कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
साखी । (६०५)
तीरथ गये सो तीन जन, चितचंचल मन चौर ॥
एकौ पाप न काटिया, लादे दशमन और ॥२१०॥
इनके अर्थ स्पष्टई हैं ॥ २०८ । २०९ । २१० ॥
तीरथ गये ते वहि मुये, जूड़े पानी न्हाय ॥
कह कबीर संतौ सुनौ, राक्षस है पछिताय ॥ २११ ॥
तीर्थ में जे जायं हैं ते तीर्थके जूड़े पानी में नहायकै बहि मुये कहे खराबह्वै
मुये काहे ते कि जौन तीर्थजाबे नहाबेकी विधि है सो एकौ न किये काहूकों
धक्का मार्यो काहूपै कोप कियो सो कबीरजी कहै हैं कि हे सन्तौ सुनौ ते
नर राँक्षक होइकै पछिताय हैं कि हम सों न बनी ॥ २११ ॥
तीरथ भै बिष बेलरी, रही युगन युग छाय ॥
कबिर न मूल निकन्दिया, कौन हलाहल खाय ॥२१२॥
तीरथ कहे तीन हैं रथ जाके सतरजतम ऐसी जो त्रिगुणात्मिका माया सो
विष बेलरीभै चारिउयुगमें छाय रही है कबिरन मूलनिकन्दिया कहे मूल जों
रामनाम है ताको कबीरा जे जीव हैं ते निकन्दिया कहे न ग्रहण करते भयें
जो कोई कहबौकियो ताहूको खण्डि डारत भये सो या नाना कुमति रूप
हलाहल खाय जीव क्यों न नरकै जाय जाबेही चाहै ॥ २१२ ॥
हे गुणवन्ती बेलरी, तव गुण वरणि न जाय ॥
जर काटेते हरि अरी, सींचेते कुंभिलाय ॥२१३॥
हे गुणवंती बेलरी माया बाणी तेरो गुण बरणि नहीं जाय है कहांलौं वर्णन
करें जब तेरी जर काटन चलैं हैं तीर्थ करिकै अहंब्रह्मास्मि कैकै तौ अधिक
हरिअरी होय है महीं ब्रह्महौं या अभिमान बढ़्यो अधिक हरि अरी भई
तामें प्रमाण ॥ “ कुशलाब्रह्मवार्तायां वृत्तिहीनाः सुरागिणः ॥ तेपि यान्तित-
मौनूंनं पुनरायान्तियान्ति च ” ॥ २१३ ॥
( ६०६ ) बीजक कबीरदास ।
बेलि कुठंगी फलबुरो, फुलवा कुबुधि वसाय ॥
मूल विनाशी तूमरी, सरोपात करुआय ॥२१४॥
यह मायारूपी जो बेलि है सो कुठंगी है काहेते कि याको दुःख रूपी फल
बुरो है औ कुबुधि जो है सोई फूलहैं वाकी नाना वासना जें हैं सोई बास बसायहै
सो यह मूल विनाशीहै अर्थात् मिथ्याहै याको मूल नहीं है आपहीते उत्पत्ति
भई है औ जेते भर मायिक पदार्थ हैं ते पातहैं तिनमें सबमें करुआई है अर्थात्
साँचे सुख नहीं हैं ॥ २१४ ॥
पानीते अति पातला, धूवाँते अति झीन ॥
पवनहुँते अति उतला, दोस्त कबीरा कीन ॥२१५॥
पानिहुँते पातर धूमाँ ते झीन औ पवनौते चंचल ऐसो जो क्षुद्रमन ताको
कबीराजे जीव ते दोस्त किये हैं सो चौरासी लक्षयोनिमें डारदियो ॥२१५॥
सतगुरुबचनसुनौहोसन्तौ, मतिलीजैशिरभार ॥
होहजूर ठाढ़ारकहौं, अबतें समर संभार ॥ २१६ ॥
साहब कहैं हैं सतगुरु जो कबीर तिनको वचन सुनिकै हे संतौ आपनेमें
मनको भारामति लेहु तुमसों समर ह्वै रह्यो है सो मनको जीति लेहु मैं हजूरमें
ठाढ़कहौं हौं अर्थात् दूरि नहींहौं जो तुम मनको जीतौ तौ मैं अपनायलेहुं २१६
ये करुआई बेलरी, औ करुवा फलतोर ॥
सिंधुनाम जब पाइये, बेलबिछोहा होर ॥ २१७ ॥
हे कल्पणारूप बेलि! तेरा फल बहुतकडुवाहै जो कल्पना करै है सो नरकही को
जायहै सो तब सिंधुनाम पावैगो जौने जगतमुख अर्थवेद शास्त्रमाया ब्रह्मजीव
सब जगत्भरोहै तौनेको जब पावैगो तब साहबमुख अर्थ जानिकै साहब रत्नको
पावैगो तब कल्पना बेलि को बिछोह ह्वै जायगो ॥ २१७ ॥
परदे पानी ढारिया, संतौ करहु विचार ॥
शरमी शरमा पचि मुआ, काल घसीटन हार॥२१८॥
गुरुमुख ॥ परदेते पानी ढरियाकहे गुरुवालोग नये मंत्र बनायकै परदे
परदे उपदेशकियो औ सिखापनदियो कि काहूसों कहियो नहीं सब वेदशास्त्र
झूठे हैं जीवात्मै सत्य है ताही मानो या समुझायदियो सो वही धरे धरे जीव नर
कको गये जो साँचो राम नामहै ताको न जान्यो वही गुरुवनको बताओ मंत्र
ताहीके भरोसे सब पूजापाठ धर्मकर्म सब छांडिदियो कहैहै हमनिष्कर्म हैं और
यहबात नहीं जानैं है कि भगवान् पूजादिक ये कर्मनमें नहीं हैं तामें प्रमाण
श्रीकबीरजीको॥ “और कर्म सब कर्म हैं भक्ति कर्म निष्कर्म। कहैं कबीर पुकारिकै
भक्तिकरौ तजि भर्म”॥ सो देखो तो भाजीके लियेतौ बाजारमें मूड़फोरै हैं भगवा-
नकीभक्ति कारिबेको कहैहैं हम निष्कर्म हैं पिसानकै चौकडारि मालपुवा धरिकै
चौकाकरैं हैं आरतीकरैं हैं औ भगवान्की आरती करिबेको कहै हैं हमहीं मालिक
हैं हमारी आरती सब जने करतेजाउ सो हे सन्तो! विचारते तौ जाउ यह अपने
शरमा शरमीमें पचिमुवाहै या कहैहै कि हम गुरुवन को उपदेश न छांड़ेंगे या नहीं
जानै हैं कि या शरम में हमको औ हमारे गुरुवौ को यम घसीटिडारेंगे नरकमें
डारि देयहैं तब मालिक है कै न बचौगे तब कौन रक्षा करैगो साहबको तो जनबै
न कियो । जिन साहबको जान्यो है हनुमान् अंगद कबीरतैं अबलौं बने है तेहि
ते साहबको भजन करो जेहिते कालते बचिजाउ नहीं तो शरमा शरमीमें नर-
कमें पचिमरौगे । औ तुम भगवान्को नहीं मानौहौ भगवान्के पाछे नहीं चलौ
हौ सो ब्रह्म राक्षस होइगो तामें प्रमाण ॥ “नानुव्रजति यो मोहाद्व्रजन्तं जगदी-
श्वरम् । ज्ञानाग्निदग्धकर्मापि स भवेद् ब्रह्मराक्षसः” ॥ इति पुरुषोत्तम माहा-
त्म्ये॥औ सब झूठा है साहबको भजन साँचा है तामें प्रमाणकबीरजीको॥
“ कञ्चन केवल हरि भजन, दूजी कथा कथीर ।
झूठा आल जंजाल तजि, पकरो साँच कबीर ॥ १ ॥
जो रक्षक है जीवको, नाहिं करो पहिंचान ।
रक्षकके चीन्हे बिना, अंत होइगी हान” ॥ २ ॥
तेहिते तुम साहबको भजनकरो जाते साहब के लोकैजाउ जहां कालकी
गम्यनहीं है तांमें प्रमाण ॥
( ६०८ ) बीजक कबीरदास ।
" जहां कालकी गमि नहीं, मुआन सुनिये कोई ।
जो कोइ गमि ताको करै, अजर अमर सो होइ " ॥ १ ॥
साहबते बिमुख करनवाले गुरुवालोग यम दूतहैं तामेंप्रमाण ॥"॥ नानारू-
पधरा दूता जीवानांज्ञानहारकाः ॥ कालाज्ञांसमनुप्राप्य विचरन्तिमहीतले "॥२॥
औ कबीरजी चौकामेंरघुनाथजीकी पूजा षोड़शही प्रकारकी लिख्यो है तामें
प्रमाण ॥
चौकाविधानका शब्द ।
अगर चंदन घसि चौक पुरावा सत सुकृत मन भावा ॥
भर झारी चरणामृत कीन्हा हंसनको बरतावा ।
पूरन मौज और रखवारा सतगुरु शब्द लखावा ॥
लौंग लायची नारियल आरति धोती कलश लसावा ।
श्वेत सिंहासन अगम अपारा सो अति बर ठहराया ॥
छांड़े लोक अमृतकी काया जगमें जोलह कहाया ।
चौरासीकी बंदि छोड़ाया निर अक्षर बतलाया ॥
साधु सबै मिलि आरति गावैं सुकृत भोग लगाया ।
कहै कबीर शब्द टकसारा यमसों जीव छुड़ाया ॥ १ ॥
पूरण मासी आदि जों मङ्गल गाइये ।
सतगुरुके पद परशि परम पद पाइये ।
प्रथमै मँदिर झराय कै चँदन लिपाइये ॥
नूतन बस्त्र अनेक चँदोवा तनाइये ।
तब पूरण गुरु के हेतु तौ आसन बिछाइये ॥
गुरुके चरण परछालि तहाँ बैठाइये ।
गज मोतिनकी चौक सु तहां पुराइये ॥
तापर नारियल धोती मिष्ठान्न धराइये ।
केला और कपूर तौ बहु बिधि ल्याइये ॥
अष्ट सुगंध सुपारी लो पान मँगाइये ।
पलौ सहित सो कलश सँवारिकै ज्योति बराइये ॥
साखी । (६०९)
ताल मृदङ्ग बजाइकै मङ्गल गाइये ।
साधु सङ्ग लै आरति तबहिं उतारिये ॥
आरति करि पुनि नारियल तबहिं मोराइये ।
पुरुषको भोग लगाइ सखा मिलि खाइये ॥
युग युग क्षुधा बुझाइ तौ पाइ अघाइयें ।
परम अनंदित होइ तौ गुरुहि मनाइये ॥
कहै कबीर सत भाय सो लोक सिधाइये ।
इहां पूजा के मंत्र नहीं लिख्यो सो पुरुष सूक्तनके मंत्र हैं ताते नहीं लिख्यो है॥
“दशौ दिशा कर मेटौ धोखा। सो कड़हार बैठही चोखा।
दशौ दिशा कर लेखा जानै। सो कड़हार आरती ठानै॥
दशइंद्रीकै पारिख पावै। सो कड़हार आरती गावै।
जो नहिं जानै एतिक साजै। चौका युक्ति करै क्यहि काजै॥
हिंस कारण करहिं गुरुआई। बिगरै ज्ञान जो पंथ पराई।
पद साखी अरु ग्रंथ दृढ़ावै। बिन परखन उत्तम घर पावै॥
शब्द साखीसिखिपारस करहीं। होय भूत पुनि नरकहि परहीं।
विना भेद कड़हार कहावै। आगिल जन्म श्वानको पावै॥
पद साखी नहिं करहि बिचारा। भूंकि रजस मरै सियारा।
पद साखी है भेद हमारा। जो बूझै सो उतरहि पारा॥
जबलग पूरा गुरू न पावै। तब लग भवजल फिरिफिरि आवै।
पूरा गुरु जो होय लखावै। शब्द निरखि परगट दिखलावै॥
एक बार जिय परचौ पावै। भव जल तरै बार नहिं लावै।
साखी-शब्द भेद जो जानहीं, सो पूरा कड़हार ॥
कह कबीर धूमक्ष है, सोहं शब्दहि पार ॥ २१८ ॥
आस्ति कहो तो कोइ न पतीजै, बिना आंस्ति को सिद्ध॥
कहै कबीर सुनो हो सन्तो, हीरै हीरा विद्ध ॥ २१९ ॥
३९
( ६१० ) बीजक कबीरदास ।
कबीरजी कहै हैं कि आस्तिकमत जो मैं सबको बताऊं हौं तो कोई नहीं पति
आयहैं काहेते कि गुरुवा लोगनकी बाणी मानि उनको सिद्धजानै हैं या नहीं
जानै हैं कि ये आस्तिकनहीं हैं साहब को नहीं जानै हैं इनते संसार न छूटैगौ
साहबके जाननवारे जे सांचे साधु हैं तिन्हीं ते संसार छूटै है काहेते हीरा ही
रैते बेधि जाय है ॥ २१९ ॥
सोना सज्जन साधु जन, टूटि जुरै सौ बार ॥
दुर्ज्जन कुम्भ कुम्हारके, एकै धका दरार ॥ २२० ॥
सज्जन साधुजन जे हैं ते सोना है जो सैकरनवार टूटै फिरि फिरि जुरिजायहै
औ दुर्जन जे हैं कुम्हारके कुम्भ कहे घड़ा जो फूटा तो फिरि नहीं जुरै है अर्थात्
जो साधुजन कहूं मांगमें भूलिहू जायँ परंतु फिरि समझाये वाहीमें लगिजायहैं
खोटी राह छांड़ि देइ हैं औ दुर्जन जे हैं ते घड़ासे फूटिजायहैं अर्थात् जौने
कुसंगमें परे तौनेहीके भये फिरि नहीं बूझै हैं ॥ २२० ॥
काजर केरी कोठरी, बूडन्ता संसार ॥
बलिहारी तेहि पुरुषकी, पैठिकै निकसन हार ॥२२१॥
यह काजरकै कोठरी मायाहै तौने में यह संसार बूड़िगयो सो वह जीवकी
बलिहारी है जो मायामें आय निकसि जाय ॥ २२१ ॥
काजरही की कोठरी, काजरहीका कोट ॥
तौभी कारा ना भया, रहाजो ओटहि ओट ॥ २२२ ॥
गुरुमुख ।
साहबकहै हैं कि यह माया काया काजरकी कोठरी है याके काजरहीके कोट
बने हैं नाना आशा नानामत माने हैं सो यद्यपि ऐसेहू रह्यो परंतु मोको रक्षक
माने रह्यो मेरी भक्तिकी ओट ही ओट बचि गयो अर्थात् मायाते बचिगयों२२२
अर्बखर्ब लौं दर्व है, उदय अस्तलौं राज ॥
भक्ति महातम ना तुलै, ये सब कौने काज ॥ २२३ ॥
साखी । ( ६११ )
अर्बखर्बलौं द्रव्यभई अथवा अर्बखर्बलौं विद्याको पढजाता भयों साखी शब्द
चौपाई दोहा कंठ भये सब शास्त्र कंठभये औ उदय अस्तलौं राज्यभयो बड़ों
बादशाह भयो सबको अपने बश कैलियों अथवा महंत भयो पंडित भयों
सबको उदय अस्तलौं चेला करिलियो औ शास्त्रार्थ करिकै जीतिलियो औ मन
न जीत्यो तौ कहा कियो भक्तिके माहात्म्यको नहीं तुलैहै ॥ २२३ ॥
मच्छ बिकाने सब चले, ढीमरके दरबार ॥
रतनारी अँखियांतरी, तूं क्यों पहिराजार ॥ २२४ ॥
मनमें लगिकै सबजीव मच्छमायाको अनुभव ब्रह्म है ताहीके हाथ जीव
बिकाय गये औ ढीमरके दरबार सब चले जायहैं अर्थात् काल मनरूपी जालमें
सबको फँदायलेइहै ताहीके दरबार सब चलेजायाँहैं अर्थात् मायाके मारिबेकों
सब उपायकरै हैं कि माया को नाशकैकै ब्रह्महैजायँ मनरूपी जालमें फन्दे
मछरी जो मायाको अनुभव ब्रह्म ताही के साथ बिकाय गये अर्थात् वही में
लीनभये ताहूपै कालते न बचे सो साहब कहै हैं कि तैतो मेराहै तेरे ज्ञान
नयन रतनार रहेहैं कहे मोमें तेरो अनुराग रह्यो है तैं काहे मनरूपी जालमें
परिकै कालके दरबार चलो जायहै जामें मेरो अनुरागहै वे आपनो ज्ञान नयन
खोलु मेरी निर्गुण भक्ति छागुणवारी है सो करु मेरे पास आइकै मन मायाँ
कालते बची जायगो ॥ २२४ ॥
पानी भीतर घरकिया, शय्या किया पतार ॥
पांसापराकरमको, तबमैं पहिरा जार ॥ २२५ ॥
जीवमुख ।
जीवकहै हैं कि मैं वाणीरूप पानीमें घरकियाहै गुरुवालोगँ वाणीको उपदेश
करिकै वही वाणीरूप पानीमें डारि दिये औ संसाररूपी जोपतारहै बन तामें
शय्याकिया तब कर्मको पांसापर्यो तामें मनरूपी जाल मैं पहिरयो अर्थात्
मनरूपजाल में फँदिगयो ॥ २२५ ॥
( ६१२ ) बीजक कबीरदास ।
मच्छ होय ना वाचिहो, ढीमरतेरे काल ॥
जेहि जेहि डावर तुम फिरौ, तहँ तहँ मेलै जाल२२६॥
हे जीव ! जो तुम मच्छ जोहै मायाको अनुभव ब्रह्म सोई ह्वैकै जो बाचा-
चाहौ तौ न बाचौगे तेरो फँदावनवारो ढीमर जो है मन सोई कालहै सो तुमको
फँदायकै कालके घर पहुँचाय देइगो अर्थात् जो ज्ञानकरि ब्रह्महू द्वैजाउगे तबहूं
माया धरिही लै आवैगी अथवा समाधि करिकै प्राणको ब्रह्मांड में पठायकै
ज्योति में लीनौ होउगे तबहूं माया धरि लै आवैगी तेहिते जौने जौने मत
जे डावर तामें फिरौगे कहे मतमें लागौगे तहाँतहाँ या मनरूपी ढीमर जाल
फेंकिकै तुमको धरिही लै आवैगो तेहिते मन वचनके परे जो भक्तियोग तौनेको
जानौ तब वह कालते बचौगे सो भक्तिके गुण पाछे कहिआये हैं औ भक्तियोग
मन बचनके परै है तामें प्रमाण कबीरजीके शब्दावली ग्रन्थको ॥
शब्द ।
अबधू ऐसा योग बिचारा । जो अक्षरहू सों है न्यारा ॥
जौन पवन तुम गङ्ग चढ़ावो करौ गुफामें बासा ।
सोतो पवन गगन जब बिनशै तब कह योग तमाशा ॥
जबहीं विनशै इंगलापिंगला बिनशै सुषुमन नारी ।
जो उनमुनि सो नाड़ी लागी सो कह रहै तुम्हारी ॥
मेरु दण्डमें डारि दुलैचा योगी आसन लाया ।
मेरु दण्डकी खाक उड़ैगी कञ्चे योग कमाया ॥
सोतो ज्योतिगगनमें दरशै पानीमें ज्यों तारा ।
बिनशो नीरनसों जब तारा निसरौगे केहि द्वारा ॥
द्वैतलाग बैराग कठिन है अटके मुनि जन योगी ।
अक्षरलों सब खबरि बतावै जहँलौं मुक्ति वियोगी ॥
सोपद कह्यो कहे सो न्यारा सत्य असत्य निबेरा ।
कहै कबीरताहि लखुयोगी बहुरि न करियेफेरा ॥ २२६ ॥
साखी । ( ६१३ )
बिन रसरी गरसब बँध्यो, तामें बँधा अलेख ॥
दीन्हो दर्पण हाथमें, चशमविना क्यादेख॥२२७॥
गुरुमुख ।
बिनरसरी सबकेंगर बाँधिलियो ऐसो जो है धोखाब्रह्म तामें अलेख जे जीव
हैं ते बँधे हैं साहब कहैं हैं तिनके हाथमें दर्पणदियो रामनाम बताइ दियो सो
चशम तो हैं नहीं कहे रामनामको ज्ञानतो है नहीं; आपनोरूप कैसे देखें किमैं
साहबको अंशहौं मकार स्वरूपहौं जब आपनोरूप न जान्यो तब मोकों
कहां जानै ॥ २२७ ॥
समुझाये समझै नहीं, परहथ आप विकाय ॥
मैंखैंचतहौं आपको, चला सो यमपुर जाय ॥ २२८ ॥
साहब कहैं हैं कि मैं बहुत समझाऊंहौं कि तैं मेरो है मेरे पास आउ आनकें
हाथ कहां बिकान जायहै नानामतनमें लागै है ब्रह्ममें लागै है कि आपहीकों
मालिक मानै है सो मैं बहुत खैंचतहौं अपनी ओर कि तैं मेरे पास आउ यह
यमपुरहीको चलोजायहै ॥ २२८ ॥
लोहे केरी नावरी, पाहन गरुवा भार ॥
शिरमें विषकी मोटरी, उतरन चाहै पार ॥ २२९ ॥
या काया लोहेकी नाव संसारसमुद्र पारजाबेको है मन पाहन ताको
गरुवाभार भरो है तापरं विषयरूप विषकी मोटरी शिरपर लीन्हे है सो जीव
कैसेकै पारजाय ॥ २२९ ॥
कृष्णसमीपी पाण्डवा, गले हेवारहि जाय ॥
लोहाको पारस मिलै, काई काहेक खाय ॥२३० ॥
कृष्णसमीपके बसनवारे पाण्डवा ते हेवारमें गले जाय सो कृष्णचन्द्रकों जौं
वे जानते तो हेवारमें काहेको जाते काहेते जो पारसमें लोहा छुइ जातो है तामें
काई नहीं लगै है अर्थात सोनाहै जायहै साहबको जाननवारो पारसही है जायहै
( ६१४ ) बीजक कबीरदास ।
यामें या हेतुहै कि जे नीकी तरह साहबको जानै हैं ते यही दे है जायहैं सो
गोपी याही देहै गई हैं सो ब्रह्मवैवर्तक में प्रसिद्ध है सो गोपिका नीकी प्रकार
जान्यो है ॥ २३० ॥
पूरबऊगै पश्चिम अथवै, भखै पवनको फूल ॥
ताहूको तो राहुगरासै, मानुषकाढेकभूल ॥ २३१ ॥
पूरबते सूर्य उगै हैं औ पश्चिम अथवै हैं पवनको फूलभखै हैं अर्थात् प्रबल
पवन चलै है वाही भ्रमत रहै हैं ऐसें सूर्य हैं तिनहूं सूर्य को राहुगरासै है अरे
मनुष्य जो तैं भूलै है कि पवनते मैं आत्माको चढ़ाय लेउँगो हजारन वर्षपवनै
खाय जिवोंगो मुक्त है जायगो सो तैं केतेदिन पवनखायगों जे सूर्य केतौदिन
पवनखायो ताहूको कालराहु गरासै है तैं कैसे कालते बचौगे ॥ २३१ ॥
नैनके आगे मन बसै, पलपलकरै जो दौर ॥
तीनि लोक मन भूपहै, मन पूजा सब ठौर ॥ २३२ ॥
ज्ञाननयनके आगे मनहीं बसै है वह धोखाब्रह्म मनहीं को अनुभव है
पलपलमें दौरै है नयन बिषयनमें लगै हैंनाना मतनमें लगै हैं नानाज्ञान बिचा-
रकरै हैं तीनि लोकमें या मनहीं भूपहै मनहीं की पूजा सब ठौर होइहै अर्थात्
मनहीं ब्रह्म है पुजावै है मनहीं जीवात्माको ज्ञान करै है किं मैहीं मालिकहौं
जों मनके परे साहब हैं ताको कोई नहीं जानै हैं ॥ २३२ ॥
मन स्वारथ आपहि रसिक, विषय लहरि फहराय ॥
मनके चलतै तन चलत, ताते सरवसुजाय ॥ २३३ ॥
या आपनो स्वारथ मनहींको मानिलियो मनको रसिक आपही भयो अर्थात्
मनको रस आपही लेइ है मनके किये जे पाप पुण्य तिनको भोगैया आपही
बन्यो है याही हेतुते याके बिषय लहरि फहरायरही है सोई विषयनको जब
मनचल्यो तब जीवहु चल्यो मनके चलते तनहूं चल्यो जाय है बिषय करनकों
ताते सरबसुहानि या जीवकी होती है अर्थात् बिषय लिये पापादिक कर्मकियो
नरकको गयो औ येई बिषयन लिये अप्सरनको भोगकरै है नानायज्ञादिक कियों
साखी। (६१६)
स्वर्गको चलो गयो सो सर्बसु याको साहबहै तिनके ज्ञानकी हानि हैगई
पाण्डवनके दृष्टांतते उपासनाकाण्ड औ सूर्यके दृष्टांतते योगकाण्ड औ मनके
अनुभवके दृष्टांतते ज्ञानकाण्ड औ बिषय लहारिकें दृष्टांतते कर्म काण्ड कह्यो सों
इनमें लगिकै नित्यबिहारी साकेत निवासी जे श्रीरामचंद्र तिन को जीव
भूलिगये याहीते जीवनको जरा मरण नहीं छूटै है ॥ २३३ ॥
ऐसी गति संसारकी, ज्यों गाडरकी ठाट ॥
एक पराजो गाड़में, सबै जात तेहिबाट ॥ २३४ ॥
या संसारकी ऐसी गति है जैसे गाडरकी पाँति जो एक गाड़में गिरै तौ
वाहीराह सिगरी गिरंती जायहैं सो या संसारको भेड़ियाधसान यही है एक
जो कौनौ मत गहै तौ सिगरे वा मतगहैं नीकनागा को बिचार न करैं ॥ २३४ ॥
वा मारगतो कठिनहै, तहँ मति कोई जाय ॥
जे गै ते बहुरे नहीं, कुशलकहै को आय ॥ २३५ ॥
वामारगतो महाकठिन है जे साहबके पास जायहैं ते नहीं लोटैं हैं उनको
जनन मरण नहीं होयहै यहां फिरि आइकै वा मार्गकी खबरिको कहै अर्थात्
कुशल को बतावै रहिगे कुसंगी तिनको संग करिकै जीव नरक को चले जाय
हैं साहबको न जाने ॥ २३५ ॥
मारी मरै कुसंगकी, केराके ढिग बेर ॥
वह हालै वह अँगचिरै, बिधिने संगनिबेर ॥ २३६ ॥
केराके साथ बैर जामै है तौ जैसे बैरके हाले केराको अंग फटिजाय है
वाके काँटाते तैसे कुसंगीकिन्हे साहबको ज्ञान जातरहै है गुरुवन के बचनजे हैं
तेई काँटाहैं गुरुवालोग बैरहैं ॥ २३६ ॥
केरा तबहिं न चेतिया, जब ढिगलागी बेरि ॥
अबके चेते क्या भया, काँटन लीन्हो घेरि ॥ २३७ ॥
( ६१६ ) बीजक कबीरदास ।
गुरुमुख ।
साहब कहैं हैं कि अरेकेरा ! अरेजीवौ तैंतो बड़ोकोमल है तब न चेतकियो
जब तेरे समीप बैरलागी अर्थात् गुरुवा लोग उपदेश करनलगे अब तेरे चेते
कहाभयो अबतो उपदेश रूप काँटा तोको घेरिलियो मेरे ज्ञानको फारिडार्यो
अब कहा चेतै है तामै प्रमाण ॥ “आछे दिन पाछे गये कियो न हरिसोंहेत” ॥
अब क्या चेते मूढ़तैं, चिड़िया चुनिगइँ खेत ॥ २३७ ॥
जीव मरण जानै नहीं, अंधभया सब जाय ॥
वादीद्वारेदादिनहिं, जन्मजन्मपँछिताय ॥ २३८ ॥
सों कबीरजी कहै हैं कि साहब या प्रकारते उपदेश करै हैं पै जीवको
कोई मरण नहीं जानै है कि हम मरि जायँगे हमारो जनन मरण न छूटैगो
सो एकतौ आंधरही रहे साहबको ज्ञान नहीं रह्यो तौपै गुरुवनको उपदेश भयो
आँधरते आँधर होत जायँ हैं बादीके द्वारे दादि नहीं पावै अर्थात् जासों पूछै
हैं कि हम कौनके हैं हमारो जनन मरण कैसे छूटै नरकते कौन हमारी रक्षा
करै तौ बेतौ बादी हैं साहबको कैसे बतावैं और और मतमें लगाय दियो
फिरि यादिहू किये साहबको न पायो तातें जगतमें २ पछितायहैं जनन मरण न
छूट्यो गुरुवासाहबको ज्ञान भुलाय दियो तामै प्रमाण ।
बिप्रमतीसीको ।
बिन परशन दरशन बहुतेरे द्वै हैं ब्रह्म ज्ञानी ।
बीज बिना बिज्ञान कथैगो धोखाकी सहिदानी ॥
कृतिम उपासी कर्म्म बिलासी जायँ ते जन यमद्वारं ।
हम करता भजि करता द्वैरहे औरै के उपकारं ॥
राम कहैगा सो निबहैगा उलटि रहै जो गाड़ा ।
धोखा दुंदुर बहुत उठैगा राम भक्तिके आड़ा ।
हिंदू तुरुक दोऊ दल भूले लोक बेद बटपारं ॥
सत गुरु बिना सिद्धि नहिं कोई खिरकी कैन उघारं ॥ २३८ ॥
साखी । ( ६१७ )
जाकोसतगुरुनामल्यो, ब्याकुलचहुँदिशिधाय ॥
आँखिनसूझैबावरा, घरजारैघूरबुताय ॥ २३९ ॥
गुरुमुख ।
जाको सतगुरु नहीं मिले हैं सो ब्याकुल ह्वैकै चारों ओर धावै है कहूंब्रह्ममें
कहूंनाना ईश्वरनमें नानामतनमेंलागै है कि हमारी मुक्ति ह्वैजाय सो अरे बावरे
तेरी आंखिनमें नहीं सूझै है औरै औरै मतनमें निश्चय करै है सो घूरहै ताकों
कहा बुतावैहै मेरोरूप औ आपनोरूप ताको तौ जानु या घरतो जरोजाय है ताको-
बुताउ जातें जनन मरण छूटै घूर बुताये कहा है ॥ २३९ ॥
अनतवस्तुजोअनतैखोजै, केहिविधिआवैहाथ ॥
ज्ञानीसोईसराहिये, पारिखराखैसाथ ॥ २४० ॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि अनतकी बस्तु अनतै खोजै है कहेयह जीव साहबको
अंशहै सदाको दास है तौनेको कहै हैं कि ब्रह्म को है देवतनको है ईश्वरनकों
दासहै सो जौने साहबको दासहै ताको तो जानबही न कियो आपनो स्वरूप
कौनी रीतिते जानै सो हम तौ सोई ज्ञानीको सराहते हैं जो पारिख अपने साथ
राखै है कि हम साहबके हैं दूसरे के नहीं हैं न ब्रह्मके न मायाके न ईश्वरन के
हैंसोई सांचे ज्ञानीको हम सराहते हैं ॥ २४० ॥
सुनिये सबकी, निबेरिये अपनी ॥
सिन्धुरको सेंदोरा, झपनीकी झपनी ॥ २४१ ॥
जहाँ जहाँ सुनिये तहाँ तहाँ साहबहीकी बात निबेरि लीजिये और मत खण्डन करि
डारिये काहेते कि वेदशास्त्र सोई है जामे साहबको परत्वहोइ जोकहूं वेदशास्त्रक-
रिकै साहबको न जान्यो ताको उपदेश यहि रीतिते जैसे सिंधुर जो हाथी ताको
सेंदुर शृङ्गारिकियो वे शुण्डते धूरिभरियो झपनीकी झपनी कहे जैसे रज झपिगई
तैसे जबलौं उपदेश सुन्यो तबलो ज्ञानरह्यो। फिरि नहींरहै जौने वेद शास्त्रमें साहबको
परत्वहोइ सोई अर्थ । तामें प्रमाण चौरासी अंगकी साखी ॥ "राम नाम निज
जानिले, येही बड़ा अरत्थ॥ काहेको पढ़ि पढ़ि मरै, कोटिन ज्ञान गरत्थ"॥२४१॥
( ६१८ ) बीजक कबीरदास ।
बाजनदेवायंतरी, कलिं कुकुरी मति छेर ॥
तुझे बिरानी क्या परी, तू आपनी निबेर ॥ २४२ ॥
जे और और बातें सबकहैं हैं सो या शरीर यंत्रकहे बीणा है जैसों बजवैया
बजावै है तैसो बाजै है ऐसे या शरीरमनके आधीन है जहां चलावैहै तहां चलै है
कहूं बक बक करावै है कहूं ब्रह्ममें लगावै है नानामतनको सिद्धांतकरै है सो
वा यंत्रकों बाजनदे मन बैकळकुकुरिया है वाको विष जो तेरे चढ़ैगो तै
तुहूं बैकळह्वैमरि जाइगो अर्थात् चौरासी योनिमें परैगो सो तोको बिरानी कह
परी है तैं आपनी निबेरु जो तेरे यन्त्र बाजै है सुरति कमलमें गुरु राम
नाम ध्वनि उपदेश देइँ हैं ताको ध्यान करु राम नाम शब्द सब शब्दतें
अलगहै सोई साँचहै और सब मिथ्याहै सो तैं राम नाम ते सनेहकरु राम
नामको स्नेही मरत नहीं है तामें प्रमाण कबीरजीको ॥ “शून्य मरै अजपा मरै
अनहदहू मरि जाय ॥ राम सनेही ना मरै, कह कबीर समुझाय” ॥ २४२॥
गावैं कथैं विचारैं नाहीं, अन जानैको दोहा ॥
कहकबीरपारसपरशेबिन, ज्योंपाहनविचलोहा ॥२४३॥
नाना पुराण नाना शास्त्र नाना मत गावै हैं औ उनको कथनी करै हैं और
औरको समुझावै है परन्तु सर्व शास्त्रको अर्थ साहबही हैं यह नहीं बिचारै हैं
जैसे शुक चित्रकूटी राम कहि दियें न चित्रकूटको अर्थ न रामको अर्थ जानै है
आने में आन साजै है रसाभाव करि देयहै ऐसे सब शास्त्रको सिद्धांत जो जो
साहब पारस रूप तिनको तो जानतही नहीं है कौनी रीति जीव लोहा कञ्चन
होइ अर्थात् जब स्पर्श होय उनको जानि उनमें लगै भजन करै तब कञ्च-
न होय ॥ २४३ ॥
प्रथममैं एक जो हौ किया, भयासो बारह बाट ॥
कसत कसौटी ना टिका, पीतर भया निराट ॥२४४॥
प्रथममें यह जीवको एक कियो कहे एक राहमें लगायो कि मेरी भक्ति करै
गो तौ संसारते छूटि जायगो औ यह बारह बन भयो कहे आपने रूपी बाणकों
साखी। ( ६१९ )
बारह लक्षमें लगायो अर्थात् छःशास्त्रके सिद्धांतमें छःदरशनमें लगाय दियो
बारह बाट भयो मोको न जान्यो सो जब ज्ञानरूपी कसौटीमें कस्यो कि साहब
को ज्ञानहै कि नहीं तब पीतरही द्वैगयो जगन्मुखै ठहरयो साहबमुख न ठहरयो
सहाबको ज्ञान सोना न ठहरयो ॥ २४४ ॥
कबिरन भक्ति बिगारिया, कंकर पत्थर धोय ॥
अन्दरमें विषराखिकै, अमृत डारै खोय ॥ २४५ ॥
कबीरा जे जीव हैं ते भक्ति को बिगारि डारचो कंकर जो है जौने को पत्थर
जो हे मन तामें धोयकै॥"पाहन फोरि गंगयक निकरी चहुँदिशि पानी पानी॥"
या पदमें पाहन मनको लिखि आये हैं सो पाषाणमें जो कंकरधोवै तौ और
चूरचूरहै जाय सो मेरे भक्तिरूपी जलमें आपने अणुजीव कन्करको तैं नहीं धोये
पाथरमें धोये ताते चूरचूरहै नानामत नानादेवमें लागे आपने स्वरूपको न जाने
अन्दरमें विषयरूपी विषराखि अमृतरूप साहबको ज्ञानताको खोइ डाल्यो॥२४५॥
रही एककी भई अनेककी, वेश्या बहुत भतारी ॥
कहकबीर काके सँगजरिहै,बहुत पुरुषकी नारी २४६॥
गुरुमुख ।
साहब कहै हैं कि हैं जीव! तैं तो मेरो रह्यो है सो तैं अब बहुत मतनमें
लगिकै बहुत मालिक मानन लग्यो सो कौन तेरो उद्धार करैगो बहुत भतारी बेश्या
काके काके साथ जरैगी ॥ २४६ ॥
तनबोहित मन कागहै, लखयोजन उड़ि जाय ॥
कबहीं दरिया अगमवह, कबहीं गगन समाय ॥२४७॥
ये चारिउ शरीर बोहित कहे नावहैं तामें मनरूपी काग बैठा है सो लख यो
जनलौं उड़ि जायहै कबहूं संसार समुद्रमें बहत रहै है औ कबहूं पाँचवां शरीर जो
कैवल्य चैतन्यकाश अगम जायबे लायक नहीं तामें महालयादिकनमें समायहै
सो जे हरिकी शरण जायहैं ते यहि संसार समुद्रको गोखुरकी तुल्य उतरिं
( ६२० ) बीजक कबीरदास ।
जाय है तामैं प्रमाण ॥ “इच्छाकर भवसागर बोहित राम अधार॥ कह कबीर
हरि शरण गहु गोबछ खुर बिस्तार ॥ २४७ ॥
ज्ञान रत्नकी कोठरी, चुपकरि दीन्हो ताल ॥
पारखि आगे खोलिये, कुंजी बचन रसाल ॥ २४८ ॥
ज्ञान रत्नकी जो कोठरी है तामैं चुपको तारा दीन्हे ही रहिये जो कोई
समुझनेवारो पारखीहोइ ताहीके आगे रसालबचन कुंजीते चुपको तारा खोलिकै
ज्ञानको प्रकटकरिये काहेते कि जे नहीं समुझैं हैं तिनके आगे न कहिये साह-
बको ज्ञानरत्न वे कहाजानैं ॥ २४८ ॥
स्वर्गपतालके बीचमें, द्वैतुमरीयकबिद्ध ॥
षटदर्शन संशयपरो, लखचौरासीसिद्ध ॥ २४९ ॥
यह स्वर्ग पातालरूपी वृक्षमें जीव ईश्वररूप दुइतुमरीलगी हैं तामैं जीवरूपी
तुमरीबेधी है कहे जीवहीते नानाशब्द निकसै हैं शरीर सारी हैं सो येई जे
जीवहैं षट्दर्शनआदिदै कै तिनको नाना मतकरिकै संशयपरो है साहबको नहीं
जानै हैं एक सिद्धांत नहीं पावैं हैं तिनको चौरासी लाख योनि सिद्धि बनी हैं
भटकतही रहै हैं ॥ २४९ ॥
सकलौदुरमतिदूरिकरु, अच्छाजन्मबनाउ ॥
कागगवन बुधिछोड़िदे, हंसगवनचलिआउ ॥ २५० ॥
साहब कहैं हैं कि अरे जीव ! तेरो जो सकलहै शरीर सोई दुर्मति है सो
पांचौ शरीरनको छोड़िदे औ आपनो अच्छो जन्म बनाउ कागबुद्धि को त्यागू
मेरो दियो हंस शरीर तामैं टिकिकै मेरे पास आउ ॥ २५० ॥
जैसीकहै करै जो तैसी, रागद्वेष निरुवारै ॥
तामैं घटै बढ़ै रति औ नहिं,यहिविधिआपसँभारै॥२५१॥
गुरुमुख ।
साहबक कहैं हैं कि जैसो उपाय मैं तेरे छूटिबेको कहि आयौं है तैसोकरै
औ संसारमें नाना रागद्वेष करि राखै हैं ताको निरुवारै मोमें प्रीति रत्तिउभर
घटै न पावै एकरसही आवै ॥ २५१ ॥
साखी। (६२१)
द्वारे तेरे राम जी, मिला कबीरा मोहिं ॥
तूतो सबमें मिलि रहा, मैं न मिलौंगा तोहिं ॥ २५२ ॥
साहब कहैं हैं कि हे जीव! तेरे मुखद्वारमें मेरो राम असनाम बनो है ताकों
भजन करि हे कबीर! जीवौ मोको मिलौ जो कहौ कि साहब दयालु हैं वोई
मिलिबेकी सामर्थ्य देइँगे सो सत्यहै तेरी दया मोको लगै है परन्तु तैं सबमें
मिलिरहा है ताते मैं तोको न मिलूंगा तैं सब छोड़िदे तो मैं तोको आपसे
मिलौं आइ ॥ २५२ ॥
भर्मपरातिहुँलोकमें, भर्मबसा सब ठाउँ ॥
कहहि कबीर पुकारिकै, बसै भर्मके गाउँ ॥ २५३ ॥
कबीरजी कहैं हैं कि हे जीव! साहब को तैं कैसे मिलै काहेते कि तीनौँ
लोकमें कर्म भर्म जो है धोखाब्रह्म सो भरो है तिनमें भर्म बसो है भरमहीमें
सब मिलिरहे हैं भरमके पार जे साहबहैं तिन को तो जानबेही न कियो ॥२५३॥
रतन लड़ाइनिरेतमें, कङ्कर चुनिचुनि खाय ॥
कहकवीरयहअवसरवीते, बहुरिचलेपछिताय ॥२५४॥
रतन जो है साहब को ज्ञान ताको रेतमें लड़ाय कहे लगाय दियो अति-
कठोर जो है कङ्कर ब्रह्मज्ञान तामें आत्माको लगायो चुनिचुनि खानलग्यो सो
कबीर जी कहैं हैं कि जब या अवसर बीति जायगो अर्थात् शरीर छूटिजायगो
तब पछितायगो वा धोखाब्रह्म में कुछ न मिलैगो ॥ २५४ ॥
जेते पत्रबनस्पती, औ गङ्गाकी रेणु ॥
पण्डितबिचारा क्याकहै, कविरकहै सुखवेणु ॥२५५॥
सारासारके बिचार करनेवारे पण्डित तोको केतो समुझावेंगे कबीरजी कहैहैं
हैं कि जेतो मैं समुझायो है कि बनस्पती पत्र गिनि जायँ औ गंगाकीरेणु गनी-
गनिजाएँ परन्तु मेरे मुखके बैन गने नहीं गिनिजायहैं तऊन तुम बूझयो॥२५५॥
१ पुरानी प्रतियोंमें इस शब्दके लिये "रमाइन" लिखाहै ।
( ६२२ ) बीजक कबीरदास ।
हमजान्यो कुलहंसहौ, ताते कीन्हो संग ॥
जो जनत्यौं बकवरणहौ, छुवन न देत्यौंअंग ॥२५६॥
कबीरजीकहें हैं कि हमतो तुमको हंसके कुलमें जानते रहे हैं ताते तुमको
उपदेश कियो तुम्हारो सङ्ग कियो है जो तुमको बकैकै बर्ण जानते कि हंस
नहींहो तो एकौ अंग छुवन न देत्यौ अर्थात् उपदेशकी बातहू न चलावतो उप-
देश को कौन कहै ॥ २५६ ॥
गुणिया तो गुणको गहै, निर्गुण गुणहि घिनाय ॥
बैलहि दीजै जायफर, क्या बूझै क्या खाय ॥ २५७ ॥
गुणियाकहै जोसगुणहोय है सो गुणको गहै है सत रज तमको जो धारण
करै है सो अशुद्धई रहै है ते मायाते नहीं छूटै हैं औजो निर्गुण उपासकहोइ
है सो सगुणको घिनाय है सो निर्गुणैवाले सगुणवाले साहबके गुणको कहा-
जानें वेतो सगुण निर्गुणके परे हैं मायाकृत गुणते रहित हैं दिव्यगुण सहित हैं
काहेते कहै हैं कि बैलके आगे जो जायफर धरिदीजिये तौ कहा बूझै क्याखाय
ऐसे वे साहबके गुणको कहाजानैं ॥ २५७ ॥
अहिरहु तजि खसमहु तज्यो, विना दाँतको ठोर ॥
मुक्तिपरी बिललातिहै, वृन्दावनकी खोर ॥ २५८ ॥
बिनादाँतको ठोरजो है बूढा गाय बैल ताको अहिरौ चराइबो छाँड़िदेइ है
और खसम जो है बैलको मालिक सोऊ छोड़ि देइ है अर्थात् बुढाजानिकै कि
मेरे कामको नहीं है तब वह बैल बृन्दाबनकी खोरि बिललानलग्यो ऐसे जब
मनरूपीदाँत उखारिडारचो तब अज्ञानअहिर याको छोड़िदियो औ याको खसम
जो है माया सबलित ब्रह्म सो जब मन न रहिगयो तब याहू छांड़िदियो तब
आपहीआप मुक्त है गयो सर्वत्र साहबहीको देखन लग्यो जैसे वृन्दावनमें डारमें
पातमें कृष्णदेखिपरेँ हैं मुक्ति परी धिललाइहै काको मुक्तकरै ऐसे यहू सर्वत्र साह-
बको देखनेलग्यो मुक्तही हैगयो मुक्तिकाको मुक्तकरै तामेंप्रमाण ॥ “सवन-
दियाँ गङ्गाभई, सब शिल शालिग्राम ॥ सकलौ बन तुलसी भयो, चीन्ह्यौ
आत्माराम” ॥ २५८ ॥
साखी । ( ६२३ )
मुखकी मीठी जे कहैं, हृदयाहै मति आन ॥
कहकबीर तेहिलोगसों, रामौ बड़े सयान ॥ २५९ ॥
जो या भाँतितें मनको त्यागिकै सर्वत्र साहब को देखै हैं तिनको साहब
सर्वत्र देखिपरे हैं औ जिनके मनमें औ मुख में आनआन है तिनको कबीरजी
कहैं हैं कि रामऊ बड़े सयानहैं अर्थात् उनते दूरिरहैं हैं ॥ २५९ ॥
इतते सबतौ जातहैं, भार लदाय लदाय ॥
उतते कोइ न आइया, जासों पूंछौं धाय ॥ २६० ॥
नानाकर्म्मके नाना उपासनाके नानाज्ञानके भार लदाय-लदायइतते सबजात हैं
परंतु उहांते ऐसाकोई न आया जासों धायकै उहांकी खबरिपूंछौ कि कौनफल-
पाया सो आपनेहींजन्मकी खबरि नहींजानै साहबकी खबरि कहाजानै॥२६०॥
भक्तिपियारीरामकी, जैसी प्यारी आगि ॥
सारा पाटन जरिगया, फिरि फिरि ल्यावैमाँगि ॥२६१॥
यहभक्ति साहबकी बहुतपियारी है जैसे आगि पियारीहोइ है कि आगि
लगी औ सारापाटन कहे शहर जरिजाय पुनि आगीकी चाहना बनीहीरहै है पुनि
पुनि मांगिलैआवै है अपनी करै है काम लोग ऐसे साहबकी भक्ति केतौलोग
साहबकी भक्तिकरि संसारते पारहै गये परंतु अबतक जो कोई भक्ति करै है सो
पिआरै होत जाय है संसारते उतरिजाय है ॥ २६१ ॥
नारिकहावै पीउकी, रहे और सँग सोइ ॥
जारमीत हिरदै बसै, खसमखुशीक्या होइ॥२६२॥
नारितौ अपने प्रीतमकी कहावै है औ आनपति लैके सोइ रहै है तौ खसम
कैसे खुशी होय ऐसे यह जीव साहब को अंश है और और मतमें लग्यो कहीं
ब्रह्म में कहीं माया में सो साहब कैसे खुशी होय ॥ २६२ ॥
सज्जनतौ दुर्जनभया, सुनि काहूकोबोल ॥
काँसाताँवाह्वैरहा, नहिं हिरण्य का मोल ॥ २६३ ॥
( ६२४ ) बीजक कबीरदास ।
'सज्जन शुद्ध जीव हैं ते गुरुवालोगन के बोल सुनिकै दुर्जन द्वैगये सो जो
हिरण्यका मोल है सो जातरहा काँसा ताँबाकी तुल्य द्वैरहा है ॥ २६३ ॥
बिरहिन साजी आरती, दर्शनदीजै राम ॥
मुयेते दरशनदेहुगे, आवै कौने काम ॥ २६४ ॥
कबीरजी कहैं हैं कि जे श्रीरामचन्द्रके बिरही जीवहैं ते आरतीसाजे खड़े हैं
कि जो रामजी मिलैं तौ आरतीकरैं संसार छाँड़ि एक तुम्हारे मिलिबेकी आशा
किये हैं सो हेसाहब ! दर्शनदीजै मुयेते दर्शनतो देवही करोगे परन्तु औरे जीवन
के काम न आवोगे काहेते वेतौ उपदेश करही न आवेंगे साहब बिरहीको मिलै
हैं तामें प्रमाण चौरासी अङ्गकी साखी ॥ "बिरहिन जरती देखिकै, साई आये-
धाय ॥ प्रेमबुन्दते सींचिकै, हियमें लई लगाय"॥ २६४ ॥
पलमें प्रलयबीतिया, लोगन लगी तमारि ॥
आगिल सोच निवारिकै, पाछे करो गोहारि ॥ २६५ ॥
पलभरमें प्रलयतेरी होती जायहै आयुक्षीण होती जायहै यही तमारि लोगनके
लगी है फिरि वा घरी नहीं मिलै ताते आगिल सोच छाँड़िदेव जौन धन जोरि
जोरि स्त्री लरिकनहेत धरचोहै पाछिल गोहारिकरौ साहब को जानो जाते जनन
मरण छूटै ॥ २६५ ॥
एकसमाना सकलमें, सकलसमाना ताहि ॥
कविरसमाना बूझमें, तहाँ दूसरा नाहि ॥ २६६ ॥
एक जो ब्रह्महै सो सब जीवनमें समाय रह्यो है औ कबीरजी कहैं हैं कि
मैं बूझमें समान्यो है ब्रह्मके प्रकाशी औ सब जगत् के अन्तर्यामी ऐसे जे
श्रीरामचन्द्र तिनको जब बूझ्यो तब वही बूझमें समायरह्यो है सर्वत्र साहबही
को देखनलग्यो दूसरा नं देखत भयो मुक्तद्वै सांचा दासभयो तामें प्रमाण
कबीरजी को ॥ "जीवन मुक्त द्वैरहै, तजै खलककी आश॥ आगे पीछे हरिफिरैं,
क्यों दुखपावै दास "॥ २६६ ॥