महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
(गदापर्व)
(गदापर्व)
त्रिंशोऽध्यायः
अश्वत्थामा, कृतवर्मा और कृपाचार्यका सरोवरपर जाकर दुर्योधनसे युद्ध करनेके विषयमें बातचीत करना, व्याधोंसे दुर्योधनका पता पाकर युधिष्ठिरका सेनासहित सरोवरपर जाना और कृपाचार्य आदिका दूर हट जाना
धृतराष्ट्र उवाच
हतेषु सर्वसैन्येषु पाण्डुपुत्रै रणाजिरे ।
मम सैन्यावशिष्टास्ते किमकुर्वत संजय ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! जब पाण्डुके पुत्रोंने समरांगणमें समस्त सेनाओंका संहार कर डाला, तब मेरी सेनाके शेष वीरोंने क्या किया? ॥ १ ॥
कृतवर्मा कृपश्चैव द्रोणपुत्रश्च वीर्यवान् ।
दुर्योधनश्च मन्दात्मा राजा किमकरोत् तदा ॥ २ ॥
कृतवर्मा, कृपाचार्य, पराक्रमी द्रोणपुत्र अश्वत्थामा तथा मन्दबुद्धि राजा दुर्योधनने उस समय क्या किया? ॥
संजय उवाच
सम्प्राद्रवत्सु दारेषु क्षत्रियाणां महात्मनाम् ।
विद्रुते शिबिरे शून्ये भृशोद्विग्नास्त्रयो रथाः ॥ ३ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! जब महामनस्वी क्षत्रिय राजाओंकी पत्नियाँ भाग चलीं और सब लोगोंके पलायन करनेसे सारा शिविर सूना हो गया, उस समय पूर्वोक्त तीनों रथी अत्यन्त उद्विग्न हो गये ॥ ३ ॥
निशम्य पाण्डुपुत्राणां तदा वै जयिनां स्वनम् ।
विद्रुतं शिबिरं दृष्ट्वा सायाह्ने राजगृद्धिनः ॥ ४ ॥
स्थानं नारोचयंस्तत्र ततस्ते ह्रदमभ्ययुः ।
सायंकालमें विजयी पाण्डवोंकी गर्जना सुनकर और अपने सारे शिविरके लोगोंको भागा हुआ देखकर राजा दुर्योधनको चाहनेवाले उन तीनों महारथियोंको वहाँ ठहरना अच्छा न लगा; इसलिये वे उसी सरोवरके तटपर गये ॥ ४ १/२ ॥
युधिष्ठिरोऽपि धर्मात्मा भ्रातृभिः सहितो रणे ॥ ५ ॥
हृष्टः पर्यचरद् राजन् दुर्योधनवधेप्सया ।
राजन्! इधर धर्मात्मा युधिष्ठिर भी रणभूमिमें दुर्योधनके वधकी इच्छासे बड़े हर्षके साथ भाइयोंसहित विचर रहे थे ॥ ५ १/२ ॥
मार्गमाणास्तु संक्रुद्धास्तव पुत्रं जयैषिणः ॥ ६ ॥
यत्नतोऽन्वेषमाणास्ते नैवापश्यञ्जनाधिपम् ।
विजयके अभिलाषी पाण्डव अत्यन्त कुपित होकर आपके पुत्रका पता लगाने लगे; परंतु यत्नपूर्वक खोज करनेपर भी उन्हें राजा दुर्योधन कहीं दिखायी नहीं दिया ॥
स हि तीव्रेण वेगेन गदापाणिरपाक्रमत् ॥ ७ ॥
तं हृदं प्राविशच्चापि विष्टभ्यापः स्वमायया ।
वह हाथमें गदा लेकर तीव्र वेगसे भागा और अपनी मायासे जलको स्तम्भित करके उस सरोवरके भीतर जा घुसा ॥ ७ १/२ ॥
यदा तु पाण्डवाः सर्वे सुपरिश्रान्तवाहनाः ॥ ८ ॥
ततः स्वशिविरं प्राप्य व्यतिष्ठन्त ससैनिकाः ।
दुर्योधनकी खोज करते-करते जब पाण्डवोंके वाहन बहुत थक गये, तब सभी पाण्डव सैनिकोंसहित अपने शिविरमें आकर ठहर गये ॥ ८ १/२ ॥
ततः कृपश्च द्रौणिश्च कृतवर्मा च सात्वतः ॥ ९ ॥
संनिविष्टेषु पार्थेषु प्रयातास्तं हृदं शनैः ।
तदनन्तर जब कुन्तीके सभी पुत्र शिविरमें विश्राम करने लगे, तब कृपाचार्य, अश्वत्थामा और सात्वतवंशी कृतवर्मा धीरे-धीरे उस सरोवरके तटपर जा पहुँचे ॥ ९ १/२ ॥
ते तं हृदं समासाद्य यत्र शेते जनाधिपः ॥ १० ॥
अभ्यभाषन्त दुर्धर्षं राजानं सुप्तमम्भसि ।
राजन्नुत्तिष्ठ युध्यस्व सहास्माभिर्युधिष्ठिरम् ॥ ११ ॥
जित्वा वा पृथिवीं भुङ्क्ष्व हतो वा स्वर्गमाप्नुहि ।
जिसमें राजा दुर्योधन सो रहा था, उस सरोवरके समीप पहुँचकर, वे जलमें सोये हुए उस दुर्धर्ष नरेशसे इस प्रकार बोले—‘राजन्! उठो और हमारे साथ चलकर युधिष्ठिरसे युद्ध करो। विजयी होकर पृथ्वीका राज्य भोगो अथवा मारे जाकर स्वर्गलोक प्राप्त करो ॥ १०-११ १/२ ॥
तेषामपि बलं सर्वं हतं दुर्योधन त्वया ॥ १२ ॥
प्रतिविद्धाश्च भूयिष्ठं ये शिष्टास्तत्र सैनिकाः ।
न ते वेगं विषहितुं शक्तास्तव विशाम्पते ॥ १३ ॥
अस्माभिरपि गुप्तस्य तस्मादुत्तिष्ठ भारत ।
'प्रजानाथ दुर्योधन! भरतनन्दन! तुमने भी तो पाण्डवोंकी सारी सेनाका संहार कर डाला है। वहाँ जो सैनिक शेष रह गये हैं, वे भी बहुत घायल हो चुके हैं; अतः जब तुम हमारेद्वारा सुरक्षित होकर उनपर आक्रमण करोगे तो वे तुम्हारा वेग नहीं सह सकेंगे; इसलिये तुम युद्धके लिये उठो' ।। १२-१३ ½ ।।
दुर्योधन उवाच
दिष्ट्या पश्यामि वो मुक्तानीदृशात् पुरुषक्षयात् ॥ १४ ॥
पाण्डुकौरवसम्मर्दाज्जीवमानान् नरर्षभान् ।
दुर्योधन बोला—मैं ऐसे जनसंहारकारी पाण्डव-कौरव-संग्रामसे आप सभी नरश्रेष्ठ वीरोंको जीवित बचा हुआ देख रहा हूँ, यह बड़े सौभाग्यकी बात है ॥
विजेष्यामो वयं सर्वे विश्रान्ता विगतक्लमाः ॥ १५ ॥
भवन्तश्च परिश्रान्ता वयं च भृशविक्षताः ।
उदीर्णं च बलं तेषां तेन युद्धं न रोचये ॥ १६ ॥
हम सब लोग विश्राम करके अपनी थकावट दूर कर लें तो अवश्य विजयी होंगे। आप लोग भी बहुत थके हुए हैं और हम भी अत्यन्त घायल हो चुके हैं। उधर पाण्डवोंका बल बढ़ा हुआ है; इसलिये इस समय मेरी युद्ध करनेकी रुचि नहीं हो रही है ॥ १५-१६ ॥
न त्वेतदद्भुतं वीरा यद् वो महदिदं मनः ।
अस्मासु च परा भक्तिर्न तु कालः पराक्रमे ॥ १७ ॥
वीरो! आपके मनमें जो युद्धके लिये महान् उत्साह बना हुआ है, यह कोई अद्भुत बात नहीं है। आपलोगोंका मुझपर महान् प्रेम भी है, तथापि यह पराक्रम प्रकट करनेका समय नहीं है ॥ १७ ॥
विश्रम्यैकां निशामद्य भवद्भिः सहितो रणे ।
प्रतियोत्स्याम्यहं शत्रून् श्वो न मेऽस्त्यत्र संशयः ॥ १८ ॥
आज एक रात विश्राम करके कल सबेरे रणभूमिमें आप लोगोंके साथ रहकर मैं शत्रुओंके साथ युद्ध करूँगा, इसमें संशय नहीं है ॥ १८ ॥
संजय उवाच
एवमुक्तोऽब्रवीद् द्रौणी राजानं युद्धदुर्मदम् ।
उत्तिष्ठ राजन् भद्रं ते विजेष्यामो वयं परान् ॥ १९ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! दुर्योधनके ऐसा कहनेपर द्रोणकुमारने उस रणदुर्मद राजासे इस प्रकार कहा—'महाराज! उठो, तुम्हारा कल्याण हो। हम शत्रुओंपर विजय प्राप्त करेंगे ॥ १९ ॥
इष्टापूर्तेन दानेन सत्येन च जपेन च ।
शपे राजन् यथा ह्यद्य निहनिष्यामि सोमकान् ॥ २० ॥
‘राजन्! मैं अपने इष्टापूर्त कर्म, दान, सत्य और जयकी शपथ खाकर कहता हूँ कि आज सोमकोंका संहार कर डालूँगा ।। २० ।।
मा स्म यज्ञकृतां प्रीतिमाप्नुयां सज्जनोचिताम् ।
यदिमां रजनीं व्युष्टां न हि हन्मि परान् रणे ।। २१ ।।
‘यदि यह रात बीतते ही प्रातःकाल रणभूमिमें शत्रुओंको न मार डालूँ तो मुझे सज्जन पुरुषोंके योग्य और यज्ञकर्ताओंको प्राप्त होनेवाली प्रसन्नता न प्राप्त हो ।।
नाहत्वा सर्वपञ्चालान् विमोक्ष्ये कवचं विभो ।
इति सत्यं ब्रवीम्येतत्तन्मे शृणु जनाधिप ।। २२ ।।
‘प्रभो! नरेश्वर! मैं समस्त पांचालोंका संहार किये बिना अपना कवच नहीं उतारूँगा, यह तुमसे सच्ची बात कहता हूँ। मेरे इस कथनको तुम ध्यानसे सुनो’ ।। २२ ।।
तेषु सम्भाषमाणेषु व्याधास्तं देशमाययुः ।
मांसभारपरिश्रान्ताः पानीयार्थं यदृच्छया ।। २३ ।।
वे इस प्रकार बात कर ही रहे थे कि मांसके भारसे थके हुए बहुत-से व्याध उस स्थानपर पानी पीनेके लिये अकस्मात् आ पहुँचे ।। २३ ।।
ते तत्र धिष्ठितास्तेषां सर्वं तद् वचनं रहः ।
दुर्योधनवचश्चैव शुश्रुवुः संगता मिथः ।। २४ ।।
उन्होंने वहाँ खड़े होकर उनकी एकान्तमें होनेवाली सारी बातें सुन लीं। परस्पर मिले हुए उन व्याधोंने दुर्योधनकी भी बात सुनी ।। २४ ।।
तेऽपि सर्वे महेष्वासा अयुद्धार्थिनि कौरवे ।
निर्वन्धं परमं चक्रुस्तदा वै युद्धकाङ्क्षिणः ।। २५ ।।
कुरुराज दुर्योधन युद्ध नहीं चाहता था तो भी युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले वे सभी महाधनुर्धर योद्धा उससे युद्ध छेड़नेके लिये बड़ा आग्रह कर रहे थे ।। २५ ।।
तांस्तथा समुदीक्ष्याथ कौरवाणां महारथान् ।
अयुद्धमनसं चैव राजानं स्थितमम्भसि ।। २६ ।।
तेषां श्रुत्वा च संवादं राज्ञश्च सलिले सतः ।
व्याधाभ्यजानन् राजेन्द्र सलिलस्थं सुयोधनम् ।। २७ ।।
राजन्! उन कौरवमहारथियोंकी वैसी मनोवृत्ति जानकर जलमें ठहरे हुए राजा दुर्योधनके मनमें युद्धका उत्साह न देखकर और सलिलनिवासी नरेशके साथ उन तीनोंका संवाद सुनकर व्याध यह समझ गये कि ‘दुर्योधन इसी सरोवरके जलमें छिपा हुआ है’ ।। २६-२७ ।।
ते पूर्वं पाण्डुपुत्रेण पृष्टा ह्यासन् सुतं तव ।
यदृच्छोपगतास्तत्र राजानं परिमार्गता ।। २८ ।।
पहले राजा दुर्योधनकी खोज करते हुए पाण्डुकुमार युधिष्ठिरने दैववश अपने पास पहुँचे हुए उन व्याधोंसे आपके पुत्रका पता पूछा था ॥ २८ ॥
ततस्ते पाण्डुपुत्रस्य स्मृत्वा तद् भाषितं तदा ।
अन्योन्यमब्रुवन् राजन् मृगव्याधाः शनैरिव ॥ २९ ॥
राजन्! उस समय पाण्डुपुत्रकी कही हुई बात याद करके वे व्याध आपसमें धीरे-धीरे बोले— ॥ २९ ॥
दुर्योधनं ख्यापयामो धनं दास्यति पाण्डवः ।
सुव्यक्तमिह नः ख्यातो ह्रदे दुर्योधनो नृपः ॥ ३० ॥
'यदि हम दुर्योधनका पता बता दें तो पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर हमें धन देंगे। हमें तो यहाँ यह स्पष्टरूपसे ज्ञात हो गया कि राजा दुर्योधन इसी सरोवरमें छिपा हुआ है ॥ ३० ॥
तस्माद् गच्छामहे सर्वे यत्र राजा युधिष्ठिरः ।
आख्यातुं सलिले सुप्तं दुर्योधनममर्षणम् ॥ ३१ ॥
अतः जलमें सोये हुए अमर्षशील दुर्योधनका पता बतानेके लिये हम सब लोग उस स्थानपर चलें, जहाँ राजा युधिष्ठिर मौजूद हैं ॥ ३१ ॥
धृतराष्ट्रात्मजं तस्मै भीमसेनाय धीमते ।
शयानं सलिले सर्वे कथयामो धनुर्भृते ॥ ३२ ॥
'बुद्धिमान् धनुर्धर भीमसेनको हम सब यह बता दें कि धृतराष्ट्रका पुत्र दुर्योधन जलमें सो रहा है ॥ ३२ ॥
स नो दास्यति सुप्रीतो धनानि बहुलान्युत ।
किं नो मांसेन शुष्केण परिक्लिष्टेन शोषिणा ॥ ३३ ॥
'इससे अत्यन्त प्रसन्न होकर वे हमें बहुत धन देंगे। फिर हमें शरीरका रक्त सुखा देनेवाले इस सूखे मांसको ढोकर व्यर्थ कष्ट उठानेकी क्या आवश्यकता है?' ॥ ३३ ॥
एवमुक्त्वा तु ते व्याधाः सम्प्रहृष्टा धनार्थिनः ।
मांसभारानुपादाय प्रययुः शिविरं प्रति ॥ ३४ ॥
इस प्रकार परस्पर वार्तालाप करके धनकी अभिलाषा रखनेवाले वे व्याध बड़े प्रसन्न हुए और मांसके बोझ उठाकर पाण्डव-शिविरकी ओर चल दिये ॥ ३४ ॥
पाण्डवापि महाराज लब्धलक्ष्याः प्रहारिणः ।
अपश्यमानाः समरे दुर्योधनमवस्थितम् ॥ ३५ ॥
निकृतेस्तस्य पापस्य ते पारं गमनेप्सवः ।
चारान् सम्प्रेषयामासुः समन्तात् तद्रणाजिरे ॥ ३६ ॥
महाराज! प्रहार करनेमें कुशल पाण्डवोंने अपना लक्ष्य सिद्ध कर लिया था; उन्होंने दुर्योधनको समरांगण-में खड़ा न देख उस पापीके किये हुए छल-कपटका बदला चुकाकर वैरके पार जानेकी इच्छासे उस संग्रामभूमिमें चारों ओर गुप्तचर भेज रखे थे ॥ ३५-३६ ॥
आगम्य तु ततः सर्वे नष्टं दुर्योधनं नृपम् ।
न्यवेदयन्त सहिता धर्मराजस्य सैनिकाः ॥ ३७ ॥
धर्मराजके उन सभी गुप्तचर सैनिकोंने एक साथ लौटकर यह निवेदन किया कि 'राजा दुर्योधन लापता हो गया है' ॥ ३७ ॥
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा चाराणां भरतर्षभ ।
चिन्तामभ्यगमत् तीव्रां निःशश्वास च पार्थिवः ॥ ३८ ॥
भरतश्रेष्ठ! उन गुप्तचरोंकी बात सुनकर राजा युधिष्ठिर घोर चिन्तामें पड़ गये और लंबी साँस खींचने लगे ॥ ३८ ॥
अथ स्थितानां पाण्डूनां दीनानां भरतर्षभ ।
तस्माद् देशादपक्रम्य त्वरिता लुब्धका विभो ॥ ३९ ॥
आजग्मुः शिविरं हृष्टा दृष्ट्वा दुर्योधनं नृपम् ।
वार्यमाणाः प्रविशंश्च भीमसेनस्य पश्यतः ॥ ४० ॥
भरतभूषण! नरेश! तदनन्तर जब पाण्डव खिन्न होकर बैठे हुए थे, उसी समय वे व्याध राजा दुर्योधनको अपनी आँखों देखकर तुरंत ही उस स्थानसे हट गये और बड़े हर्षके साथ पाण्डव-शिविरमें जा पहुँचे। द्वारपालोंके रोकनेपर भी वे भीमसेनके देखते-देखते भीतर घुस गये ॥
ते तु पाण्डवमासाद्य भीमसेनं महाबलम् ।
तस्मै तत् सर्वमाचख्युर्यद् वृत्तं यच्च वैश्रुतम् ॥ ४१ ॥
महाबली पाण्डुपुत्र भीमसेनके पास जाकर उन्होंने सरोवरके तटपर जो कुछ हुआ था और जो कुछ सुननेमें आया था, वह सब कह सुनाया ॥ ४१ ॥
ततो वृकोदरो राजन् दत्त्वा तेषां धनं बहु ।
धर्मराजाय तत् सर्वमाचचक्षे परंतपः ॥ ४२ ॥
राजन्! तब शत्रुओंको संताप देनेवाले भीमने उन व्याधोंको बहुत धन देकर धर्मराजसे सारा समाचार कहा ॥
असौ दुर्योधनो राजन् विज्ञातो मम लुब्धकैः ।
संस्तभ्य सलिलं शेते यस्यार्थे परितप्यसे ॥ ४३ ॥
वे बोले—'धर्मराज! मेरे व्याधोंने राजा दुर्योधनका पता लगा लिया है। आप जिसके लिये संतप्त हैं, वह मायासे पानी बाँधकर सरोवरमें सो रहा है' ॥ ४३ ॥
तद् वचो भीमसेनस्य प्रियं श्रुत्वा विशाम्पते ।
अजातशत्रुः कौन्तेयो हृष्टोऽभूत् सह सोदरैः ॥ ४४ ॥
प्रजानाथ! भीमसेनका वह प्रिय वचन सुनकर अजातशत्रु कुन्तीकुमार युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ बड़े प्रसन्न हुए ॥ ४४ ॥
तं च श्रुत्वा महेष्वासं प्रविष्टं सलिलह्रदे ।
क्षिप्रमेव ततोऽगच्छन् पुरस्कृत्य जनार्दनम् ॥ ४५ ॥
महाधनुर्धर दुर्योधनको पानीसे भरे सरोवरमें घुसा सुनकर राजा युधिष्ठिर भगवान् श्रीकृष्णको आगे करके शीघ्र ही वहाँसे चल दिये ॥ ४५ ॥
ततः किलकिलाशब्दः प्रादुरासीद् विशाम्पते ।
पाण्डवानां प्रहृष्टानां पञ्चालानां च सर्वशः ॥ ४६ ॥
प्रजानाथ! फिर तो हर्षमें भरे हुए पाण्डव और पांचालोंकी किलकिलाहटका शब्द सब ओर गूँजने लगा ॥ ४६ ॥
सिंहनादांस्ततश्चक्रुः श्वेडांश्च भरतर्षभ ।
त्वरिताः क्षत्रिया राजन् जग्मुर्द्वैपायनं ह्रदम् ॥ ४७ ॥
भरतभूषण नरेश! वे सभी क्षत्रिय सिंहनाद एवं गर्जना करने लगे तथा तुरंत ही द्वैपायन नामक सरोवरके पास जा पहुँचे ॥ ४७ ॥
ज्ञातः पापो धार्तराष्ट्रो दृष्टश्चेत्यसकृद्रणे ।
प्राक्रोशन् सोमकास्तत्र हृष्टरूपाः समन्ततः ॥ ४८ ॥
हर्षमें भरे हुए सोमकवीर रणभूमिमें सब ओर पुकार-पुकारकर कहने लगे ‘धृतराष्ट्रके पापी पुत्रका पता लग गया और उसे देख लिया गया’ ॥ ४८ ॥
तेषामाशु प्रयातानां रथानां तत्र वेगिनाम् ।
बभूव तुमुलः शब्दो दिविस्पृक् पृथिवीपते ॥ ४९ ॥
पृथ्वीनाथ! वहाँ शीघ्रतापूर्वक यात्रा करनेवाले उनके वेगशाली रथोंका घोर घर्घर शब्द आकाशमें व्याप्त हो गया ॥ ४९ ॥
दुर्योधनं परीप्सन्तस्तत्र तत्र युधिष्ठिरम् ।
अन्वयुस्त्वरितास्ते वै राजानं श्रान्तवाहनाः ॥ ५० ॥
अर्जुनो भीमसेनश्च माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ।
धृष्टद्युम्नश्च पाञ्चाल्यः शिखण्डी चापराजितः ॥ ५१ ॥
उत्तमौजा युधामन्युः सात्यकिश्च महारथः ।
पञ्चालानां च ये शिष्टा द्रौपदेयाश्च भारत ॥ ५२ ॥
हयाश्च सर्वे नागाश्च शतशश्च पदातयः ।
भारत! उस समय अर्जुन, भीमसेन, माद्रीकुमार पाण्डुपुत्र नकुल-सहदेव, पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न, अपराजित वीर शिखण्डी, उत्तमौजा, युधामन्यु, महारथी सात्यकि, द्रौपदीके पाँचों पुत्र तथा पांचालोंमेंसे जो जीवित बच गये थे, वे वीर दुर्योधनको पकड़नेकी इच्छासे अपने वाहनोंके थके होनेपर भी बड़ी उतावलीके साथ राजा युधिष्ठिरके पीछे-पीछे गये। उनके साथ सभी घुड़सवार, हाथीसवार और सैकड़ों पैदल सैनिक भी थे ॥ ५०—५२ १/२ ॥
ततः प्राप्तो महाराज धर्मराजः प्रतापवान् ॥ ५३ ॥
द्वैपायनं ह्रदं घोरं यत्र दुर्योधनोऽभवत् ।
महाराज! तत्पश्चात् प्रतापी धर्मराज युधिष्ठिर उस भयंकर द्वैपायनह्रदके तटपर जा पहुँचे, जिसके भीतर दुर्योधन छिपा हुआ था ॥ ५३ १/२ ॥
शीतामलजलं हृद्यं द्वितीयमिव सागरम् ॥ ५४ ॥
मायया सलिलं स्तभ्य यत्राभूत् ते स्थितः सुतः ।
अत्यद्भुतेन विधिना दैवयोगेन भारत ॥ ५५ ॥
उसका जल शीतल और निर्मल था। वह देखनेमें मनोरम और दूसरे समुद्रके समान विशाल था। भारत! उसीके भीतर मायाद्वारा जलको स्तम्भित करके दैवयोग एवं अद्भुत विधिसे आपका पुत्र विश्राम कर रहा था ॥ ५४-५५ ॥
सलिलान्तर्गतः शेते दुर्दर्शः कस्यचित् प्रभो ।
मानुषस्य मनुष्येन्द्र गदाहस्तो जनाधिपः ॥ ५६ ॥
प्रभो! नरेन्द्र! हाथमें गदा लिये राजा दुर्योधन जलके भीतर सोया था। उस समय किसी भी मनुष्यके लिये उसको देखना कठिन था ॥ ५६ ॥
ततो दुर्योधनो राजा सलिलान्तर्गतो वसन् ।
शुश्रुवे तुमुलं शब्दं जलदोपमनिःस्वनम् ॥ ५७ ॥
तदनन्तर पानीके भीतर बैठे हुए राजा दुर्योधनने मेघकी गर्जनाके समान भयंकर शब्द सुना ॥ ५७ ॥
युधिष्ठिरश्च राजेन्द्र तं ह्रदं सह सोदरैः ।
आजगाम महाराज तव पुत्रवधाय वै ॥ ५८ ॥
राजेन्द्र! महाराज! आपके पुत्रका वध करनेके लिये राजा युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ उस सरोवरके तटपर आ पहुँचे ॥ ५८ ॥
महता शङ्खनादेन रथनेमिस्वनेन च ।
ऊर्ध्वं धुन्वन् महारेणुं कम्पयंश्चापि मेदिनीम् ॥ ५९ ॥
यौधिष्ठिरस्य सैन्यस्य श्रुत्वा शब्दं महारथाः ।
कृतवर्मा कृपो द्रौणि राजानमिदमब्रुवन् ॥ ६० ॥
वे महान् शंखनाद तथा रथके पहियोंकी घर्घराहटसे पृथ्वीको कँपाते और धूलका महान् ढेर ऊपर उड़ाते हुए वहाँ आये थे। युधिष्ठिरकी सेनाका कोलाहल सुनकर कृतवर्मा, कृपाचार्य और अश्वत्थामा तीनों महारथी राजा दुर्योधनसे इस प्रकार बोले— ॥ ५९-६० ॥
इमे ह्यायान्ति संहृष्टाः पाण्डवा जितकाशिनः ।
अपयास्यामहे तावदनुजानातु नो भवान् ॥ ६१ ॥
‘ये विजयसे उल्लसित होनेवाले पाण्डव बड़े हर्षमें भरकर इधर ही आ रहे हैं। अतः हमलोग यहाँसे हट जायँगे। इसके लिये तुम हमें आज्ञा प्रदान करो’ ॥ ६१ ॥
दुर्योधनस्तु तच्छ्रुत्वा तेषां तत्र तरस्विनाम् ।
तथेत्युक्त्वा हृदं तं वै माययास्तम्भयत् प्रभो ॥ ६२ ॥
प्रभो! उन वेगशाली वीरोंकी वह बात सुनकर दुर्योधनने 'तथास्तु' कहकर उस सरोवरके जलको पुनः मायाद्वारा स्तम्भित कर दिया ॥ ६२ ॥
ते त्वनुज्ञाप्य राजानं भृशं शोकपरायणाः ।
जग्मुर्दूरे महाराज कृपप्रभृतयो रथाः ॥ ६३ ॥
महाराज! राजाकी आज्ञा लेकर अत्यन्त शोकमें डूबे हुए कृपाचार्य आदि महारथी वहाँसे दूर चले गये ॥ ६३ ॥
ते गत्वा दूरमध्वानं न्यग्रोधं प्रेक्ष्य मारिष ।
न्यविशन्त भृशं श्रान्ताश्चिन्तयन्तो नृपं प्रति ॥ ६४ ॥
मान्यवर! दूरके मार्गपर जाकर उन्हें एक बरगदका वृक्ष दिखायी दिया। वे अत्यन्त थके होनेके कारण राजा दुर्योधनके विषयमें चिन्ता करते हुए उसीके नीचे बैठ गये ॥ ६४ ॥
विष्टभ्य सलिलं सुप्तो धार्तराष्ट्रो महाबलः ।
पाण्डवाश्चापि सम्प्राप्तास्तं देशं युद्धमीप्सवः ॥ ६५ ॥
इधर महाबली धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन पानी बाँधकर सो गया। इतनेहीमें युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले पाण्डव भी वहाँ आ पहुँचे ॥ ६५ ॥
कथं नु युद्धं भविता कथं राजा भविष्यति ।
कथं नु पाण्डवा राजन् प्रतिपत्स्यन्ति कौरवम् ॥ ६६ ॥
इत्येवं चिन्तयानास्तु रथेभ्योऽश्वान् विमुच्य ते ।
तत्रासांचक्रिरे राजन् कृपप्रभृतयो रथाः ॥ ६७ ॥
राजन्! उधर कृपाचार्य आदि महारथी रथोंसे घोड़ोंको खोलकर यह सोचने लगे कि 'अब युद्ध किस तरह होगा? राजा दुर्योधनकी क्या दशा होगी और पाण्डव किस प्रकार कुरुराज दुर्योधनका पता पायेंगे' ऐसी चिन्ता करते हुए वे वहाँ बैठकर आराम करने लगे ॥ ६६-६७ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३० ॥