सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

जैसे दुर्भेद्य पर्वतके पास पहुँचकर जलका महान् प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है तथा जिस प्रकार सम्पूर्ण जलाशय (समुद्र) अपनी तटभूमिको नहीं लाँघ पाते, उसी प्रका

⬅ विषय-सूची (TOC)

महौघः सलिलस्येव गिरिमासाद्य दुर्भिदम् ।
द्रोणं ते नाभ्यवर्तन्त वेलामिव जलाशयाः ॥ ८ ॥
जैसे दुर्भेद्य पर्वतके पास पहुँचकर जलका महान् प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है तथा जिस प्रकार सम्पूर्ण जलाशय (समुद्र) अपनी तटभूमिको नहीं लाँघ पाते, उसी प्रकार वे पाण्डव-सैनिक द्रोणाचार्यके अत्यन्त निकट न पहुँच सके ॥ ८ ॥
पीड्यमानाः शरै राजन् द्रोणचापविनिःसृतैः ।
न शेकुः प्रमुखे स्थातुं भारद्वाजस्य पाण्डवाः ॥ ९ ॥
राजन्! द्रोणाचार्यके धनुषसे छूटे हुए बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित होकर पाण्डववीर उनके सामने नहीं ठहर सके ॥ ९ ॥
तदद्भुतमपश्याम द्रोणस्य भुजयोर्बलम् ।
यदेनं नाभ्यवर्तन्त पञ्चालाः सृञ्जयैः सह ॥ १० ॥
उस समय हमलोगोंने द्रोणाचार्यकी भुजाओंका वह अद्भुत बल देखा, जिससे कि सृञ्जयोंसहित सम्पूर्ण पांचालवीर उनके सामने टिक न सके ॥ १० ॥

चक्रव्यूह

तमायान्तमभिक्रुद्धं द्रोणं दृष्ट्वा युधिष्ठिरः ।
बहुधा चिन्तयामास द्रोणस्य प्रतिवारणम् ॥ ११ ॥
क्रोधमें भरे हुए उन्हीं द्रोणाचार्यको आते देख राजा युधिष्ठिरने उन्हें रोकनेके उपायपर बारंबार विचार किया ॥ ११ ॥
अशक्यं तु तमन्येन द्रोणं मत्वा युधिष्ठिरः ।
अविषह्यं गुरुं भारं सौभद्रं समवासृजत् ॥ १२ ॥
इस समय द्रोणाचार्यका सामना करना दूसरेके लिये असम्भव जानकर युधिष्ठिरने वह दुःसह एवं महान् भार सुभद्राकुमार अभिमन्युपर रख दिया ॥ १२ ॥
वासुदेवादवरं फाल्गुनाच्चामितौजसम् ।
अब्रवीत् परवीरघ्नमभिमन्युमिदं वचः ॥ १३ ॥
अमिततेजस्वी अभिमन्यु वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण तथा अर्जुनसे किसी बातमें कम नहीं था, वह शत्रुवीरोंका संहार करनेमें समर्थ था; अतः उससे युधिष्ठिरने इस प्रकार कहा — ॥ १३ ॥
एत्य नो नार्जुनो गर्हेद् यथा तात तथा कुरु ।
चक्रव्यूहस्य न वयं विद्मो भेदं कथंचन ॥ १४ ॥
‘तात संशप्तकोंके साथ युद्ध करके लौटनेपर अर्जुन जिस प्रकार हमलोगोंकी निन्दा न करें (हमें असमर्थ न बतावें), वैसा कार्य करो। हमलोग तो किसी तरह भी चक्रव्यूहके भेदनकी प्रक्रियाको नहीं जानते हैं ॥
त्वं वार्जुनो वा कृष्णो वा भिन्द्यात् प्रद्युम्न एव वा ।
चक्रव्यूहं महाबाहो पञ्चमो नोपपद्यते ॥ १५ ॥
‘महाबाहो! तुम, अर्जुन, श्रीकृष्ण अथवा प्रद्युम्न—ये चार पुरुष ही चक्रव्यूहका भेदन कर सकते हो। पाँचवाँ कोई योद्धा इस कार्यके योग्य नहीं है ॥ १५ ॥
अभिमन्यो वरं तात याचतां दातुमर्हसि ।
पितॄणां मातुलानां च सैन्यानां चैव सर्वशः ॥ १६ ॥
‘तात अभिमन्यु! तुम्हारे पिता और मामाके पक्षके समस्त योद्धा तथा सम्पूर्ण सैनिक तुमसे याचना कर रहे हैं। तुम्हीं इन्हें वर देनेके योग्य हो ॥ १६ ॥
धनंजयो हि नस्तात गर्हयेदेत्य संयुगात् ।
क्षिप्रमस्त्रं समादाय द्रोणानीकं विशातय ॥ १७ ॥
‘तात! यदि हम विजयी नहीं हुए तो युद्धसे लौटनेपर अर्जुन निश्चय ही हमलोगोंको कोसेंगे, अतः शीघ्र अस्त्र लेकर तुम द्रोणाचार्यकी सेनाका विनाश कर डालो’ ॥ १७ ॥
अभिमन्युरुवाच
द्रोणस्य दृढमत्युग्रमनीकप्रवरं युधि ।

पितॄणां जयमाकाङ्क्षन्नवगाहेऽविलम्बितम् ॥ १८ ॥

अभिमन्युने कहा—महाराज! मैं अपने पितृ-वर्गकी विजयकी अभिलाषासे युद्धस्थलमें द्रोणाचार्यकी अत्यन्त भयंकर, सुदृढ़ एवं श्रेष्ठ सेनामें शीघ्र ही प्रवेश करता हूँ ॥ १८ ॥
उपदिष्टो हि मे पित्रा योगोऽनीकविशातने ।
नोत्सहे हि विनिर्गन्तुमहं कस्यांचिदापदि ॥ १९ ॥
पिताजीने मुझे चक्रव्यूहको भेदनकी विधि तो बतायी है; परंतु किसी आपत्तिमें पड़ जानेपर मैं उस व्यूहसे बाहर नहीं निकल सकता ॥ १९ ॥

युधिष्ठिर उवाच

भिन्ध्यनीकं युधां श्रेष्ठ द्वारं संजनयस्व नः ।
वयं त्वानुगमिष्यामो येन त्वं तात यास्यसि ॥ २० ॥
युधिष्ठिर बोले—योद्धाओंमें श्रेष्ठ वीर! तुम व्यूहका भेदन करो और हमारे लिये द्वार बना दो! तात! फिर तुम जिस मार्गसे जाओगे, उसीके द्वारा हम भी तुम्हारे पीछे-पीछे चले चलेंगे ॥ २० ॥
धनंजयसमं युद्धे त्वां वयं तात संयुगे ।
प्रणिधायानुयास्यामो रक्षन्तः सर्वतोमुखाः ॥ २१ ॥
बेटा! हमलोग युद्धस्थलमें तुम्हें अर्जुनके समान मानते हैं। हम अपना ध्यान तुम्हारी ही ओर रखकर सब ओरसे तुम्हारी रक्षा करते हुए तुम्हारे साथ ही चलेंगे ॥ २१ ॥

भीम उवाच

अहं त्वानुगमिष्यामि धृष्टद्युम्नोऽथ सात्यकिः ।
पञ्चालाः केकया मत्स्यास्तथा सर्वे प्रभद्रकाः ॥ २२ ॥
भीमसेन बोले— बेटा! मैं तुम्हारे साथ चलूँगा। धृष्टद्युम्न, सात्यकि, पांचालदेशीय योद्धा, केकय-राजकुमार, मत्स्य देशके सैनिक तथा समस्त प्रभद्रकगण भी तुम्हारा अनुसरण करेंगे ॥ २२ ॥

सकृद् भिन्नं त्वया व्यूहं तत्र तत्र पुनः पुनः ।
वयं प्रध्वंसयिष्यामो निघ्नमाना वरान् वरान् ॥ २३ ॥
तुम जहाँ-जहाँ एक बार भी व्यूह तोड़ दोगे, वहाँ-वहाँ हमलोग मुख्य-मुख्य योद्धाओंका वध करके उस व्यूहको बारंबार नष्ट करते रहेंगे ॥ २३ ॥

अभिमन्युरुवाच

अहमेतत् प्रवेक्ष्यामि द्रोणानीकं दुरासदम् ।
पतङ्ग इव संक्रुद्धो ज्वलितं जातवेदसम् ॥ २४ ॥
अभिमन्युने कहा— जैसे पतंग जलती हुई आगमें कूद पड़ता है, उसी प्रकार मैं भी कुपित हो द्रोणाचार्यके दुर्गम सैन्य-व्यूहमें प्रवेश करूँगा ॥ २४ ॥

तत् कर्माद्य करिष्यामि हितं यद् वंशयोर्द्वयोः ।
मातुलस्य च यत् प्रीतिं करिष्यति पितुश्च मे ॥ २५ ॥
आज मैं वह पराक्रम करूँगा, जो पिता और माता दोनोंके कुलोंके लिये हितकर होगा तथा वह मामा श्रीकृष्ण तथा पिता अर्जुन दोनोंको प्रसन्न करेगा ॥ २५ ॥

शिशुनैकेन संग्रामे काल्यमानानि संघशः ।
द्रक्ष्यन्ति सर्वभूतानि द्विषत्सैन्यानि वै मया ॥ २६ ॥
यद्यपि मैं अभी बालक हूँ तो भी आज समस्त प्राणी देखेंगे कि मैंने अकेले ही समूह-के-समूह शत्रुसैनिकोंका युद्धमें संहार कर डाला है ॥ २६ ॥

नाहं पार्थेन जातः स्यां न च जातः सुभद्रया ।
यदि मे संयुगे कश्चिज्जीवितो नाद्य मुच्यते ॥ २७ ॥
यदि आज मेरे साथ युद्ध करके कोई भी सैनिक जीवित बच जाय तो मैं अर्जुनका पुत्र नहीं और सुभद्राकी कोखसे मेरा जन्म नहीं ॥ २७ ॥

यदि चैकरथेनाहं समग्रं क्षत्रमण्डलम् ।
न करोम्यष्टधा युद्धे न भवाम्यर्जुनात्मजः ॥ २८ ॥
यदि मैं युद्धमें एकमात्र रथकी सहायतासे सम्पूर्ण क्षत्रियमण्डलके आठ टुकड़े न कर दूँ तो अर्जुनका पुत्र नहीं ॥

युधिष्ठिर उवाच

एवं ते भाषमाणस्य बलं सौभद्र वर्धताम् ।

यत् समुत्सहसे भेत्तुं द्रोणानीकं दुरासदम् ॥ २९ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**सुभद्रानन्दन! ऐसी ओजस्वी बातें कहते हुए तुम्हारा बल निरन्तर बढ़ता रहे; क्योंकि तुम द्रोणाचार्यके दुर्गम सैन्यमें प्रवेश करनेका उत्साह रखते हो ॥ २९ ॥
रक्षितं पुरुषव्याघ्रैर्महेष्वासैर्महाबलैः ।
साध्यरुद्रमरुत्तुल्यैर्वस्वग्न्यादित्यविक्रमैः ॥ ३० ॥
द्रोणाचार्यकी सेना उन महाबली महाधनुर्धर पुरुषसिंह वीरों द्वारा सुरक्षित है, जो कि साध्य, रुद्र तथा मरुद्गणोंके समान बलवान् और वसु, अग्नि एवं सूर्यके समान पराक्रमी हैं ॥ ३० ॥

संजय उवाच

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा स यन्तारमचोदयत् ।
सुमित्राश्वांन् रणे क्षिप्रं द्रोणानीकाय चोदय ॥ ३१ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! महाराज युधिष्ठिरका यह वचन सुनकर अभिमन्युने अपने सारथिको यह आज्ञा दी—‘सुमित्र! तुम शीघ्र ही घोड़ोंको रणक्षेत्रमें द्रोणाचार्यकी सेनाकी ओर हाँक ले चलो ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि अभिमन्युप्रतिज्ञायां पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें अभिमन्युकी प्रतिज्ञाविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥