महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
११३-
त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः
सात्यकिका द्रोण और कृतवर्माके साथ युद्ध करते हुए काम्बोजोंकी सेनाके पास पहुँचना
संजय उवाच
प्रयाते तव सैन्यं तु युयुधाने युयुत्सया ।
धर्मराजो महाराज स्वेनानीकेन संवृतः ॥ १ ॥
प्रायाद् द्रोणरथं प्रेप्सुर्युयुधानस्य पृष्ठतः ।
**संजय कहते हैं—**महाराज! जब युयुधान युद्धकी इच्छासे आपकी सेनाकी ओर बढ़े, उस समय अपने सैनिकोंसे घिरे हुए धर्मराज युधिष्ठिर द्रोणाचार्यके रथका सामना करनेके लिये उनके पीछे-पीछे गये ॥ १ १/२ ॥
ततः पाञ्चालराजस्य पुत्रः समरदुर्मदः ॥ २ ॥
प्राक्रोशत् पाण्डवानीके वसुदानश्च पार्थिवः ।
आगच्छत प्रहरत द्रुतं विपरिधावत ॥ ३ ॥
यथा सुखेन गच्छेत सात्यकिर्युद्धदुर्मदः ।
महारथा हि बहवो यतिष्यन्त्यस्य निर्जये ॥ ४ ॥
तदनन्तर समरभूमिमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न तथा राजा वसुदानने पाण्डवसेनामें पुकारकर कहा—'योद्धाओ! आओ, दौड़ो और शीघ्रतापूर्वक प्रहार करो, जिससे रणदुर्मद सात्यकि सुखपूर्वक आगे जा सकें; क्योंकि बहुत-से कौरव महारथी इन्हें पराजित करनेका प्रयत्न करेंगे' ॥ २—४ ॥
इति ब्रुवन्तो वेगेन निपेतुस्ते महारथाः ।
वयं प्रतिजिगीषन्तस्तत्र तान् समभिद्रुताः ॥ ५ ॥
सेनापतिकी पूर्वोक्त बात दोहराते हुए सभी पाण्डव महारथी बड़े वेगसे वहाँ आ पहुँचे। उस समय हमलोगोंंने भी उन्हें जीतनेकी अभिलाषासे उनपर धावा कर दिया ॥ ५ ॥
(बाणशब्दरवान् कृत्वा विमिश्रान् शङ्खनिस्वनैः ।
युयुधानरथं दृष्ट्वा तावका अभिदुद्रुवुः ॥)
युयुधानके रथको देखकर आपके सैनिक शंखध्वनिसे मिश्रित बाणोंका शब्द प्रकट करते हुए उनके सामने दौड़े आये ॥
ततः शब्दो महानासीद् युयुधानरथं प्रति ।
आकीर्यमाणा धावन्ती तव पुत्रस्य वाहिनी ॥ ६ ॥
सात्वतेन महाराज शतधाभिव्यशीर्यत ।
तदनन्तर सात्यकिके रथके समीप महान् कोलाहल मच गया। महाराज! चारों ओरसे दौड़कर आती हुई आपके पुत्रकी सेना सात्यकिके बाणोंसे आच्छादित हो सैकड़ों टुकड़ियोंमें बँटकर तितत-बितर हो गयी ।। ६ १/२ ।।
तस्यां विदीर्यमाणायां शिनेः पौत्रो महारथः ।। ७ ।।
सप्त वीरान् महेष्वासानग्रानीकेष्वपोथयत् ।
उस सेनाके छिन्न-भिन्न होते ही शिनिके महारथी पौत्रने सेनाके मुहानेपर खड़े हुए सात महाधनुर्धर वीरोंको मार गिराया ।। ७ १/२ ।।
अथान्यानपि राजेन्द्र नानाजनपदेश्वरान् ।। ८ ।।
शरैरनलसंकाशैर्निन्ये वीरान् यमक्षयम् ।
राजेन्द्र! तदनन्तर विभिन्न जनपदोंके स्वामी अन्यान्य वीर राजाओंको भी उन्होंने अपने अग्निसदृश बाणोंद्वारा यमलोक पहुँचा दिया ।। ८ १/२ ।।
शतमेकेन विव्याध शतेनैकं च पत्रिणाम् ।। ९ ।।
द्विपारोहान् द्विपांश्चैव हयारोहान् हयांस्तथा ।
रथिनः साश्वसूतांश्च जघानेशः पशूनिव ।। १० ।।
वे एक बाणसे सैकड़ों वीरोंको और सैकड़ों बाणोंसे एक-एक वीरको घायल करने लगे। जिस प्रकार भगवान् पशुपति पशुओंका संहार कर डालते हैं, उसी प्रकार सात्यकिने हाथीसवारों और हाथियोंको, घुड़सवारों और घोड़ोंको तथा घोड़े और सारथिसहित रथियोंको मार डाला ।। ९-१० ।।
तं तथाद्भुतकर्माणं शरसम्पातवर्षिणम् ।
न केचनाभ्यधावन् वै सात्यकिं तव सैनिकाः ।। ११ ।।
इस प्रकार बाणधाराकी वर्षा करनेवाले उस अद्भुत पराक्रमी सात्यकिके सामने जानेका साहस आपके कोई सैनिक न कर सके ।। ११ ।।
ते भीता मृद्यमानाश्च प्रमृष्टा दीर्घबाहुना ।
आयोधनं जहुर्वीरा दृष्ट्वा तमतिमानिनम् ।। १२ ।।
उस महाबाहु वीरने अपने बाणोंसे रौंदकर आपके सारे सिपाहियोंको मसल डाला। वे वीर सिपाही ऐसे डर गये कि उस अत्यन्त मानी शूरवीरको देखते ही युद्धका मैदान छोड़ देते थे ।। १२ ।।
तमेकं बहुधापश्यन् मोहितास्तस्य तेजसा ।
रथैर्विमथितैश्चैव भग्ननीडैश्च मारिष ।। १३ ।।
चक्रैर्विमथितैश्छत्रैर्ध्वजैश्च विनिपातितैः ।
अनुकर्षैः पताकाभिः शिरस्त्राणैः सकाञ्चनैः ।। १४ ।।
बाहुभिश्चन्दनादिग्धैः साङ्गदैश्च विशाम्पते ।
हस्तिहस्तोपमैश्चापि भुजङ्गाभोगसंनिभैः ।। १५ ।।
ऊरुभिः पृथिवी च्छन्ना मनुजानां नराधिप ।
माननीय नरेश! सारे कौरव-सैनिक सात्यकिके तेजसे मोहित हो अकेले होनेपर भी उन्हें अनेक रूपोंमें देखने लगे। वहाँ बहुसंख्यक रथ चूर-चूर हो गये थे। उनकी बैठकें टूट-फूट गयी थीं। पहियोंके टुकड़े-टुकड़े हो गये थे। छत्र और ध्वज छिन्न-भिन्न होकर धरतीपर पड़े थे। अनुकर्ष, पताका, शिरस्त्राण, सुवर्णभूषित अंगदयुक्त चन्दनचर्चित भुजाएँ, हाथीकी सूँड़ तथा सर्पोंके शरीरके समान मोटे-मोटे ऊरु सब ओर बिखरे पड़े थे। नरेश्वर! मनुष्योंके विभिन्न अंगों तथा रथके पूर्वोक्त अवयवोंसे वहाँकी भूमि आच्छादित हो गयी थी ।। १३—१५ ½ ।।
शशाङ्कसंनिभैश्चैव वदनैश्चारुकुण्डलैः ।। १६ ।।
पतितैर्ऋषभाक्षाणां सा बभावति मेदिनी ।
वृषभके समान बड़े-बड़े नेत्रोंवाले वीरोंके गिरे हुए मनोहर कुण्डलमण्डित चन्द्रमा-जैसे मुखोंसे वहाँकी भूमि अत्यन्त शोभा पा रही थी ।। १६ ½ ।।
गजैश्च बहुधा छिन्नैः शयानैः पर्वतोपमैः ।। १७ ।।
रराजातिभृशं भूमिविकीर्णैरिव पर्वतैः ।
अनेकों टुकड़ोंमें कटकर धराशायी हुए पर्वताकार गजराजोंसे वहाँकी भूमि इस प्रकार अत्यन्त शोभासम्पन्न हो रही थी, मानो वहाँ बहुत-से पर्वत बिखरे हुए हों ।।
तपनीयमयैर्योक्त्रैर्मुक्ताजालविभूषितैः ।। १८ ।।
उरश्छदैर्विचित्रैश्च व्यशोभन्त तुरङ्गमाः ।
गतसत्त्वा महीं प्राप्य प्रमृष्टा दीर्घबाहुना ।। १९ ।।
कितने ही घोड़े सुनहरी रस्सियों तथा मोतीकी जालियोंसे विभूषित विचित्र आच्छादन वस्त्रोंसे विशेष शोभायमान हो रहे थे। महाबाहु सात्यकिके द्वारा रौंदे जाकर वे धरतीपर पड़े थे और उनके प्राण-पखेरू उड़ गये ।। १८-१९ ।।
नानाविधानि सैन्यानि तव हत्वा तु सात्वतः ।
प्रविष्टस्तावकं सैन्यं द्रावयित्वा चमूं भृशम् ।। २० ।।
इस प्रकार आपकी नाना प्रकारकी सेनाओंका संहार करके तथा बहुत-से सैनिकोंको भगाकर सात्यकि आपकी सेनाके भीतर घुस गये ।। २० ।।
ततस्तेनैव मार्गेण येन यातो धनंजयः ।
इयेष सात्यकिर्गन्तुं ततो द्रोणेन वारितः ।। २१ ।।
तदनन्तर जिस मार्गसे अर्जुन गये, उसीसे सात्यकिने भी जानेका विचार किया; परंतु द्रोणाचार्यने उन्हें रोक दिया ।। २१ ।।
भारद्वाजं समासाद्य युयुधानश्च सात्यकिः ।
न न्यवर्तत संक्रुद्धो वेलामिव जलाशयः ।। २२ ।।
अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए सत्यकनन्दन युयुधान द्रोणाचार्यके पास पहुँचकर रुक तो गये; परंतु पीछे नहीं लौटे। जैसे क्षुब्ध जलाशय अपनी तटभूमितक पहुँचकर फिर पीछे नहीं लौटता है ।। २२ ।।
निवार्य तु रणे द्रोणो युयुधानं महारथम् ।
विव्याध निशितैर्बाणैः पञ्चभिर्मर्मभेदिभिः ।। २३ ।।
द्रोणाचार्यने रणक्षेत्रमें महारथी युयुधानको रोककर मर्मस्थलको विदीर्ण कर देनेवाले पाँच पैने बाणोंसे उन्हें घायल कर दिया ।। २३ ।।
सात्यकिस्तु रणे द्रोणं राजन् विव्याध सप्तभिः ।
हेमपुङ्खैः शिलाधौतैः कङ्कबर्हिणवाजितैः ।। २४ ।।
राजन्! तब सात्यकिने भी समरांगणमें शानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पाँखवाले तथा कंक और मोरकी पाँखोंसे संयुक्त हुए सात बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यको क्षत-विक्षत कर डाला ।। २४ ।।
तं षड्भिः सायकैर्द्रोणः साश्वयन्तारमर्दयत् ।
स तं न ममृषे द्रोणं युयुधानो महारथः ।। २५ ।।
फिर द्रोणने छः बाण मारकर घोड़ों और सारथिसहित सात्यकिको पीड़ित कर दिया। द्रोणाचार्यके इस पराक्रमको महारथी युयुधान सहन न कर सके ।। २५ ।।
सिंहनादं ततः कृत्वा द्रोणं विव्याध सात्यकिः ।
दशभिः सायकैश्चान्यैः षड्भिरष्टाभिरेव च ।। २६ ।।
उन्होंने सिंहनाद करके लगातार दस, छः और आठ बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यको गहरी चोट पहुँचायी ।। २६ ।।
युयुधानः पुनर्द्रोणं विव्याध दशभिः शरैः ।
एकेन सारथिं चास्य चतुर्भिश्चतुरो हयान् ।। २७ ।।
ध्वजमेकेन बाणेन विव्याध युधि मारिष ।
माननीय नरेश! तदनन्तर युयुधानने पुनः दस बाण मारकर द्रोणाचार्यको घायल कर दिया। फिर एक बाणसे उनके सारथिको, चारसे चारों घोड़ोंको और एक बाणसे उनकी ध्वजाको युद्धस्थलमें बींध डाला ।। २७ १/२ ।।
तं द्रोणः साश्वयन्तारं सरथध्वजमाशुगैः ।। २८ ।।
त्वरन् प्राच्छादयद् बाणैः शलभानामिव व्रजैः ।
इसके बाद द्रोणाचार्यने उतावले होकर टिड्डीदलोंके समान अपने शीघ्रगामी बाणोंद्वारा घोड़े, सारथि, रथ और ध्वजसहित सात्यकिको आच्छादित कर दिया ।। २८ १/२ ।।
तथैव युयुधानोऽपि द्रोणं बहुभिराशुगैः ।। २९ ।।
आच्छादयदसम्भ्रान्तस्ततो द्रोण उवाच ह ।
इसी प्रकार सात्यकिने भी बिना किसी घबराहटके बहुत-से शीघ्रगामी बाणोंकी वर्षा करके द्रोणाचार्यको ढक दिया। तब द्रोणाचार्य बोले— ।। २९ १/२ ।।
तवाचार्यो रणं हित्वा गतः कापुरुषो यथा ।। ३० ।।
युध्यमानं च मां हित्वा प्रदक्षिणमवर्तत ।
त्वं हि मे युध्यतो नाद्य जीवन् यास्यसि माधव ।। ३१ ।।
यदि मां त्वं रणे हित्वा न यास्याचार्यवद् द्रुतम् ।
‘माधव! तुम्हारे आचार्य अर्जुन तो कायरके समान युद्धका मैदान छोड़कर चले गये हैं। मैं युद्ध कर रहा था तो भी मुझे छोड़कर मेरी परिक्रमा करते हुए चल दिये। तुम भी अपने आचार्यके समान तुरंत ही समरांगणमें मुझे छोड़कर चले नहीं जाओगे तो युद्धमें तत्पर रहते हुए मेरे हाथसे आज जीवित बचकर नहीं जा सकोगे’ ।। ३०-३१ १/२ ।।
सात्यकिरुवाच
धनंजयस्य पदवीं धर्मराजस्य शासनात् ।। ३२ ।।
गच्छामि स्वस्ति ते ब्रह्मन् न मे कालात्ययो भवेत् ।
आचार्यानुगतो मार्गः शिष्यैरन्वास्यते सदा ।। ३३ ।।
तस्मादेव व्रजाम्याशु यथा मे स गुरुर्गतः ।
सात्यकिने कहा—ब्रह्मन्! आपका कल्याण हो। मैं धर्मराजकी आज्ञासे धनंजयके मार्गपर जा रहा हूँ। आप ऐसा करें, जिससे मुझे विलम्ब न हो। शिष्यगण तो सदासे ही अपने आचार्यके मार्गका ही अनुसरण करते आये हैं। अतः जिस प्रकार मेरे गुरुजी गये हैं, उसी प्रकार मैं भी शीघ्र ही चला जाता हूँ ।। ३२-३३ १/२ ।।
संजय उवाच
एतावदुक्त्वा शैनेय आचार्यं परिवर्जयन् ।। ३४ ।।
प्रयातः सहसा राजन् सारथिं चेदमब्रवीत् ।
संजय कहते हैं—राजन्! ऐसा कहकर सात्यकि सहसा द्रोणाचार्यको छोड़कर चल दिये और सारथिसे इस प्रकार बोले— ।। ३४ १/२ ।।
द्रोणः करिष्यते यत्नं सर्वथा मम वारणे ।। ३५ ।।
यत्तो याहि रणे सूत शृणु चेदं वचः परम् ।
‘सूत! द्रोणाचार्य मुझे रोकनेके लिये सब प्रकारसे प्रयत्न करेंगे, अतः तुम रणक्षेत्रमें सावधान होकर चलो और मेरी यह दूसरी बात भी सुन लो ।। ३५ १/२ ।।
एतदालोक्यते सैन्यमावन्त्यानां महाप्रभम् ।। ३६ ।।
अस्यान्तरतस्त्वेतद् दाक्षिणात्यं महद् बलम् ।
तदनन्तरमेतच्च बाह्लिकानां महद् बलम् ।। ३७ ।।
‘यह अवन्तिनिवासियोंकी अत्यन्त तेजस्विनी सेना दिखायी देती है। इसके बाद यह दाक्षिणात्योंकी विशाल सेना है। उसके पश्चात् यह बाह्लिकोंकी विशाल वाहिनी है॥ ३६-३७॥
बाह्लिकाभ्याशतो युक्तं कर्णस्य च महद् बलम्।
अन्योन्येन हि सैन्यानि भिन्नान्येतानि सारथे॥ ३८॥
‘बाह्लिकोंके पास ही उनसे जुड़ी हुई कर्णकी बड़ी भारी सेना खड़ी है। सारथे! ये सारी सेनाएँ एक-दूसरेसे भिन्न हैं॥ ३८॥
अन्योन्यं समुपाश्रित्य न त्यक्ष्यन्ति रणाजिरम्।
एतदन्तरमासाद्य चोदयाश्वान् प्रहृष्टवत्॥ ३९॥
‘ये सब-की-सब एक-दूसरेका सहारा लेकर युद्धके लिये डटी हुई हैं। ये कभी भी समरांगणका परित्याग नहीं करेंगी। तुम इन्हींके बीचमें होकर प्रसन्नतापूर्वक अपने घोड़ोंको आगे बढ़ाओ॥ ३९॥
मध्यमं जवमास्थाय वह मामत्र सारथे।
बाह्लिका यत्र दृश्यन्ते नानाप्रहरणोद्यताः॥ ४०॥
‘सारथे! मध्यम वेगका आश्रय लेकर तुम मुझे वहाँ ले चलो, जहाँ नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये युद्धके लिये उद्यत हुए बाह्लिकदेशीय सैनिक दिखायी देते हैं॥
दाक्षिणात्याश्च बहवः सूतपुत्रपुरोगमाः।
हस्त्यश्वरथसम्बाधं यच्चानीकं विलोक्यते॥ ४१॥
नानादेशसमुत्थैश्च पदातिभिरधिष्ठितम्।
‘जहाँ सूतपुत्र कर्णको आगे करके बहुत-से दाक्षिणात्य योद्धा खड़े हैं, हाथी, घोड़ों और रथोंसे भरी हुई जो वह सेना दृष्टिगोचर हो रही है, उसमें अनेक देशोंके पैदल सैनिक मौजूद हैं; तुम वहाँ भी मेरे रथको ले चलो’॥ ४१ १/२॥
एतावदुक्त्वा यन्तारं ब्राह्मणं परिवर्जयन्॥ ४२॥
स व्यतीयाय यत्रोग्रं कर्णस्य च महद् बलम्।
सारथिसे ऐसा कहकर सात्यकि ब्राह्मण द्रोणाचार्यको छोड़ते हुए सबको लाँघकर उस स्थानपर जा पहुँचे जहाँ कर्णकी भयंकर एवं विशाल सेना खड़ी थी॥ ४२ १/२॥
तं द्रोणोऽनुययौ क्रुद्धो विकिरन् विशिखान् बहून्॥ ४३॥
युयुधानं महाभागं गच्छन्तमनिवर्तिनम्।
युद्धसे पीछे न हटनेवाले महाभाग युयुधानको आगे बढ़ते देख द्रोणाचार्य कुपित हो उठे और वे बहुत-से बाणोंकी वर्षा करते हुए कुछ दूरतक उनके पीछे-पीछे दौड़े॥ ४३ १/२॥
कर्णस्य सैन्यं सुमहदभिहत्य शितैः शरैः॥ ४४॥
प्राविशद् भारतीं सेनामपर्यन्तां च सात्यकिः।
सात्यकि कर्णकी विशाल वाहिनीको अपने पैने बाणोंद्वारा घायल करके अपार कौरवी सेनामें घुस गये ।।
प्रविष्टे युयुधाने तु सैनिकेषु द्रुतेषु च ।। ४५ ।।
अमर्षी कृतवर्मा तु सात्यकिं पर्यवारयत् ।
सात्यकिके प्रवेश करते ही सारे कौरव-सैनिक भागने लगे। तब क्रोधमें भरे हुए कृतवर्माने उन्हें आ घेरा ।।
तमापतन्तं विशिखैः षड्भिराहत्य सात्यकिः ।। ४६ ।।
चतुर्भिंश्चतुरोऽस्याश्वान्याजघानाशु वीर्यवान् ।
उसे आते देख पराक्रमी सात्यकिने छः बाणोंद्वारा उसे चोट पहुँचाकर चार बाणोंसे उसके चारों घोड़ोंको शीघ्र ही घायल कर दिया ।। ४६ १/२ ।।
ततः पुनः षोडशभिर्नतपर्वभिराशुगैः ।। ४७ ।।
सात्यकिः कृतवर्माणं प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे ।
तदनन्तर पुनः झुकी हुई गाँठवाले सोलह बाण मारकर सात्यकिने कृतवर्माकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ।। ४७ १/२ ।।
स ताड्यमानो विशिखैर्बहुभिस्तिग्मतेजनैः ।। ४८ ।।
सात्वतेन महाराज कृतवर्मा न चक्षमे ।
महाराज! सात्यकिके प्रचण्ड तेजवाले बहुसंख्यक बाणोंद्वारा घायल होनेपर कृतवर्मा सहन न कर सका ।।
स वत्सदन्तं संधाय जिह्मगानलसंनिभम् ।। ४९ ।।
आकृष्य राजन्नाकर्णाद् विव्याधोरसि सात्यकिम् ।
राजन्! वक्रगतिसे चलनेवाले अग्निके समान तेजस्वी वत्सदन्त नामक बाणको धनुषपर रखकर कृतवर्माने उसे कानतक खींचा और उसके द्वारा सात्यकिकी छातीमें प्रहार किया ।। ४९ १/२ ।।
स तस्य देहावरणं भित्त्वा देहं च सायकः ।। ५० ।।
सपुङ्खपत्रः पृथिवीं विवेश रुधिरोक्षितः ।
वह बाण सात्यकिके शरीर और कवच दोनोंको विदीर्ण करके खूनसे लथपथ हो पंख एवं पत्रसहित धरतीमें समा गया ।। ५० १/२ ।।
अथास्य बहुभिर्बाणैश्छिनत् परमास्त्रवित् ।। ५१ ।।
समार्गणगणं राजन् कृतवर्मा शरासनम् ।
राजन्! कृतवर्मा उत्तम अस्त्रोंका ज्ञाता है। उसने बहुत-से बाण चलाकर बाणसमूहोंसहित सात्यकिके शरासनको काट दिया ।। ५१ १/२ ।।
विव्याध च रणे राजन् सात्यकिं सत्यविक्रमम् ।। ५२ ।।
दशभिर्विशिखैस्तीक्ष्णैरभिक्रुद्धः स्तनान्तरे ।
नरेश्वर! इसके बाद क्रोधमें भरे हुए कृतवर्माने सत्यपराक्रमी सात्यकिकी छातीमें पुनः दस पैने बाणोंद्वारा गहरा आघात किया ॥ ५२१/२ ॥
ततः प्रशीर्णे धनुषि शक्त्या शक्तिमतां वरः ।। ५३ ।।
जघान दक्षिणं बाहुं सात्यकिः कृतवर्मणः ।
धनुष कट जानेपर शक्तिशाली शूरवीरोंमें श्रेष्ठ सात्यकिने कृतवर्माकी दाहिनी भुजापर शक्तिद्वारा ही प्रहार किया ॥ ५३१/२ ॥
ततोऽन्यत् सुदृढं चापं पूर्णमायम्य सात्यकिः ।। ५४ ।।
व्यसृजद् विशिखांस्तूर्णं शतशोऽथ सहस्रशः ।
सरथं कृतवर्माणं समन्तात् पर्यवारयत् ।। ५५ ।।
तदनन्तर दूसरे सुदृढ़ धनुषको अच्छी तरह खींचकर सात्यकिने तुरंत ही सैकड़ों और हजारों बाणोंकी वर्षा की और रथसहित कृतवर्माको सब ओरसे ढक दिया ॥ ५५ ॥
छादयित्वा रणे राजन् हार्दिक्यं स तु सात्यकिः ।
अथास्य भल्लेन शिरः सारथेः समकृन्तत ।। ५६ ।।
राजन्! रणक्षेत्रमें इस प्रकार कृतवर्माको आच्छादित करके सात्यकिने एक भल्ल द्वारा उसके सारथिका सिर काट दिया ॥ ५६ ॥
स पपात हतः सूतो हार्दिक्यस्य महारथात् ।
ततस्ते यन्तर्रहिताः प्राद्रवंस्तुरगा भृशम् ।। ५७ ।।
उनके द्वारा मारा गया सारथि कृतवर्माके विशाल रथसे नीचे गिर पड़ा। फिर तो सारथिके बिना उसके घोड़े बड़े जोरसे भागने लगे ॥ ५७ ॥
अथ भोजस्तु सम्भ्रान्तो निगृह्य तुरगान् स्वयम् ।
तस्थौ वीरो धनुष्पाणिस्तत् सैन्यान्यभ्यपूजयन् ।। ५८ ।।
इससे कृतवर्माको बड़ी घबराहट हुई; परंतु वह वीर स्वयं ही घोड़ोंको काबूमें करके हाथमें धनुष ले युद्धके लिये डट गया। उसके इस कर्मकी सभी सैनिकोंने भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ ५८ ॥
स मुहूर्तमिवाश्वस्य सदश्वांन् समनोदयत् ।
व्यपेतभीरमित्राणामावहत् सुमहद् भयम् ।। ५९ ।।
उसने थोड़ी ही देरमें आश्वस्त होकर अपने उत्तम घोड़ोंको आगे बढ़ाया तथा स्वयं निर्भय रहकर शत्रुओंके हृदयमें महान् भय उत्पन्न कर दिया ॥ ५९ ॥
सात्यकिश्चाभ्यगात् तस्मात् स तु भीममुपाद्रवत् ।
युयुधानोऽपि राजेन्द्र भोजानीकाद् विनिःसृतः ।। ६० ।।
प्रययौ त्वरितस्तूर्णं काम्बोजानां महाचमूम् ।
स तत्र बहुभिः शूरैः संनिरुद्धो महारथैः ।। ६१ ।।
न चचाल तदा राजन् सात्यकिः सत्यविक्रमः ।
राजेन्द्र! यही अवसर पाकर सात्यकि वहाँसे आगे निकल गये। तब कृतवर्माने भीमसेनपर धावा किया। कृतवर्माकी सेनासे निकलकर युयुधान तुरंत ही काम्बोजोंकी विशाल वाहिनीके पास आ पहुँचे। वहाँ बहुत-से शूरवीर महारथियोंने उन्हें आगे बढ़नेसे रोक दिया। महाराज! तो भी उस समय सत्यपराक्रमी सात्यकि विचलित नहीं हुए ॥ ६०-६१ १/२ ॥
संधाय च चमूं द्रोणो भोजे भारं निवेश्य च ॥ ६२ ॥
अभ्यधावद् रणे यत्तो युयुधानं युयुत्सया ।
द्रोणाचार्यने अपनी बिखरी हुई सेनाको एकत्र करके उसकी रक्षाका भार कृतवर्माको सौंपकर समरांगणमें सात्यकिके साथ युद्ध करनेकी इच्छासे उद्यत हो उनके पीछे-पीछे दौड़े ॥ ६२ १/२ ॥
तथा तमनुधावन्तं युयुधानस्य पृष्ठतः ॥ ६३ ॥
न्यवारयन्त संहृष्टाः पाण्डुसैन्ये बृहत्तमाः ।
इस प्रकार उन्हें युयुधानके पीछे दौड़ते देख पाण्डव-सेनाके प्रमुख वीर हर्षमें भरकर द्रोणाचार्यको रोकनेका प्रयत्न करने लगे ॥ ६३ १/२ ॥
समासाद्य तु हार्दिक्यं रथानां प्रवरं रथम् ॥ ६४ ॥
पञ्चाला विगतोत्साहा भीमसेनपुरोगमाः ।
परंतु रथियोंमें श्रेष्ठ महारथी कृतवर्माके पास पहुँचकर भीमसेनको आगे करके आक्रमण करनेवाले पांचालोंका उत्साह नष्ट हो गया ॥ ६४ १/२ ॥
विक्रम्य वारिता राजन् वीरेण कृतवर्मणा ॥ ६५ ॥
यतमानांश्च तान् सर्वानीषद्विगतचेतसः ।
अभितस्तान् शरौघेण क्लान्तवाहानकारयत् ॥ ६६ ॥
राजन्! वीर कृतवर्माने पराक्रम करके उनको रोक दिया। वे सभी वीर कुछ-कुछ शिथिल एवं अचेत-से हो रहे थे तो भी अपनी विजयके लिये प्रयत्नशील थे; परंतु कृतवर्माने सब ओरसे उनके ऊपर बाणसमूहोंकी वर्षा करके उनके वाहनोंको व्याकुल कर दिया ॥ ६५-६६ ॥
निगृहीतास्तु भोजेन भोजानीकेप्सवो रणे ।
अतिष्ठन्नार्यवद् वीराः प्रार्थयन्तो महद्यशः ॥ ६७ ॥
कृतवर्माद्वारा रोके जानेपर वे पाण्डव वीर रणक्षेत्रमें महान् यशकी इच्छा करते हुए उसीकी सेनाके साथ युद्धकी अभिलाषा करके श्रेष्ठ पुरुषोंके समान डटकर खड़े हो गये ॥ ६७ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिप्रवेशे
त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सात्यकिप्रवेशविषयक एक
सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ६८ श्लोक हैं)