कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 653, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ेंसाखी। (६१६)
स्वर्गको चलो गयो सो सर्बसु याको साहबहै तिनके ज्ञानकी हानि हैगई
पाण्डवनके दृष्टांतते उपासनाकाण्ड औ सूर्यके दृष्टांतते योगकाण्ड औ मनके
अनुभवके दृष्टांतते ज्ञानकाण्ड औ बिषय लहारिकें दृष्टांतते कर्म काण्ड कह्यो सों
इनमें लगिकै नित्यबिहारी साकेत निवासी जे श्रीरामचंद्र तिन को जीव
भूलिगये याहीते जीवनको जरा मरण नहीं छूटै है ॥ २३३ ॥
ऐसी गति संसारकी, ज्यों गाडरकी ठाट ॥
एक पराजो गाड़में, सबै जात तेहिबाट ॥ २३४ ॥
या संसारकी ऐसी गति है जैसे गाडरकी पाँति जो एक गाड़में गिरै तौ
वाहीराह सिगरी गिरंती जायहैं सो या संसारको भेड़ियाधसान यही है एक
जो कौनौ मत गहै तौ सिगरे वा मतगहैं नीकनागा को बिचार न करैं ॥ २३४ ॥
वा मारगतो कठिनहै, तहँ मति कोई जाय ॥
जे गै ते बहुरे नहीं, कुशलकहै को आय ॥ २३५ ॥
वामारगतो महाकठिन है जे साहबके पास जायहैं ते नहीं लोटैं हैं उनको
जनन मरण नहीं होयहै यहां फिरि आइकै वा मार्गकी खबरिको कहै अर्थात्
कुशल को बतावै रहिगे कुसंगी तिनको संग करिकै जीव नरक को चले जाय
हैं साहबको न जाने ॥ २३५ ॥
मारी मरै कुसंगकी, केराके ढिग बेर ॥
वह हालै वह अँगचिरै, बिधिने संगनिबेर ॥ २३६ ॥
केराके साथ बैर जामै है तौ जैसे बैरके हाले केराको अंग फटिजाय है
वाके काँटाते तैसे कुसंगीकिन्हे साहबको ज्ञान जातरहै है गुरुवन के बचनजे हैं
तेई काँटाहैं गुरुवालोग बैरहैं ॥ २३६ ॥
केरा तबहिं न चेतिया, जब ढिगलागी बेरि ॥
अबके चेते क्या भया, काँटन लीन्हो घेरि ॥ २३७ ॥