रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० रंगनाथ रामायण
लेकर चला । यह देखकर देवताओ के साथ सारा स्वर्ग काँप गया और सभी पहाड़ो से
युक्त पृथ्वी हिल उठी । खर ने रण-भेरी बजाई और सुमेरु-पर्वत की आभा के समान
दीखनेवाले चितकबरे रंग के अश्वो से युक्त, मणिमय कूबर तथा दस स्वर्णमय चक्रो से
समन्वित, रण में विजय प्रदान करनेवाले, धनुष-बाण और खड्गो से भरे, किंकिणि-ध्वनि से
मुखरित होनेवाले रथ पर चढ़कर वह रण-विद्या-विशारद राम पर आक्रमण के लिए निकल पड़ा ।
(उसके पीछे-पीछे) बाज के पंखो के समान बाणवाला, बिजली की समता रखनेवाला,
त्रिशिर (नामक राक्षस) सभी दिशाओ की काति को मलिन करता हुआ, सूर्य की
कांति के समान उज्ज्वल, श्रेष्ठ गधो के समूह से खीचे जानेवाले स्वर्ण से आच्छादित रथ
पर बैठकर बड़े गर्व के साथ उस महायुद्ध के लिए रवाना हुआ । उसके आगे-आगे मयूर
की छटा को मात करनेवाले, पवन की गति का भी तिरस्कार करनेवाले, काति-युक्त शीघ्र-
गामी अश्व-समूह के द्वारा खींचे जानेवाले उत्तम रथ पर बैठकर, अत्यधिक उत्साह से बड़े
ठाट-बाट के साथ (खर) जा रहा था । पृथुग्रीव, श्येनगामी, विहंगमुख, मेघमाली, महामाली
प्रलयकाल की कालाग्नि की समता करनेवाला सर्पमुखी, कालकार्मुक, दुर्जय, यज्ञ-शत्रु, परुष,
करुणा-रहित, करवीरनेत्र और रुधिराशन नामक बारह प्रतापी राक्षस वीर, बारह आदित्यो
के समान, बड़ी श्रद्धा से खर के पीछे जा रहे थे । त्रिशिर, प्रमाथी, रणकुशल, महाकपाल
और स्थूलाक्ष, (आदि राक्षस) उस रण-मदमत्त सेना के साथ चारो ओर सावधान होकर
चल रहे थे ।
(इस प्रकार जब राक्षस-सेना निकली), तब भयंकर गज-समूहो के चिघाड़ने, घोड़ो
के हिनहिनाने, रथो के चलने तथा पदचरो के हुँकारने की ध्वनि तथा पताकाओ के फड़फड़ाने
की ध्वनि से पृथ्वी धँस गई, दिशाएँ चूर-चूर हो गई, समुद्र उमडने लगे और सभी भूत
थर-थर काँपने लगे । सेना के चलने से जो धूल उडी, उसने आकाश को ऐसा ढक दिया
कि संदेह होने लगा कि रवि-मंडल है या नही । इसी समय खर की पताका पर चील
बैठने लगे । घोड़े घुटने टेकने लगे, रक्त की वर्षा होने लगी, सियार रोते हुए सेना के
बीच से दौड़ने लगे, नक्षत्र टूटने लगे, पक्षियो की ध्वनि चारो ओर सुनाई पड़ने लगी ।
इसी प्रकार के कितने ही उत्पात पृथ्वी और आकाश में होने लगे । फिर भी खर बिना
भयभीत हुए आगे बढ़ता गया और दण्डक-वन में पहुँच गया । अनुपम आकारवाले राम उस
कोलाहल को सुनकर पर्णशाला के बाहर आकर खड़े हुए और पृथ्वी तथा आकाश में दीखने-
वाले अपशकुन को देखकर, शीघ्र अपने अनुज को बुलाया और कहा—'सौमित्र, युद्ध-सूचक
चिह्न कितने ही दिखाई पड रहे है । कदाचित् वह निंद्य और नकटी राक्षसी अपने साथ और
सेना ला रही है । वह सुनो, सेना का रणघोष सुनाई पड रहा है । वहाँ देखो, सेनाओ
के चलने से धूल आसमान में छा रही है । जानकी का अब यहाँ रहना ठीक नहीं ।
इसलिए सावधान होकर तुम शीघ्र ही उन्हे अपने साथ ले जाकर पर्वत की गुफा में ठहरो ।
तब लक्ष्मण ने कहा—'हे सूर्यवंश-तिलक, आपको यहाँ छोड़कर में कैसे जा सकता हूँ ?
आप ही सीताजी के साथ पर्वत की गुफा में जाकर देखते रहिए । मै आपकी कृपा
से इन दुर्वार राक्षसों का वध करूँगा ।' ये बातें सुनकर राम ने कहा—'इनसे युद्ध करना