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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 540)

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द्व्यशीतितमोऽध्यायः

युधिष्ठिरका प्रातःकाल उठकर स्नान और नित्यकर्म आदिसे निवृत्त हो ब्राह्मणोंको दान देना, वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो सिंहासनपर बैठना और वहाँ पधारे हुए भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करना

संजय उवाच

तयोः संवदतोरेवं कृष्णदारुकयोस्तथा ।
सात्यगाद् रजनी राजन्नथ राजाऽन्वबुध्यत ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! इधर श्रीकृष्ण और दारुकमें पूर्वोक्त प्रकारसे बातें हो ही रही थीं कि वह रात बीत गयी। दूसरी ओर राजा युधिष्ठिर भी जाग गये ॥ १ ॥

पठन्ति पाणिखनिका मागधा मधुपर्किकाः ।
वैतालिकाश्च सूताश्च तुष्टुवुः पुरुषर्षभम् ॥ २ ॥
उस समय हाथसे ताली देकर गीत गानेवाले तथा मांगलिक वस्तुओंको प्रस्तुत करनेवाले सूत, मागध और वैतालिक जन पुरुषश्रेष्ठ युधिष्ठिरकी स्तुति करने लगे ॥ २ ॥

नर्तकाश्चाप्यनृत्यन्त जगुर्गीतानि गायकाः ।
कुरुवंशस्तवार्थानि मधुरं रक्तकण्ठिनः ॥ ३ ॥
नर्तक नाचने और रागयुक्त कण्ठवाले गायक कुरुकुलकी स्तुतिसे युक्त मधुर गीत गाने लगे ॥ ३ ॥

मृदङ्गा झर्झरा भेर्यः पणवानकगोमुखाः ।
आडम्बराश्च शङ्खाश्च दुन्दुभ्यश्च महास्वनाः ॥ ४ ॥
एवमेतानि सर्वाणि तथान्यान्यपि भारत ।
वादयन्ति सुसंहृष्टाः कुशलाः साधुशिक्षिताः ॥ ५ ॥
भारत! सुशिक्षित एवं कुशल वादक अत्यन्त हर्षमें भरकर मृदंग, झाँझ, भेरी, पणव, आनक, गोमुख, आडम्बर, शंख और बड़े जोरसे बजनेवाली दुन्दुभियाँ तथा दूसरे प्रकारके वाद्योंको भी बजाने लगे ॥ ४-५ ॥

समेघसवनिर्घोषो महान् शब्दोऽस्पृशद् दिवम् ।
पार्थिवप्रवरं सुप्तं युधिष्ठिरमबोधयत् ॥ ६ ॥
वाद्योंका वह मेघके समान गम्भीर एवं महान् घोष आकाशतक फैल गया। उस ध्वनिने सोये हुए नृपश्रेष्ठ महाराज युधिष्ठिरको जगा दिया ॥ ६ ॥

प्रतिबुद्धः सुखं सुप्तो महार्हे शयनोत्तमे ।

उत्थायावश्यकार्यार्थं ययौ स्नानगृहं नृपः ॥ ७ ॥
बहुमूल्य एवं उत्तम शय्यापर सुखपूर्वक सोकर जगे हुए राजा युधिष्ठिर वहाँसे उठकर आवश्यक कार्यके लिये स्नान करने गये ॥ ७ ॥

ततः शुक्लाम्बराः स्नातास्तरुणाः शतमष्ट च ।
स्नापकाः काञ्चनैः कुम्भैः पूर्णैः समुपतस्थिरे ॥ ८ ॥
वहाँ स्नान करके श्वेत वस्त्र धारण किये हुए एक सौ आठ युवक सोनेके घड़ोंमें जल भरकर उन्हें नहलानेके लिये उपस्थित हुए ॥ ८ ॥

भद्रासने सूपविष्टः परिधायाम्बरं लघु ।
सस्नौ चन्दनसंयुक्तैः पानीयैरभिमन्त्रितैः ॥ ९ ॥
उस समय एक हलका वस्त्र पहनकर राजा युधिष्ठिर भद्रासन (चौकी)-पर बैठ गये और चन्दनयुक्त मन्त्रपूत जलसे स्नान करने लगे ॥ ९ ॥

उत्सादितः कषायेण बलवद्भिः सुशिक्षितैः ।
आप्लुतः साधिवासेन जलेन स सुगन्धिना ॥ १० ॥
सबसे पहले बलवान् तथा सुशिक्षित पुरुषोंने सर्वौषधि आदिद्वारा तैयार किये हुए उबटनसे उनके शरीरको अच्छी तरह मला, फिर उन्होंने अधिवासित एवं सुगन्धित जलसे स्नान किया ॥ १० ॥

राजहंसनिभं प्राप्य उष्णीषं शिथिलार्पितम् ।

जलक्षयनिमित्तं वै वेष्टयामास मूर्धनि ॥ ११ ॥
तत्पश्चात् राजहंसके समान सफेद ढीलीढाली पगड़ी लेकर माथेका जल सुखानेके लिये उसे मस्तकपर लपेट लिया ॥ ११ ॥
हरिणा चन्दनेनाङ्गमुलिप्य महाभुजः ।
स्रग्वी चाक्लिष्टवसनः प्राङ्मुखः प्राञ्जलिः स्थितः ॥ १२ ॥
फिर वे महाबाहु युधिष्ठिर अपने सारे अंगोंमें हरिचन्दनका अनुलेपन करके नूतन वस्त्र और पुष्पमाला धारण किये हाथ जोड़े पूर्वाभिमुख होकर बैठ गये ॥ १२ ॥
जजाप जप्यं कौन्तेयः सतां मार्गमनुष्ठितः ।
तत्राग्निशरणं दीप्तं प्रविवेश विनीतवत् ॥ १३ ॥
सत्पुरुषोंके मार्गपर चलनेवाले कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने जपनेयोग्य गायत्री मन्त्रका जप किया और प्रज्वलित अग्निसे प्रकाशित अग्निशालामें विनीतभावसे प्रवेश किया ॥ १३ ॥
समिद्भिः सपवित्राभिरग्निमाहुतिभिस्तथा ।
मन्त्रपूताभिरर्चयित्वा निष्क्राम गृहात् ततः ॥ १४ ॥
वहाँ पवित्री (कुशके दो पत्तों)-सहित समिधाओं तथा मन्त्रपूत आहुतियोंसे अग्निदेवकी पूजा करके वे उस अग्निहोत्रगृहसे बाहर निकले ॥ १४ ॥
द्वितीयां पुरुषव्याघ्रः कक्ष्यां निर्गम्य पार्थिवः ।
ततो वेदविदो वृद्धानपश्यद् ब्राह्मणर्षभान् ॥ १५ ॥
फिर शिविरकी दूसरी ड्योढ़ी पार करके पुरुषसिंह राजा युधिष्ठिरने वेदवेत्ता वृद्ध ब्राह्मण-शिरोमणियोंको देखा ॥ १५ ॥
दान्तान् वेदव्रतस्नातान् स्नातानवभृथेषु च ।
सहस्रानुचरान् सौरान् सहस्रं चाष्ट चापरान् ॥ १६ ॥
वे सब-के-सब जितेन्द्रिय, वेदाध्ययनके व्रतमें निष्णात, यज्ञान्तस्नानसे पवित्र तथा सूर्यदेवके उपासक थे। वे संख्यामें एक हजार आठ थे और उनके साथ एक सहस्र अनुचर थे ॥ १६ ॥
अक्षतैः सुमनोभिश्च वाचयित्वा महाभुजः ।
तान् द्विजान् मधुसर्पिर्भ्यां फलैः श्रेष्ठैः सुमङ्गलैः ॥ १७ ॥
प्रादात् काञ्चनमेकैकं निष्कं विप्राय पाण्डवः ।
तब महाबाहु पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरने अक्षत-फूल देकर उन ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया और उनमेंसे प्रत्येक ब्राह्मणको मधु, घी एवं श्रेष्ठ मांगलिक फलोंके साथ एक-एक स्वर्णमुद्रा प्रदान की ॥ १७ १/२ ॥
अलंकृतं चाश्वशतं वासांसीष्टाश्च दक्षिणाः ॥ १८ ॥
तथा गाः कपिला दोग्ध्रीः सवत्साः पाण्डुनन्दनः ।
हेमशृङ्गा रौप्यखुरा दत्त्वा चक्रे प्रदक्षिणम् ॥ १९ ॥

इसके सिवा उन पाण्डुनन्दनने ब्राह्मणोंको सजे-सजाये सौ घोड़े, उत्तम वस्त्र, इच्छानुसार दक्षिणा और बछड़ोंसहित दूध देनेवाली बहुत-सी कपिला गौएँ दीं। उन गौओंके सींगोंमें सोने और खुरोंमें चाँदी मढ़े हुए थे। उन सबको देकर युधिष्ठिरने उन (गौओं एवं ब्राह्मणों)-की परिक्रमा की ।। १८-१९ ।।

स्वस्तिकान् वर्धमानांश्च नन्द्यावर्तांश्च काञ्चनान् ।
माल्यं च जलकुम्भांश्च ज्वलितं च हुताशनम् ।। २० ।।
पूर्णान्यक्षतपात्राणि रुचकं रोचनास्तथा ।
स्वलंकृताः शुभाः कन्या दधिसर्पिर्मधूदकम् ।। २१ ।।
मङ्गल्यान् पक्षिणश्चैव यच्चान्यदपि पूजितम् ।
दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा च कौन्तेयो बाह्यां कक्ष्यां ततोऽगमत् ।। २२ ।।

तत्पश्चात् सोनेके बने हुए स्वस्तिक, सिकोरे, बन्द मुँहवाले अर्घपात्र, माला, जलसे भरे हुए कलश, प्रज्वलित अग्नि, अक्षतसे भरे हुए पूर्णपात्र, बिजौरा नीबू, गोरोचन, आभूषणोंसे विभूषित सुन्दरी कन्याएँ, दही, घी, मधु, जल, मांगलिक पक्षी तथा अन्यान्य भी जो प्रशस्त वस्तुएँ हैं, उन सबको देखकर और उनमेंसे कुछका स्पर्श करके कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने बाहरी ड्योढ़ीमें प्रवेश किया ।। २०—२२ ।।

ततस्तस्यां महाबाहोस्तिष्ठतः परिचारकाः ।
सौवर्णं सर्वतोभद्रं मुक्तावैदूर्यमण्डितम् ।। २३ ।।
परार्घ्यास्तरणास्तीर्णं सोत्तरच्छदमृद्धिमत् ।
विश्वकर्मकृतं दिव्यमुपजह्रुर्वरासनम् ।। २४ ।।

उस ड्योढ़ीमें खड़े हुए महाबाहु युधिष्ठिरके सेवकोंने उनके लिये सोनेका बना हुआ एक सर्वतोभद्र नामक श्रेष्ठ आसन दिया, जिसमें मुक्ता और वैदूर्यमणि जड़ी हुई थी। उसपर बहुमूल्य बिछौना बिछा हुआ था। उसके ऊपर सुन्दर चादर बिछायी गयी थी। वह दिव्य एवं समृद्धिशाली सिंहासन साक्षात् विश्वकर्माका बनाया हुआ था ।। २३-२४ ।।

तत्र तस्योपविष्टस्य भूषणानि महात्मनः ।
उपाजहुर्महार्हाणि प्रेष्याः शुभ्राणि सर्वशः ।। २५ ।।

वहाँ बैठे हुए महात्मा राजा युधिष्ठिरको उनके सेवकोंने सब प्रकारके उज्ज्वल एवं बहुमूल्य आभूषण भेंट किये ।। २५ ।।

मुक्ताभरणवेषस्य कौन्तेयस्य महात्मनः ।
रूपमासीन्महाराज द्विषतां शोकवर्धनम् ।। २६ ।।

महाराज! मुक्तामय आभूषणोंसे विभूषित वेशवाले महात्मा कुन्तीनन्दनका स्वरूप उस समय शत्रुओंका शोक बढ़ा रहा था ।। २६ ।।

चामरैश्चन्द्ररश्म्याभैर्हेमदण्डैः सुशोभनैः ।
दोधूयमानैः शुशुभे विद्युद्भिरिव तोयदः ।। २७ ।।

चन्द्रमाकी किरणोंके समान श्वेत तथा सुवर्णमय दण्डवाले सुन्दर शोभाशाली अनेक चँवर डुलाये जा रहे थे। उनसे राजा युधिष्ठिरकी वैसी ही शोभा हो रही थी, जैसे बिजलियोंसे मेघ सुशोभित होता है॥ २७॥

संस्तूयमानः सूतैश्च वन्द्यमानश्च वन्दिभिः।
उपगीयमानो गन्धर्वैरास्ते स्म कुरुनन्दनः॥ २८॥
उस समय सूतगण स्तुति करते थे, वन्दीजन वन्दना कर रहे थे और गन्धर्वगण उनके सुयशके गीत गाते थे। इन सबसे घिरे हुए युधिष्ठिर वहाँ सिंहासनपर विराजमान थे॥ २८॥

ततो मुहूर्तादासीत् तु स्यन्दनानां स्वनो महान्।
नेमिघोषश्च रथिनां खुरघोषश्च वाजिनाम्॥ २९॥
तदनन्तर दो ही घड़ीमें रथोंका महान् शब्द गूँज उठा। रथियोंके रथोंके पहियोंकी घरघराहट और घोड़ोंकी टापोंके शब्द सुनायी देने लगे॥ २९॥

ह्रादेन गजघण्टानां शङ्खानां निनदेन च।
नराणां पदशब्दैश्च कम्पतीव स्म मेदिनी॥ ३०॥
हाथियोंके घंटोंकी घनघनाहट, शंखोंकी ध्वनि तथा पैदल चलनेवाले मनुष्योंके पैरोंकी धमकसे यह पृथ्वी काँपती-सी जान पड़ती थी॥ ३०॥

ततः शुद्धान्तमासाद्य जानुभ्यां भूतले स्थितः।
शिरसा वन्दनीयं तमभिवाद्य जनेश्वरम्॥ ३१॥
कुण्डली बद्धनिस्त्रिंशः संनद्धकवचो युवा।
अभिप्रणम्य शिरसा द्वाःस्थो धर्मात्मजाय वै॥ ३२॥
न्यवेदयद्धृषीकेशमुपयान्तं महात्मने।
इसी समय कानोंमें कुण्डल पहने, कमरमें तलवार बाँधे और वक्षःस्थलपर कवच धारण किये एक तरुण द्वारपालने उस ड्योढ़ीके भीतर प्रवेश करके धरतीपर दोनों घुटने टेक दिये और वन्दनीय महाराज युधिष्ठिरको मस्तक नवाकर प्रणाम किया। इस प्रकार सिरसे प्रणाम करके उसने धर्मपुत्र महात्मा युधिष्ठिरको यह सूचना दी कि भगवान् श्रीकृष्ण पधार रहे हैं॥ ३१-३२ १/२॥

सोऽब्रवीत् पुरुषव्याघ्रः स्वागतेनैव माधवम्॥ ३३॥
अर्घ्यं चैवासनं चास्मै दीयतां परमार्चितम्।
तब पुरुषसिंह युधिष्ठिरने द्वारपालसे कहा—'तुम माधवको स्वागतपूर्वक ले आओ और उन्हें अर्घ्य तथा परम उत्तम आसन अर्पित करो'॥ ३३ १/२॥

ततः प्रवेश्य वार्ष्णेयमुपवेश्य वरासने।
पूजयामास विधिवद् धर्मराजो युधिष्ठिरः॥ ३४॥

तब द्वारपालने भगवान् श्रीकृष्णको भीतर ले आकर एक श्रेष्ठ आसनपर बैठा दिया। तत्पश्चात् धर्मराज युधिष्ठिरने स्वयं ही विधिपूर्वक उनका पूजन किया ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि युधिष्ठिरसज्जतायां
द्व्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें युधिष्ठिरके सुसज्जित होनेसे
सम्बन्ध रखनेवाला बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८२ ॥