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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 506)

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सप्तसप्ततितमोऽध्यायः

नाना प्रकारके अशुभसूचक उत्पात, कौरव-सेनामें भय और श्रीकृष्णका अपनी बहिन सुभद्राको आश्वासन देना

संजय उवाच

तां निशां दुःखशोकार्तौ निःश्वसन्ताविवोरगौ ।
निद्रां नैवोपलेभाते वासुदेवधनंजयौ ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! दुःख और शोकसे पीड़ित हुए श्रीकृष्ण और अर्जुन सर्पोंके समान लंबी साँस खींच रहे थे। उन दोनोंको उस रातमें नींद नहीं आयी ॥ १ ॥

नरनारायणौ क्रुद्धौ ज्ञात्वा देवाः सवासवाः ।
व्यथिताश्चिन्तयामासुः किंस्विदेतद् भविष्यति ॥ २ ॥
नर और नारायणको कुपित जान इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता व्यथित हो चिन्ता करने लगे; यह क्या होनेवाला है? ॥ २ ॥

ववुश्च दारुणा वाता रूक्षा घोराभिशंसिनः ।
सकबन्धस्तथाऽऽदित्ये परिधिः समदृश्यत ॥ ३ ॥
रूक्ष, भयसूचक एवं दारुण वायु बहने लगी। (दूसरे दिन सूर्योदय होनेपर) सूर्यमण्डलमें कबन्धयुक्त घेरा देखा गया ॥ ३ ॥

शुष्काशन्यश्च निष्पेतुः सनिर्घाताः सविद्युतः ।
चचाल चापि पृथिवी सशैलवनकानना ॥ ४ ॥
बिना वर्षाके ही वज्र गिरने लगे। आकाशमें बिजलीकी चमकके साथ भयंकर गर्जना होने लगी। पर्वत, वन और काननोंसहित पृथिवी काँपने लगी ॥ ४ ॥

चुक्षुभुश्च महाराज सागरा मकरालयाः ।
प्रतिस्रोतः प्रवृत्ताश्च तथा गन्तुं समुद्रगाः ॥ ५ ॥
महाराज! ग्राहोंके निवासस्थान समुद्रोंमें ज्वार आ गया। समुद्रगामिनी नदियाँ उलटी धारामें बहकर अपने उद्गमकी ओर जाने लगीं ॥ ५ ॥

रथाश्वनरनागानां प्रवृत्तमधरोत्तरम् ।
क्रव्यादानां प्रमोदार्थं यमराष्ट्रविवृद्धये ॥ ६ ॥
मांसभक्षी प्राणियोंके आनन्द और यमराजके राज्यकी वृद्धिके लिये रथ, घोड़े, मनुष्य और हाथियोंके नीचे-ऊपरके ओष्ठ फड़कने लगे ॥ ६ ॥

वाहनानि शकृन्मूत्रे मुमुचु रुरुदुश्च ह ।
तान् दृष्ट्वा दारुणान् सर्वानुत्पाताँल्लोमहर्षणान् ॥ ७ ॥

सर्वे ते व्यथिताः सैन्यास्त्वदीया भरतर्षभ ।
श्रुत्वा महाबलस्योग्रां प्रतिज्ञां सव्यसाचिनः ॥ ८ ॥
भरतश्रेष्ठ! हाथी, घोड़े आदि वाहन मल-मूत्र करने और रोने लगे। उन सब भयंकर एवं रोमांचकारी उत्पातोंको देखकर और महाबली सव्यसाची अर्जुनकी उस भयंकर प्रतिज्ञाको सुनकर आपके सभी सैनिक व्यथित हो उठे ॥ ७-८ ॥

अथ कृष्णं महाबाहुरब्रवीत् पाकशासनिः ।
आश्वासय सुभद्रां त्वं भगिनीं स्नुषया सह ॥ ९ ॥
स्नुषां चास्या वयस्याश्च विशोकाः कुरु माधव ।
साम्ना सत्येन युक्तेन वचसाऽऽश्वासय प्रभो ॥ १० ॥
इधर इन्द्रकुमार महाबाहु अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—'माधव! आप पुत्रवधू उत्तरासहित अपनी बहिन सुभद्राको धीरज बँधाइये। उत्तरा और उसकी सखियोंका शोक दूर कीजिये। प्रभो! शान्तिपूर्ण, सत्य और युक्तियुक्त वचनोंद्वारा इन सबको आश्वासन दीजिये' ॥ ९-१० ॥

ततोऽर्जुनगृहं गत्वा वासुदेवः सुदुर्मनाः ।
भगिनीं पुत्रशोकार्तामाश्वासयत दुःखिताम् ॥ ११ ॥
तब भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त उदास मनसे अर्जुनके शिविरमें गये और पुत्रशोकसे पीड़ित हुई अपनी दुखिया बहिनको आश्वासन देने लगे ॥ ११ ॥

वासुदेव उवाच

मा शोकं कुरु वार्ष्णेयि कुमारं प्रति सस्नुषा ।
सर्वेषां प्राणिनां भीरु निष्ठैषा कालनिर्मिता ॥ १२ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—वृष्णिनन्दिनी! तुम और पुत्रवधू उत्तरा कुमार अभिमन्युके लिये शोक न करो। भीरु! काल एक दिन सभी प्राणियोंकी ऐसी ही अवस्था कर देता है ॥ १२ ॥

कुले जातस्य धीरस्य क्षत्रियस्य विशेषतः ।
सदृशं मरणं ह्येतत् तव पुत्रस्य मा शुचः ॥ १३ ॥
तुम्हारा पुत्र उत्तम कुलमें उत्पन्न धीर-वीर और विशेषतः क्षत्रिय था। यह मृत्यु उसके योग्य ही हुई है; इसलिये शोक न करो ॥ १३ ॥

दिष्ट्या महारथो धीरः पितुस्तुल्यपराक्रमः ।
क्षात्रेण विधिना प्राप्तो वीराभिलषितां गतिम् ॥ १४ ॥
यह सौभाग्यकी बात है कि पिताके तुल्य पराक्रमी धीर महारथी अभिमन्यु क्षत्रियोचित कर्तव्यका पालन करके उस उत्तम गतिको प्राप्त हुआ है, जिसकी वीर पुरुष अभिलाषा करते हैं ॥ १४ ॥

जित्वा सुबहुशः शत्रून् प्रेषयित्वा च मृत्यवे ।
गतः पुण्यकृतां लोकान् सर्वकामदुहोऽक्षयान् ॥ १५ ॥
वह बहुत-से शत्रुओंको जीतकर और बहुतोंको मृत्युके लोकमें भेजकर पुण्यात्माओंको प्राप्त होनेवाले उन अक्षय लोकोंमें गया है, जो सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं ॥ १५ ॥

तपसा ब्रह्मचर्येण श्रुतेन प्रज्ञयापि च ।

सन्तो यां गतिमिच्छन्ति तां प्राप्तस्तव पुत्रकः ॥ १६ ॥
तपस्या, ब्रह्मचर्य, शास्त्रज्ञान और सद्बुद्धिके द्वारा साधुपुरुष जिस गतिको पाना चाहते हैं, वही गति तुम्हारे पुत्रको भी प्राप्त हुई है ॥ १६ ॥

वीरसूर्वीरपत्नी त्वं वीरजा वीरबान्धवा ।
मा शुचस्तनयं भद्रे गतः स परमां गतिम् ॥ १७ ॥
सुभद्रे! तुम वीरमाता, वीरपत्नी, वीरकन्या और वीर भाइयोंकी बहिन हो। तुम पुत्रके लिये शोक न करो। वह उत्तम गतिको प्राप्त हुआ है ॥ १७ ॥

प्राप्स्यते चाप्यसौ पापः सैन्धवो बालघातकः ।
अस्यावलेपस्य फलं ससुहृद्गणबान्धवः ॥ १८ ॥
व्युष्टायां तु वरारोहे रजन्यां पापकर्मकृत् ।
न हि मोक्ष्यति पार्थात् स प्रविष्टोऽप्यमरावतीम् ॥ १९ ॥
वरारोहे! बालककी हत्या करानेवाला वह पापकर्मा पापी सिंधुराज जयद्रथ रात बीतनेपर प्रातःकाल होते ही अपने सुहृदों और बन्धु-बान्धवोंसहित इस अपराधका फल पायेगा। वह अमरावतीपुरीमें जाकर छिप जाय तो भी अर्जुनके हाथसे उसका छुटकारा नहीं होगा ॥ १८-१९ ॥

श्वः शिरः श्रोष्यसे तस्य सैन्धवस्य रणे हतम् ।
समन्तपञ्चकाद् बाह्यं विशोका भव मा रुदः ॥ २० ॥
तुम कल ही सुनोगी कि रणक्षेत्रमें जयद्रथका मस्तक काट लिया गया है और वह समन्तपंचक क्षेत्रसे बाहर जा गिरा है। अतः शोक त्याग दो और रोना बंद करो ॥ २० ॥

क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य गतः शूरः सतां गतिम् ।
यां गतिं प्राप्नुयामेह ये चान्ये शस्त्रजीविनः ॥ २१ ॥
शूरवीर अभिमन्युने क्षत्रिय-धर्मको आगे रखकर सत्पुरुषोंकी गति पायी है, जिसे हमलोग और इस संसारके दूसरे शस्त्रधारी क्षत्रिय भी पाना चाहते हैं ॥ २१ ॥

व्यूढोरस्को महाबाहुरनिवर्ती रथप्रणुत् ।
गतस्तव वरारोहे पुत्रः स्वर्गं ज्वरं जहि ॥ २२ ॥
सुन्दरी! चौड़ी छाती और विशाल भुजाओंसे सुशोभित युद्धसे पीछे न हटनेवाला तथा शत्रुपक्षके रथियोंपर विजय पानेवाला तुम्हारा पुत्र स्वर्गलोकमें गया है। तुम चिन्ता छोड़ो ॥ २२ ॥

अनुयातश्च पितरं मातृपक्षं च वीर्यवान् ।
सहस्रशो रिपून् हत्वा हतः शूरो महारथः ॥ २३ ॥
बलवान्, शूरवीर और महारथी अभिमन्यु पितृकुल तथा मातृकुलकी मर्यादाका अनुसरण करते हुए सहस्रों शत्रुओंको मारकर मरा है ॥ २३ ॥

आश्वासय स्नुषां राज्ञि मा शुचः क्षत्रिये भृशम् ।

श्वः प्रियं सुमहच्छ्रुत्वा विशोका भव नन्दिनि ॥ २४ ॥
रानी बहिन! अधिक चिन्ता छोड़ो और बहूको धीरज बँधाओ। अपने कुलको आनन्दित करनेवाली क्षत्रियकन्ये! कल अत्यन्त प्रिय समाचार सुनकर शोकरहित हो जाओ ॥ २४ ॥
यत् पार्थेन प्रतिज्ञातं तत् तथा न तदन्यथा ।
चिकीर्षितं हि ते भर्तुर्न भवेज्जातु निष्फलम् ॥ २५ ॥
अर्जुनने जिस बातके लिये प्रतिज्ञा कर ली है, वह उसी रूपमें पूर्ण होगी। उसे कोई पलट नहीं सकता। तुम्हारे स्वामी जो कुछ करना चाहते हैं, वह कभी निष्फल नहीं होता ॥ २५ ॥
यदि च मनुजपन्नगाः पिशाचा
रजनिचराः पतगाः सुरासुराश्च ।
रणगतमभियान्ति सिन्धुराजं
न स भविता सह तैरपि प्रभाते ॥ २६ ॥
यदि मनुष्य, नाग, पिशाच, निशाचर, पक्षी, देवता और असुर भी रणक्षेत्रमें आये हुए सिंधुराज जयद्रथकी सहायताके लिये आ जायँ तो भी वह कल उन सहायकोंके साथ ही जीवनसे हाथ धो बैठेगा ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि सुभद्राश्वासने सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें सुभद्राको श्रीकृष्णका आश्वासनविषयक सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७७ ॥