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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 508 में से

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पृष्ठ 187

अरण्यकांड १५७
'हाय रघुराम' का आर्त्तनाद स्पष्ट रूप से सुना । यह आर्त्तध्वनि सुनकर उसने भय तथा
आश्चर्यचकित हो, सिर उठाकर सारे आकाश तथा सभी दिशाओ में अपनी दृष्टि दौड़ाई
और मन-ही-मन कहने लगा—'दया-रहित हो रावण उस राम की पत्नी को अपने यहाँ
ले जा रहा है । उस दिन जब से मुझे राम ने देखा, तब से वे मेरे साथ घनिष्ठ मित्रता
का व्यवहार कर रहे हैं । अब इस राक्षस के दुष्कर्मों को सहना ठीक नही है । अपना
शौर्य दिखाकर मै अकेले ही इस राक्षस का वध करूँगा और वैदेही को छुड़ा लाऊँगा या
सूर्यवंशाधिप राघव के लिए युद्ध में अपने प्राण छोड़ दूंगा ।'
ऐसा निश्चय करके, उसने अपने सुदृढ शरीर को बढाकर आकाश की तरफ ऐसे
उछल पडा, जैसे वज्र के वार का सहन न कर सकने के कारण महापर्वत आकाश में उड़
रहा हो । (उसके उड़ते समय) पर्वत-श्रृंग (उसके पैरो का टक्कर खाने से) चूर-चूर
हो गये । उसने अपने मुंह में रखे हुए मास-खंडो को पृथ्वी पर थूक दिया । भयंकर रूप
से उसके नखो में फँसे हुए करि, सिंह, शरभ आदि मृगो के सिर (उसके पैरो से छूटकर
पृथ्वी पर) लुढ़कने लगे । उसकी बलिष्ठ चोंच की दीप्ति तथा पंखो की आभा (चारो
ओर) विकीर्ण होने लगी । अत्यधिक क्रोध से उसकी आँखें प्रचंड दीखने लगी, पंखो के
द्वारा उत्पन्न पवन से पर्वत-शिखरो पर रहनेवाले वृक्ष टूटकर दिशाओ को भरने लगे ।
वह रावण की ओर इस प्रकार आने लगा, मानो रावण के (मन के) तम को दूर करने
के लिए आनेवाला मध्याह्न का सूर्य हो, या बली रावण-रूपी सूर्य को निगलने के लिए
बडे भयंकर रूप से आनेवाला राहु हो, या रावण-रूपी राहु को निगलने के लिए अत्यधिक
वेग से आनेवाला तार्क्ष्य (एक मुनि) हो । जटायु कहने लगा—'हे कुटिल राक्षस, ठहर,
ठहर, आगे मत बढ । तू रघुराम नृपचन्द्र की देवी को कहाँ लिये जा रहा है ? अब कहाँ
ले जा सकेगा ? कहाँ जायगा ? किम ओर जायगा ? यदि तू जाना भी चाहे, तो जाने
न दूंगा, तुझे मै मारूँगा, काटूँगा, खंड-खंड कर दूंगा, दंड दूंगा और पोली लकडी के समान
(तेरे) सिरो को काट दूंगा ।' इसके पश्चात् वह सीता को देखकर कहने लगा—'हे देवी,
दुःखी मत होइए । इस भयंकर राक्षस का वध करके मै आपको इसके हाथो से छुड़ाऊँगा ।'
भयंकर निदाघ के मध्य बादलो का गर्जन जैसे मयूरो को प्रसन्नता पहुँचाता है,
वैसे ही इन वचनो से सीता को कुछ सांत्वना मिली । कुम्हलाये हुए मुंह से, अत्यत दुख
से कुढती हुई सीता बोली—'हे जटायु ! हे भाई ! देखो यह सुरवैरी राम-लक्ष्मण को वंचित
करके घमंड से मुझे उठाकर ले जा रहा है ।' इन बातो को सुनकर अरुणनंदन (गरुड)
क्रोधोन्मत्त होकर रथ के आगे आकर खडा हो गया और प्रलय-काल के बादलो के निर्घोष
की भाँति कठोर वचनो से बार-बार दशकंठ को डाँटते हुए अत्यधिक साहस के साथ कहने
लगा—'हे रावण, तू परम पवित्र ब्रह्मा का पोता है, पुण्यात्मा विश्रवसु का पुत्र है,
कुबेर का भाई है और दानवश्रेष्ठ है, क्या तेरे लिये ऐसा काम उचित है ? तू जगदेकपति
नृप राम की पत्नी को बलात् लिये जा रहा है, यह उचित नहीं है । तुझे तो राम
से लडकर उसके पश्चात् उनकी स्त्री को लाना चाहिए था । उनको धोखा देकर, उनकी
स्त्री को इस प्रकार लाया है । क्या यह कोई शूरता है ? अरे, राम की क्रोधाग्नि तुझे