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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 650

( ६१२ ) बीजक कबीरदास ।
मच्छ होय ना वाचिहो, ढीमरतेरे काल ॥
जेहि जेहि डावर तुम फिरौ, तहँ तहँ मेलै जाल२२६॥
हे जीव ! जो तुम मच्छ जोहै मायाको अनुभव ब्रह्म सोई ह्वैकै जो बाचा-
चाहौ तौ न बाचौगे तेरो फँदावनवारो ढीमर जो है मन सोई कालहै सो तुमको
फँदायकै कालके घर पहुँचाय देइगो अर्थात् जो ज्ञानकरि ब्रह्महू द्वैजाउगे तबहूं
माया धरिही लै आवैगी अथवा समाधि करिकै प्राणको ब्रह्मांड में पठायकै
ज्योति में लीनौ होउगे तबहूं माया धरि लै आवैगी तेहिते जौने जौने मत
जे डावर तामें फिरौगे कहे मतमें लागौगे तहाँतहाँ या मनरूपी ढीमर जाल
फेंकिकै तुमको धरिही लै आवैगो तेहिते मन वचनके परे जो भक्तियोग तौनेको
जानौ तब वह कालते बचौगे सो भक्तिके गुण पाछे कहिआये हैं औ भक्तियोग
मन बचनके परै है तामें प्रमाण कबीरजीके शब्दावली ग्रन्थको ॥
शब्द ।
अबधू ऐसा योग बिचारा । जो अक्षरहू सों है न्यारा ॥
जौन पवन तुम गङ्ग चढ़ावो करौ गुफामें बासा ।
सोतो पवन गगन जब बिनशै तब कह योग तमाशा ॥
जबहीं विनशै इंगलापिंगला बिनशै सुषुमन नारी ।
जो उनमुनि सो नाड़ी लागी सो कह रहै तुम्हारी ॥
मेरु दण्डमें डारि दुलैचा योगी आसन लाया ।
मेरु दण्डकी खाक उड़ैगी कञ्चे योग कमाया ॥
सोतो ज्योतिगगनमें दरशै पानीमें ज्यों तारा ।
बिनशो नीरनसों जब तारा निसरौगे केहि द्वारा ॥
द्वैतलाग बैराग कठिन है अटके मुनि जन योगी ।
अक्षरलों सब खबरि बतावै जहँलौं मुक्ति वियोगी ॥
सोपद कह्यो कहे सो न्यारा सत्य असत्य निबेरा ।
कहै कबीरताहि लखुयोगी बहुरि न करियेफेरा ॥ २२६ ॥