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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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साखी । ( ६२३ )
मुखकी मीठी जे कहैं, हृदयाहै मति आन ॥
कहकबीर तेहिलोगसों, रामौ बड़े सयान ॥ २५९ ॥
जो या भाँतितें मनको त्यागिकै सर्वत्र साहब को देखै हैं तिनको साहब
सर्वत्र देखिपरे हैं औ जिनके मनमें औ मुख में आनआन है तिनको कबीरजी
कहैं हैं कि रामऊ बड़े सयानहैं अर्थात् उनते दूरिरहैं हैं ॥ २५९ ॥
इतते सबतौ जातहैं, भार लदाय लदाय ॥
उतते कोइ न आइया, जासों पूंछौं धाय ॥ २६० ॥
नानाकर्म्मके नाना उपासनाके नानाज्ञानके भार लदाय-लदायइतते सबजात हैं
परंतु उहांते ऐसाकोई न आया जासों धायकै उहांकी खबरिपूंछौ कि कौनफल-
पाया सो आपनेहींजन्मकी खबरि नहींजानै साहबकी खबरि कहाजानै॥२६०॥
भक्तिपियारीरामकी, जैसी प्यारी आगि ॥
सारा पाटन जरिगया, फिरि फिरि ल्यावैमाँगि ॥२६१॥
यहभक्ति साहबकी बहुतपियारी है जैसे आगि पियारीहोइ है कि आगि
लगी औ सारापाटन कहे शहर जरिजाय पुनि आगीकी चाहना बनीहीरहै है पुनि
पुनि मांगिलैआवै है अपनी करै है काम लोग ऐसे साहबकी भक्ति केतौलोग
साहबकी भक्तिकरि संसारते पारहै गये परंतु अबतक जो कोई भक्ति करै है सो
पिआरै होत जाय है संसारते उतरिजाय है ॥ २६१ ॥
नारिकहावै पीउकी, रहे और सँग सोइ ॥
जारमीत हिरदै बसै, खसमखुशीक्या होइ॥२६२॥
नारितौ अपने प्रीतमकी कहावै है औ आनपति लैके सोइ रहै है तौ खसम
कैसे खुशी होय ऐसे यह जीव साहब को अंश है और और मतमें लग्यो कहीं
ब्रह्म में कहीं माया में सो साहब कैसे खुशी होय ॥ २६२ ॥
सज्जनतौ दुर्जनभया, सुनि काहूकोबोल ॥
काँसाताँवाह्वैरहा, नहिं हिरण्य का मोल ॥ २६३ ॥