महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 341)
पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः
अभिमन्युके द्वारा सत्यश्रवा, क्षत्रियसामूह, रुक्मरथ तथा उसके मित्रगणों और सैकड़ों राजकुमारोंका वध और दुर्योधनकी पराजय
संजय उवाच
आददानस्तु शूराणामायूंष्यभवदार्जुनः ।
अन्तकः सर्वभूतानां प्राणान् काल इवागते ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! मृत्युकाल उपस्थित होनेपर जैसे यमराज समस्त प्राणियोंके प्राण हर लेते हैं, उसी प्रकार अर्जुनकुमार अभिमन्यु भी वीरोंकी आयुका अपहरण करते हुए उनके लिये यमराज ही हो गये थे ॥ १ ॥
स शक्र इव विक्रान्तः शक्रसूनोः सुतो बली ।
अभिमन्युस्तदानीकं लोडयन् समदृश्यत ॥ २ ॥
इन्द्रकुमार अर्जुनका बलवान् पुत्र अभिमन्यु इन्द्रके समान पराक्रमी था। वह उस समय सारे व्यूहका मन्थन करता दिखायी देता था ॥ २ ॥
प्रविश्यैव तु राजेन्द्र क्षत्रियेन्द्रान्तकोपमः ।
सत्यश्रवसमादत्त व्याघ्रो मृगमिवोल्बणः ॥ ३ ॥
राजेन्द्र! क्षत्रियशिरोमणियोंके लिये यमराजके समान अभिमन्युने उस सेनामें प्रवेश करते ही जैसे उन्मत्त व्याघ्र हरिणको दबोच लेता है, उसी प्रकार सत्यश्रवाको ले बैठा ॥ ३ ॥
सत्यश्रवसि चाक्षिप्ते त्वरमाणा महारथाः ।
प्रगृह्य विपुलं शस्त्रमभिमन्युमुपाद्रवन् ॥ ४ ॥
सत्यश्रवाके मारे जानेपर उन सभी महारथियोंने प्रचुर अस्त्र-शस्त्र लेकर बड़ी उतावलीके साथ अभिमन्युपर आक्रमण किया ॥ ४ ॥
अहं पूर्वमहं पूर्वमिति क्षत्रियपुङ्गवाः ।
स्पर्धमानाः समाजग्मुर्जिघांसन्तोऽर्जुनात्मजम् ॥ ५ ॥
वे सभी क्षत्रियशिरोमणि 'पहले मैं, पहले मैं' इस प्रकार परस्पर होड़ लगाते हुए अर्जुनकुमारको मार डालनेकी इच्छासे आगे बढ़े ॥ ५ ॥
क्षत्रियाणामनीकानि प्रद्रुतान्यभिधावताम् ।
जग्रास तिमिरासाद्य क्षुद्रमत्स्यानिवार्णवे ॥ ६ ॥
उस समय धावा करनेवाले क्षत्रियोंकी उन आगे बढ़ती हुई सेनाओंको अभिमन्युने उसी प्रकार कालका ग्रास बना लिया, जैसे महासागरमें तिमि नामक महामत्स्य छोटे-छोटे मत्स्योंको निगल जाता है ॥ ६ ॥
ये केचन गतास्तस्य समीपमपलायिनः ।
न ते प्रतिन्यवर्तन्त समुद्रादिव सिन्धवः ॥ ७ ॥
युद्धसे न भागनेवाले जो कोई शूरवीर उस सयम अभिमन्युके पास गये, वे फिर नहीं लौटे। जैसे समुद्रमें मिली हुई नदियाँ फिर वहाँसे लौट नहीं पाती हैं ॥ ७ ॥
महाग्राहगृहीतेव वातवेगभयार्दिता ।
समकम्पत सा सेना विभ्रष्टा नौरिवार्णवे ॥ ८ ॥
जिसका समुद्रमें मार्ग भूल गया हो, जो वायुके वेगसे भयाक्रान्त हो रही हो तथा जिसे किसी बहुत बड़े ग्राहने पकड़ लिया हो—ऐसी नौका जैसे डगमगाने लगती है, उसी प्रकार वह सेना अभिमन्युके भयसे काँप रही थी ॥ ८ ॥
अथ रुक्मरथो नाम मद्रेश्वरसुतो बली ।
त्रस्तामाश्वासयन् सेनामत्रस्तो वाक्यमब्रवीत् ॥ ९ ॥
इसी समय मद्रराजका बलवान् पुत्र रुक्मरथ आकर अपनी डरी हुई सेनाको आश्वासन देता हुआ निर्भय होकर बोला— ॥ ९ ॥
अलं त्रासेन वः शूरा नैष कश्चिन्मयि स्थिते ।
अहमेनं ग्रहीष्यामि जीवग्राहं न संशयः ॥ १० ॥
‘शूरवीरो! तुम्हें डरनेकी कोई आवश्यकता नहीं। यह अभिमन्यु मेरे रहते कुछ भी नहीं है। मैं अभी इसे जीतेजी पकड़ लूँगा। इसमें संशय नहीं है’ ॥ १० ॥
एवमुक्त्वा तु सौभद्रमभिदुद्राव वीर्यवान् ।
सुकल्पितेनोह्यमानः स्यन्दनेन विराजता ॥ ११ ॥
ऐसा कहकर पराक्रमी रुक्मरथ सुन्दर सजे-सजाये तेजस्वी रथपर आरूढ़ हो सुभद्राकुमार अभिमन्युकी ओर दौड़ा ॥ ११ ॥
सोऽभिमन्युं त्रिभिर्बाणैर्विद्ध्वा वक्षस्यथानदत् ।
त्रिभिश्च दक्षिणे बाहौ सव्ये च निशितैस्त्रिभिः ॥ १२ ॥
उसने अभिमन्युकी छातीमें तीन बाण मारकर सिंहनाद किया। फिर तीन बाण दाहिनी और तीन तीखे बाण बायीं भुजामें मारे ॥ १२ ॥
स तस्येष्वसनं छित्त्वा फाल्गुनिः सव्यदक्षिणौ ।
भुजौ शिरश्च स्वक्षिभ्रु क्षितौ क्षिप्रमपातयत् ॥ १३ ॥
तब अर्जुनकुमारने रुक्मरथका धनुष काटकर उसकी बायीं-दायीं भुजाओंको तथा सुन्दर नेत्र एवं भौंहोंसे सुशोभित मस्तकको भी तुरंत ही पृथ्वीपर काट गिराया ॥ १३ ॥
दृष्ट्वा रुक्मरथं रुक्णं पुत्रं शल्यस्य मानिनम् ।
जीवग्राहं जिघृक्षन्तं सौभद्रेण यशस्विना ॥ १४ ॥
संग्रामदुर्मदा राजन् राजपुत्राः प्रहारिणः ।
वयस्याः शल्यपुत्रस्य सुवर्णविकृतध्वजाः ॥ १५ ॥
तालमात्राणि चापानि विकर्षन्तो महाबलाः ।
आर्जुनिं शरवर्षेण समन्तात् पर्यवारयन् ॥ १६ ॥
राजन्! राजा शल्यके अभिमानी पुत्र रुक्मरथको जो अभिमन्युको जीते-जी पकड़ना चाहता था, यशस्वी सुभद्रकुमारके द्वारा मारा गया देख शल्यपुत्रके बहुत-से मित्र राजकुमार, जो प्रहार करनेमें कुशल और युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले थे, अर्जुनकुमारको चारों ओरसे घेरकर बाणोंकी वर्षा करने लगे। उनके ध्वज सुवर्णके बने हुए थे, वे महाबली वीर चार हाथके धनुष खींच रहे थे ॥ १४-१६ ॥
शूरैः शिक्षाबलोपेतैस्तरुरणैरत्यमर्षणैः ।
दृष्ट्वैकं समरे शूरं सौभद्रमपराजितम् ॥ १७ ॥
छाद्यमानं शरव्रातैर्हृष्टो दुर्योधनोऽभवत् ।
वैवस्वतस्य भवनं गतं ह्येनममन्यत ॥ १८ ॥
शिक्षा और बलसे सम्पन्न, तरुण अवस्थावाले, अत्यन्त अमर्षशील और शूरवीर राजकुमारोंद्वारा, किसीसे परास्त न होनेवाले शौर्यसम्पन्न सुभद्रकुमारको अकेले ही समरांगणमें बाणसमूहोंसे आच्छादित होते देख राजा दुर्योधनको बड़ा हर्ष हुआ। उसने यह मान लिया कि अब अभिमन्यु यमराजके लोकमें पहुँच गया ॥ १७-१८ ॥
सुवर्णपुङ्खैरिषुभिर्नानालिङ्गैः सुतेजनैः ।
अदृश्यमार्जुनं चक्रुर्निमेषात् ते नृपात्मजाः ॥ १९ ॥
उन राजकुमारोंने सोनेके पंखवाले नाना प्रकारके चिह्नोंसे सुशोभित और पैने बाणोंद्वारा अर्जुनकुमार अभिमन्युको पलक मारते-मारते अदृश्य कर दिया ॥ १९ ॥
ससूताश्वध्वजं तस्य स्यन्दनं तं च मारिष ।
आचितं समपश्याम श्वाविधं शललैरिव ॥ २० ॥
आर्य! सारथि, घोड़े और ध्वजसहित अभिमन्युके उस रथको मैंने उसी प्रकार बाणोंसे व्याप्त देखा, जैसे साही (सेह)-का शरीर काँटोंसे भरा रहता है ॥ २० ॥
स गाढविद्धः क्रुद्धश्च तोत्रैर्गज इवार्दितः ।
गान्धर्वमस्त्रमायच्छद् रथमायां च भारत ॥ २१ ॥
भारत! बाणोंसे गहरी चोट खाकर अभिमन्यु अंकुशसे पीड़ित हुए गजराजकी भाँति कुपित हो उठा। उसने गान्धर्वास्त्रका प्रयोग किया और रथमाया (रथयुद्धकी शिक्षामें निपुणता) प्रकट की ॥ २१ ॥
अर्जुनेन तपस्तप्त्वा गन्धर्वेभ्यो यदाहृतम् ।
तुम्बुरुप्रमुखेभ्यो वै तेनामोहयताहितान् ॥ २२ ॥
अर्जुनने तपस्या करके तुम्बुरु आदि गन्धर्वोंसे जो अस्त्र प्राप्त किया था, उसीसे अभिमन्युने अपने शत्रुओंको मोहित कर दिया ॥ २२ ॥
एकधा शतधा राजन् दृश्यते स्म सहस्रधा ।
अलातचक्रवत् संख्ये क्षिप्रमस्त्राणि दर्शयन् ॥ २३ ॥
राजन्! वह शीघ्रतापूर्वक अस्त्रसंचालनका कौशल दिखाता हुआ युद्धमें अलातचक्रकी भाँति एक, शत तथा सहस्रों रूपोंमें दृष्टिगोचर होता था ॥ २३ ॥
रथचर्यास्त्रमायाभिर्मोहयित्वा परंतपः ।
बिभेद शतधा राजन् शरीराणि महीक्षिताम् ॥ २४ ॥
महाराज! शत्रुओंको संताप देनेवाले अभिमन्युने रथचर्या तथा अस्त्रोंकी मायासे मोहित करके राजाओंके शरीरोंके सौ-सौ टुकड़े कर दिये ॥ २४ ॥
प्राणाः प्राणभृतां संख्ये प्रेषितानि शितैः शरैः ।
राजन् प्रापुरमुं लोकं शरीराण्यवनिं ययुः ॥ २५ ॥
राजन्! उस युद्धस्थलमें उसके पैने बाणोंसे प्रेरित हुए प्राणधारियोंके शरीर तो पृथ्वीपर गिर पड़े, परंतु प्राण परलोकमें जा पहुँचे ॥ २५ ॥
धनूंष्यश्वान् नियन्तॄंश्च ध्वजान् बाहूंश्च साङ्गदान् ।
शिरांसि च शितैर्बाणैस्तेषां चिच्छेद फाल्गुनिः ॥ २६ ॥
अर्जुनकुमारने अपने तीखे बाणोंद्वारा उनके धनुष, घोड़े, सारथि, ध्वज, अंगदयुक्त बाहु तथा मस्तक भी काट डाले ॥ २६ ॥
चूतारामो यथा भग्नः पञ्चवर्षः फलोपगः ।
राजपुत्रशतं तद्वत् सौभद्रेण निपातितम् ॥ २७ ॥
जैसे पाँच वर्षोंका लगाया हुआ आमका बाग, जो फल देनेके योग्य हो गया हो, काट दिया जाय, उसी प्रकार सैकड़ों राजकुमारोंको सुभद्राकुमारने वहाँ मार गिराया ॥ २७ ॥
क्रुद्धाशीविषसंकाशान् सुकुमारान् सुखोचितान् ।
एकेन निहतान् दृष्ट्वा भीतो दुर्योधनोऽभवत् ॥ २८ ॥
क्रोधमें भरे हुए विषधर सर्पोंके समान भयंकर तथा सुख भोगनेके योग्य उन सुकुमार राजकुमारोंको एकमात्र अभिमन्युद्वारा मारा गया देख दुर्योधन भयभीत हो गया ॥ २८ ॥
रथिनः कुञ्जरानश्वान् पदातींश्चापि मज्जतः ।
दृष्ट्वा दुर्योधनः क्षिप्रमुपायात् तममर्षितः ॥ २९ ॥
रथियों, हाथियों, घोड़ों और पैदलोंको भी अभिमन्यु-रूपी समुद्रमें डूबते देख अमर्षमें भरे हुए दुर्योधनने शीघ्र ही उसपर धावा किया ॥ २९ ॥
तयोः क्षणमिवापूर्णः संग्रामः समपद्यत ।
अथाभवत् ते विमुखः पुत्रः शरशताहतः ॥ ३० ॥
उन दोनोंमें एक क्षणतक अधूरा-सा युद्ध हुआ। इतनेहीमें आपका पुत्र दुर्योधन सैकड़ों बाणोंसे आहत होकर वहाँसे भाग गया ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि दुर्योधनपराजयो
पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें दुर्योधनकी पराजयविषयक
पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४५ ॥