महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 3066)
द्वादशोऽध्यायः
श्रीकृष्णका अश्वत्थामाकी चपलता एवं क्रूरताके प्रसंगमें सुदर्शनचक्र माँगनेकी बात सुनाते हुए उससे भीमसेनकी रक्षाके लिये प्रयत्न करनेका आदेश देना
वैशम्पायन उवाच
तस्मिन् प्रयाते दुर्धर्षे यदूनामृषभस्ततः ।
अब्रवीत् पुण्डरीकाक्षः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! दुर्धर्ष वीर भीमसेनके चले जानेपर यदुकुलतिलक कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरसे कहा— ॥ १ ॥
एष पाण्डव ते भ्राता पुत्रशोकपरायणः ।
जिघांसुर्द्रौणिमाक्रन्दे एक एवाभिधावति ॥ २ ॥
'पाण्डुनन्दन! ये आपके भाई भीमसेन पुत्रशोकमें मग्न होकर युद्धमें द्रोणकुमारके वधकी इच्छासे अकेले ही उसपर धावा कर रहे हैं ॥ २ ॥
भीमः प्रियस्ते सर्वेभ्यो भ्रातृभ्यो भरतर्षभ ।
तं कृच्छ्रगतमद्य त्वं कस्मान्नाभ्युपपद्यसे ॥ ३ ॥
'भरतश्रेष्ठ! भीमसेन आपको समस्त भाइयोंसे अधिक प्रिय हैं; किंतु आज वे संकटमें पड़ गये हैं। फिर आप उनकी सहायताके लिये जाते क्यों नहीं हैं? ॥
यत् तदाचष्ट पुत्राय द्रोणः परपुरञ्जयः ।
अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम दहेत पृथिवीमपि ॥ ४ ॥
'शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाले द्रोणाचार्यने अपने पुत्रको जिस ब्रह्मशिर नामक अस्त्रका उपदेश दिया है, वह समस्त भूमण्डलको भी दग्ध कर सकता है ॥ ४ ॥
तन्महात्मा महाभागः केतुः सर्वधनुष्मताम् ।
प्रत्यपादयदाचार्यः प्रीयमाणो धनंजयम् ॥ ५ ॥
'सम्पूर्ण धनुर्धरोंके सिरमौर महाभाग महात्मा द्रोणाचार्यने प्रसन्न होकर वह अस्त्र पहले अर्जुनको दिया था ॥ ५ ॥
तं पुत्रोऽप्येक एवैनमन्वयाचदमर्षणः ।
ततः प्रोवाच पुत्राय नातिहृष्टमना इव ॥ ६ ॥
'अश्वत्थामा इसे सहन न कर सका। वह उनका एकलौता पुत्र था; अतः उसने भी अपने पितासे उसी अस्त्रके लिये प्रार्थना की। तब आचार्यने अपने पुत्रको उस अस्त्रका उपदेश कर दिया; किंतु इससे उनका मन अधिक प्रसन्न नहीं था ॥ ६ ॥
विदितं चापलं ह्यासीदात्मजस्य दुरात्मनः ।
सर्वधर्मविदाचार्यः सोऽन्वशात् स्वसुतं ततः ॥ ७ ॥
‘उन्हें अपने दुरात्मा पुत्रकी चपलता ज्ञात थी; अतः सब धर्मोंके ज्ञाता आचार्यने अपने पुत्रको इस प्रकार शिक्षा दी— ॥ ७ ॥
परमापद्गतेनापि न स्म तात त्वया रणे ।
इदमस्त्रं प्रयोक्तव्यं मानुषेषु विशेषतः ॥ ८ ॥
“बेटा! बड़ी-से-बड़ी आपत्तिमें पड़नेपर भी तुम्हें रणभूमिमें विशेषतः मनुष्योंपर इस अस्त्रका प्रयोग नहीं करना चाहिये' ॥ ८ ॥
इत्युक्तवान् गुरुः पुत्रं द्रोणः पश्चादथोक्तवान् ।
न त्वं जातु सतां मार्गे स्थातेति पुरुषर्षभ ॥ ९ ॥
‘नरश्रेष्ठ! अपने पुत्रसे ऐसा कहकर गुरु द्रोण पुनः उससे बोले—‘बेटा! मुझे संदेह है कि तुम कभी सत्पुरुषोंके मार्गपर स्थिर नहीं रहोगे' ॥ ९ ॥
स तदाज्ञाय दुष्टात्मा पितुर्वचनमप्रियम् ।
निराशः सर्वकल्याणैः शोकात् पर्यचरन्महीम् ॥ १० ॥
‘पिताके इस अप्रिय वचनको सुन और समझकर दुष्टात्मा द्रोणपुत्र सब प्रकारके कल्याणकी आशा छोड़ बैठा और बड़े शोकसे पृथ्वीपर विचरने लगा ॥ १० ॥
ततस्तदा कुरुश्रेष्ठ वनस्थे त्वयि भारत ।
अवसद् द्वारकामेत्य वृष्णिभिः परमार्चितः ॥ ११ ॥
‘भरतनन्दन! कुरुश्रेष्ठ! तदनन्तर जब तुम वनमें रहते थे, उन्हीं दिनों अश्वत्थामा द्वारकामें आकर रहने लगा। वहाँ वृष्णिवंशियोंने उसका बड़ा सत्कार किया ॥ ११ ॥
स कदाचित् समुद्रान्ते वसन् द्वारवतीमनु ।
एक एकं समागम्य मामुवाच हसन्निव ॥ १२ ॥
‘एक दिन द्वारकामें समुद्रके तटपर रहते समय उसने अकेले ही मुझ अकेलेके पास आकर हँसते हुए-से कहा— ॥ १२ ॥
यत् तदुग्रं तपः कृष्ण चरन् सत्यपराक्रमः ।
अगस्त्याद् भारताचार्यः प्रत्यपद्यत मे पिता ॥ १३ ॥
अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम देवगन्धर्वपूजितम् ।
तदद्य मयि दाशार्ह यथा पितरि मे तथा ॥ १४ ॥
अस्मत्तस्तदुपादाय दिव्यमस्त्रं यदूत्तम ।
ममात्यस्त्रं प्रयच्छ त्वं चक्रं रिपुहणं रणे ॥ १५ ॥
“दशार्हनन्दन! श्रीकृष्ण! भरतवंशके आचार्य मेरे सत्यपराक्रमी पिताने उग्र तपस्या करके महर्षि अगस्त्यसे जो ब्रह्मास्त्र प्राप्त किया था, वह देवताओं और गन्धर्वोंद्वारा सम्मानित अस्त्र इस समय जैसा मेरे पिताके पास है, वैसा ही मेरे पास भी है; अतः यदुश्रेष्ठ!
आप मुझसे वह दिव्य अस्त्र लेकर रणभूमिमें शत्रुओंका नाश करनेवाला अपना चक्र नामक अस्त्र मुझे दे दीजिये' ।। १३—१५ ।।
स राजन् प्रीयमाणेन मयाप्युक्तः कृताञ्जलिः ।
याचमानः प्रयत्नेन मत्तोऽस्त्रं भरतर्षभ ।। १६ ।।
‘भरतश्रेष्ठ! वह हाथ जोड़कर बड़े प्रयत्नके द्वारा मुझसे अस्त्रकी याचना कर रहा था, तब मैंने भी प्रसन्नतापूर्वक ही उससे कहा— ।। १६ ।।
देवदानवगन्धर्वमनुष्यपतगोरगाः ।
न समा मम वीर्यस्य शतांशेनापि पिण्डिताः ।। १७ ।।
“ब्रह्मन्! देवता, दानव, गन्धर्व, मनुष्य, पक्षी और नाग—ये सब मिलकर मेरे पराक्रमके सौवें अंशकी भी समानता नहीं कर सकते ।। १७ ।।
इदं धनुरियं शक्तिरिदं चक्रमियं गदा ।
यद्यदिच्छसि चेदस्त्रं मत्तस्तत् तद् ददामि ते ।। १८ ।।
“यह मेरा धनुष है, यह शक्ति है, यह चक्र है और यह गदा है। तुम जो-जो अस्त्र मुझसे लेना चाहते हो, वही वह तुम्हें दिये देता हूँ ।। १८ ।।
यच्छक्नोषि समुद्यन्तुं प्रयोक्तुमपि वा रणे ।
तद् गृहाण विनास्त्रेण यन्मे दातुमभीप्ससि ।। १९ ।।
“तुम मुझे जो अस्त्र देना चाहते हो, उसे दिये बिना ही रणभूमिमें मेरे जिस आयुधको उठा अथवा चला सको, उसे ही ले लो' ।। १९ ।।
स सुनाभं सहस्रारं वज्रनाभमयस्मयम् ।
वव्रे चक्रं महाभागो मत्तः स्पर्धन्मया सह ।। २० ।।
‘तब उस महाभागने मेरे साथ स्पर्धा रखते हुए मुझसे मेरा वह लोहमय चक्र माँगा, जिसकी सुन्दर नाभिमें वज्र लगा हुआ है तथा जो एक सहस्र अरोंसे सुशोभित होता है! ।। २० ।।
गृहाण चक्रमित्युक्तो मया तु तदनन्तरम् ।
जग्राहोत्पत्य सहसा चक्रं सव्येन पाणिना ।। २१ ।।
‘मैंने भी कह दिया—‘ले लो चक्र,' मेरे इतना कहते ही उसने सहसा उछलकर बायें हाथसे चक्रको पकड़ लिया ।। २१ ।।
न चैनमशकत् स्थानात् संचालयितुमप्युत ।
अथैनं दक्षिणेनापि गृहीतुमुपचक्रमे ।। २२ ।।
‘परंतु वह उसे अपनी जगहसे हिला भी न सका। तब उसने उसे दाहिने हाथसे उठानेका प्रयत्न आरम्भ किया ।। २२ ।।
सर्वयत्नबलेनापि गृह्णन्नेवमिदं ततः ।
ततः सर्वबलेनापि यदैनं न शशाक ह ।। २३ ।।
उद्यन्तुं वा चालयितुं द्रौणिः परमदुर्मनाः ।
कृत्वा यत्नं परिश्रान्तः स न्यवर्तत भारत ॥ २४ ॥
'सारा प्रयत्न और सारी शक्ति लगाकर भी जब उसे पकड़कर उठा अथवा हिला न सका, तब द्रोणकुमार मन-ही-मन बहुत दुःखी हो गया। भारत! यत्न करके थक जानेपर वह उसे लेनेकी चेष्टासे निवृत्त हो गया ।। २३-२४ ।।
निवृत्तमनसं तस्मादभिप्रयाद् विचेतसम् ।
अहमामन्त्र्य संविग्नमश्वत्थामानमब्रुवम् ॥ २५ ॥
'जब उस संकल्पसे उसका मन हट गया और वह दुःखसे अचेत एवं उद्विग्न हो गया, तब मैंने अश्वत्थामाको बुलाकर पूछा— ।। २५ ।।
यः सदैव मनुष्येषु प्रमाणं परमं गतः ।
गाण्डीवधन्वा श्वेताश्वः कपिप्रवरकेतनः ॥ २६ ॥
यः साक्षाद् देवदेवेशं शितिकण्ठमुमापतिम् ।
द्वन्द्वयुद्धे पराजिष्णुस्तोषायामास शङ्करम् ॥ २७ ॥
यस्मात् प्रियतरो नास्ति ममान्यः पुरुषो भुवि ।
नादेयं यस्य मे किञ्चिदपि दाराः सुतास्तथा ॥ २८ ॥
तेनापि सुहृदा ब्रह्मन् पार्थेनाक्लिष्टकर्मणा ।
नोक्तपूर्वमिदं वाक्यं यत् त्वं मामभिभाषसे ॥ २९ ॥
“ब्रह्मन्! जो मनुष्य समाजमें सदा ही परम प्रामाणिक समझे जाते हैं, जिनके पास गाण्डीव धनुष और श्वेत घोड़े हैं, जिनकी ध्वजापर श्रेष्ठ वानर विराजमान होता है, जिन्होंने द्वन्द्वयुद्धमें साक्षात् देवदेवेश्वर नीलकण्ठ उमा-वल्लभ भगवान् शंकरको पराजित करनेका साहस करके उन्हें संतुष्ट किया था, इस भूमण्डलमें मुझे जिनसे बढ़कर परम प्रिय दूसरा कोई मनुष्य नहीं है, जिनके लिये मेरे पास स्त्री, पुत्र आदि कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जो देने योग्य न हो, अनायास ही महान् कर्म करनेवाले मेरे उस प्रिय सुहृद् कुन्तीकुमार अर्जुनने भी पहले कभी ऐसी बात नहीं कही थी, जो आज तुम मुझसे कह रहे हो ।।
ब्रह्मचर्यं महत् घोरं तीर्त्वा द्वादशवार्षिकम् ।
हिमवत्पार्श्वमास्थाय यो मया तपसार्जितः ॥ ३० ॥
समानव्रतचारिण्यां रुक्मिण्यां योऽन्वजायत ।
सनत्कुमारस्तेजस्वी प्रद्युम्नो नाम मे सुतः ॥ ३१ ॥
तेनाप्येतन्महद् दिव्यं चक्रमप्रतिमं रणे ।
न प्रार्थितमभून्मूढ यदिदं प्रार्थितं त्वया ॥ ३२ ॥
“मूढ़ ब्राह्मण! मैंने बारह वर्षोंतक अत्यन्त घोर ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करके हिमालयकी घाटीमें रहकर बड़ी भारी तपस्याके द्वारा जिसे प्राप्त किया था, मेरे समान व्रतका पालन करनेवाली रुक्मिणीदेवीके गर्भसे जिसका जन्म हुआ है, जिसके रूपमें
साक्षात् तेजस्वी सनत्कुमारने ही मेरे यहाँ अवतार लिया है, वह प्रद्युम्न मेरा प्रिय पुत्र है। परंतु रणभूमिमें जिसकी कहीं तुलना नहीं है, मेरे इस परम दिव्य चक्रको कभी उस प्रद्युम्नने भी नहीं माँगा था, जिसकी आज तुमने माँग की है ।।
रामेणातिबलेनैतन्नोक्तपूर्वं कदाचन ।
न गदेन न साम्बेन यदिदं प्रार्थितं त्वया ॥ ३३ ॥
“अत्यन्त बलशाली बलरामजीने भी पहले कभी ऐसी बात नहीं कही है। जिसे तुमने माँगा है, उसे गद और साम्बने भी कभी लेनेकी इच्छा नहीं की ॥ ३३ ॥
द्वारकावासिभिश्चान्यैर्वृष्ण्यन्धकमहारथैः ।
नोक्तपूर्वमिदं जातु यदिदं प्रार्थितं त्वया ॥ ३४ ॥
“द्वारकामें निवास करनेवाले जो अन्य वृष्णि तथा अन्धकवंशके महारथी हैं, उन्होंने भी कभी मेरे सामने ऐसा प्रस्ताव नहीं किया था, जैसा कि तुमने इस चक्रको माँगते हुए किया है ॥ ३४ ॥
भारताचार्यपुत्रस्त्वं मानितः सर्वयादवैः ।
चक्रेण रथिनां श्रेष्ठ कं नु तात युयुत्ससे ॥ ३५ ॥
“तात! रथियोंमें श्रेष्ठ! तुम तो भरतकुलके आचार्यके पुत्र हो। सम्पूर्ण यादवोंने तुम्हारा बड़ा सम्मान किया है। फिर बताओ तो सही, इस चक्रके द्वारा तुम किसके साथ युद्ध करना चाहते हो?' ॥ ३५ ॥
एवमुक्तो मया द्रौणिर्मामिदं प्रत्युवाच ह ।
प्रयुज्य भवते पूजां योत्स्ये कृष्ण त्वया सह ॥ ३६ ॥
प्रार्थितं ते मया चक्रं देवदानवपूजितम् ।
अजेयः स्यामिति विभो सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ३७ ॥
'जब मैंने इस तरह पूछा, तब द्रोणकुमारने मुझे इस प्रकार उत्तर दिया—'श्रीकृष्ण! मैं आपकी पूजा करके फिर आपके ही साथ युद्ध करूँगा। प्रभो! मैं यह सच कहता हूँ कि मैंने इस देव-दानवपूजित चक्रको आपसे इसीलिये माँगा था कि इसे पाकर अजेय हो जाऊँ ।।
त्वत्तोऽहं दुर्लभं काममनवाप्यैव केशव ।
प्रतियास्यामि गोविन्द शिवेनाभिवदस्व माम् ॥ ३८ ॥
“किंतु केशव! अब मैं अपनी इस दुर्लभ कामनाको आपसे प्राप्त किये बिना ही लौट जाऊँगा। गोविन्द! आप मुझसे केवल इतना कह दें कि 'तेरा कल्याण हो' ॥ ३८ ॥
एतत् सुभीमं भीमानावृषभेण त्वया धृतम् ।
चक्रमप्रतिचक्रेण भुवि नान्योऽभिपद्यते ॥ ३९ ॥
“यह चक्र अत्यन्त भयंकर है और आप भी भयानक वीरोंके शिरोमणि हैं। आपके किसी विरोधीके पास ऐसा चक्र नहीं है। आपने ही इसे धारण कर रखा है। इस भूतलपर दूसरा कोई पुरुष इसे नहीं उठा सकता' ॥ ३९ ॥
एतावदुक्त्वा द्रौणिर्मां युग्यानश्वान् धनानि च ।
आदायोपययौ काले रत्नानि विविधानि च ॥ ४० ॥
‘मुझसे इतना ही कहकर द्रोणकुमार अश्वत्थामा रथमें जोतने योग्य घोड़े, धन तथा नाना प्रकारके रत्न लेकर वहाँसे यथासमय लौट गया ।। ४० ।।
स संरम्भी दुरात्मा च चपलः क्रूर एव च ।
वेद चास्त्रं ब्रह्मशिरस्तस्माद् रक्ष्यो वृकोदरः ॥ ४१ ॥
‘वह क्रोधी, दुष्टात्मा, चपल और क्रूर है। साथ ही उसे ब्रह्मास्त्रका भी ज्ञान है; अतः उससे भीमसेनकी रक्षा करनी चाहिये’ ।। ४१ ।।
इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि युधिष्ठिरकृष्णसंवादे द्वादशोऽध्यायः
॥ १२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें युधिष्ठिर और श्रीकृष्णका संवादविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२ ।।