महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3207, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंजब ये शान्तनुनन्दन भीष्म भी आज शत्रुओंके बाणोंसे मारे जाकर सो रहे हैं तो यही कहना पड़ता है कि 'युद्धमें न कोई कुशल है, न विद्वान् है और न पराक्रमी ही है' ।। २२ ।।
स्वयमेतेन शूरेण पृच्छ्यमानेन पाण्डवैः ।
धर्मज्ञेनाहवे मृत्युरादिष्टः सत्यवादिना ।। २३ ।।
पाण्डवोंके पूछनेपर इन धर्मज्ञ एवं सत्यवादी शूरवीरने स्वयं ही अपनी मृत्युका उपाय बता दिया था ।। २३ ।।
प्रणष्टः कुरुवंशश्च पुनर्येन समुद्धृतः ।
स गतः कुरुभिः सार्धं महाबुद्धिः पराभवम् ।। २४ ।।
जिन्होंने नष्ट हुए कुरुवंशका पुनः उद्धार किया था, वे ही परम बुद्धिमान् भीष्म इन कौरवोंके साथ परास्त हो गये ।। २४ ।।
धर्मेषु कुरवः कं नु परिप्रक्ष्यन्ति माधव ।
गते देवव्रते स्वर्गं देवकल्पे नरर्षभे ।। २५ ।।
माधव! इन देवतुल्य नरश्रेष्ठ देवव्रतके स्वर्गलोकमें चले जानेपर अब कौरव किसके पास जाकर धर्मविषयक प्रश्न करेंगे ।। २५ ।।
अर्जुनस्य विनेतारमाचार्यं सात्यकेस्तथा ।
तं पश्य पतितं द्रोणं कुरूणां गुरुमुत्तमम् ।। २६ ।।
जो अर्जुनके शिक्षक, सात्यकिके आचार्य तथा कौरवोंके श्रेष्ठ गुरु थे, वे द्रोणाचार्य रणभूमिमें गिरे हुए हैं, उन्हें भी देख लो ।। २६ ।।
अस्त्रं चतुर्विधं वेद यथैव त्रिदशेश्वरः ।
भार्गवो वा महावीर्यस्तथा द्रोणोऽपि माधव ।। २७ ।।
माधव! जैसे देवराज इन्द्र अथवा महापराक्रमी परशुरामजी चार प्रकारकी अस्त्रविद्याको जानते हैं, उसी प्रकार द्रोणाचार्य भी जानते थे ।। २७ ।।
यस्य प्रसादाद् वीभत्सुः पाण्डवः कर्म दुष्करम् ।
चकार स हतः शेते नैनमस्त्राण्यपालयन् ।। २८ ।।
जिनके प्रसादसे पाण्डुनन्दन अर्जुनने दुष्कर कर्म किया है, वे ही आचार्य यहाँ मरे पड़े हैं। उन अस्त्रोंने इनकी रक्षा नहीं की ।। २८ ।।
यं पुरोधाय कुरव आह्वयन्ति स्म पाण्डवान् ।
सोऽयं शस्त्रभृतां श्रेष्ठो द्रोणः शस्त्रैः परिक्षतः ।। २९ ।।
जिनको आगे रखकर कौरव पाण्डवोंको ललकारा करते थे, वे ही शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य शस्त्रोंसे क्षत-विक्षत हो गये हैं ।। २९ ।।
यस्य निर्दहतः सेनां गतिरग्नेरिवाभवत् ।
स भूमौ निहतः शेते शान्तार्चिरिव पावकः ।। ३० ।।