महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1639)
दशमोऽध्यायः
कर्णको सेनापति बनानेके लिये अश्वत्थामाका प्रस्ताव और सेनापतिके पदपर उसका अभिषेक
संजय उवाच
हते द्रोणे महेष्वासे तस्मिन्नहनि भारत ।
कृते च मोघसंकल्पे द्रोणपुत्रे महारथे ॥ १ ॥
द्रवमाणे महाराज कौरवाणां बलार्णवे ।
व्यूह्य पार्थः स्वकं सैन्यमतिष्ठद् भ्रातृभिर्वृतः ॥ २ ॥
संजयने कहा— भरतनन्दन महाराज! उस दिन जब महाधनुर्धर द्रोणाचार्य मारे गये, महारथी द्रोणपुत्रका संकल्प व्यर्थ हो गया और समुद्रके समान विशाल कौरव-सेना भागने लगी, उस समय कुन्तीकुमार अर्जुन अपनी सेनाका व्यूह बनाकर अपने भाइयोंके साथ रणभूमिमें डटे रहे ॥ १-२ ॥
तमवस्थितमाज्ञाय पुत्रस्ते भरतर्षभ ।
विद्रुतं स्वबलं दृष्ट्वा पौरुषेण न्यवारयत् ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! उन्हें युद्धके लिये डटा हुआ जान आपके पुत्रने अपनी सेनाको भागती देख उसे पराक्रमपूर्वक रोका ॥ ३ ॥
स्वमनीकमवस्थाप्य बाहुवीर्यमुपाश्रितः ।
युद्ध्वा च सुचिरं कालं पाण्डवैः सह भारत ॥ ४ ॥
लब्धलक्ष्यैः परैर्हृष्टैर्व्यायच्छद्भिश्शिरं तदा ।
संध्याकालं समासाद्य प्रत्याहारमकारयत् ॥ ५ ॥
भारत! इस प्रकार अपनी सेनाको स्थापित करके, जिन्हें अपना लक्ष्य प्राप्त हो गया था और इसीलिये जो बड़े हर्षके साथ परिश्रमपूर्वक युद्ध कर रहे थे, उन विपक्षी पाण्डवोंके साथ दुर्योधनने अपने ही बाहुबलके भरोसे दीर्घकालतक युद्ध करके संध्याकाल आनेपर सैनिकोंको शिविरमें लौटनेकी आज्ञा दे दी ॥ ४-५ ॥
कृत्वावहारं सैन्यानां प्रविश्य शिविरं स्वकम् ।
कुरवः सुहितं मन्त्रं मन्त्रयाञ्चक्रिरे मिथः ॥ ६ ॥
सेनाको लौटाकर अपने शिविरमें प्रवेश करनेके पश्चात् समस्त कौरव परस्पर अपने हितके लिये गुप्त मन्त्रणा करने लगे ॥ ६ ॥
पर्यङ्केषु परार्घ्येषु स्पर्ध्यास्तरणवत्सु च ।
वरासनेषूपविष्टाः सुखशय्यास्विवामराः ॥ ७ ॥
उस समय वे सब लोग बहुमूल्य बिछौनोंसे युक्त मूल्यवान् पलंगों तथा श्रेष्ठ सिंहासनोंपर बैठे हुए थे, मानो देवता सुखद शय्याओंपर विराज रहे हों॥ ७॥
ततो दुर्योधनो राजा साम्ना परमवल्गुना ।
तानाभाष्य महेष्वासान् प्राप्तकालमभाषत ॥ ८ ॥
मतं मतिमतां श्रेष्ठाः सर्वे प्रब्रूत मा चिरम् ।
एवं गते तु किं कार्यं किं च कार्यतरं नृपाः ॥ ९ ॥
उस समय राजा दुर्योधनने सान्त्वनापूर्ण परम मधुर वाणीद्वारा उन महाधनुर्धर नरेशोंको सम्बोधित करके यह समयोचित बात कही—'बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ नरेश्वरो! तुम सब लोग शीघ्र बोलो, विलम्ब न करो, इस अवस्थामें हमलोगोंको क्या करना चाहिये और सबसे अधिक आवश्यक कर्तव्य क्या है?' ॥ ८-९ ॥
संजय उवाच
एवमुक्ते नरेन्द्रेण नरसिंहा युयुत्सवः ।
चक्रुर्नानाविधाश्चेष्टाः सिंहासनगतास्तदा ॥ १० ॥
संजय कहते हैं— राजा दुर्योधनके ऐसा कहनेपर वे सिंहासनपर बैठे हुए पुरुषसिंह नरेश युद्धकी इच्छासे नाना प्रकारकी चेष्टाएँ करने लगे ॥ १० ॥
तेषां निशाम्येङ्गितानि युद्धे प्राणाञ्जुहुषताम् ।
समुद्वीक्ष्य मुखं राज्ञो बालार्कसमवर्चसम् ॥ ११ ॥
आचार्यपुत्रो मेधावी वाक्यज्ञो वाक्यमाददे ।
युद्धमें प्राणोंकी आहुति देनेकी इच्छा रखनेवाले उन नरेशोंकी चेष्टाएँ देखकर राजा दुर्योधनके प्रातःकालीन सूर्यके समान तेजस्वी मुखकी ओर दृष्टिपात करके वाक्यविशारद, मेधावी आचार्यपुत्र अश्वत्थामाने यह बात कही— ॥ ११ ½ ॥
रागो योगस्तथा दाक्ष्यं नयश्चेत्यर्थसाधकाः ॥ १२ ॥
उपायाः पण्डितैः प्रोक्तास्ते तु दैवमुपाश्रिताः ।
'विद्वानोंने अभीष्ट अर्थकी सिद्धि करानेवाले चार उपाय बताये हैं—राग (राजाके प्रति सैनिकोंकी भक्ति), योग (साधन-सम्पत्ति), दक्षता (उत्साह, बल एवं कौशल) तथा नीति; परंतु वे सभी दैवके अधीन हैं ॥ १२ ½ ॥
लोकप्रवीरा येऽस्माकं देवकल्पा महारथाः ॥ १३ ॥
नीतिमन्तस्तथा युक्ता दक्षा रक्ताश्च ते हताः ।
न त्वेव कार्यं नैराश्यमस्माभिर्विजयं प्रति ॥ १४ ॥
'हमारे पक्षमें जो देवताओंके समान पराक्रमी, विश्व-विख्यात महारथी वीर, नीतिमान्, साधनसम्पन्न, दक्ष और स्वामीके प्रति अनुरक्त थे, वे सब-के-सब मारे गये, तथापि हमें अपनी विजयके प्रति निराश नहीं होना चाहिये ॥ १३-१४ ॥
सुनीतैरिह सर्वार्थैर्देवमप्यनुलोम्यते ।
ते वयं प्रवरं नृणां सर्वैर्गुणगणैर्युतम् ॥ १५ ॥
कर्णमेवाभिषेक्ष्यामः सैनापत्येन भारत ।
कर्णं सेनापतिं कृत्वा प्रमथिष्यामहे रिपून् ॥ १६ ॥
‘यदि सारे कार्य उत्तम नीतिके अनुसार किये जायँ तो उनके द्वारा दैवको भी अनुकूल किया जा सकता है; अतः भारत! हमलोग सर्वगुणसम्पन्न नरश्रेष्ठ कर्णका ही सेनापतिके पदपर अभिषेक करेंगे और इन्हें सेनापति बनाकर हमलोग शत्रुओंको मथ डालेंगे ॥ १५-१६ ॥
एष ह्यतिबलः शूरः कृतास्त्रो युद्धदुर्मदः ।
वैवस्वत इवासह्यः शक्तो जेतुं रणे रिपून् ॥ १७ ॥
‘ये अत्यन्त बलवान्, शूरवीर, अस्त्रोंके ज्ञाता, रणदुर्मद और सूर्यपुत्र यमराजके समान शत्रुओंके लिये असह्य हैं। इसलिये ये रणभूमिमें हमारे विपक्षियोंपर विजय पा सकते हैं' ॥ १७ ॥
एतदाचार्यतनयाच्छ्रुत्वा राजंस्तवात्मजः ।
आशां बहुमतीं चक्रे कर्णं प्रति स वै तदा ॥ १८ ॥
राजन्! उस समय आचार्यपुत्र अश्वत्थामाके मुखसे यह बात सुनकर आपके पुत्र दुर्योधनने कर्णके प्रति विशेष आशा बाँध ली ॥ १८ ॥
हते भीष्मे च द्रोणे च कर्णो जेष्यति पाण्डवान् ।
तामाशां हृदये कृत्वा समाश्वस्य च भारत ॥ १९ ॥
ततो दुर्योधनः प्रीतः प्रियं श्रुत्वास्य तद् वचः ।
प्रीतिसत्कारसंयुक्तं तथ्यमात्महितं शुभम् ॥ २० ॥
स्वं मनः समवस्थाप्य बाहुवीर्यमुपाश्रितः ।
दुर्योधनो महाराज राधेयमिदमब्रवीत् ॥ २१ ॥
भरतनन्दन! भीष्म और द्रोणाचार्यके मारे जानेपर कर्ण पाण्डवोंको जीत लेगा, इस आशाको हृदयमें रखकर दुर्योधनको बड़ी सान्त्वना मिली। महाराज! वह अश्वत्थामाके उस प्रिय वचनको सुनकर बड़ा प्रसन्न हुआ। तत्पश्चात् अपने बाहुबलका आश्रय ले मनको सुस्थिर करके दुर्योधनने राधापुत्र कर्णसे बड़े प्रेम और सत्कारके साथ अपने लिये हितकर यथार्थ और मंगलकारक वचन इस प्रकार कहा— ॥ १९—२१ ॥
कर्ण जानामि ते वीर्यं सौहृदं परमं मयि ।
तथापि त्वां महाबाहो प्रवक्ष्यामि हितं वचः ॥ २२ ॥
‘कर्ण! मैं तुम्हारे पराक्रमको जानता हूँ और यह भी अनुभव करता हूँ कि मेरे प्रति तुम्हारा स्नेह बहुत अधिक है। महाबाहो! तथापि मैं तुमसे अपने हितकी बात कहना चाहता हूँ ॥ २२ ॥
श्रुत्वा यथेष्टं च कुरु वीर यत् तव रोचते ।
भवान् प्राज्ञतमो नित्यं मम चैव परा गतिः ॥ २३ ॥
‘वीर! मेरी यह बात सुनकर तुम अपनी इच्छाके अनुसार जो तुम्हें अच्छा लगे, वह करो। तुम बहुत बड़े बुद्धिमान् तो हो ही, सदाके लिये मेरे सबसे बड़े सहारे भी हो ॥ २३ ॥
भीष्मद्रोणावतिरथौ हतौ सेनापती मम ।
सेनापतिर्भवानस्तु ताभ्यां द्रविणवत्तरः ॥ २४ ॥
‘मेरे दो सेनापति पितामह भीष्म और आचार्य द्रोण, जो अतिरथी वीर थे, युद्धमें मारे गये। अब तुम मेरे सेनानायक बनो; क्योंकि तुम उन दोनोंसे भी अधिक शक्तिशाली हो ॥ २४ ॥
वृद्धौ च तौ महेष्वासौ सापेक्षौ च धनंजये ।
मानितौ च मया वीरौ राधेय वचनात् तव ॥ २५ ॥
‘वे दोनों महाधनुर्धर होते हुए भी बूढ़े थे और अर्जुनके प्रति उनके मनमें पक्षपात था। राधानन्दन! मैंने तुम्हारे कहनेसे ही उन दोनों वीरोंको सेनापति बनाकर सम्मानित किया था ॥ २५ ॥
पितामहत्वं सम्प्रेक्ष्य पाण्डुपुत्रा महारणे ।
रक्षितास्तात भीष्मेण दिवसानि दशैव तु ॥ २६ ॥
‘तात! भीष्मने पितामहके नातेकी ओर दृष्टिपात करके उस महासमरमें दस दिनोंतक पाण्डवोंकी रक्षा की है ॥ २६ ॥
न्यस्तशस्त्रे च भवति हतो भीष्मः पितामहः ।
शिखण्डिनं पुरस्कृत्य फाल्गुनेन महाहवे ॥ २७ ॥
‘उन दिनों तुमने हथियार रख दिया था; इसलिये महासमरमें अर्जुनने शिखण्डीको आगे करके पितामह भीष्मको मार डाला था ॥ २७ ॥
हते तस्मिन् महेष्वासे शरतल्पगते तथा ।
त्वयोक्ते पुरुषव्याघ्र द्रोणो ह्वासीत् पुरःसरः ॥ २८ ॥
‘पुरुषसिंह! उन महाधनुर्धर भीष्मके घायल होकर बाण-शय्यापर सो जानेके बाद तुम्हारे कहनेसे ही द्रोणाचार्य हमारी सेनाके अगुआ बनाये गये थे ॥ २८ ॥
तेनापि रक्षिताः पार्थाः शिष्यत्वादिति मे मतिः ।
स चापि निहतो वृद्धो धृष्टद्युम्नेन सत्वरम् ॥ २९ ॥
‘मेरा विश्वास है कि उन्होंने भी अपना शिष्य समझकर कुन्तीके पुत्रोंकी रक्षा की है। वे बूढ़े आचार्य भी शीघ्र ही धृष्टद्युम्नके हाथसे मारे गये ॥ २९ ॥
निहताभ्यां प्रधानाभ्यां ताभ्याममितविक्रम ।
त्वत्समं समरे योधं नान्यं पश्यामि चिन्तयन् ॥ ३० ॥
‘अमितपराक्रमी वीर! उन प्रधान सेनापतियोंके मारे जानेके पश्चात् मैं बहुत सोचनेपर भी समरांगणमें तुम्हारे समान दूसरे किसी योद्धाको नहीं देखता ।। ३० ।।
भवानेव तु नः शक्तो विजयाय न संशयः ।
पूर्वं मध्ये च पश्चाच्च तथैव विहितं हितम् ।। ३१ ।।
‘हमलोगोंमेंसे तुम्हीं शत्रुओंपर विजय पानेमें समर्थ हो, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। तुमने पहले, बीचमें और पीछे भी हमारा हित ही किया है ।। ३१ ।।
स भवान् धुर्यवत् संख्ये धुरमुद्वोढुमर्हति ।
अभिषेचय सैनान्ये स्वयमात्मानमात्मना ।। ३२ ।।
‘तुम धुरन्धर पुरुषकी भाँति युद्धस्थलमें सेना-संचालनका भार वहन करनेके योग्य हो; इसलिये स्वयं ही अपने-आपको सेनापतिके पदपर अभिषिक्त कराओ ।। ३२ ।।
देवतानां यथा स्कन्दः सेनानीः प्रभुरव्ययः ।
तथा भवानिमां सेनां धार्तराष्ट्रीं बिभर्तु वै ।। ३३ ।।
‘जैसे अविनाशी भगवान् स्कन्द देवताओंकी सेनाका संचालन करते हैं, उसी प्रकार तुम भी धृतराष्ट्रपुत्रोंकी सेनाको अपनी अध्यक्षतामें ले लो ।। ३३ ।।
जहि शत्रुगणान् सर्वान् महेन्द्रो दानवानिव ।
अवस्थितं रणे दृष्ट्वा पाण्डवास्त्वां महारथाः ।। ३४ ।।
द्रविष्यन्ति च पाञ्चाला विष्णुं दृष्ट्वेव दानवाः ।
तस्मात् त्वं पुरुषव्याघ्र प्रकर्षैतां महाचमूम् ।। ३५ ।।
‘जैसे देवराज इन्द्रने दानवोंका संहार किया था, उसी प्रकार तुम भी समस्त शत्रुओंका वध करो। जैसे दानव भगवान् विष्णुको देखते ही भाग जाते हैं, उसी प्रकार पाण्डव तथा पांचाल महारथी तुम्हें रणभूमिमें सेनापतिके रूपमें उपस्थित देखकर भाग खड़े होंगे; अतः पुरुषसिंह! तुम इस विशाल सेनाका संचालन करो ।। ३४-३५ ।।
भवत्यवस्थिते यत्ते पाण्डवा मन्दचेतसः ।
द्रविष्यन्ति सहामात्याः पाञ्चालाः सृंजयाश्च ह ।। ३६ ।।
‘तुम्हारे सावधानीके साथ खड़े होते ही मूर्ख पाण्डव, पांचाल और सृंजय अपने मन्त्रियोंसहित भाग जायँगे ।। ३६ ।।
यथा ह्यभ्युदितः सूर्यः प्रतपन् स्वेन तेजसा ।
व्यपोहति तमस्तीव्रं तथा शत्रून् प्रतापय ।। ३७ ।।
‘जैसे उदित हुआ सूर्य अपने तेजसे तपकर घोर अन्धकारको नष्ट कर देता है, उसी प्रकार तुम भी शत्रुओंको संतप्त एवं नष्ट करो’ ।। ३७ ।।
संजय उवाच
आशा बलवती राजन् पुत्रस्य तव याभवत् ।
हते भीष्मे च द्रोणे च कर्णो जेष्यति पाण्डवान् ।। ३८ ।।
तामाशां हृदये कृत्वा कर्णमेवं तदाब्रवीत् ।
सूतपुत्र न ते पार्थः स्थित्वाग्रे संयुयुत्सति ।। ३९ ।।
**संजय कहते हैं—**राजन्! आपके पुत्रके मनमें जो यह प्रबल आशा हो गयी थी कि भीष्म और द्रोणके मारे जानेपर कर्ण पाण्डवोंको जीत लेगा, वही आशा मनमें लेकर उस समय उसने कर्णसे इस प्रकार कहा—‘सूतपुत्र! अर्जुन तुम्हारे सामने खड़े होकर कभी युद्ध करना नहीं चाहते हैं’ ।। ३८-३९ ।।
कर्ण उवाच
उक्तमेतन्मया पूर्वं गान्धारे तव संनिधौ ।
जेष्यामि पाण्डवान् सर्वान् सपुत्रान् सजनार्दनान् ।। ४० ।।
**कर्णने कहा—**गान्धारीनन्दन! मैंने तुम्हारे समीप पहले ही यह बात कह दी है कि मैं पाण्डवोंको, उनके पुत्रों और श्रीकृष्णके साथ ही परास्त कर दूँगा ।। ४० ।।
सेनापतिर्भविष्यामि तवाहं नात्र संशयः ।
स्थिरो भव महाराज जितान् विद्धि च पाण्डवान् ।। ४१ ।।
महाराज! तुम धैर्य धारण करो। मैं तुम्हारा सेनापति बनूँगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। अब पाण्डवोंको पराजित हुआ ही समझो ।। ४१ ।।
संजय उवाच
एवमुक्तो महाराज ततो दुर्योधनो नृपः ।
उत्तस्थौ राजभिः सार्धं देवैरिव शतक्रतुः ।। ४२ ।।
**संजय कहते हैं—**महाराज! कर्णके ऐसा कहनेपर राजा दुर्योधन अन्य सामन्त नरेशोंके साथ उसी प्रकार उठकर खड़ा हो गया, जैसे देवताओंके साथ इन्द्र खड़े होते हैं ।। ४२ ।।
सैनापत्येन सत्कर्तुं कर्णं स्कन्दमिवामराः ।
ततोऽभिषिषिचुः कर्णं विधिदृष्टेन कर्मणा ।। ४३ ।।
दुर्योधनमुखा राजन् राजानो विजयैषिणः ।
जैसे देवताओंने स्कन्दको सेनापति बनाकर उनका सत्कार किया था, उसी प्रकार समस्त कौरव कर्णको सेनापति बनाकर उसका सत्कार करनेके लिये उद्यत हुए। राजन्! विजयाभिलाषी दुर्योधन आदि राजाओंने शास्त्रोक्त विधिके द्वारा कर्णका अभिषेक किया ।। ४३ १/२ ।।
शातकुम्भमयैः कुम्भैर्माद्तिकैश्चाभिमन्त्रितैः ॥ ४४ ॥
तोयपूर्णविषाणैश्च द्विपखड्गमहर्षभैः ।
मणिमुक्तायुतैश्चान्यैः पुण्यगन्धैस्तथौषधैः ॥ ४५ ॥
औदुम्बरे सुखासीनमासने क्षौमसंवृते ।
शास्त्रदृष्टेन विधिना सम्भारैश्च सुसम्भृतैः ॥ ४६ ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्यास्तथा शूद्राश्च सम्मताः ।
तुष्टुवुस्तं महात्मानमभिषिक्तं वरासने ॥ ४७ ॥
अभिषेकके लिये सोने तथा मिट्टीके घड़ोंमें अभिमन्त्रित जल रखे गये थे। हाथीके दाँत तथा गैंडे और बैलके सींगोंके बने हुए पात्रोंमें भी पृथक्-पृथक् जल रखा गया था। उन पात्रोंमें मणि और मोती भी थे। अन्यान्य पवित्र गन्धशाली पदार्थ और औषध भी डाले गये थे। कर्ण गूलरकाठकी बनी हुई चौकीपर, जिसके ऊपर रेशमी कपड़ा बिछा हुआ था, सुखपूर्वक बैठा था। उस अवस्थामें शास्त्रीय विधिके अनुसार पूर्वोक्त सुसंचित सामग्रियोंद्वारा ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा सम्मानित शूद्रोंने उसका अभिषेक किया और अभिषेक हो जानेपर श्रेष्ठ आसनपर बैठे हुए महामना कर्णकी उन सब लोगोंने स्तुति की ।। ४४—४७ ।।
ततोऽभिषिक्ते राजेन्द्र निष्कैर्गोभिर्धनेन च ।
वाचयामास विप्राग्र्यान् राधेयः परवीरहा ॥ ४८ ॥
राजेन्द्र! इस प्रकार अभिषेक-कार्य सम्पन्न हो जानेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले राधापुत्र कर्णने स्वर्णमुद्राएँ, गौएँ तथा धन देकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया ।।
(स व्यरोचत राधेयः सूतमागधवन्दिभिः ।
स्तूयमानो यथा भानुरुदये ब्रह्मवादिभिः ।।
उस समय सूत, मागध और वन्दीजनोंद्वारा की हुई अपनी स्तुति सुनता हुआ राधापुत्र कर्ण वेदवादी ब्राह्मणोंद्वारा अभिमन्त्रित उदयकालीन सूर्यके समान सुशोभित हो रहा था।
ततः पुण्याहघोषेण वादित्रनिनदेन च।
जयशब्देन शूराणां तुमुलः सर्वतोऽभवत् ॥
जयेत्यूचुर्नृपाः सर्वे राधेयं तत्र संगताः ॥)
तत्पश्चात् पुण्याहवाचनके शब्दसे, वाद्योंकी गंभीर ध्वनिसे तथा शूरवीरोंके जय-जयकारसे मिली-जुली हुई भयंकर आवाज वहाँ सब ओर गूँज उठी। उस स्थानपर एकत्र हुए सभी राजाओंने 'राधापुत्र कर्णकी जय' के नारे लगाये।
जय पार्थान् सगोविन्दान् सानुगांस्तान् महामृधे ।
इति तं वन्दिनः प्राहुर्द्विजाश्च पुरुषर्षभम् ॥ ४९ ॥
जहि पार्थान् सपाञ्चालान् राधेय विजयाय नः ।
उद्यन्निव सदा भानुस्तमांम्युग्रैर्गभस्तिभिः ॥ ५० ॥
वन्दीजनों तथा ब्राह्मणोंने उस समय पुरुषशिरोमणि कर्णको आशीर्वाद देते हुए कहा—'राधापुत्र! तुम कुन्तीके पुत्रोंको, उनके सेवकों तथा श्रीकृष्णके साथ महासमरमें जीत लो और हमारी विजयके लिये कुन्तीकुमारोंको पांचालोंसहित मार डालो। ठीक उसी तरह, जैसे सूर्य अपनी उग्र किरणोंद्वारा सदा उदय होते ही अन्धकारका विनाश कर देता है ॥ ४९-५० ॥
न ह्यलं त्वद्विसृष्टानां शराणां वै सकेशवाः ।
उलूकाः सूर्यरश्मीनां ज्वलतामिव दर्शने ॥ ५१ ॥
'जैसे उल्लू सूर्यकी प्रज्वलित किरणोंकी ओर देखनेमें असमर्थ होते हैं, उसी प्रकार तुम्हारे छोड़े हुए बाणोंकी ओर श्रीकृष्णसहित समस्त पाण्डव नहीं देख सकते ॥ ५१ ॥
न हि पार्थाः सपाञ्चालाः स्थातुं शक्तास्तवाग्रतः ।
आत्तशस्त्रस्य समरे महेन्द्रस्येव दानवाः ॥ ५२ ॥
'जैसे हाथमें वज्र लिये हुए इन्द्रके सामने दानव नहीं खड़े हो सकते, उसी प्रकार समरांगणमें तुम्हारे सामने पांचाल और पाण्डव नहीं ठहर सकते हैं' ॥ ५२ ॥
अभषिक्तस्तु राधेयः प्रभया सोऽमितप्रभः ।
अत्यरिच्यत रूपेण दिवाकर इवापरः ॥ ५३ ॥
राजन्! इस प्रकार अभिषेक सम्पन्न हो जानेपर अमिततेजस्वी राधापुत्र कर्ण अपनी प्रभा तथा रूपसे दूसरे सूर्यके समान अधिक प्रकाशित होने लगा ॥ ५३ ॥
सैनापत्ये तु राधेयमभिषिच्य सुतस्तव ।
अमन्यत तदाऽऽत्मानं कृतार्थं कालचोदितः ॥ ५४ ॥
कालसे प्रेरित हुआ आपका पुत्र दुर्योधन राधाकुमार कर्णको सेनापतिके पदपर अभिषिक्त करके अपने-आपको कृतकृत्य मानने लगा ॥ ५४ ॥
कर्णोऽपि राजन् सम्प्राप्य सैनापत्यमरिंदमः ।
योगमाज्ञापयामास सूर्यस्योदयनं प्रति ॥ ५५ ॥
राजन्! शत्रुदमन कर्णने भी सेनापतिका पद प्राप्त करके सूर्योदयके समय सेनाको युद्धके लिये तैयार होनेकी आज्ञा दे दी ॥ ५५ ॥
तव पुत्रैर्वृतः कर्णः शुशुभे तत्र भारत ।
देवैरिव यथा स्कन्दः संग्रामे तारकामये ॥ ५६ ॥
भारत! वहाँ आपके पुत्रोंसे घिरा हुआ कर्ण तारकामय संग्राममें देवताओंसे घिरे हुए स्कन्दके समान सुशोभित हो रहा था ॥ ५६ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णाभिषेके दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्णका अभिषेकविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ५८ १/२ श्लोक हैं।)