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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 508 में से

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पृष्ठ 175

उस पर चलाया । तब वह राक्षस (खर) अपना सारा अकड खोकर वज्रपात से
चूर-चूर होकर पृथ्वी पर गिरनेवाले पर्वत के समान गिर पडा । डेढ मुहूर्त्त
के अंतर (तीन घडियो) में अपने ऊपर आक्रमण करनेवाले खर-दूषणादि चौदह सहस्र
राक्षसो का (राम ने) इस प्रकार वध किया, यह देखकर सुरो ने राम की भूरि-भूरि प्रशसा की ।
मुनियो ने आशीर्वाद दिये, देवताओ ने पुष्प-वृष्टि की । पर्वत की गुफा से शीघ्र
जानकी को साथ लिये हुए लक्ष्मण बाहर आये, राम को प्रणाम किया और उनकी प्रशसा
करते हुए, उनके हाथ में शोभायमान होनेवाले धनुष को ले लिया । हर्ष से भरे हृदय
से जानकीरमण पर्णशाला में गये और युद्ध में मरे हुए राक्षसो का वृत्तात सीता को सुनाते हुए
बडी प्रसन्नता से रहने लगे ।

१३ लंका में अकंपन तथा रावण का वार्त्तालाप

तब अकपन नामक राक्षस प्रकपित हो आर्त्तनाद करते हुए, बडे वेग से लंका गया
और रावण को देखकर कहा—‘हे असुराधिपति, चौदह सहस्र राक्षस वीर तथा खर-दूषण
आदि काकुत्स्थ राम के शरो की अग्नि में भस्म हो गये है । यह सत्य है ।’ यह सुनकर रावण आश्चर्य-
चकित हुआ और उस अकपन को रोषपूर्ण दृष्टि से देखते हुए कहा—‘क्यो रे, कैसी बात
कर रहा है ? कौन है वह राम ? क्या वह कोई कुबेर है, या इद्र है, या यम धर्मराज है ?
वे तीनो मिलकर भी तो हमारे खर-दूषण को जीत नही सकते । ऐसी दशा में वह
अकेले उन प्रतापी वीरो को किस प्रकार जीत सका, स्पष्ट रूप से समझाओ । हम तुम्हें
अभय-दान देते है ।’ तब अकपन निर्भय होकर राघव का वृत्तात, उनके साहस और शौर्य,
खर-दूषण आदि राक्षसों का वध, सौमित्र और जानकी का वृत्तांत आदि से अत तक कह
सुनाया ।
तब रावण अत्यत क्रुद्ध हुआ और युद्ध करने के लिए उद्यत होने लगा । उससे
घनिष्ठ मित्रता रखने के कारण अकपन ने रावण से कहा—‘हे राक्षसराज, रघुराम को
जीतना क्या पक्षिवाहन (विष्णु) या शूलपाणि (शिव) के लिए भी सभव हो सकता है ?
वह निपुण (व्यक्ति) बात-की-बात में आकाश तथा पृथ्वी को जोडने अथवा तोडने की
शक्ति रखता है, दावाग्नि का या पवन का अवरोध करने तथा मुक्त करने में वही समर्थ है ।
सभी लोको का नाश करने या उनका पोषण करने की शक्ति उसी में है, समस्त
ब्रह्माण्ड की रक्षा करने की क्षमता उसी में है, इसलिए में आपको एक उपाय
बताता हूँ । युद्ध की कोई आवश्यकता नही है । उस काकुत्स्थ राम की देवी, लावण्य का
समुद्र (सीता) को यदि आप ला सकें, तो राम उसके वियोग की अग्नि में भस्म हो जायगा ।
यह सुनकर उस राक्षसराज ने उसी को उचित समझकर अकपन की भूरि-भूरि
प्रशंसा की और स्वर्ण-रथ पर आरूढ होकर समुद्र पार किया और धुरंधर मंत्री ताड़का-
पुत्र मारीच के पास पहुँचा । उसने उसे खर-दूषण आदि राक्षसो के वध का वृत्तात सुनाया
और कहा—‘मैं राम की स्त्री सीता को हरकर ले जाने के उद्देश्य से तुम्हारे पास आया हूँ ।’
तब मारीच ने कहा—‘हे रावण, यह कैसी इच्छा है ? किसी अभाव के बिना,
समस्त भोगो का अनुभव करके भी ऐसी दुष्ट बुद्धि तुम में कैसे उत्पन्न हुई ? किस दुष्ट-बुद्धि
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