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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 179, कुल 508 में से

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पृष्ठ 179

अरण्यकांड ९४६
का जीवन व्यतीत कर रहा हूँ । हे रावण, तुम राम की शक्ति को नहीं जानते । हमारी
शूर्पणखा अपने भद्दे रूप का विचार नहीं करती, अपनी दशा के बारे में नहीं सोचती ।
उन अनुपम गुणधाम, अभिराम, रामचन्द्र पर यो फूली-फूली आसक्त होना क्या उचित था ?
उसने स्वयं ही (अपने अपराध से ही) अपना रूप ऐसा विकृत करवा लिया । इसपर
क्रुद्ध होकर खर और दूषण रघुराम पर आक्रमण करने गये और उनकी वाणाग्नि की
ज्वालाओ में दग्ध हो गये । उनके कारण तुम क्यो मतिभ्रष्ट हो राम का शत्रु बनकर
अपने को नष्ट करना चाहते हो । यह न उचित है, न नीतिसगत है । इसलिए तुम
अपना विचार छोड़ दो और लका लौटकर प्रसन्नता से रहो । किसी भी प्रकार तुम विचार
करो, यह अनुचित कार्य ही है । यदि मै प्रयत्न करके जाऊँ भी, तो राम के बाण से मेरे
प्राण नहीं बचेंगे । मैं तुम्हारा अपकार कभी नही करूँगा । मैं अपने मन में कभी तुम्हारे
अहित की इच्छा नहीं करता । इसलिए तुम अवश्य मेरी बात मानो । मैं जो कहता हूँ,
उसे हित-वचन मानो । तुमने तो कहा था कि यदि तुम यह कार्य करोगे, तो मै अपना आधा
राज्य दूंगा । किन्तु कौन कह सकता है कि रघुराम को छेड़कर मै जीवित लौट आ सकूँगा ?"
मारीच के इन वचनों को सुनकर रावण क्रोध-विवश होकर बोला—'एक साधारण
मानव को तुम लोकरक्षक, तीनो लोको को भयभीत करनेवाला, तथा मुझसे श्रेष्ठ बतलाते हो ।
तुम अपने प्राणों के भय से ऐसा प्रलाप कर रहे हो और मुझे भयभीत करने के
लिए बातें बना रहे हो । तुम नहीं सोचते कि मैं राजा हूँ । मेरी आज्ञा की तुम अव-
हेलना करते हो । अब मुझे तुम्हारी आवश्यकता ही क्या है । साथ कर लेने
के लिए तुम्हें बुलाया भी, तो मेरी ऐसी दशा हुई ।'
इस प्रकार कहकर रावण मारीच का वध करने के लिए उद्यत हुआ । उसका
क्रोध देखकर मारीच ने मन-ही-मन सोचा—'इस नीच के हाथ से मरने की अपेक्षा उस
राम के हाथो से मरना ही भला है ।' इसके पश्चात् उसने राक्षसराज को देखकर
कहा—'उचित बात कहने पर तुम ऐसा क्रोध क्यों करते हो ? अच्छा उपदेश देनेवाले
मंत्रियो का वध करनेवाले राजा कही हो सकते हैं ? ठीक है, तुम जो कहो, मैं उसके
अनुसार करूँगा ।' तब रावण ने बडे स्नेह से उसको क्षमा कर दिया और उसे अपने
रथ पर बैठाकर अत्यंत वेग से उसके साथ पंचवटी में पहुँच गया । कामातुर की बुद्धि
ऐसी ही होती है । बुरे मार्ग को वह क्यों त्यागने लगा ?
१७ मारीच का माया-मृग के रूप में आना
मारीच रथ से उतर गया और उस राक्षसराज की प्रार्थना के अनुसार, (स्वयं
मायावी होने के कारण) अच्छी तरह सोच-विचारकर राक्षस-शक्ति के प्रभाव से सुंदर
माया-मृग का रूप धारण किया । उस माया-मृग का शरीर सुनहला था, उसका विशाल
नेत्रयुग्म इन्द्रनील मणि के समान था, उसकी भौहें प्रवाल की-सी और कान उज्ज्वल वज्र
के-से थे, नीले खड्ग के समान उसके मरकत के सींग थे, मोतियो का-सा उसका पृष्ठ-
भाग था, रत्न-बिंदुओ के समान (उसके शरीर पर) धब्बे थे, नव पद्मराग के समान
उसका उदर था, और उसके खुर रजत के समान चमकते थे । वह मृग ऐसा प्रतीत होता था