महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
हैडिम्बं निहतं दृष्ट्वा विशीर्णमिव पर्वतम् ।
अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
घटोत्कचके वधसे पाण्डवोंका शोक तथा श्रीकृष्णकी प्रसन्नता और उसका कारण
संजय उवाच
हैडिम्बं निहतं दृष्ट्वा विशीर्णमिव पर्वतम् ।
बभूवुः पाण्डवाः सर्वे शोकबाष्पाकुलेक्षणाः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! जैसे पर्वत ढह गया हो, उसी प्रकार हिडिम्बाकुमार घटोत्कचको मारा गया देख समस्त पाण्डवोंके नेत्रोंमें शोकके आँसू भर आये ॥ १ ॥
वासुदेवस्तु हर्षेण महताभिपरिप्लुतः ।
ननाद सिंहनादं वै पर्यष्वजत फाल्गुनम् ॥ २ ॥
परंतु वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण बड़े हर्षमें मग्न होकर सिंहनाद करने लगे। उन्होंने अर्जुनको छातीसे लगा लिया ॥ २ ॥
स विनद्य महानादमभीषून् संनियम्य च ।
ननर्त हर्षसंवीतो वातोद्धूत इव द्रुमः ॥ ३ ॥
वे बड़े जोरसे गर्जना करके घोड़ोंकी रास रोककर हवाके हिलाये हुए वृक्षके समान हर्षसे झूमकर नाचने लगे ॥ ३ ॥
ततः परिष्वज्य पुनः पार्थमास्फोट्य चासकृत् ।
रथोपस्थगतो धीमान् प्राणदत् पुनरच्युतः ॥ ४ ॥
तत्पश्चात् पुनः अर्जुनको हृदयसे लगाकर बारंबार उनकी पीठ ठोंककर रथके पिछले भागमें बैठे हुए बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्ण फिर जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ ४ ॥
प्रहृष्टमनसं ज्ञात्वा वासुदेवं महाबलः ।
अर्जुनोऽथाब्रवीद् राजन्नातिहृष्टमना इव ॥ ५ ॥
राजन्! भगवान् श्रीकृष्णके मनमें अधिक प्रसन्नता हुई जानकर महाबली अर्जुन कुछ अप्रसन्न-से होकर बोले— ॥ ५ ॥
अतिहर्षोऽयमस्थाने तवाद्य मधुसूदन ।
शोकस्थाने तु सम्प्राप्ते हैडिम्बस्य वधेन तु ॥ ६ ॥
‘मधुसूदन! हिडिम्बाकुमार घटोत्कचके वधसे आज हमारे लिये तो शोकका अवसर प्राप्त हुआ है, परंतु आपको यह बेमौके अधिक हर्ष हो रहा है ॥ ६ ॥
विमुखानीह सैन्यानि हतं दृष्ट्वा घटोत्कचम् ।
वयं च भृशमुद्विग्ना हैडिम्बेस्तु निपातनात् ॥ ७ ॥
'घटोत्कचको मारा गया देख हमारी सेनाएँ यहाँ युद्धसे विमुख होकर भागी जा रही हैं। हिडिम्बाकुमारके धराशायी होनेसे हमलोग भी अत्यन्त उद्विग्न हो उठे हैं ॥ ७ ॥
नैतत्कारणमल्पं हि भविष्यति जनार्दन ।
तदद्य शंस मे पृष्टः सत्यं सत्यवतां वर ॥ ८ ॥
'परंतु जनार्दन! आपको जो इतनी खुशी हो रही है उसका कोई छोटा-मोटा कारण न होगा। वही मैं आपसे पूछता हूँ। सत्यवक्ताओंमें श्रेष्ठ प्रभो! आप इसका मुझे यथार्थ कारण बताइये ॥ ८ ॥
यद्येतन्न रहस्यं ते वक्तुमर्हस्यरिंदम ।
धैर्यस्य वैकृतं ब्रूहि त्वमद्य मधुसूदन ॥ ९ ॥
'शत्रुदमन! यदि कोई गोपनीय बात न हो तो मुझे अवश्य बतावें। मधुसूदन! आपके इस हर्ष-प्रदर्शनसे आज हमारा धैर्य छूटा जा रहा है, अतः आप इसका कारण अवश्य बतावें ॥ ९ ॥
समुद्रस्येव संशोषं मेरोरिव विसर्पणम् ।
तथैतदद्य मन्येऽहं तव कर्म जनार्दन ॥ १० ॥
'जनार्दन! जैसे समुद्रका सूखना और मेरु पर्वतका विचलित होना आश्चर्यकी बात है, उसी प्रकार आज मैं आपके इस हर्षप्रकाशनरूपी कर्मको आश्चर्यजनक मानता हूँ' ॥ १० ॥
श्रीवासुदेव उवाच
अतिहर्षमिमं प्राप्तं शृणु मे त्वं धनंजय ।
अतीव मनसः सद्यः प्रसादकरमुत्तमम् ॥ ११ ॥
**भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**धनंजय! आज वास्तवमें मुझे यह अत्यन्त हर्षका अवसर प्राप्त हुआ है, इसका क्या कारण है, यह तुम मुझसे सुनो। मेरे मनको तत्काल अत्यन्त प्रसन्नता प्रदान करनेवाला वह उत्तम कारण इस प्रकार है ॥ ११ ॥
शक्तिं घटोत्कचेनेमां व्यंसयित्वा महाद्युते ।
कर्णं निहतमेवाजौ विद्धि सद्यो धनंजय ॥ १२ ॥
महातेजस्वी धनंजय! इन्द्रकी दी हुई शक्तिको घटोत्कचके द्वारा कर्णके हाथसे दूर कराकर अब तुम युद्धमें कर्णको शीघ्र मरा हुआ ही समझो ॥ १२ ॥
शक्तिहस्तं पुनः कर्णं को लोकेऽस्ति पुमानिह ।
य एनमभितस्तिष्ठेत् कार्तिकेयमिवाहवे ॥ १३ ॥
इस संसारमें कौन ऐसा पुरुष है, जो युद्धस्थलमें कार्तिकेयके समान शक्तिशाली कर्णके सामने खड़ा हो सके ॥ १३ ॥
दिष्ट्यापनीतकवचो दिष्ट्यापहृतकुण्डलः ।
दिष्ट्या सा व्यंसिता शक्तिरमोघास्य घटोत्कचे ॥ १४ ॥
सौभाग्यकी बात है कि कर्णका दिव्य कवच उतर गया, सौभाग्यसे ही उसके कुण्डल छीने गये तथा सौभाग्यसे ही उसकी वह अमोघशक्ति घटोत्कचपर गिरकर उसके हाथसे निकल गयी ॥ १४ ॥
यदि हि स्यात् सकवचस्तथैव स्यात् सकुण्डलः ।
सामरानपि लोकांस्त्रीनेकः कर्णो जयेद् रणे ॥ १५ ॥
यदि कर्ण कवच और कुण्डलोंसे सम्पन्न होता तो वह अकेला ही रणभूमिमें देवताओंसहित तीनों लोकोंको जीत सकता था ॥ १५ ॥
वासवो वा कुबेरो वा वरुणो वा जलेश्वरः ।
यमो वा नोत्सहेत् कर्णं रणे प्रतिसमासितुम् ॥ १६ ॥
उस अवस्थामें इन्द्र, कुबेर, जलेश्वर वरुण अथवा यमराज भी रणभूमिमें कर्णका सामना नहीं कर सकते थे ॥ १६ ॥
गाण्डीवमुद्यम्य भवांश्चक्रं चाहं सुदर्शनम् ।
न शक्तौ स्वो रणे जेतुं तथायुक्तं नरर्षभम् ॥ १७ ॥
तुम गाण्डीव उठाकर और मैं सुदर्शनचक्र लेकर दोनों एक साथ जाते तो भी समरांगणमें कवच-कुण्डलोंसे युक्त नरश्रेष्ठ कर्णको नहीं जीत सकते थे ॥ १७ ॥
त्वद्धितार्थं तु शक्रेण मायापहृतकुण्डलः ।
विहीनकवचश्चायं कृतः परपुरंजयः ॥ १८ ॥
तुम्हारे हितके लिये इन्द्रने शत्रु-नगरीपर विजय पानेवाले कर्णके दोनों कुण्डल मायासे हर लिये और उसे कवचसे भी वंचित कर दिया ॥ १८ ॥
उत्कृत्य कवचं यस्मात् कुण्डले विमले च ते ।
प्रादाच्छक्राय कर्णो वै तेन वैकर्तनः स्मृतः ॥ १९ ॥
कर्णने कवच तथा उन निर्मल कुण्डलोंको स्वयं ही अपने शरीरसे कुतरकर इन्द्रको दे दिया था; इसीलिये उसका नाम वैकर्तन हुआ ॥ १९ ॥
आशीविष इव क्रुद्धो जृम्भितो मन्त्रतेजसा ।
तथाद्य भाति कर्णो मे शान्तज्वाल इवानलः ॥ २० ॥
जैसे क्रोधमें भरे हुए सर्पको मन्त्रके तेजसे स्तब्ध कर दिया जाय तथा प्रज्वलित आगकी ज्वालाको बुझा दिया जाय, शक्तिसे वंचित हुआ कर्ण भी आज मुझे वैसा ही प्रतीत होता है ॥ २० ॥
यदाप्रभृति कर्णाय शक्तिर्दत्ता महात्मना ।
वासवेन महाबाहो क्षिप्ता यासौ घटोत्कचे ॥ २१ ॥
कुण्डलाभ्यां निमायाथ दिव्येन कवचेन च ।
तां प्राप्यामन्यत वृषः सततं त्वां हतं रणे ॥ २२ ॥
महाबाहो! जबसे महात्मा इन्द्रने कर्णको उसके दिव्य कवच और कुण्डलोंके बदलेमें
अपनी शक्ति दी थी, जिसे उसने घटोत्कचपर चला दिया है, उस शक्तिको पाकर धर्मात्मा
कर्ण सदा तुम्हें रणभूमिमें मारा गया ही मानता था ।। २१-२२ ।।
एवंगतोऽपि शक्योऽयं हन्तुं नान्येन केनचित् ।
ऋते त्वां पुरुषव्याघ्र शपे सत्येन चानघ ।। २३ ।।
पुरुषसिंह! आज ऐसी अवस्थामें आकर भी कर्ण तुम्हारे सिवा किसी दूसरे योद्धासे
नहीं मारा जा सकता। अनघ! मैं सत्यकी शपथ खाकर यह बात कहता हूँ ।। २३ ।।
ब्रह्मण्यः सत्यवादी च तपस्वी नियतव्रतः ।
रिपुष्वपि दयावांश्च तस्मात् कर्णो वृषः स्मृतः ।। २४ ।।
कर्ण ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, तपस्वी, नियम और व्रतका पालक तथा शत्रुओंपर भी
दया करनेवाला है; इसीलिये उसे वृष (धर्मात्मा) कहा गया है ।। २४ ।।
युद्धशौण्डो महाबाहुर्नित्योद्यतशरासनः ।
केसरीव वने नर्दन् मातङ्ग इव यूथपान् ।। २५ ।।
विमदान् रथशार्दूलान् कुरुते रणमूर्धनि ।
महाबाहु कर्ण युद्धमें कुशल है। उसका धनुष सदा उठा ही रहता है। वनमें दहाड़नेवाले
सिंहके समान वह सदा गर्जता रहता है। जैसे मतवाला हाथी कितने ही यूथपतियोंको
मदरहित कर देता है, उसी प्रकार कर्ण युद्धके मुहानेपर सिंहके समान पराक्रमी
महारथियोंका भी घमंड चूर कर देता है ।। २५ १/२ ।।
मध्यं गत इवादित्यो यो न शक्यो निरीक्षितुम् ।। २६ ।।
त्वदीयैः पुरुषव्याघ्र योधमुख्यैर्महात्मभिः ।
शरजालसहस्रांशुः शरदीव दिवाकरः ।। २७ ।।
पुरुषसिंह! तुम्हारे महामनस्वी श्रेष्ठ योद्धा दोपहरके तपते हुए सूर्यकी भाँति कर्णकी
ओर देख भी नहीं सकते। जैसे शरद्-ऋतुके निर्मल आकाशमें सूर्य अपनी सहस्रों किरणें
बिखेरता है, उसी प्रकार कर्ण युद्धमें अपने बाणोंका जाल-सा बिछा देता है ।। २६-२७ ।।
तपान्ते जलदो यद्वच्छरधाराः क्षरन् मुहुः ।
दिव्यास्त्रजलदः कर्णः पर्जन्य इव वृष्टिमान् ।। २८ ।।
जैसे वर्षाकालमें बरसनेवाला मेघ पानीकी धारा गिराता है, उसी प्रकार दिव्यास्त्ररूपी
जल प्रदान करनेवाला कर्णरूपी मेघ बारंबार बाणधाराकी वर्षा करता रहता है ।। २८ ।।
त्रिदशैरपि चास्याद्भिः शरवर्षं समन्ततः ।
अशक्यस्तदयं जेतुं स्रवद्भिर्मांसशोणितम् ।। २९ ।।
चारों ओर बाणोंकी वृष्टि करके शत्रुओंके शरीरोंसे रक्त और मांस बहानेवाले देवता भी
कर्णको परास्त नहीं कर सकते ।। २९ ।।
कवचेन विहीनश्च कुण्डलाभ्यां च पाण्डव ।
सोऽद्य मानुषतां प्राप्तो विमुक्तः शक्रदत्तया ॥ ३० ॥
पाण्डुनन्दन! कर्ण कवच और कुण्डलसे हीन तथा इन्द्रकी दी हुई शक्तिसे शून्य होकर अब साधारण मनुष्यके समान हो गया है ॥ ३० ॥
एको हि योगोऽस्य भवेद् वधाय
च्छिद्रे ह्येनं स्वप्रमत्तः प्रमत्तम् ।
कृच्छ्रं प्राप्तं रथचक्रे विमग्ने
हन्याः पूर्वं त्वं तु संज्ञां विचार्य ॥ ३१ ॥
इतनेपर भी इसके वधका एक ही उपाय है। कोई छिद्र प्राप्त होनेपर जब वह असावधान हो, तुम्हारे साथ युद्ध होते समय जब कर्णके रथका पहिया (शापवश) धरतीमें धँस जाय और वह संकटमें पड़ जाय, उस समय तुम पूर्ण सावधान हो मेरे संकेतपर ध्यान देकर उसे पहले ही मार डालना ॥ ३१ ॥
न ह्युद्यतास्त्रं युधि हन्यादजय्य-
मप्येकवीरो बलभित् सवज्रः ।
जरासंधश्चेदिराजो महात्मा
महाबाहुश्चैकलव्यो निषादः ॥ ३२ ॥
एकैकशो निहताः सर्व एते
योगैस्तैस्तैस्त्वद्धितार्थं मयैव ।
अन्यथा जब वह युद्धके लिये अस्त्र उठा लेगा, उस समय उस अजेय वीर कर्णको त्रिलोकीके एकमात्र शूरवीर वज्रधारी इन्द्र भी नहीं मार सकेंगे। मगधराज जरासंध, महामनस्वी चेदिराज शिशुपाल और निषादजातीय महाबाहु एकलव्य—इन सबको मैंने ही तुम्हारे हितके लिये विभिन्न उपायोंद्वारा एक-एक करके मार डाला है ॥ ३२ १/२ ॥
अथापरे निहता राक्षसेन्द्रा
हिडिम्बकिर्मीरबकप्रधानाः ।
अलायुधः परचक्रावमर्दी
घटोत्कचश्चोग्रकर्मा तरस्वी ॥ ३३ ॥
इनके सिवा हिडिम्ब, किर्मीर और बक आदि दूसरे-दूसरे राक्षसराज, शत्रुदलका संहार करनेवाला अलायुध और भयंकर कर्म करनेवाला वेगशाली घटोत्कच भी तुम्हारे हितके लिये ही मारे और मरवाये गये हैं ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे घटोत्कचवधे
श्रीकृष्णहर्षेऽशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके समय घटोत्कचका वध होनेपर श्रीकृष्णका हर्षविषयक एक सौ अस्सीवाँ अध्याय पूरा
हुआ ।। १८० ।।