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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

१६७-

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सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

कर्णके द्वारा सहदेवकी पराजय, शल्यके द्वारा विराटके भाई शतानीकका वध और विराटकी पराजय तथा अर्जुनसे पराजित होकर अलम्बुषका पलायन

संजय उवाच

सहदेवमथायान्तं द्रोणप्रेप्सुं विशाम्पते ।
कर्णो वैकर्तनो युद्धे वारयामास भारत ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—प्रजानाथ! भरतनन्दन! द्रोणाचार्यकी लक्ष्य करके आते हुए सहदेवको युद्धस्थलमें वैकर्तन कर्णने रोका ॥ १ ॥

सहदेवस्तु राधेयं विद्ध्वा नवभिराशुगैः ।
पुनर्विव्याध दशभिर्विशिखैर्नतपर्वभिः ॥ २ ॥
सहदेवने राधापुत्र कर्णको नौ बाणोंसे बींधकर झुकी हुई गाँठवाले दस बाणोंद्वारा पुनः घायल कर दिया ॥

तं कर्णः प्रतिविव्याध शतेन नतपर्वणाम् ।
सज्यं चास्य धनुः शीघ्रं चिच्छेद लघुहस्तवत् ॥ ३ ॥
कर्णने बदलेमें झुकी हुई गाँठवाले सौ बाण मारे और शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले वीर योद्धाकी भाँति उसने उनके प्रत्यञ्चासहित धनुषको भी शीघ्र ही काट दिया ॥

ततोऽन्यद् धनुरादाय माद्रीपुत्रः प्रतापवान् ।
कर्णं विव्याध विंशत्या तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ४ ॥
तदनन्तर प्रतापी माद्रीकुमार सहदेवने दूसरा धनुष हाथमें लेकर कर्णको बीस बाणोंसे घायल कर दिया। वह अद्भुत-सा कार्य हुआ ॥ ४ ॥

तस्य कर्णो हयान् हत्वा शरैः संनतपर्वभिः ।
सारथिं चास्य भल्लेन द्रुतं निन्ये यमक्षयम् ॥ ५ ॥
तब कर्णने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे सहदेवके घोड़ोंको मारकर एक भल्लका प्रहार करके उनके सारथिको भी शीघ्र ही यमलोक पहुँचा दिया ॥ ५ ॥

विरथः सहदेवस्तु खड्गं चर्म समाददे ।
तदप्यस्य शरैः कर्णो व्यधमत् प्रहसन्निव ॥ ६ ॥
रथहीन हो जानेपर सहदेवने ढाल और तलवार हाथमें ले ली; परंतु कर्णने हँसते हुए-से बाण मारकर उनकी उस तलवारके भी टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ ६ ॥

अथ गुर्वीं महाघोरां हेमचित्रां महागदाम् ।

प्रेषयामास संक्रुद्धो वैकर्तनरथं प्रति ।। ७ ।।
तब सहदेवने अत्यन्त कुपित होकर एक सुवर्णजटित अत्यन्त भयंकर विशाल गदा सूर्यपुत्र कर्णके रथपर दे मारी ।।
तामापतन्तीं सहसा सहदेवप्रचोदिताम् ।
व्यष्टम्भयच्छरैः कर्णो भूमौ चैनामपातयत् ।। ८ ।।
सहदेवके द्वारा चलायी हुई उस गदाको सहसा अपने ऊपर आती देख कर्णने बहुत-से बाणोंद्वारा उसे स्तम्भित कर दिया और पृथ्वीपर गिरा दिया ।। ८ ।।
गदां विनिहतां दृष्ट्वा सहदेवस्त्वरान्वितः ।
शक्तिं चिक्षेप कर्णाय तामप्यस्याच्छिनच्छरैः ।। ९ ।।
अपनी गदाको असफल होकर गिरी हुई देख सहदेवने बड़ी उतावलीके साथ कर्णपर शक्ति चलायी; किंतु उसने बाणोंद्वारा उस शक्तिको भी काट डाला ।। ९ ।।
ससम्भ्रमं ततस्तूर्णमवप्लुत्य रथोत्तमात् ।
सहदेवो महाराज दृष्ट्वा कर्णं व्यवस्थितम् ।। १० ।।
रथचक्रं प्रगृह्याजौ मुमोचाधिरथिं प्रति ।
महाराज! तब सहदेव अपने उस उत्तम रथसे शीघ्र ही वेगपूर्वक कूद पड़े और युद्धस्थलमें अधिरथपुत्र कर्णको सामने खड़ा देख रथका एक चक्का लेकर उसके ऊपर चला दिया ।। १० १/२ ।।
तदापतद् वै सहसा कालचक्रमिवोद्यतम् ।। ११ ।।
शरैरनेकसाहस्रैराच्छिनत् सूतनन्दनः ।
उठे हुए कालचक्रके समान सहसा अपने ऊपर गिरते हुए उस रथचक्रको सूतनन्दन कर्णने कई हजार बाणोंसे काट गिराया ।। ११ १/२ ।।
तस्मिंस्तु निहते चक्रे सूतजेन महात्मना ।। १२ ।।
ईषादण्डकयोक्त्रांश्च युगानि विविधानि च ।
हस्त्यङ्गानि तथाश्वांश्च मृतांश्च पुरुषान् बहून् ।। १३ ।।
चिक्षेप कर्णमुद्दिश्य कर्णस्तान् व्यधमच्छरैः ।
महामनस्वी सूतपुत्र कर्णके द्वारा उस रथचक्रके नष्ट कर दिये जानेपर ईषादण्ड, जोते, नाना प्रकारके जूए, हाथीके कटे हुए अंग, मरे घोड़े और बहुत-सी मृत मनुष्योंकी लाशें कर्णको लक्ष्य करके चलायीं; परंतु कर्णने अपने बाणोंद्वारा उन सबकी धज्जियाँ उड़ा दीं ।।
स निरायुधमात्मानं ज्ञात्वा माद्रवतीसुतः ।। १४ ।।
वार्यमाणस्तु विशिखैः सहदेवो रणं जहौ ।
तत्पश्चात् माद्रीकुमार सहदेवने अपने-आपको आयुधोंसे रहित समझकर कर्णके बाणोंसे अवरुद्ध हो उस रणभूमिको त्याग दिया ।। १४ १/२ ।।
तमभिद्रुत्य राधेयो मुहूर्ताद् भरतर्षभ ।। १५ ।।

अब्रवीत् प्रहसन् वाक्यं सहदेवं विशाम्पते ।
भरतश्रेष्ठ! प्रजानाथ! तदनन्तर राधापुत्र कर्णने दो घड़ीतक सहदेवका पीछा करके उनसे हँसते हुए इस प्रकार कहा— ॥ १५ १/२ ॥
मा युध्यस्व रणेऽधीर विशिष्टै रथिभिः सह ॥ १६ ॥
सदृशैर्युध्य माद्रेय वचो मे मा विशङ्किथाः ।
‘ओ अधीर बालक! तू युद्धस्थलमें विशिष्ट रथियोंके साथ संग्राम न करना। माद्रीकुमार! अपने समान योद्धाओंके साथ युद्ध किया कर। मेरी इस बातपर संदेह न करना’ ॥ १६ १/२ ॥
अथैनं धनुषोऽग्रेण तुदन् भूयोऽब्रवीद् वचः ॥ १७ ॥
एषोऽर्जुनो रणे तूर्णं युध्यते कुरुभिः सह ।
तत्र गच्छस्व माद्रेय गृहं वा यदि मन्यसे ॥ १८ ॥
तदनन्तर धनुषकी नोकसे उन्हें पीड़ा देते हुए कर्णने पुनः इस प्रकार कहा—‘माद्रीपुत्र! ये अर्जुन कौरवोंके साथ रणभूमिमें शीघ्रतापूर्वक युद्ध कर रहे हैं। तू उन्हींके पास चला जा अथवा तेरा मन हो तो घरको लौट जा’ ॥
एवमुक्त्वा तु तं कर्णो रथेन रथिनां वरः ।
प्रायात् पाञ्चालपाण्डूनां सैन्यानि प्रदहन्निव ॥ १९ ॥
सहदेवसे ऐसा कहकर रथियोंमें श्रेष्ठ कर्ण पांचालों और पाण्डवोंकी सेनाओंको दग्ध करता हुआ-सा रथके द्वारा उनकी ओर वेगपूर्वक चल दिया ॥ १९ ॥
वधं प्राप्तं तु माद्रेयं नावधीत् समरेऽरिहा ।
कुन्त्याः स्मृत्वा वचो राजन् सत्यसंधो महायशाः ॥ २० ॥
यद्यपि सहदेव उस समय वध करने योग्य अवस्थामें पहुँच गये थे, तो भी कुन्तीको दिये हुए वचनको याद करके समरांगणमें शत्रुसूदन सत्यप्रतिज्ञ एवं महायशस्वी कर्णने उनका वध नहीं किया ॥ २० ॥
सहदेवस्ततो राजन् विमनाः शरपीडितः ।
कर्णवाक्छरतप्तश्च जीवितान्निरविद्यत ॥ २१ ॥
राजन्! तदनन्तर सहदेव कर्णके बाणोंसे पीड़ित और उसके वचनरूपी बाणोंसे संतप्त एवं खिन्नचित्त हो अपने जीवनसे विरक्त हो गये ॥ २१ ॥
आरुरोह रथं चापि पाञ्चाल्यस्य महात्मनः ।
जनमेजयस्य समरे त्वरायुक्तो महारथः ॥ २२ ॥
फिर वे महारथी सहदेव बड़ी उतावलीके साथ महामना पांचालराजकुमार जनमेजयके रथपर आरूढ़ हो गये ॥
विराटं सहसेनं तु द्रोणं वै द्रुतमागतम् ।
मद्रराजः शरौघेण च्छादयामास धन्विनम् ॥ २३ ॥

द्रोणाचार्यपर वेगपूर्वक आक्रमण करनेवाले सेनासहित धनुर्धर राजा विराटको मद्रराज शल्यने अपने बाणसमूहोंसे आच्छादित कर दिया ॥ २३ ॥
तयोः समभवद् युद्धं समरे दृढधन्विनोः ।
यादृशं ह्यभवद् राजन् जम्भवासवयोः पुरा ॥ २४ ॥
राजन्! फिर तो समरांगणमें उन दोनों सुदृढ़ धनुर्धर योद्धाओंमें वैसा ही घोर युद्ध होने लगा, जैसा कि पूर्वकालमें इन्द्र और जम्भासुरमें हुआ था ॥ २४ ॥
मद्रराजो महाराज विराटं वाहिनीपतिम् ।
आजघ्ने त्वरितस्तूर्णं शतेन नतपर्वणाम् ॥ २५ ॥
महाराज! मद्रराज शल्यने सेनापति राजा विराटको बड़ी उतावलीके साथ झुकी हुई गाँठवाले सौ बाण मारकर तुरंत घायल कर दिया ॥ २५ ॥
प्रतिविव्याध तं राजन् नवभिर्निशितैः शरैः ।
पुनश्चैनं त्रिसप्तत्या भूयश्चैव शतेन तु ॥ २६ ॥
राजन्! तब विराटने मद्रराजको पहले नौ, फिर तिहत्तर और पुनः सौ तीखे बाणोंसे घायल करके बदला चुकाया ॥
तस्य मद्राधिपो हत्वा चतुरो रथवाजिनः ।
सूतं ध्वजं च समरे शराभ्यां संन्यपातयत् ॥ २७ ॥
तदनन्तर मद्रराजने विराटके रथके चारों घोड़ोंको मारकर दो बाणोंसे समरांगणमें सारथि और ध्वजको भी काट गिराया ॥ २७ ॥
हताश्वात् तु रथात् तूर्णमवप्लुत्य महारथः ।
तस्थौ विस्फारयंश्चापं विमुञ्चंश्च शिताञ्छरान् ॥ २८ ॥
तब उस अश्वहीन रथसे तुरंत ही कूदकर महारथी राजा विराट धनुषकी टंकार करते और तीखे बाणोंको छोड़ते हुए भूमिपर खड़े हो गये ॥ २८ ॥
शतानीकस्ततो दृष्ट्वा भ्रातरं हतवाहनम् ।
रथेनाभ्यपतत् तूर्णं सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ २९ ॥
तत्पश्चात् शतानीक अपने भाईके वाहनको नष्ट हुआ देख सब लोगोंके देखते-देखते शीघ्र ही रथके द्वारा उनके पास आ पहुँचे ॥ २९ ॥
शतानीकमथायान्तं मद्रराजो महामृधे ।
विशिखैर्बहुभिर्विद्ध्वा ततो निन्ये यमक्षयम् ॥ ३० ॥
उस महासमरमें वहाँ आते हुए शतानीकको बहुत-से बाणोंद्वारा घायल करके मद्रराज शल्यने उन्हें यमलोक पहुँचा दिया ॥ ३० ॥
तस्मिंस्तु निहते वीरे विराटो रथसत्तमः ।
आरुरोह रथं तूर्णं तमेव ध्वजमालिनम् ॥ ३१ ॥

वीर शतानीकके मारे जानेपर रथियोंमें श्रेष्ठ विराट तुरंत ही ध्वज-मालासे विभूषित उसी रथपर आरूढ़ हो गये ॥

ततो विस्फार्य नयने क्रोधाद् द्विगुणविक्रमः ।
मद्रराजरथं तूर्णं छादयामास पत्रिभिः ॥ ३२ ॥
तब क्रोधसे आँखें फाड़कर दूना पराक्रम दिखाते हुए विराटने अपने बाणोंद्वारा मद्रराजके रथको शीघ्र ही आच्छादित कर दिया ॥ ३२ ॥

ततो मद्राधिपः क्रुद्धः शरेणानतपर्वणा ।
आजघानोरसि दृढं विराटं वाहिनीपतिम् ॥ ३३ ॥
इससे कुपित हुए मद्रराज शल्यने झुकी हुई गाँठवाले एक बाणसे सेनापति विराटकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥

सोऽतिविद्धो महाराज रथोपस्थ उपाविशत् ।
कश्मलं चाविशत् तीव्रं विराटो भरतर्षभ ॥ ३४ ॥
महाराज! भरतभूषण! राज विराट अत्यन्त घायल होकर रथके पिछले भागमें धम्म-से बैठ गये और उन्हें तीव्र मूर्च्छाने दबा लिया ॥ ३४ ॥

सारथिस्तमपोवाह समरे शरविक्षतम् ।
ततः सा महती सेना प्राद्रवन्निशि भारत ॥ ३५ ॥
वध्यमाना शरशतैः शल्येनाहवशोभिना ।
भरतनन्दन! समरांगणमें बाणोंसे क्षत-विक्षत हुए राजा विराटको उनका सारथि दूर हटा ले गया। तब संग्राममें शोभा पानेवाले शल्यके सैकड़ों सायकोंसे पीड़ित हुई वह विशाल सेना उस रात्रिके समय भाग खड़ी हुई ॥ ३५ १/२ ॥

तां दृष्ट्वा विद्रुतां सेनां वासुदेवधनंजयौ ॥ ३६ ॥
प्रयातौ तत्र राजेन्द्र यत्र शल्यो व्यवस्थितः ।
राजेन्द्र! उस सेनाको भागती देख श्रीकृष्ण और अर्जुन उसी ओर चल दिये, जहाँ राजा शल्य खड़े थे ॥

तौ तु प्रत्युद्ययौ राजन् राक्षसेन्द्रो ह्यलम्बुषः ॥ ३७ ॥
अष्टचक्रसमायुक्तमास्थाय प्रवरं रथम् ।
राजन्! उस समय राक्षसराज अलम्बुष आठ पहियोंसे युक्त श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो उन दोनोंका सामना करनेके लिये आगे बढ़ आया ॥ ३७ १/२ ॥

तुरङ्गममुखैर्युक्तं पिशाचैर्घोरदर्शनैः ॥ ३८ ॥
लोहितार्द्रपताकं तं रक्तमाल्यविभूषितम् ।
कार्ष्णायसमयं घोरमृक्षचर्मसमावृतम् ॥ ३९ ॥
उसके उस रथमें घोड़ोंके समान मुखवाले भयंकर पिशाच जुते हुए थे। उसपर लाल रंगकी आर्द्र पताका फहरा रही थी। उस रथको लाल रंगके फूलोंकी मालासे सजाया गया

था। वह भयंकर रथ काले लोहेका बना था और उसके ऊपर रीछकी खाल मढ़ी हुई थी ॥ ३८-३९ ॥

रौद्रेण चित्रपक्षेण विवृताक्षेण कूजता ।
ध्वजेनोच्छ्रितदण्डेन गृध्रराजेन राजता ॥ ४० ॥
स बभौ राक्षसो राजन् भिन्नाञ्जनचयोपमः ।
उसकी ध्वजापर विचित्र पंख और फैले हुए नेत्रोंवाला भयंकर गृध्रराज अपनी बोली बोलता था। उससे उपलक्षित उस ऊँचे डंडेवाले कान्तिमान् ध्वजसे कटे-छटे कोयलेके पहाड़के समान वह राक्षस बड़ी शोभा पा रहा था ॥ ४०१/२ ॥

रुरोधार्जुनमायान्तं प्रभञ्जनमिवाद्रिराट् ॥ ४१ ॥
किरन् बाणगणान् राजन् शतशोऽर्जुनमूर्धनि ।
राजन्! अर्जुनके मस्तकपर सैकड़ों बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए उस राक्षसने अपनी ओर आते हुए अर्जुनको उसी प्रकार रोक दिया, जैसे गिरिराज हिमालय प्रचण्ड वायुको रोक देता है ॥ ४११/२ ॥

अतितीव्रं महत् युद्धं नरराक्षसयोस्तदा ॥ ४२ ॥
द्रष्टृणां प्रीतिजननं सर्वेषां तत्र भारत ।
गृध्रकाकबलोलूककङ्कगोमायुहर्षणम् ॥ ४३ ॥
भारत! उस समय वहाँ मनुष्य और राक्षसमें बड़े जोरसे महान् संग्राम होने लगा, जो समस्त दर्शकोंका आनन्द बढ़ानेवाला और गीध, कौए, बगले, उल्लू, कंक तथा गीदड़ोंको हर्ष प्रदान करनेवाला था ॥ ४२-४३ ॥

तमर्जुनः शतेनैव पत्रिणां समताडयत् ।
नवभिश्च शितैर्बाणैर्ध्वजं चिच्छेद भारत ॥ ४४ ॥
भरतनन्दन! अर्जुनने सौ बाणोंसे उस राक्षसको घायल कर दिया और नौ तीखे बाणोंसे उसकी ध्वजा काट डाली ॥

सारथिं च त्रिभिर्बाणैस्त्रिभिरेव त्रिवेणुकम् ।
धनुरेकेन चिच्छेद चतुर्भिंश्चतुरो हयान् ॥ ४५ ॥
फिर तीन बाणोंसे उसके सारथिको, तीनसे ही रथके त्रिवेणुको, एकसे उसके धनुषको और चार बाणोंसे चारों घोड़ोंको काट डाला ॥ ४५ ॥

पुनः सज्यं कृतं चापं तदप्यस्य द्विधाच्छिनत् ।
विरथस्योद्यतं खड्गं शरेणास्य द्विधाकरोत् ॥ ४६ ॥
जब उसने पुनः दूसरे धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ायी तो अर्जुनने उसके भी दो टुकड़े कर दिये। रथहीन होनेपर उस राक्षसने जब खड्ग उठाया, तब अर्जुनने एक बाण मारकर उसके भी दो खण्ड कर डाले ॥ ४६ ॥

अथैनं निशितैर्बाणैश्चतुर्भिर्भरतर्षभ ।

पार्थोऽविध्यद् राक्षसेन्द्रं स विद्धः प्राद्रवद् भयात् ॥ ४७ ॥
भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् कुन्तीकुमार अर्जुनने चार तीखे बाणोंद्वारा उस राक्षसराजको बींध डाला। उन बाणोंसे विद्ध होकर अलम्बुष भयके मारे भाग गया ॥ ४७ ॥

तं विजित्यार्जुनस्तूर्णं द्रोणान्तिकमुपाययौ ।
किरञ्शरगणान् राजन् नरवारणवाजिषु ॥ ४८ ॥
राजन्! उसे परास्त करके अर्जुन मनुष्यों, हाथियों तथा घोड़ोंपर बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए तुरंत ही द्रोणाचार्यके समीप चले गये ॥ ४८ ॥

वध्यमाना महाराज पाण्डवेन यशस्विना ।
सैनिका न्यपतन्नुर्व्यां वातनुन्ना इव द्रुमाः ॥ ४९ ॥
महाराज! उन यशस्वी पाण्डुकुमारके द्वारा मारे जाते हुए आपके सैनिक आँधीके उखाड़े हुए वृक्षोंके समान धड़ाधड़ पृथ्वीपर गिर रहे थे ॥ ४९ ॥

तेषु तूत्साद्यमानेषु फाल्गुनेन महात्मना ।
सम्प्राद्रवद् बलं सर्वं पुत्राणां ते विशाम्पते ॥ ५० ॥
प्रजानाथ! जब इस प्रकार महात्मा अर्जुनके द्वारा उनका संहार होने लगा, तब आपके पुत्रोंकी सारी सेना भाग चली ॥ ५० ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे अलम्बुषपराभवे
सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके अवसरपर अलम्बुषका पराजयविषयक एक सौ सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६७ ॥