्रकृति के हैं, वे शरणागत-त्राता तथा सद्धर्म में तत्पर हैं । वे जगन्नाथ हैं,
अशरणशरण हैं, अगणित गुणों से विभूषित हैं, तेजस्वी, दिव्य पराक्रमी तथा सत्यवादी हैं ।
ऐसे महान् व्यक्ति का सेवक तथा हितेच्छु होकर मे रहता हूँ । राघव के लिए कोई कार्य
असाध्य नही हैं । कुटिल राक्षस का पता लगाकर हम स्वय सीता को ला सकते हैं ; किन्तु
परिश्रम उठाकर अकेले जाना उचित नहीं है और वह राजनीति भी नही है । इसलिए
मेरे प्रभु का विचार है कि तुम्हारे सुग्रीव को अपना मित्र बनाया जाय । अब तुम इस
कार्य को किसी तरह सम्पन्न करो ।'
तब पवन-पुत्र ने अत्यत प्रसन्न होकर अपना निज रूप दिखाया । राम-लक्ष्मण न
उसे अपनाया, इससे उसने अपने को कृतार्थ समझा । तब उसने अपनी आँखो में आनंदाश्रु
भरकर उनकी अत्यधिक स्तुति की । तत्पश्चात् राम और लक्ष्मण ने अत्यत हर्ष से अनिल-
कुमार को विदा किया । हनुमान् अत्यधिक आनद तथा उत्साह से सुग्रीव के पास पहुँचे
और उसे रघुवश के राजकुमारो का वृतात इस प्रकार कहने लगा—'हे सुग्रीव, रमणीय
रूपवाले राम-लक्ष्मण, महनीय गुणो से अलकृत होते हुए इस जगत् में विद्यमान हैं । शोक-
सागर में निमग्न होनेवाले तुम्हें, रघुराम एक नौका के रूप में मिल गये हैं । हे सुग्रीव,
अब तुम सुरक्षित हो गये । तुम्हारा प्रतिशोध पूर्ण होगा । तुम्हें पूर्ण सतोष होगा । मैं
तुम्हारे पुण्य की प्रशसा कैसे करूँ ? सच्चरित्रवान्, दयामूर्ति, सत्यवादी, आजानुबाहु, महा-
विष्णु, श्रीनिवास और पुण्यनिधि, दशरथात्मज राम ही तुम्हारे प्रभु हैं । वे महात्मा जब
अपने पिता की आज्ञा से दडकवन में रहते थे, तब दशानन उनकी पत्नी को चुराकर ले गया ।
उससे युद्ध करके उसका सहार करने के उद्देश्य से वे तुमसे मित्रता करने यहाँ आये हैं ।
इन वातो को सुनकर सुग्रीव हर्षित हुआ । उसने अनिलकुमार को देखकर कहा—
'हे पवनसुत, मेरा सारा भय दूर हो गया । मेरी तपस्या सफल हुई । तुम्हारे जैसे अजन
के प्राप्त होने से मैं राघव-रूपी निधि को देख सका । तुम्हारे जैसे कर्णधार के रहने से
मैं इस शोक-सागर को पार करने में समर्थ हुआ । तुम उन्हें ऋष्यमूक पर्वत पर लिवा
लाओ और मेरे मन का सताप दूर करो । अब तुम जाओ ।'
वायु-पुत्र तुरत रघुराम के पास गया और प्रणाम करके उनसे निवेदन किया—'हे
देव, श्रीमान् का मित्र सुग्रीव, आपके दर्शनो का अभिलाषी है, अत आप पधारें ।' राम
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