महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
(द्रोणवधपर्व)
(द्रोणवधपर्व)
चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
निद्रासे व्याकुल हुए उभयपक्षके सैनिकोंका अर्जुनके कहनेसे सो जाना और चन्द्रोदयके बाद पुनः उठकर युद्धमें लग जाना
संजय उवाच
व्यासेनैवमथोक्तस्तु धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
स्वयं कर्णवधाद् वीरो निवृत्तो भरतर्षभ ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— भरतश्रेष्ठ! व्यासजीके ऐसा कहनेपर वीर धर्मराज युधिष्ठिर स्वयं कर्णका वध करनेके विचारसे हट गये ॥ १ ॥
घटोत्कचे तु निहते सूतपुत्रेण तां निशाम् ।
दुःखामर्षवशं प्राप्तो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ २ ॥
सूतपुत्रके द्वारा घटोत्कचके मारे जानेपर उस रातमें धर्मराज युधिष्ठिर दुःख और अमर्षके वशीभूत हो गये ॥ २ ॥
दृष्ट्वा भीमेन महतीं वार्यमाणां चमूं तव ।
धृष्टद्युम्नमुवाचेदं कुम्भयोनिं निवारय ॥ ३ ॥
भीमसेनके द्वारा आपकी विशाल सेनाका निवारण होता देख उन्होंने धृष्टद्युम्नसे इस प्रकार कहा—'वीर! तुम द्रोणाचार्यको आगे बढ़नेसे रोको ॥ ३ ॥
त्वं हि द्रोणविनाशाय समुत्पन्नो हुताशनात् ।
सशरः कवची खड्गी धन्वी च परतापनः ॥ ४ ॥
'तुम तो शत्रुओंको संताप देनेवाले हो और द्रोणका विनाश करनेके लिये ही बाण, कवच, खड्ग और धनुषसहित अग्निकुण्डसे उत्पन्न हुए हो ॥ ४ ॥
अभिद्रव रणे हृष्टो मा च ते भीः कथंचन ।
जनमेजयः शिखण्डी च दौर्मुखिश्च यशोधरः ॥ ५ ॥
अभिद्रवन्तु संहृष्टाः कुम्भयोनिं समन्ततः ।
'अतः हर्षमें भरकर रणभूमिमें द्रोणाचार्यपर धावा करो। तुम्हें किसी प्रकार भय नहीं होना चाहिये। जनमेजय, शिखण्डी तथा दुर्मुखपुत्र यशोधर—ये हर्ष और उत्साहमें भरकर चारों ओरसे द्रोणाचार्यपर धावा करें ॥ ५ ½ ॥
नकुलः सहदेवश्च द्रौपदेयाः प्रभद्रकाः ॥ ६ ॥
द्रुपदश्च विराटश्च पुत्रभ्रातृसमन्वितौ ।
सात्यकिः केकयाश्चैव पाण्डवश्च धनंजयः ॥ ७ ॥
अभिद्रवन्तु वेगेन कुम्भयोनिवधेप्सया ।
‘नकुल, सहदेव, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, प्रभद्रकगण, पुत्रों और भाइयोंसहित द्रुपद और विराट, सात्यकि, केकय तथा पाण्डुपुत्र अर्जुन—ये द्रोणाचार्यके वधकी इच्छासे वेगपूर्वक उनपर धावा बोल दें’ ॥ ६-७ १/२ ॥
तथैव रथिनः सर्वे हस्त्यश्वं यच्च किञ्चन ॥ ८ ॥
पदाताश्च रणे द्रोणं पातयन्तु महारथम् ।
‘इसी प्रकार हमारे समस्त रथी, हाथी-घोड़ोंकी जो कुछ भी सेना अवशिष्ट है वह और पैदल सैनिक—ये सभी रणभूमिमें महारथी द्रोणाचार्यको मार गिरावें’ ॥
तथाऽऽज्ञप्तास्तु ते सर्वे पाण्डवेन महात्मना ॥ ९ ॥
अभ्यद्रवन्त वेगेन कुम्भयोनिवधेप्सया ।
पाण्डुनन्दन महात्मा युधिष्ठिरके इस प्रकार आदेश देनेपर वे सब वीर द्रोणाचार्यके वधकी इच्छासे वेगपूर्वक उनपर टूट पड़े ॥ ९ १/२ ॥
आगच्छतस्तान् सहसा सर्वोद्योगेन पाण्डवान् ॥ १० ॥
प्रतिजग्राह समरे द्रोणः शस्त्रभृतां वरः ।
उन समस्त पाण्डव-सैनिकोंको पूरे उद्योगके साथ सहसा आक्रमण करते देख शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यने समरभूमिमें आगे बढ़कर उनका सामना किया ॥ १० १/२ ॥
ततो दुर्योधनो राजा सर्वोद्योगेन पाण्डवान् ॥ ११ ॥
अभ्यद्रवत् सुसंक्रुद्ध इच्छन् द्रोणस्य जीवितम् ।
उस समय द्रोणाचार्यके जीवनकी रक्षा चाहते हुए राजा दुर्योधनने अत्यन्त कुपित हो पूरे प्रयत्नके साथ पाण्डवोंपर धावा किया ॥ ११ १/२ ॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं श्रान्तवाहनसैनिकम् ॥ १२ ॥
पाण्डवानां कुरूणां च गर्जतामितरेतरम् ।
तदनन्तर एक-दूसरेको लक्ष्य करके गर्जते हुए पाण्डव तथा कौरव योद्धाओंमें पुनः युद्ध आरम्भ हो गया। वहाँ जितने वाहन और सैनिक थे, वे सभी थक गये थे ॥ १२ १/२ ॥
निद्रान्धास्ते महाराज परिश्रान्ताश्च संयुगे ॥ १३ ॥
नाभ्यपद्यन्त समरे काञ्चिच्चेष्टां महारथाः ।
महाराज! युद्धमें अत्यन्त थके हुए महारथी योद्धा निद्रासे अंधे हो रहे थे; अतः संग्राममें कोई चेष्टा नहीं कर पाते थे ॥ १३ १/२ ॥
त्रियामा रजनी चैषा घोररूपा भयानका ॥ १४ ॥
सहस्रयामप्रतिमा बभूव प्राणहारिणी ।
यह तीन पहरकी रात उनके लिये सहस्रों प्रहरोंकी रात्रिके समान घोर, भयानक एवं प्राणहारिणी प्रतीत होती थी ॥ १४ १/२ ॥
वध्यतां च तथा तेषां क्षतानां च विशेषतः ॥ १५ ॥
अर्धरात्रिः समाजज्ञे निद्रान्धानां विशेषतः ।
वहाँ बाणोंकी चोट सहते और विशेषतः क्षत-विक्षत होते हुए निद्रान्ध सैनिकोंकी आधी रात बीत गयी ॥ १५ १/२ ॥
सर्वे ह्यासन् निरुत्साहाः क्षत्रिया दीनचेतसः ॥ १६ ॥
तव चैव परेषां च गतास्त्रा विगतेषवः ।
उस समय आपकी और शत्रुओंकी सेनाके समस्त क्षत्रिय उत्साहहीन एवं दीनचित्त हो गये थे; उनके हाथोंसे अस्त्र और बाण गिर गये थे ॥ १६ १/२ ॥
ते तदापारयन्तश्च ह्रीमन्तश्च विशेषतः ॥ १७ ॥
स्वधर्ममनुपश्यन्तो न जहुः स्वामनीकिनीम् ।
वे उस समय अच्छी तरह युद्ध नहीं कर पा रहे थे, तो भी विशेषतः लज्जाशील होनेके कारण अपने धर्मपर दृष्टि रखते हुए अपनी सेना छोड़कर जा न सके ॥ १७ १/२ ॥
अस्त्राण्यन्ये समुत्सृज्य निद्रान्धाः शेरते जनाः ॥ १८ ॥
रथेष्वन्ये गजेष्वन्ये हयेष्वन्ये च भारत ।
भारत! दूसरे बहुत-से सैनिक अपने अस्त्र-शस्त्र छोड़कर नींदसे अन्धे होकर सो रहे थे। कुछ लोग रथोंपर, कुछ हाथियोंपर और कुछ लोग घोड़ोंपर ही सो गये थे ॥ १८ १/२ ॥
निद्रान्धा नो बुबुधिरे काञ्चिच्चेष्टां नराधिप ॥ १९ ॥
तानन्ये समरे योधाः प्रेषयन्तो यमक्षयम् ।
नरेश्वर! नींदसे बेसुध होनेके कारण वे किसी भी चेष्टाको समझ नहीं पाते थे और उन्हें दूसरे योद्धा समरांगणमें यमलोक भेज देते थे ॥ १९ १/२ ॥
स्वप्नायमानांस्त्वपरे परानतिविचेतसः ॥ २० ॥
आत्मानं समरे जघ्नुः स्वानेव च परानपि ।
नानावाचो विमुञ्चन्तो निद्रान्धास्ते महारणे ॥ २१ ॥
दूसरे सैनिक शत्रुओंको स्वप्नमें पड़कर अत्यन्त वेसुध हुए देख उन्हें मार बैठते थे। कुछ लोग उस महासमरमें निद्रान्ध होकर नाना प्रकारकी बातें कहते हुए कभी अपने-आपपर ही प्रहार कर बैठते थे, कभी अपने पक्षके ही लोगोंको मार डालते थे और कभी शत्रुओंका भी वध करते थे ॥ २०-२१ ॥
अस्माकं च महाराज परेभ्यो बहवो जनाः ।
योद्धव्यमिति तिष्ठन्तो निद्रासंरक्तलोचनाः ॥ २२ ॥
महाराज! हमारे पक्षके भी बहुत-से सैनिक शत्रुओंके साथ युद्ध करना है, ऐसा समझकर खड़े थे, परंतु नींदसे उनकी आँखें लाल हो गयी थीं॥ २२॥
संसर्पन्तो रणे केचिन्निद्रान्धास्ते तथा परान्।
जघ्नुः शूरा रणे शूरांस्तस्मिंस्तमसि दारुणे॥ २३॥
कुछ शूरवीर निद्रान्ध होकर भी रणभूमिमें विचरते थे और उस दारुण अन्धकारमें शत्रुपक्षके शूरवीरोंका वध कर डालते थे॥ २३॥
हन्यमानमथात्मानं परेभ्यो बहवो जनाः।
नाभ्यजानन्त समरे निद्रया मोहिता भृशम्॥ २४॥
बहुत-से मनुष्य निद्रासे अत्यन्त मोहित हो जानेके कारण शत्रुओंकी ओरसे समरभूमिमें अपनेको जो मारनेकी चेष्टा होती थी, उसे समझ ही नहीं पाते थे॥ २४॥
तेषामेतादृशीं चेष्टां विज्ञाय पुरुषर्षभः।
उवाच वाक्यं बीभत्सुरुच्चैः संनादयन् दिशः॥ २५॥
उनकी ऐसी अवस्था जानकर पुरुषप्रवर अर्जुनने सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए उच्चस्वरसे इस प्रकार कहा—॥ २५॥
श्रान्ता भवन्तो निद्रान्धाः सर्व एव सवाहनाः।
तमसा च वृते सैन्ये रजसा बहुलेन च॥ २६॥
ते यूयं यदि मन्यध्वमुपारमत सैनिकाः।
निमीलयत चात्रैव रणभूमौ मुहूर्तकम्॥ २७॥
‘सैनिको! तुम सब लोग अपने वाहनोंसहित थक गये हो और नींदसे अन्धे हो रहे हो। इधर यह सारी सेना घोर अन्धकार और बहुत-सी धूलसे ढक गयी है। अतः यदि तुम ठीक समझो तो युद्ध बंद कर दो और दो घड़ीतक इस रणभूमिमें ही सो लो॥ २६-२७॥
ततो विनिद्रा विश्रान्ताश्चन्द्रमस्युदिते पुनः।
संसाधयिष्यथान्योन्यं संग्रामं कुरुपाण्डवाः॥ २८॥
‘तत्पश्चात् चन्द्रोदय होनेपर विश्राम करनेके अनन्तर निद्रारहित हो तुम समस्त कौरव-पाण्डव योद्धा परस्पर पूर्ववत् संग्राम आरम्भ कर देना’॥ २८॥
तद् वचः सर्वधर्मज्ञा धार्मिकस्य विशाम्पते।
अरोचयन्त सैन्यानि तथा चान्योन्यमब्रुवन्॥ २९॥
प्रजानाथ! धर्मात्मा अर्जुनका यह वचन समस्त धर्मज्ञोंको ठीक लगा। सारी सेनाओंने उसे पसंद किया और सब लोग परस्पर यही बात कहने लगे॥ २९॥
चुक्रुशुः कर्ण कर्णेति तथा दुर्योधनेति च।
उपारमत पाण्डूनां विरता हि वरूथिनी॥ ३०॥
कौरव सैनिक ‘हे कर्ण! हे कर्ण! हे राजा दुर्योधन!’ इस प्रकार पुकारते हुए उच्चस्वरसे बोले—‘आपलोग युद्ध बंद कर दें; क्योंकि पाण्डव-सेना युद्धसे विरत हो गयी है’॥ ३०॥
तथा विक्रोशमानस्य फाल्गुनस्य ततस्ततः ।
उपारमत पाण्डूनां सेना तव च भारत ॥ ३१ ॥
भारत! जब अर्जुनने सब ओर इधर-उधर उच्चस्वरसे पूर्वोक्त प्रस्ताव उपस्थित किया, तब पाण्डवोंकी तथा आपकी सेना भी युद्धसे निवृत्त हो गयी ॥ ३१ ॥
तामस्य वाचं देवाश्च ऋषयश्च महात्मनः ।
सर्वसैन्यानि चाक्षुद्रां प्रहृष्टाः प्रत्यपूजयन् ॥ ३२ ॥
महात्मा अर्जुनके इस श्रेष्ठ वचनका सम्पूर्ण देवताओं, ऋषियों और समस्त सैनिकोंने बड़े हर्षके साथ स्वागत किया ॥ ३२ ॥
तत् सम्पूज्य वचोऽक्रूरं सर्वसैन्यानि भारत ।
मुहूर्तमस्वपन् राजञ्छ्रान्तानि भरतर्षभ ॥ ३३ ॥
भारतवंशी नरेश! भरतकुलभूषण! अर्जुनके उस क्रूरताशून्य वचनका आदर करके थकी हुई सारी सेनाएँ दो घड़ीतक सोती रहीं ॥ ३३ ॥
सा तु सम्प्राप्य विश्रामं ध्वजिनी तव भारत ।
सुखमाप्तवती वीरमर्जुनं प्रत्यपूजयत् ॥ ३४ ॥
भारत! आपकी सेना विश्रामका अवसर पाकर सुखका अनुभव करने लगी। उसने वीर अर्जुनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा— ॥ ३४ ॥
त्वयि वेदास्तथास्त्राणि त्वयि बुद्धिपराक्रमौ ।
धर्मस्त्वयि महाबाहो दया भूतेषु चानघ ॥ ३५ ॥
'महाबाहु निष्पाप अर्जुन! तुममें वेद तथा अस्त्रोंका ज्ञान है। तुममें बुद्धि और पराक्रम है तथा तुममें धर्म एवं सम्पूर्ण भूतोंके प्रति दया है ॥ ३५ ॥
यच्चाश्वस्तास्तवेच्छामः शर्म पार्थ तदस्तु ते ।
मनसश्च प्रियानर्थान् वीर क्षिप्रमवाप्नुहि ॥ ३६ ॥
'कुन्तीनन्दन! हमलोग तुम्हारी प्रेरणासे सुस्ताकर सुखी हुए हैं; इसलिये तुम्हारा कल्याण चाहते हैं। तुम्हें सुख प्राप्त हो। वीर! तुम शीघ्र ही अपने मनको प्रिय लगनेवाले पदार्थ प्राप्त करो' ॥ ३६ ॥
इति ते तं नरव्याघ्रं प्रशंसन्तो महारथाः ।
निद्रया समवाक्षिप्तास्तूष्णीमासन् विशाम्पते ॥ ३७ ॥
प्रजानाथ! इस प्रकार आपके महारथी नरश्रेष्ठ अर्जुनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए निद्राके वशीभूत हो मौन हो गये ॥ ३७ ॥
अश्वपृष्ठेषु चाप्यन्ये रथनीडेषु चापरे ।
गजस्कन्धगताश्चान्ये शेरते चापरे क्षितौ ॥ ३८ ॥
सायुधाः सगदाश्चैव सखड्गाः सपरश्वधाः ।
सप्रासकवचाश्चान्ये नराः सुप्ताः पृथक् पृथक् ॥ ३९ ॥
कुछ लोग घोड़ोंकी पीठोंपर, दूसरे रथोंकी बैठकोंमें, कुछ अन्य योद्धा हाथियोंपर तथा दूसरे बहुत-से सैनिक पृथ्वीपर ही सो रहे। कुछ लोग सभी प्रकारके आयुध लिये हुए थे। किन्हींके हाथोंमें गदाएँ थीं। कुछ लोग तलवार और फरसे लिये हुए थे तथा दूसरे बहुत-से मनुष्य प्रास और कवचसे सुशोभित थे। वे सभी अलग-अलग सो रहे थे ।। ३८-३९ ।।
गजास्ते पन्नगाभोगैर्हस्तैर्भूरिणुगुण्ठितैः ।
निद्रान्धा वसुधां चक्रुर्घाणनिःश्वासशीतलाम् ॥ ४० ॥
नींदसे अंधे हुए हाथी सर्पोंके समान धूलमें सनी हुई सूँड़ोंसे लंबी-लंबी साँसें छोड़कर इस वसुधाको शीतल करने लगे ॥ ४० ॥
सुप्ताः शुशुभिरे तत्र निःश्वसन्तो महीतले ।
विकीर्णा गिरयो यद्वन्निःश्वसद्भिर्महोरगैः ॥ ४१ ॥
धरतीपर सोकर निःश्वास खींचते हुए गजराज ऐसे सुशोभित हो रहे थे, मानो पर्वत विखरे पड़े हों और उनमें रहनेवाले बड़े-बड़े सर्प लंबी साँसें छोड़ रहे हों ॥ ४१ ॥
समां च विषमां चक्रुः खुराग्रैर्विकृतां महीम् ।
हयाः काञ्चनयोक्त्रास्ते केसरलम्बिभिर्युगैः ॥ ४२ ॥
सोनेकी बागडोरमें बँधे हुए घोड़े अपने गर्दनके बालोंपर रथके जूए लिये टापोंसे खोद-खोदकर समतल भूमिको भी विषम बना रहे थे ॥ ४२ ॥
सुषुपूस्तत्र राजेन्द्र युक्ता वाहेषु सर्वशः ।
एवं हयाश्च नागाश्च योधाश्च भरतर्षभ ।
युद्धाद् विरम्य सुषुपुः श्रमेण महतान्विता ॥ ४३ ॥
राजेन्द्र! वे रथोंमें जुते हुए ही चारों ओर सो गये। भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार घोड़े, हाथी और सैनिक भारी थकावटसे युक्त होनेके कारण युद्धसे विरत हो सो गये ॥
तत् तथा निद्रया भग्नमबोधं प्रास्वपद् भृशम् ।
कुशलैः शिल्पिभिर्न्यस्तं पटे चित्रमिवाद्भुतम् ॥ ४४ ॥
इस प्रकार निद्रासे वेसुध हुआ वह सैन्यसमूह गहरी नींदमें सो रहा था। वह देखनेमें ऐसा जान पड़ता था, मानो किन्हीं कुशल कलाकारोंने पटपर अद्भुत चित्र अंकित कर दिया हो ॥ ४४ ॥
ते क्षत्रियाः कुण्डलिनो युवानः
परस्परं सायकविक्षताङ्गाः ।
कुम्भेषु लीनाः सुषुपुर्गजानां
कुचेषु लग्ना इव कामिनीनाम् ॥ ४५ ॥
वे कुण्डलधारी तरुण क्षत्रिय परस्पर सायकोंकी मारसे सम्पूर्ण अंगोंमें क्षत-विक्षत हो हाथियोंके कुम्भस्थलोंसे सटकर ऐसे सो रहे थे, मानो कामिनियोंके कुचोंका आलिंगन करके सोये हों ॥ ४५ ॥
ततः कुमुदनाथेन कामिनीगण्डपाण्डुना ।
नेत्रानन्देन चन्द्रेण माहेन्द्री दिगलङ्कृता ॥ ४६ ॥
तत्पश्चात् कामिनियोंके कपोलोंके समान श्वेत-पीतवर्णवाले नयनानन्ददायी कुमुदनाथ चन्द्रमाने पूर्व दिशाको सुशोभित किया ॥ ४६ ॥
दशशताक्षककुब्दरिनिःसृतः
किरणकेसरभासुरपिञ्जरः ।
तिमिरवारणयूथविदारणः
समुदियादुदयाचलकेसरी ॥ ४७ ॥
उदयाचलके शिखरपर चन्द्रमारूपी सिंहका उदय हुआ, जो पूर्व दिशारूपी कन्दरासे निकला था। वह किरणरूपी केसरोंसे प्रकाशित एवं पिंगलवर्णका था और अन्धकाररूपी गजराजोंके यूथको विदीर्ण कर रहा था ॥ ४७ ॥
हरवृषोत्तमगात्रसमद्युतिः
स्मरशरासनपूर्णसमप्रभः ।
नववधूस्मितचारुमनोहरः
प्रविसृतः कुमुदाकरबान्धवः ॥ ४८ ॥
भगवान् शंकरके वृषभ नन्दिकेश्वरके उत्तम अंगोंके समान जिसकी श्वेत कान्ति है, जो कामदेवके श्वेत पुष्पमय धनुषके समान पूर्णतः उज्ज्वल प्रभासे प्रकाशित होता है और नववधूकी मन्द मुसकानके सदृश सुन्दर एवं मनोहर जान पड़ता है; वह कुमुदकुल-बान्धव चन्द्रमा क्रमशः ऊपर उठकर आकाशमें अपनी चाँदनी छिटकाने लगा ॥ ४८ ॥
ततो मुहूर्ताद् भगवान् पुरस्ताच्छशलक्षणः ।
अरुणं दर्शयामास ग्रसन् ज्योतिःप्रभाः प्रभुः ॥ ४९ ॥
उस समय दो घड़ीके बाद शशचिह्नसे सुशोभित प्रभावशाली भगवान् चन्द्रमाने अपनी ज्योत्स्नासे नक्षत्रोंकी प्रभाको क्षीण करते हुए पहले अरुण कान्तिका दर्शन कराया ॥ ४९ ॥
अरुणस्य तु तस्यानु जातरूपसमप्रभम् ।
रश्मिजालं महच्चन्द्रो मन्दं मन्दमवासृजत् ॥ ५० ॥
अरुण कान्तिके पश्चात् चन्द्रदेवने धीरे-धीरे सुवर्णके समान प्रभाववाले विशाल किरण-जालका प्रसार आरम्भ किया ॥ ५० ॥
उत्सारयन्तः प्रभया तमस्ते चन्द्ररश्मयः ।
पर्यगच्छन् शनैः सर्वा दिशः खं च क्षितिं तथा ॥ ५१ ॥
फिर वे चन्द्रमाकी किरणें अपनी प्रभासे अन्धकारका निवारण करती हुई शनैः-शनैः सम्पूर्ण दिशाओं, आकाश और भूमण्डलमें फैलने लगीं ॥ ५१ ॥
ततो मुहूर्ताद् भुवनं ज्योतिर्भूतमिवाभवत् ।
अप्रख्यमप्रकाशं च जगामाशु तमस्तथा ॥ ५२ ॥
तदनन्तर एक ही मुहूर्तमें समस्त संसार ज्योतिर्मय-सा हो गया। अन्धकारका कहीं नाम भी नहीं रह गया। वह अदृश्यभावसे तत्काल कहीं चला गया ॥ ५२ ॥
प्रतिप्रकाशिते लोके दिवाभूते निशाकरे ।
विचेरुर्न विचेरुश्च राजन् नक्तञ्चरास्ततः ॥ ५३ ॥
चन्द्रदेवके पूर्णतः प्रकाशित होनेपर जगत्में दिनका-सा उजाला हो गया। राजन्! उस समय रात्रिमें विचरनेवाले कुछ प्राणी विचरण करने लगे और कुछ जहाँ-के-तहाँ पड़े रहे ॥ ५३ ॥
बोध्यमानं तु तत् सैन्यं राजंश्चन्द्रस्य रश्मिभिः ।
बुबुधे शतपत्राणां वनं सूर्यांशुभिर्यथा ॥ ५४ ॥
नरेश्वर! चन्द्रमाकी किरणोंके स्पर्शसे सारी सेना उसी प्रकार जाग उठी, जैसे सूर्यरश्मियोंका स्पर्श पाकर कमलोंका समूह खिल उठता है ॥ ५४ ॥
यथा चन्द्रोदयोद्भूतः क्षुभितः सागरोऽभवत् ।
तथा चन्द्रोदयोद्भूतः स बभूव बलार्णवः ॥ ५५ ॥
जैसे पूर्णिमाके चन्द्रमाका उदय होनेपर उससे प्रभावित होनेवाले महासागरमें ज्वार उठने लगता है, उसी प्रकार उस समय चन्द्रोदय होनेसे उस सारे सैन्य-समुद्रमें खलबली मच गयी ॥ ५५ ॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं पुनरेव विशाम्पते ।
लोके लोकविनाशाय परं लोकमभीप्सताम् ॥ ५६ ॥
प्रजानाथ! तदनन्तर इस जगत्में महान् जनसंहारके लिये परलोककी इच्छा रखनेवाले योद्धाओंका वह युद्ध पुनः आरम्भ हो गया ॥ ५६ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणवधपर्वणि रात्रियुद्धे सैन्यनिद्रायां
चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणवधपर्वमें रात्रियुद्धके समय सेनाका निद्राविषयक एक सौ चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८४ ॥