रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअरण्यकांड १४७
भाई का रूप कैसा है ? उसकी स्त्री सीता का रूप कैसा है ? तुम अपनी देखी हुई बातो
का पूरा विवरण दो, तो मै उनकी रक्त-धाराओ से तुम्हारी प्यास बुझाऊँगा ।'
तब शूर्पणखा बडी प्रसन्नता से यो कहने लगी—'रामचन्द्र उन्नत वक्षवाला,
श्यामालोत्पल वर्णवाला, सभी लोको में श्रेष्ठ रूपवान्, सूर्य-मडल के तेज को परास्त करनेवाला
तेजस्वी, धीर, आजानुबाहु, महान् पराक्रमी और कमलो के समान नेत्रवाला है । उसी योद्धा ने
अकेले खर, दूषण आदि राक्षसो को परास्त किया था । सौमित्र हेमवर्णवाला है और
दूसरी बातो में अपने भाई के समान ही सभी गुणो से सपत्र है । उसी ने मेरी ऐसी गति
कर दी है । अब सीता की सुदरता के सबध में भी जान लो । मैने देवताओ की स्त्रियो को,
राक्षस-स्त्रियो को, किन्नर-अंगनाओ को, भोगिनी कामिनियो को, गधर्व-पत्नियो को,
यक्ष-काताओ को अच्छी तरह देखा है । मैने पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती तथा रति को भी
देखा है । मैने रभा, शची तथा त्रिभुवनो में रहनेवाली सभी स्त्रियो को देखा है, मुनि-
पत्नियो को देखा है और ब्राह्मण-स्त्रियो को भी देखा है । किन्तु वैसे कुच, वैसी आँखें,
वैसी मधुर बोली, वैसे कपोल, वैसी नाक, वैसा सौदर्य, वैसे चिकुर, वैसे कटाक्ष, वैसे उरु,
वैसे हाव-भाव, वैसी मद हँसी, वह मद-गमन, और वह विवेक किसी भी स्त्री में नही
देखा । मै कैसे सीता की प्रशसा करूँ ? वह स्त्री सभी लोको पर राज्य करनेवाले तुम्हारे
जैसे पति के लिए ही योग्य है, अन्यो के लिए योग्य नही है । वह चन्द्रमुखी, वह
चकोराक्षी, वह नवयुवती, वह कुद-सम दाँतवाली, वह गजगामिनी, वह नवल-लतिका, वह
मानिनीमणि, वह पुष्पगधि, वह स्त्री, तुम्हारी स्त्री होकर रहे, तो हे दनुजैश, तुम्हारे राज्य
की शोभा बढेगी ।'
१५ रावण का पुनः मारीच के पास जाना
कामातुर रावण ने जब देखा कि इस स्त्री की बातो तथा अकपन की बातो में
कितनी समानता है, तो वह अत्यत विस्मित हुआ । उसने राजसभा स्थगित कर दी और
भाग्य से प्रेरित होकर एकान्त में चला गया और सारथी को बुलाकर रथ लाने की आज्ञा दी ।
सारथी के रथ लाते ही वह सूर्य-किरणो के सदृश अनुपम आयुधो से परिपूर्ण उस
रथ पर आरूढ होकर करोड सूर्यो की दीप्ति से विलसित होते हुए आकाश-मार्ग से समुद्र
के मध्यभाग से जाते, विविध वस्तुओ को देखते समुद्र पार कर गया और पूगीफल, मिर्च,
अगरु, नारिकेल, साल, हरेणु, रसाल, विशाल आदि वनो को बडे कौतुक के साथ देखता
हुआ चला । पहले, गरुड के सुधा-कलश को लाने के लिए जाते समय, गज-कच्छपो को
खाने के लिए, जिस वृक्ष पर अपना पैर रखा था, उस वृक्ष को, तथा उस पर पक्षीद्र के
द्वारा कृत चिह्न को और शत योजनो तक फैली हुई शाखाओ से विलसित, मुनियो से घिरे
हुए सुभद्र नामक वटवृक्ष को बडी प्रसन्नता से देखा और महान् महिमा-समन्वित
आसुचन्द्र आश्रम में जटा-वल्कल धारण किये हुए, शात चित्त तथा सौम्य भाव मे अत्यधिक
तपोनिष्ठा से रहनवाले मारीच के पास पहुँचा और उससे आदर-सत्कार प्राप्त करने के
पश्चात्, अत्यत दीन होकर उससे अपने आगमन का कारण यो कहने लगा—'हे मारीच,
तुम मेरे अतरग मत्री हो, इसलिए मै यहाँ आया हूँ । सूर्यवंशी रामचन्द्र अपने पिता की