सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

सात्यकि और युधिष्ठिरका संवाद

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकादशाधिकशततमोऽध्यायः

सात्यकि और युधिष्ठिरका संवाद

संजय उवाच

प्रीतियुक्तं च हृद्यं च मधुराक्षरमेव च ।
कालयुक्तं च चित्रं च न्याय्यं यच्चापि भाषितुम् ॥ १ ॥
धर्मराजस्य तद् वाक्यं निशम्य शिनिपुङ्गवः ।
सात्यकिर्भरतश्रेष्ठ प्रत्युवाच युधिष्ठिरम् ॥ २ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! धर्मराजका वह वचन प्रेमपूर्ण, मनको प्रिय लगनेवाला, मधुर अक्षरोंसे युक्त, सामयिक, विचित्र, कहनेयोग्य तथा न्यायसंगत था। भरतश्रेष्ठ! उसे सुनकर शिनिप्रवर सात्यकिने युधिष्ठिरको इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ १-२ ॥

श्रुतं ते गदतो वाक्यं सर्वमेतन्मयाच्युत ।
न्याययुक्तं च चित्रं च फाल्गुनार्थे यशस्करम् ॥ ३ ॥
‘अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले नरेश! आपने अर्जुनकी सहायताके लिये जो-जो बातें कही हैं, वह सब मैंने सुन लीं। आपका कथन अद्भुत, न्यायसंगत और यशकी वृद्धि करनेवाला है ॥ ३ ॥

एवंविधे तथा काले मादृशं प्रेक्ष्य सम्मतम् ।
वक्तुमर्हसि राजेन्द्र यथा पार्थं तथैव माम् ॥ ४ ॥
राजेन्द्र! ऐसे समयमें मेरे-जैसे प्रिय व्यक्तिको देखकर आप जैसी बात कह सकते हैं, वैसी ही कही है। आप अर्जुनसे जो कुछ कह सकते हैं, वही आपने मुझसे भी कहा है ॥ ४ ॥

न मे धनंजयस्यार्थे प्राणा रक्ष्याः कथंचन ।
त्वत्प्रयुक्तः पुनरहं किं न कुर्यां महाहवे ॥ ५ ॥
‘महाराज! अर्जुनके हितके लिये मुझे किसी प्रकार भी अपने प्राणोंकी रक्षाकी चिन्ता नहीं करनी है; फिर आपका आदेश मिलनेपर मैं इस महायुद्धमें क्या नहीं कर सकता हूँ? ॥ ५ ॥

लोकत्रयं योधयेयं सदेवासुरमानुषम् ।
त्वत्प्रयुक्तो नरेन्द्रह किमुतैतत् सुदुर्बलम् ॥ ६ ॥
‘नरेन्द्र! आपकी आज्ञा हो तो देवताओं, असुरों तथा मनुष्योंसहित तीनों लोकोंके साथ मैं युद्ध कर सकता हूँ। फिर यहाँ इस अत्यन्त दुर्बल कौरवी सेनाका सामना करना कौन बड़ी बात है? ॥ ६ ॥

सुयोधनबलं त्वद्य योधयिष्ये समन्ततः ।

विजेष्ये च रणे राजन् सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ७ ॥
'राजन्! मैं रणक्षेत्रमें आज चारों ओर घूमकर दुर्योधनकी सेनाके साथ युद्ध करूँगा और उसपर विजय पाऊँगा; यह मैं आपसे सच्ची बात कहता हूँ ॥ ७ ॥
कुशल्यहं कुशलिनं समासाद्य धनंजयम् ।
हते जयद्रथे राजन् पुनरेष्यामि तेऽन्तिकम् ॥ ८ ॥
'राजन्! मैं कुशलपूर्वक रहकर सकुशल अर्जुनके पास पहुँच जाऊँगा और जयद्रथके मारे जानेपर उनके साथ ही आपके पास लौट आऊँगा ॥ ८ ॥
अवश्यं तु मया सर्वं विज्ञाप्यस्त्वं नराधिप ।
वासुदेवस्य यद् वाक्यं फाल्गुनस्य च धीमतः ॥ ९ ॥
'परंतु नरेश्वर! भगवान् श्रीकृष्ण तथा बुद्धिमान् अर्जुनने युद्धके लिये जाते समय मुझसे जो कुछ कहा था, वह सब आपको सूचित कर देना मेरे लिये अत्यन्त आवश्यक है ॥ ९ ॥
दृढं त्वभिपरीतोऽहमर्जुनेन पुनः पुनः ।
मध्ये सर्वस्य सैन्यस्य वासुदेवस्य शृण्वतः ॥ १० ॥
'अर्जुनने सारी सेनाके बीचमें भगवान् श्रीकृष्णके सुनते हुए मुझे बारंबार कहकर दृढ़तापूर्वक बाँध लिया है ॥
अद्य माधव राजानमप्रमत्तोऽनुपालय ।
आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा यावद्धन्मि जयद्रथम् ॥ ११ ॥
'उन्होंने कहा था—'माधव! आज मैं जबतक जयद्रथका वध करता हूँ, तबतक युद्धमें तुम श्रेष्ठ बुद्धिका आश्रय लेकर पूरी सावधानीके साथ राजा युधिष्ठिरकी रक्षा करो ॥ ११ ॥
त्वयि चाहं महाबाहो प्रद्युम्ने वा महारथे ।
नृपं निक्षिप्य गच्छेयं निरपेक्षो जयद्रथम् ॥ १२ ॥
'महाबाहो! मैं तुमपर अथवा महारथी प्रद्युम्नपर ही भरोसा करके राजाको धरोहरकी भाँति सौंपकर निरपेक्षभावसे जयद्रथके पास जा सकता हूँ ॥ १२ ॥
जानीषे हि रणे द्रोणं रभसं श्रेष्ठसम्मतम् ।
प्रतिज्ञा चापि ते नित्यं श्रुता द्रोणस्य माधव ॥ १३ ॥
'माधव! तुम जानते ही हो कि रणक्षेत्रमें श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा सम्मानित आचार्य द्रोण कितने वेगशाली हैं। उन्होंने जो प्रतिज्ञा कर रखी है, उसे भी तुम प्रतिदिन सुनते ही होगे ॥ १३ ॥
ग्रहणे धर्मराजस्य भारद्वाजोऽपि गृध्यति ।
शक्तश्चापि रणे द्रोणो निग्रहीतुं युधिष्ठिरम् ॥ १४ ॥
'द्रोणाचार्य भी धर्मराजको बंदी बनाना चाहते हैं और वे समरांगणमें राजा युधिष्ठिरको कैद करनेमें समर्थ भी हैं ॥ १४ ॥
एवं त्वयि समाधाय धर्मराजं नरोत्तमम् ।
अहमद्य गमिष्यामि सैन्धवस्य वधाय हि ॥ १५ ॥

'ऐसी अवस्थामें नरश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिरकी रक्षाका सारा भार तुमपर ही रखकर आज मैं सिन्धुराजके वधके लिये जाऊँगा ।। १५ ।।
जयद्रथं च हत्वाहं द्रुतमेष्यामि माधव ।
धर्मराजं न चेद् द्रोणो निगृह्णीयाद् रणे बलात् ।। १६ ।।
'माधव! यदि द्रोणाचार्य रणक्षेत्रमें धर्मराजको बलपूर्वक बंदी न बना सकें तो मैं जयद्रथका वध करके शीघ्र ही लौट आऊँगा ।। १६ ।।
निगृहीते नरश्रेष्ठे भारद्वाजेन माधव ।
सैन्धवस्य वधो न स्यान्ममाप्रीतिस्तथा भवेत् ।। १७ ।।
'मधुवंशी वीर! यदि द्रोणाचार्यने नरश्रेष्ठ युधिष्ठिरको कैद कर लिया तो सिन्धुराजका वध नहीं हो सकेगा और मुझे भी महान् दुःख होगा ।। १७ ।।
एवंगते नरश्रेष्ठे पाण्डवे सत्यवादिनि ।
अस्माकं गमनं व्यक्तं वनं प्रति भवेत् पुनः ।। १८ ।।
'यदि सत्यवादी नरश्रेष्ठ पाण्डुकुमार युधिष्ठिर इस प्रकार बंदी बनाये गये तो निश्चय ही हमें पुनः वनमें जाना पड़ेगा ।। १८ ।।
सोऽयं मम जयो व्यक्तं व्यर्थ एव भविष्यति ।
यदि द्रोणो रणे क्रुद्धो निगृह्णीयाद् युधिष्ठिरम् ।। १९ ।।
'यदि द्रोणाचार्य रणक्षेत्रमें कुपित होकर युधिष्ठिरको कैद कर लेंगे तो मेरी यह विजय अवश्य ही व्यर्थ हो जायगी ।। १९ ।।
स त्वमद्य महाबाहो प्रियार्थं मम माधव ।
जयार्थं च यशोऽर्थं च रक्ष राजानमाहवे ।। २० ।।
'महाबाहु माधव! इसलिये तुम आज मेरा प्रिय करने, मुझे विजय दिलाने और मेरे यशकी वृद्धि करनेके लिये युद्धस्थलमें राजा युधिष्ठिरकी रक्षा करो' ।। २० ।।
स भवान् मयि निक्षेपो निक्षिप्तः सव्यसाचिना ।
भारद्वाजाद् भयं नित्यं मन्यमानेन वै प्रभो ।। २१ ।।
'प्रभो! इस प्रकार द्रोणाचार्यसे निरन्तर भय मानते हुए सव्यसाची अर्जुनने आपको मेरे पास धरोहरके रूपमें रख छोड़ा है ।। २१ ।।
तस्यापि च महाबाहो नित्यं पश्यामि संयुगे ।
नान्यं हि प्रतियोद्धारं रौक्मिणेयादृते प्रभो ।। २२ ।।
'महाबाहो! प्रभो! मैं प्रतिदिन युद्धस्थलमें रुक्मिणी-नन्दन प्रद्युम्नके सिवा दूसरे किसी वीरको ऐसा नहीं देखता जो द्रोणाचार्यके सामने खड़ा होकर उनसे युद्ध कर सके ।। २२ ।।
मां चापि मन्यते युद्धे भारद्वाजस्य धीमतः ।
सोऽहं सम्भावनां चैतामाचार्यवचनं च तत् ।। २३ ।।
पृष्ठतो नोत्सहे कर्तुं त्वां वा त्यक्तुं महीपते ।

‘अर्जुन मुझे भी बुद्धिमान् द्रोणाचार्यका सामना करनेमें समर्थ योद्धा मानते हैं। महीपते! मैं अपने आचार्यकी इस सम्भावनाको तथा उनके उस आदेशको न तो पीछे ढकेल सकता हूँ और न आपको ही त्याग सकता हूँ ।। २३ १/२ ।।

आचार्यो लघुहस्तत्वादभेद्यकवचावृतः ।। २४ ।।
उपलभ्य रणे क्रीडेद् यथा शकुनिना शिशुः ।

‘द्रोणाचार्य अभेद्य कवचसे सुरक्षित हैं। वे शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेके कारण रणक्षेत्रमें अपने विपक्षीको पाकर उसी प्रकार क्रीड़ा करते हैं, जैसे कोई बालक पक्षीके साथ खेल रहा हो ।। २४ १/२ ।।

यदि कार्ष्णिर्धनुष्पाणिर्हि स्यान्मकरध्वजः ।। २५ ।।
तस्मै त्वां विसृजेयं वै स त्वां रक्षेद् यथार्जुनः ।

‘यदि कामदेवके अवतार श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न यहाँ हाथमें धनुष लेकर खड़े होते तो उन्हें मैं आपको सौंप देता। वे अर्जुनके समान ही आपकी रक्षा कर सकते थे ।। २५ १/२ ।।

कुरु त्मात्मनो गुप्तिं कस्ते गोप्ता गते मयि ।। २६ ।।
यः प्रतीयाद् रणे द्रोणं यावद् गच्छामि पाण्डवम् ।

‘आप पहले अपनी रक्षाकी व्यवस्था कीजिये। मेरे चले जानेपर कौन आपका संरक्षण करनेवाला है, जो रणक्षेत्रमें तबतक द्रोणाचार्यका सामना करता रहे जबतक कि मैं अर्जुनके पास जाता (और लौटता) हूँ ।। २६ १/२ ।।

मा च ते भयमद्यास्तु राजन्नर्जुनसम्भवम् ।। २७ ।।
न स जातु महाबाहुर्भारमुद्यम्य सीदति ।

‘महाराज! आज आपके मनमें अर्जुनके लिये भय नहीं होना चाहिये। वे महाबाहु किसी कार्यभारको उठा लेनेपर कभी शिथिल नहीं होते हैं ।। २७ १/२ ।।

ये च सौवीरका योधास्तथा सैन्धवपौरवाः ।। २८ ।।
उदीच्या दाक्षिणात्याश्च ये चान्येऽपि महारथाः ।
ये च कर्णमुखा राजन् रथोदाराः प्रकीर्तिताः ।। २९ ।।
एतेऽर्जुनस्य क्रुद्धस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ।

‘राजन्! जो सौवीर, सिन्धु तथा पुरुदेशके योद्धा हैं, जो उत्तर और दक्षिणके निवासी एवं अन्य महारथी हैं तथा जो कर्ण आदि श्रेष्ठ रथी बताये गये हैं वे कुपित हुए अर्जुनकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हैं ।।

उद्युक्ता पृथिवी सर्वा ससुरासुरमानुषा ।। ३० ।।
सराक्षसगणा राजन् सकिन्नरमहोरगा ।
जङ्गमाः स्थावराः सर्वे नालं पार्थस्य संयुगे ।। ३१ ।।

‘नरेश्वर! देवता, असुर, मनुष्य, राक्षस, किन्नर तथा महान् सर्पगणोंसहित यह समूची पृथ्वी और सभी स्थावर-जंगम प्राणी युद्धके लिये उद्यत हो जायँ तो भी सब मिलकर भी युद्धस्थलमें अर्जुनका सामना नहीं कर सकते ॥ ३०-३१ ॥
एवं ज्ञात्वा महाराज व्येतु ते धीर्धनंजये ।
यत्र वीरौ महेष्वासौ कृष्णौ सत्यपराक्रमौ ॥ ३२ ॥
न तत्र कर्मणो व्यापत् कथञ्चिदपि विद्यते ।
‘महाराज! ऐसा जानकर अर्जुनके विषयमें आपका भय दूर हो जाना चाहिये। जहाँ सत्यपराक्रमी और महाधनुर्धर वीर श्रीकृष्ण एवं अर्जुन विद्यमान हैं वहाँ किसी प्रकार भी कार्यमें व्याघात नहीं हो सकता ॥ ३२ १/२ ॥
दैवं कृतास्त्रतां योगममर्षमपि चाहवे ॥ ३३ ॥
कृतज्ञतां दयां चैव भ्रातुस्त्वमनुचिन्तय ।
‘आपके भाई अर्जुनमें जो दैवीशक्ति, अस्त्रविद्याकी निपुणता, योग, युद्धस्थलमें अमर्ष, कृतज्ञता और दया आदि सद्गुण हैं उनका आप बारंबार चिन्तन कीजिये ॥ ३३ १/२ ॥
मयि चापि सहाये ते गच्छमानेऽर्जुनं प्रति ॥ ३४ ॥
द्रोणे चित्रास्त्रतां संख्ये राजंस्त्वमनुचिन्तय ।
‘राजन्! मैं आपका सहायक रहा हूँ, यदि मैं भी अर्जुनके पास चला जाता हूँ तो युद्धमें द्रोणाचार्य जिन विचित्र अस्त्रोंका प्रयोग करेंगे उनपर भी आप अच्छी तरह विचार कर लीजिये ॥ ३४ १/२ ॥
आचार्यो हि भृशं राजन् निग्रहे तव गृध्यति ॥ ३५ ॥
प्रतिज्ञामात्मनो रक्षन् सत्यां कर्तुं च भारत ।
‘भरतवंशी नरेश! द्रोणाचार्य आपको कैद करनेकी बड़ी इच्छा रखते हैं। वे अपनी प्रतिज्ञाकी रक्षा करते हुए उसे सत्य कर दिखाना चाहते हैं ॥ ३५ १/२ ॥
कुरुष्वाद्यात्मनो गुप्तिं कस्ते गोप्ता गते मयि ॥ ३६ ॥
यस्याहं प्रत्ययात् पार्थ गच्छेयं फाल्गुनं प्रति ।
‘अब आप अपनी रक्षाका प्रबन्ध कीजिये। पार्थ! मेरे चले जानेपर कौन आपका रक्षक होगा, जिसपर विश्वास करके मैं अर्जुनके पास चला जाऊँ ॥ ३६ १/२ ॥
न ह्यहं त्वां महाराज अनिक्षिप्य महाहवे ॥ ३७ ॥
क्वचिद् यास्यामि कौरव्य सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।
‘महाराज! कुरुनन्दन! मैं आपको इस महासमरमें किसी वीरके संरक्षणमें रखे बिना कहीं नहीं जाऊँगा; यह मैं आपसे सच्ची बात कहता हूँ ॥ ३७ १/२ ॥
एतद्विचार्य बहुशो बुद्ध्या बुद्धिमतां वर ॥ ३८ ॥
दृष्ट्वा श्रेयः परं बुद्ध्या ततो राजन् प्रशाधि माम् ॥ ३९ ॥

'बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ महाराज! अपनी बुद्धिसे इस विषयमें बहुत सोच-विचार करके आपको जो परम मंगलकारक कृत्य जान पड़े, उसके लिये मुझे आज्ञा दें' ।। ३८-३९ ।।

युधिष्ठिर उवाच

एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि माधव ।
न तु मे शुद्ध्यते भावः श्वेताश्वं प्रति मारिष ।। ४० ।।
**युधिष्ठिर बोले—**महाबाहु माधव! तुम जैसा कहते हो, वही ठीक है। आर्य! श्वेतवाहन द्रोणाचार्यकी ओरसे मेरा हृदय शुद्ध (निश्चिन्त) नहीं हो रहा है ।।
करिष्ये परमं यत्नमात्मनो रक्षणे ह्यहम् ।
गच्छ त्वं समनुज्ञातो यत्र यातो धनंजयः ।। ४१ ।।
मैं अपनी रक्षाके लिये महान् प्रयत्न करूँगा। तुम मेरी आज्ञासे वहीं जाओ, जहाँ अर्जुन गया है ।। ४१ ।।
आत्मसंरक्षणं संख्ये गमनं चार्जुनं प्रति ।
विचार्यैतत् स्वयं बुद्ध्या गमनं तत्र रोचय ।। ४२ ।।
मुझे युद्धमें अपनी रक्षा करनी चाहिये या अर्जुनके पास तुम्हें भेजना चाहिये। इन दोनों बातोंपर तुम स्वयं ही अपनी बुद्धिसे विचार करके वहाँ जाना ही पसंद करो ।।
स त्वमातिष्ठ यानाय यत्र यातो धनंजयः ।
ममापि रक्षणं भीमः करिष्यति महाबलः ।। ४३ ।।
अतः जहाँ अर्जुन गया है वहाँ जानेके लिये तुम तैयार हो जाओ। महाबली भीमसेन मेरी भी रक्षा कर लेंगे ।। ४३ ।।
पार्षतश्च ससोदर्यः पार्थिवाश्च महाबलाः ।
द्रौपदेयाश्च मां तात रक्षिष्यन्ति न संशयः ।। ४४ ।।
तात! भाइयोंसहित धृष्टद्युम्न, महाबली भूपालगण तथा द्रौपदीके पाँचों पुत्र मेरी रक्षा कर लेंगे; इसमें संशय नहीं है ।। ४४ ।।
केकया भ्रातरः पञ्च राक्षसश्च घटोत्कचः ।
विराटो द्रुपदश्चैव शिखण्डी च महारथः ।। ४५ ।।
धृष्टकेतुश्च बलवान् कुन्तिभोजश्च मातुलः ।
नकुलः सहदेवश्च पञ्चालाः सृञ्जयास्तथा ।। ४६ ।।
एते समाहितास्तात रक्षिष्यन्ति न संशयः ।
तात! पाँच भाई केकयराजकुमार, राक्षस घटोत्कच, विराट, द्रुपद, महारथी शिखण्डी, धृष्टकेतु, बलवान् मामा कुन्तिभोज (पुरुजित्), नकुल, सहदेव, पांचाल तथा सृंजय-वीरगण—ये सभी सावधान होकर निःसंदेह मेरी रक्षा करेंगे ।। ४५-४६ १/२ ।।
न द्रोणः सह सैन्येन कृतवर्मा च संयुगे ।। ४७ ।।

समासादयितुं शक्तो न च मां धर्षयिष्यति ।
सेनासहित द्रोणाचार्य तथा कृतवर्मा—ये युद्धस्थलमें मेरे पास नहीं पहुँच सकते और न मुझे परास्त ही कर सकेंगे ॥ ४७ १/२ ॥
धृष्टद्युम्नश्च समरे द्रोणं क्रुद्धं परंतपः ॥ ४८ ॥
वारयिष्यति विक्रम्य वेलेव मकरालयम् ।
शत्रुओंको संताप देनेवाला धृष्टद्युम्न समरांगणमें कुपित हुए द्रोणाचार्यको पराक्रम करके रोक लेगा। ठीक वैसे ही, जैसे तटकी भूमि समुद्रको आगे बढ़नेसे रोक देती है ॥ ४८ १/२ ॥
यत्र स्थास्यति संग्रामे पार्षतः परवीरहा ॥ ४९ ॥
द्रोणो न सैन्यं बलवत् क्रामेत् तत्र कथंचन ।
जहाँ शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला द्रुपदकुमार संग्रामभूमिमें खड़ा होगा, वहाँ मेरी प्रबल सेनापर द्रोणाचार्य किसी तरह आक्रमण नहीं कर सकते ॥
एष द्रोणविनाशाय समुत्पन्नो हुताशनात् ॥ ५० ॥
कवची स शरी खड्गी धन्वी च वरभूषणः ।
यह धृष्टद्युम्न, द्रोणाचार्यका नाश करनेके लिये कवच, धनुष, बाण, खड्ग और श्रेष्ठ आभूषणोंके साथ अग्निसे प्रकट हुआ है ॥ ५० १/२ ॥
विश्रब्धं गच्छ शैनेय मा कार्षीर्मयि सम्भ्रमम् ।
धृष्टद्युम्नो रणे क्रुद्धं द्रोणमावारयिष्यति ॥ ५१ ॥
अतः शिनिनन्दन! तुम निश्चिन्त होकर जाओ। मेरे लिये संदेह मत करो। धृष्टद्युम्न रणक्षेत्रमें कुपित हुए द्रोणाचार्यको सर्वथा रोक देगा ॥ ५१ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि युधिष्ठिरसात्यकिवाक्ये
एकादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें युधिष्ठिर और सात्यकिका संवादविषयक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १११ ॥