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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 508 में से

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पृष्ठ 180

१५० रंगनाथ रामायण
मानो रोहणाचल का समस्त सौंदर्य मृग का रूप धारण किये हुए पृथ्वी पर विचर रहा हो,
अथवा अकेले राहु से भीत होकर चंद्रमंडल पृथ्वी पर घूम रहा हो, अथवा
राक्षस-क्षय करने के हेतु ब्रह्मा ने समस्त सौंदर्य को एकत्रित करके मृग का निर्माण किया हो
और उसे कपट (मन) से भेजने पर यहाँ वह आ गया हो, अथवा जानकी ने
अपनी कुटिल वेणी से इन्द्रनील मणियो का, ‘ दाँतो से मोतियो का, अरुण ओष्ठो से
प्रवालो का, कपोलो से वज्रो का, शरीर की कांति से वैडूर्य का, उदर के ऊपर की रोम-
राजि से मरकत-मणियो का, पाणि-द्युति से पद्मरागो का, और नख-द्युति से गोमेदको का
परिहास किया था । इसलिए सभी रत्न, रत्नगर्भा की पुत्री-रूपी रत्न को सताने के लिए
मृग का रूप धारण करके आये हो, अथवा रघुराम ने सीता के लिए मेरा धनुष तोडा था।
अब में उन्हें व्याकुल करूँगा—यो सोचकर हर के भेजने पर उनके हाथ का हिरन
इस प्रकार आया हो, अथवा सीता के मुख की कांति से पराजित होकर, चंद्र के भेजने
पर आया हुआ माया-मृग हो । इस प्रकार का वह हिरण चित्र-विचित्र वर्णों की कांति
से समन्वित हो, कपट-रूप धारण किये हुए, अनुपम सौंदर्य को प्रकट करते हुए, ढूँढ़-ढूँढ़-
कर तृण चरने लगा । कभी वह अपनी पूंछ की रमणीय कांति से वन के मयूरो को
नचाता, कभी अपने शरीर की कान्ति को विकीर्ण करके सारे वन को सुनहला बना देता था,
तो कभी चौकड़ी भरकर इन्द्रधनुष का-सा दृश्य प्रस्तुत करता था, कभी तो आकाश
की ओर उछलकर विद्युल्लता की-सी ज्योति उत्पन्न कर देता, तो कभी अपने पार्श्वभाग
की कांति से चंद्रकांत मणि को लज्जित कर देता; कभी मृगो के झुंडो के साथ मिलकर
चरने लगता, तो कभी उन्हें डराता, कभी छिप जाता, तो कभी प्रकट हो जाता, कभी
अति निकट पहुँच जाता, फिर इतने में डरकर चौकड़ी भरकर दूर निकल जाता, कभी
पेड़ो की छाया में चला जाता, कभी पर्णशालाओ में घुस जाता, कभी सिकुड़ता, फिर
तुरत ही छलाँग मारकर निकल जाता, कभी वह पृथ्वी को सूँघने लगता, पूंछ हिलाता,
कान खड़े करके कुछ सुनता और तुरत अत्यंत वेग से दौड़ने लगता । कभी निकट पहुँचता,
सिकुड़े हुए अपने शरीर को हिलाता, घास पर लेट जाता, और बड़े स्नेह से मुनियो के
निकट चला जाता, कभी अपने खुरो से अपने कानो को खुजलाता और सींगो से पुष्प-
लताओ को हिलाकर उनके सभी फूलो को गिरा देता । इस प्रकार वह हिरण उस सुन्दर
पर्णशाला के आगे बड़े आनंद से विविध कौतुक करने लगा ।
उसी समय सीता फूल चुनने के लिए आई और उस पर्णशाला की सुंदर भूमि
को अपने मंजुल नूपुरो की मृदु ध्वनि मे भरती हुई, सौरभ मे महकनेवाली पुष्प-लताओ की
झाड़ियो के निकट पहुँचकर फूल चुनने लगीं । तब वह मन को आश्चर्यचकित कर
देनेवाले उस हिरन को देखकर विस्मित हुई और सूर्यवंशाधिप राम को देखकर बोली—
‘हे नाथ, यह देखिए निकट ही एक अद्भुत मृग दीख रहा है । हमने इतने वर्णों का,
ऐसा सुंदर मृग अबतक किसी भी वन में नहीं देखा । इसके चर्म पर सुख से शयन
करने की बड़ी इच्छा हो रही है । इसलिए हे प्राणेश, इसका पीछा कीजिए और इसे मारकर
मुझे इसका चर्म ला दीजिए । नहीं, नहीं, किसी भी उपाय से इसे जीवित ही पकड़कर