महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 2534)
चतुर्दशोऽध्यायः
अर्जुन और अश्वत्थामाका युद्ध तथा पांचाल वीर सुरथका वध
संजय उवाच
अर्जुनो द्रौणिना विद्धो युद्धे बहुभिरायसैः ।
तस्य चानुचरैः शूरैस्त्रिगर्तानां महारथैः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! दूसरी ओर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा तथा उसके पीछे चलनेवाले त्रिगर्तदेशीय शूरवीर महारथियोंने अर्जुनको लोहेके बने हुए बहुत-से बाणोंद्वारा घायल कर दिया ।। १ ।।
द्रौणिं विव्याध समरे त्रिभिरेव शिलीमुखैः ।
तथेतरान् महेष्वासान् द्वाभ्यां द्वाभ्यां धनंजयः ॥ २ ॥
तब अर्जुनने समरभूमिमें तीन बाणोंसे अश्वत्थामाको और दो-दो बाणोंसे अन्य महाधनुर्धरोंको बींध डाला ।।
भूयश्चैव महाराज शरवर्षैरवाकिरत् ।
शरकण्टकितास्ते तु तावका भरतर्षभ ॥ ३ ॥
न जहुः पार्थमासाद्य ताड्यमानाः शितैः शरैः ।
महाराज! भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् अर्जुनने पुनः उन सबको अपने बाणोंकी वर्षासे आच्छादित कर दिया। अर्जुनके पैने बाणोंकी मार खाकर उन बाणोंसे कण्टकयुक्त होकर भी आपके सैनिक अर्जुनको छोड़ न सके ।। ३ १/२ ।।
अर्जुनं रथवंशेन द्रोणपुत्रपुरोगमाः ॥ ४ ॥
अयोधयन्त समरे परिवार्य महारथाः ।
समरांगणमें द्रोणपुत्रको आगे करके कौरव महारथी अर्जुनको रथसमूहसे घेरकर उनके साथ युद्ध करने लगे ।।
तैस्तु क्षिप्ताः शरा राजन् कार्तस्वरविभूषिताः ॥ ५ ॥
अर्जुनस्य रथोपस्थं पूरयामासुरुज्जसा ।
राजन्! उनके चलाये हुए सुवर्णभूषित बाणोंने अर्जुनके रथकी बैठकको अनायास ही भर दिया ।। ५ १/२ ।।
तथा कृष्णौ महेष्वासौ वृषभौ सर्वधन्विनाम् ॥ ६ ॥
शरैर्वीक्ष्य विनुन्नाङ्गौ प्रहृष्टा युद्धदुर्मदाः ।
सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ तथा महाधनुर्धर श्रीकृष्ण और अर्जुनके सम्पूर्ण अंगोंको बाणोंसे व्यथित हुआ देख रणदुर्मद कौरवयद्धा बड़े प्रसन्न हुए ।। ६ १/२ ।।
कूबरं रथचक्राणि ईषा योक्त्राणि वा विभो ।। ७ ।।
युगं चैवानुकर्षं च शरभूतमभूत्तदा ।
प्रभो! अर्जुनके रथके पहिये, कूबर, ईषादण्ड, लगाम या जोते, जूआ और अनुकर्ष—ये सब-के-सब उस समय बाणमय हो रहे थे ।। ७ १/२ ।।
नैतादृशं दृष्टपूर्वं राजन् नैव च न श्रुतम् ।। ८ ।।
यादृशं तत्र पार्थस्य तावकाः सम्प्रचक्रिरे ।
राजन्! वहाँ आपके योद्धाओंने अर्जुनकी जैसी अवस्था कर दी थी, वैसी पहले कभी न तो देखी गयी और न सुनी ही गयी थी ।। ८ १/२ ।।
स रथः सर्वतो भाति चित्रपुङ्खैः शितैः शरैः ।। ९ ।।
उल्काशतैः सम्प्रदीप्तं विमानमिव भूतले ।
विचित्र पंखवाले पैने बाणोंद्वारा सब ओरसे व्याप्त हुआ अर्जुनका रथ भूतलपर सैकड़ों मसालोंसे प्रकाशित होनेवाले विमानके समान शोभा पाता था ।। ९ १/२ ।।
ततोऽर्जुनो महाराज शरैः संनतपर्वभिः ।। १० ।।
अवाकिरत्तां पृतनां मेघो वृष्ट्येव पर्वतम् ।
महाराज! तदनन्तर अर्जुनने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा आपकी उस सेनाको उसी प्रकार ढक दिया, जैसे मेघ पानीकी वर्षासे पर्वतको आच्छादित कर देता है ।। १० १/२ ।।
ते वध्यमानाः समरे पार्थनामाङ्कितैः शरैः ।। ११ ।।
पार्थभूतममन्यन्त प्रेक्षमाणास्तथाविधम् ।
समरभूमिमें अर्जुनके नामसे अंकित बाणोंकी चोट खाते हुए कौरव-सैनिक उन्हें उसी रूपमें देखते हुए सब कुछ अर्जुनमय ही मानने लगे ।। ११ १/२ ।।
कोपोद्भूतशरज्वालो धनुःशब्दानिलो महान् ।। १२ ।।
सैन्येन्धनं ददाहाशु तावकं पार्थपावकः ।
अर्जुनरूपी महान् अग्निने क्रोधसे प्रज्वलित हुई बाणमयी ज्वालाएँ फैलाकर धनुषकी टंकाररूपी वायुसे प्रेरित हो आपके सैन्यरूपी ईंधनको शीघ्रतापूर्वक जलाना आरम्भ किया ।। १२ १/२ ।।
चक्राणां पततां चापि युगानां च धरातले ।। १३ ।।
तूणीराणां पताकानां ध्वजानां च रथैः सह ।
ईषाणामनुकर्षाणां त्रिवेणूनां च भारत ।। १४ ।।
अक्षाणामथ योक्त्राणां प्रतोदानां च सर्वशः ।
शिरसां पततां चापि कुण्डलोष्णीषधारिणाम् ।। १५ ।।
भुजानां च महाभाग स्कन्धानां च समन्ततः ।
छत्राणां व्यजनैः सार्धं मुकुटानां च राशयः ॥ १६ ॥
समदृश्यन्त पार्थस्य रथमार्गेषु भारत ।
भारत! महाभाग! अर्जुनके रथके मार्गोंमें धरतीपर गिरते हुए रथके पहियों, जूओं, तरकसों, पताकाओं, ध्वजों, रथों, हरसों, अनुकर्षों, त्रिवेणु नामक काष्ठों, धुरों, रस्सियों, चाबुकों, कुण्डल और पगड़ी धारण करनेवाले मस्तकों, भुजाओं, कंधों, छत्रों, व्यजनों और मुकुटोंके ढेर-के-ढेर दिखायी देने लगे ॥ १३—१६ १/२ ॥
ततः क्रुद्धस्य पार्थस्य रथमार्गे विशाम्पते ॥ १७ ॥
अगम्यरूपा पृथिवी मांसशोणितकर्दमा ।
प्रजानाथ! कुपित हुए अर्जुनके रथके मार्गकी भूमिपर मांस और रक्तकी कीच जम जानेके कारण वहाँ चलना-फिरना असम्भव हो गया ॥ १७ १/२ ॥
भीरूणां त्रासजननी शूराणां हर्षवर्धिनी ॥ १८ ॥
बभूव भरतश्रेष्ठ रुद्रस्याक्रीडनं यथा ।
भरतश्रेष्ठ! वह रणभूमि रुद्रदेवके क्रीडास्थल (श्मशान)-की भाँति कायरोंके मनमें भय उत्पन्न करनेवाली और शूरवीरोंका हर्ष बढ़ानेवाली थी ॥ १८ १/२ ॥
हत्वा तु समरे पार्थः सहस्रे द्वे परंतपः ॥ १९ ॥
रथानां सवरूथानां विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ।
शत्रुओंको संताप देनेवाले पार्थ समरांगणमें आवरणसहित दो सहस्र रथोंका संहार करके धूमरहित प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ १९ १/२ ॥
यथा हि भगवानग्निर्जगद् दग्ध्वा चराचरम् ॥ २० ॥
विधूमो दृश्यते राजंस्तथा पार्थो धनंजयः ।
राजन्! जैसे चराचर जगत्को दग्ध करके भगवान् अग्निदेव धूमरहित देखे जाते हैं, उसी प्रकार कुन्तीकुमार अर्जुन भी देदीप्यमान हो रहे थे ॥ २० १/२ ॥
द्रौणिस्तु समरे दृष्ट्वा पाण्डवस्य पराक्रमम् ॥ २१ ॥
रथेनातिपताकेन पाण्डवं प्रत्यवारयत् ।
संग्रामभूमिमें पाण्डुपुत्र अर्जुनका वह पराक्रम देखकर द्रोणकुमार अश्वत्थामाने अत्यन्त ऊँची पताकावाले रथके द्वारा आकर उन्हें रोका ॥ २१ १/२ ॥
तावुभौ पुरुषव्याघ्रौ तावुभौ धन्विनां वरौ ॥ २२ ॥
समीयतुस्तदान्योन्यं परस्परवधैषिणौ ।
वे दोनों ही मनुष्योंमें व्याघ्रके समान पराक्रमी थे और दोनों ही धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ समझे जाते थे। उस समय परस्पर वधकी इच्छासे दोनों ही एक-दूसरेके साथ भिड़ गये ॥ २२ १/२ ॥
तयोरासीन्महाराज बाणवर्षं सुदारुणम् ।। २३ ।।
जीमूतयोर्यथा वृष्टिस्तपान्ते भरतर्षभ ।
महाराज! भरतश्रेष्ठ! जैसे वर्षा-ऋतुमें दो मेघखण्ड पानी बरसा रहे हों, उसी प्रकार उन दोनोंके बाणोंकी वहाँ अत्यन्त भयंकर वर्षा होने लगी ।। २३ १/२ ।।
अन्योन्यस्पर्धिनौ तौ तु शरैः संनतपर्वभिः ।। २४ ।।
ततक्षतुस्तदान्योन्यं शृङ्गाभ्यां वृषभाविव ।
जैसे दो साँड़ परस्पर सींगोंसे प्रहार करते हैं, उसी प्रकार आपसमें लाग-डाँट रखनेवाले वे दोनों वीर झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा एक-दूसरेको क्षत-विक्षत करने लगे ।। २४ १/२ ।।
तयोर्युद्धं महाराज चिरं सममिवाभवत् ।। २५ ।।
शस्त्राणां सङ्गमश्चैव घोरस्तत्राभवत् पुनः ।
महाराज! बहुत देरतक तो उन दोनोंका युद्ध एक-सा चलता रहा। फिर उनमें वहाँ अस्त्र-शस्त्रोंका घोर संघर्ष आरम्भ हो गया ।। २५ १/२ ।।
ततोऽर्जुनं द्वादशभी रुक्मपुङ्खैः सुतेजनैः ।। २६ ।।
वासुदेवं च दशभिर्द्रोणिर्विव्याध भारत ।
भरतनन्दन! तब अश्वत्थामाने अत्यन्त तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले बारह बाणोंसे अर्जुनको और दस सायकोंसे श्रीकृष्णको भी घायल कर दिया ।। २६ १/२ ।।
ततः प्रहर्षाद् बीभत्सुर्व्याक्षिपद् गाण्डिवं धनुः ।। २७ ।।
मानयित्वा मुहूर्तं तु गुरुपुत्रं महाहवे ।
तदनन्तर उस महासमरमें दो घड़ीतक गुरुपुत्रका आदर करके अर्जुनने बड़े हर्ष और उत्साहके साथ गाण्डीव धनुषको खींचना आरम्भ किया ।। २७ १/२ ।।
व्यश्वसूतरथं चक्रे सव्यसाची परंतपः ।। २८ ।।
मृदुपूर्वं ततश्चैनं पुनः पुनरताडयत् ।
शत्रुओंको संताप देनेवाले सव्यसाचीने अश्वत्थामाके घोड़े, सारथि एवं रथको चौपट कर दिया। फिर वे हलके हाथों बाण चलाकर बारंबार उसे घायल करने लगे ।। २८ १/२ ।।
हताश्वे तु रथे तिष्ठन् द्रोणपुत्रस्त्वयस्मयम् ।। २९ ।।
मुसलं पाण्डुपुत्राय चिक्षेप परिघोपमम् ।
जिसके घोड़े मार डाले गये थे, उसी रथपर खड़े हुए द्रोणपुत्रने पाण्डुकुमार अर्जुनपर लोहेका एक मुसल चलाया, जो परिघके समान प्रतीत होता था ।। २९ १/२ ।।
तमापतन्तं सहसा हेमपट्टविभूषितम् ।। ३० ।।
चिच्छेद सप्तधा वीरः पार्थः शत्रुनिबर्हणः ।
शत्रुओंका संहार करनेवाले वीर अर्जुनने सहसा अपनी ओर आते हुए उस सुवर्णपत्रविभूषित मुसलके सात टुकड़े कर डाले ।। ३० १/२ ।।
स च्छिन्नं मुसलं दृष्ट्वा द्रौणिः परमकोपनः ॥ ३१ ॥
आददे परिघं घोरं नगेन्द्रशिखरोपमम् ।
अपने मुसलको कटा हुआ देख अश्वत्थामाको बड़ा क्रोध हुआ और उसने पर्वतशिखरके समान एक भयंकर परिघ हाथमें ले लिया ॥ ३१ १/२ ॥
चिक्षेप चैव पार्थाय द्रौणिर्युद्धविशारदः ॥ ३२ ॥
तमन्तकमिव क्रुद्धं परिघं प्रेक्ष्य पाण्डवः ।
अर्जुनस्त्वरितो जघ्ने पञ्चभिः सायकोत्तमैः ॥ ३३ ॥
युद्धविशारद द्रोणपुत्रने वह परिघ अर्जुनपर दे मारा। क्रोधमें भरे हुए यमराजके समान उस परिघको देखकर पाण्डुपुत्र अर्जुनने तुरंत ही पाँच उत्तम बाणोंद्वारा उसे काट गिराया ॥ ३२-३३ ॥
स च्छिन्नः पतितो भूमौ पार्थबाणैर्महाहवे ।
दारयन् पृथिवीन्द्राणां मनांसीव च भारत ॥ ३४ ॥
भारत! उस महासमरमें पार्थके बाणोंसे कटकर वह परिघ राजाओंके हृदयोंको विदीर्ण करता हुआ-सा पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३४ ॥
ततोऽपरैस्त्रिभिर्भल्लैर्द्रौणिं विव्याध पाण्डवः ।
सोऽतिविद्धो बलवता पार्थेन सुमहात्मना ॥ ३५ ॥
नाकम्पत तदा द्रौणिः पौरुषे स्वे व्यवस्थितः ।
तत्पश्चात् पाण्डुकुमार अर्जुनने दूसरे तीन भल्लोंसे द्रोणपुत्रको घायल कर दिया। महामनस्वी बलवान् वीर अर्जुनके द्वारा अत्यन्त घायल होकर भी अश्वत्थामा अपने पुरुषार्थका आश्रय ले तनिक भी कम्पित नहीं हुआ ॥
सुरथं च ततो राजन् भारद्वाजो महारथम् ॥ ३६ ॥
अवाकिरच्छरवातैः सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ।
राजन्! तब भारद्वाजनन्दन अश्वत्थामाने सम्पूर्ण क्षत्रियोंके देखते-देखते महारथी सुरथको अपने बाणसमूहोंसे आच्छादित कर दिया ॥ ३६ १/२ ॥
ततस्तु सुरथोऽप्याजो पञ्चालानां महारथः ॥ ३७ ॥
रथेन मेघघोषेण द्रौणिमेवाभ्यधावत ।
तब युद्धस्थलमें पांचाल महारथी सुरथने भी मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाले रथके द्वारा अश्वत्थामापर ही धावा किया ॥ ३७ १/२ ॥
विकर्षन् वै धनुः श्रेष्ठं सर्वभारसहं दृढम् ॥ ३८ ॥
ज्वलनाशीविषनिभैः शरैश्चैनमवाकिरत् ।
सब प्रकारके भारोंको सहन करनेमें समर्थ, सुदृढ़ एवं उत्तम धनुषको खींचकर सुरथने अग्नि और विषैले सर्पोंके समान भयंकर बाणोंकी वर्षा करके अश्वत्थामाको ढक दिया ॥ ३८ १/२ ॥
सुरथं तं ततः क्रुद्धमापतन्तं महारथम् ।। ३९ ।।
चुकोप समरे द्रौणिर्दण्डाहत इवोरगः ।
महारथी सुरथको क्रोधपूर्वक आक्रमण करते देख अश्वत्थामा समरमें डंडेकी चोट खाये हुए सर्पके समान अत्यन्त कुपित हो उठा ।। ३९ १/२ ।।
त्रिशिखां भुकुटीं कृत्वा सृक्किणी परिसंलिहन् ।। ४० ।।
उद्वीक्ष्य सुरथं रोषाद् धनुर्ज्यामवमृज्य च ।
मुमोच तीक्ष्णं नाराचं यमदण्डोपमद्युतिम् ।। ४१ ।।
वह भौंहोंको तीन जगहसे टेढ़ी करके अपने गलफरोंको चाटने लगा और सुरथकी ओर रोषपूर्वक देखकर धनुषकी प्रत्यंचाको साफ करके उसने यमदण्डके समान तेजस्वी तीखे नाराचका प्रहार किया ।। ४०-४१ ।।
स तस्य हृदयं भित्त्वा प्रविवेशातिवेगितः ।
शक्राशनिरिवोत्सृष्टो विदार्य धरणीतलम् ।। ४२ ।।
जैसे इन्द्रका छोड़ा हुआ अत्यन्त वेगशाली वज्र पृथ्वी फाड़कर उसके भीतर घुस जाता है, उसी प्रकार वह नाराच वेगपूर्वक सुरथकी छाती छेदकर उसके भीतर समा गया ।। ४२ ।।
ततः स पतितो भूमौ नाराचेन समाहतः ।
वज्रेण च यथा शृङ्गं पर्वतस्येव दीर्यतः ।। ४३ ।।
नाराचसे घायल हुआ सुरथ वज्रसे विदीर्ण हुए पर्वतके शिखरकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ।। ४३ ।।
तस्मिन् विनिहते वीरे द्रोणपुत्रः प्रतापवान् ।
आरुरोह रथं तूर्णं तमेव रथिनां वरः ।। ४४ ।।
उस वीरके मारे जानेपर रथियोंमें श्रेष्ठ प्रतापी द्रोणपुत्र अश्वत्थामा तुरंत ही उसी रथपर आरूढ़ हो गया ।। ४४ ।।
ततः सज्जो महाराज द्रौणिराहवदुर्मदः ।
अर्जुनं योधयामास संशप्तकवृतो रणे ।। ४५ ।।
महाराज! फिर युद्धसज्जासे सुसज्जित हो रणभूमिमें संशप्तकोंसे घिरा हुआ रणदुर्मद द्रोणकुमार अर्जुनके साथ युद्ध करने लगा ।। ४५ ।।
तत्र युद्धं महच्चासीदर्जुनस्य परैः सह ।
मध्यंदिनगते सूर्ये यमराष्ट्रविवर्धनम् ।। ४६ ।।
वहाँ दोपहर होते-होते अर्जुनका शत्रुओंके साथ महाघोर युद्ध होने लगा, जो यमराजके राष्ट्रकी वृद्धि करनेवाला था ।। ४६ ।।
तत्राश्चर्यमपश्याम दृष्ट्वा तेषां पराक्रमम् ।
यदेको युगपद् वीरान् समयोधयदर्जुनः ।। ४७ ।।
उस समय उन कौरवपक्षीय वीरोंका पराक्रम देखकर हमने एक और आश्चर्यकी बात यह देखी कि अर्जुन अकेले ही एक ही समय उन सभी वीरोंके साथ युद्ध कर रहे हैं ।।
विमर्दः सुमहानासीदेकस्य बहुभिः सह ।
शतक्रतुर्यथा पूर्वं महत्या दैत्यसेनया ॥ ४८ ॥
जैसे पूर्वकालमें विशाल दैत्यसेनाके साथ इन्द्रका युद्ध हुआ था, उसी प्रकार एकमात्र अर्जुनका बहुसंख्यक विपक्षियोंके साथ महान् संग्राम होने लगा ।। ४८ ।।
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि संकुलयुद्धे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें संकुलयुद्धविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४ ।।