महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 3092)
सप्तदशोऽध्यायः
अपने समस्त पुत्रों और सैनिकोंके मारे जानेके विषयमें युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे पूछना और उत्तरमें श्रीकृष्णके द्वारा महादेवजीकी महिमाका प्रतिपादन
वैशम्पायन उवाच
हतेषु सर्वसैन्येषु सौप्तिके तै रथेस्त्रिभिः ।
शोचन् युधिष्ठिरो राजा दाशार्हमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! रातको सोते समय उन तीन महारथियोंने पाण्डवोंकी सारी सेनाओंका जो संहार कर डाला था, उसके लिये शोक करते हुए राजा युधिष्ठिरने दशार्हनन्दन भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
कथं नु कृष्ण पापेन क्षुद्रेणाकृतकर्मणा ।
द्रौणिना निहताः सर्वे मम पुत्रा महारथाः ॥ २ ॥
‘श्रीकृष्ण! नीच एवं पापात्मा द्रोणकुमारने कोई विशेष तप या पुण्यकर्म भी तो नहीं किया था, जिससे उसमें अलौकिक शक्ति आ जाती। फिर उसने मेरे सभी महारथी पुत्रोंका वध कैसे कर डाला? ॥ २ ॥
तथा कृतास्त्रविक्रान्ताः सहस्रशतयोधिनः ।
द्रुपदस्यात्मजाश्चैव द्रोणपुत्रेण पातिताः ॥ ३ ॥
‘द्रुपदके पुत्र तो अस्त्र-विद्याके पूरे पण्डित, पराक्रमी तथा लाखों योद्धाओंके साथ युद्ध करनेमें समर्थ थे तो भी द्रोणपुत्रने उन्हें मार गिराया, यह कितने आश्चर्यकी बात है? ॥ ३ ॥
यस्य द्रोणो महेष्वासो न प्रादादाहवे मुखम् ।
निजघ्ने रथिनां श्रेष्ठं धृष्टद्युम्नं कथं नु सः ॥ ४ ॥
‘महाधनुर्धर द्रोणाचार्य युद्धमें जिसके सामने मुँह नहीं दिखाते थे, उसी रथियोंमें श्रेष्ठ धृष्टद्युम्नको अश्वत्थामाने कैसे मार डाला? ॥ ४ ॥
किं नु तेन कृतं कर्म तथायुक्तं नरर्षभ ।
यदेकः समरे सर्वानवधीन्नो गुरोः सुतः ॥ ५ ॥
‘नरश्रेष्ठ! आचार्यपुत्रने ऐसा कौन-सा उपयुक्त कर्म किया था, जिससे उसने अकेले ही समरांगणमें हमारे सभी सैनिकोंका वध कर डाला’ ॥ ५ ॥
श्रीभगवानुवाच
नूनं स देवदेवानामीश्वरेश्वरमव्ययम् ।
जगाम शरणं द्रौणिरेकस्तेनावधीद् बहून् ॥ ६ ॥
श्रीभगवान् बोले—राजन्! निश्चय ही अश्वत्थामाने ईश्वरोंके भी ईश्वर देवाधिदेव अविनाशी भगवान् शिवकी शरण ली थी, इसीलिये उसने अकेले ही बहुत-से वीरोंका विनाश कर डाला ॥ ६ ॥
प्रसन्नो हि महादेवो दद्यादमरतामपि ।
वीर्यं च गिरिशो दद्याद् येनेन्द्रमपि शातयेत् ॥ ७ ॥
पर्वतपर शयन करनेवाले महादेवजी तो प्रसन्न होनेपर अमरत्व भी दे सकते हैं। वे उपासकको इतनी शक्ति दे देते हैं, जिससे वह इन्द्रको भी नष्ट कर सकता है ॥ ७ ॥
वेदाहं हि महादेवं तत्त्वेन भरतर्षभ ।
यानि चास्य पुराणानि कर्माणि विविधानि च ॥ ८ ॥
भरतश्रेष्ठ! मैं महादेवजीको यथार्थरूपसे जानता हूँ। उनके जो नाना प्रकारके प्राचीन कर्म हैं, उनसे भी मैं पूर्ण परिचित हूँ ॥ ८ ॥
आदिरेष हि भूतानां मध्यमन्तश्च भारत ।
विचेष्टते जगच्चेदं सर्वमस्यैव कर्मणा ॥ ९ ॥
भरतनन्दन! ये भगवान् शिव सम्पूर्ण भूतोंके आदि, मध्य और अन्त हैं। उन्हींके प्रभावसे यह सारा जगत् भाँति-भाँतिकी चेष्टाएँ करता है ॥ ९ ॥
एवं सिसृक्षुर्भूतानि ददर्श प्रथमं विभुः ।
पितामहोऽब्रवीच्चैनं भूतानि सृज मा चिरम् ॥ १० ॥
प्रभावशाली ब्रह्माजीने प्राणियोंकी सृष्टि करनेकी इच्छासे सबसे पहले महादेवजीको ही देखा था। तब पितामह ब्रह्माने उनसे कहा—'प्रभो! आप अविलम्ब सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि कीजिये' ॥ १० ॥
हरिकेशस्तथेत्युक्त्वा भूतानां दोषदर्शिवान् ।
दीर्घकालं तपस्तेपे मग्नोऽम्भसि महातपाः ॥ ११ ॥
यह सुन महादेवजी 'तथास्तु' कहकर भूतगणोंके नाना प्रकारके दोष देख जलमें मग्न हो गये और महान् तपका आश्रय ले दीर्घकालतक तपस्या करते रहे ॥ ११ ॥
सुमहान्तं ततः कालं प्रतीक्ष्यैनं पितामहः ।
स्रष्टारं सर्वभूतानां ससर्ज मनसा परम् ॥ १२ ॥
इधर पितामह ब्रह्माने सुदीर्घकालतक उनकी प्रतीक्षा करके अपने मानसिक संकल्पसे दूसरे सर्वभूतस्रष्टाको उत्पन्न किया ॥ १२ ॥
सोऽब्रवीत् पितरं दृष्ट्वा गिरिशं सुप्तमम्भसि ।
यदि मे नाग्रजोऽस्त्यन्यस्ततः स्रक्ष्याम्यहं प्रजाः ॥ १३ ॥
उस विराट् पुरुष या स्रष्टाने महादेवजीको जलमें सोया देख अपने पिता ब्रह्माजीसे कहा—'यदि दूसरा कोई मुझसे ज्येष्ठ न हो तो मैं प्रजाकी सृष्टि करूँगा' ॥ १३ ॥
तमब्रवीत् पिता नास्ति त्वदन्यः पुरुषोऽग्रजः ।
स्थाणुरेष जले मग्नो विस्रब्धः कुरु वैकृतम् ॥ १४ ॥
यह सुनकर पिता ब्रह्माने स्रष्टासे कहा—‘तुम्हारे सिवा दूसरा कोई अग्रज पुरुष नहीं है। ये स्थाणु (शिव) हैं भी तो पानीमें डूबे हुए हैं; अतः तुम निश्चिन्त होकर सृष्टिका कार्य आरम्भ करो’ ॥ १४ ॥
भूतान्यन्वसृजत् सप्त दक्षादींस्तु प्रजापतीन् ।
यैरिमं व्यकरोत् सर्वं भूतग्रामं चतुर्विधम् ॥ १५ ॥
तब स्रष्टाने सात प्रकारके प्राणियों और दक्ष आदि प्रजापतियोंको उत्पन्न किया, जिनके द्वारा उन्होंने इस चार प्रकारके समस्त प्राणिसमुदायका विस्तार किया ॥ १५ ॥
ताः सृष्टमात्राः क्षुधिताः प्रजाः सर्वाः प्रजापतिम् ।
बिभक्षयिषवो राजन् सहसा प्राद्रवंस्तदा ॥ १६ ॥
राजन्! सृष्टि होते ही समस्त प्रजा भूखसे पीड़ित हो प्रजापतिको ही खा जानेकी इच्छासे सहसा उनके पास दौड़ी गयी ॥ १६ ॥
स भक्ष्यमाणस्त्राणार्थी पितामहमुपाद्रवत् ।
आभ्यो मां भगवांस्त्रातु वृत्तिरासां विधीयताम् ॥ १७ ॥
जब प्रजा प्रजापतिको अपना आहार बनानेके लिये उद्यत हुई, तब वे आत्मरक्षाके लिये बड़े वेगसे भागकर पितामह ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित हुए और बोले—‘भगवन्! आप मुझे इन प्रजाओंसे बचाइये और इनके लिये कोई जीविका-वृत्ति नियत कर दीजिये’ ॥ १७ ॥
ततस्ताभ्यो ददावन्नमोषधीः स्थावराणि च ।
जङ्गमानि च भूतानि दुर्बलानि बलीयसाम् ॥ १८ ॥
तब ब्रह्माजीने उन प्रजाओंको अन्न और ओषधि आदि स्थावर वस्तुएँ जीवन-निर्वाहके लिये दीं और अत्यन्त बलवान् हिंसक जन्तुओंके लिये दुर्बल जंगम प्राणियोंको ही आहार निश्चित कर दिया ॥ १८ ॥
विहितान्नाः प्रजास्तास्तु जग्मुः सृष्टा यथागतम् ।
ततो ववृधिरे राजन् प्रीतिमत्यः स्वयोनिषु ॥ १९ ॥
जिनकी सृष्टि हुई थी, उनके लिये जब भोजनकी व्यवस्था कर दी गयी, तब वे प्रजावर्गके लोग जैसे आये थे, वैसे लौट गये। राजन्! तदनन्तर सारी प्रजा अपनी ही योनियोंमें प्रसन्नतापूर्वक रहती हुई उत्तरोत्तर बढ़ने लगी ॥ १९ ॥
भूतग्रामे विवृद्धे तु तुष्टे लोकगुरावपि ।
उदतिष्ठज्जलाज्ज्येष्ठः प्रजाश्चेमा ददर्श सः ॥ २० ॥
जब प्राणिसमुदायकी भलीभाँति वृद्धि हो गयी और लोकगुरु ब्रह्मा भी संतुष्ट हो गये, तब वे ज्येष्ठ पुरुष शिव जलसे बाहर निकले। निकलनेपर उन्होंने इन समस्त प्रजाओंको देखा ॥ २० ॥
बहुरूपाः प्रजाः सृष्टा विवृद्धाश्च स्वतेजसा ।
चुक्रोध भगवान् रुद्रो लिङ्गं स्वं चाप्यविध्यत ॥ २१ ॥
अनेक रूपवाली प्रजाकी सृष्टि हो गयी और वह अपने ही तेजसे भलीभाँति बढ़ भी गयी। यह देखकर भगवान् रुद्र कुपित हो उठे और उन्होंने अपना लिंग काटकर फेंक दिया ॥ २१ ॥
तत् प्रविद्धं तथा भूमौ तथैव प्रत्यतिष्ठत ।
तमुवाचाव्ययो ब्रह्मा वचोभिः शमयन्निव ॥ २२ ॥
इस प्रकार भूमिपर डाला गया वह लिंग उसी रूपमें प्रतिष्ठित हो गया। तब अविनाशी ब्रह्माने अपने वचनोंद्वारा उन्हें शान्त करते हुए-से कहा— ॥ २२ ॥
किं कृतं सलिले शर्व चिरकालस्थितेन ते ।
किमर्थं चेदमुत्पाद्य लिङ्गं भूमौ प्रवेशितम् ॥ २३ ॥
‘रुद्रदेव! आपने दीर्घकालतक जलमें स्थित रहकर कौन-सा कार्य किया है? और इस लिंगको उत्पन्न करके किसलिये पृथ्वीपर डाल दिया है?’ ॥ २३ ॥
सोऽब्रवीज्जातसंरम्भस्तथा लोकगुरुर्गुरुम् ।
प्रजाः सृष्टाः परेणेमाः किं करिष्याम्यनेन वै ॥ २४ ॥
यह प्रश्न सुनकर कुपित हुए जगद्गुरु शिवने ब्रह्माजीसे कहा—‘प्रजाकी सृष्टि तो दूसरेने कर डाली; फिर इस लिंगको रखकर मैं क्या करूँगा ॥ २४ ॥
तपसाधिगतं चान्नं प्रजार्थं मे पितामह ।
ओषध्यः परिवर्तरेन् यथैवं सततं प्रजाः ॥ २५ ॥
‘पितामह! मैंने जलमें तपस्या करके प्रजाके लिये अन्न प्राप्त किया है; वे अन्नरूप ओषधियाँ प्रजाओंके ही समान निरन्तर विभिन्न अवस्थाओंमें परिणत होती रहेंगी’ ॥
एवमुक्त्वा स संक्रोधो जगाम विमना भवः ।
गिरेर्मुञ्जवतः पादं तपस्तप्तुं महातपाः ॥ २६ ॥
ऐसा कहकर क्रोधमें भरे हुए महातपस्वी महादेवजी उदास मनसे मुंजवान् पर्वतकी घाटीपर तपस्या करनेके लिये चले गये ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि युधिष्ठिरकृष्णसंवादे
सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें युधिष्ठिर और श्रीकृष्णका संवादविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥