कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६२४ ) बीजक कबीरदास ।
'सज्जन शुद्ध जीव हैं ते गुरुवालोगन के बोल सुनिकै दुर्जन द्वैगये सो जो
हिरण्यका मोल है सो जातरहा काँसा ताँबाकी तुल्य द्वैरहा है ॥ २६३ ॥
बिरहिन साजी आरती, दर्शनदीजै राम ॥
मुयेते दरशनदेहुगे, आवै कौने काम ॥ २६४ ॥
कबीरजी कहैं हैं कि जे श्रीरामचन्द्रके बिरही जीवहैं ते आरतीसाजे खड़े हैं
कि जो रामजी मिलैं तौ आरतीकरैं संसार छाँड़ि एक तुम्हारे मिलिबेकी आशा
किये हैं सो हेसाहब ! दर्शनदीजै मुयेते दर्शनतो देवही करोगे परन्तु औरे जीवन
के काम न आवोगे काहेते वेतौ उपदेश करही न आवेंगे साहब बिरहीको मिलै
हैं तामें प्रमाण चौरासी अङ्गकी साखी ॥ "बिरहिन जरती देखिकै, साई आये-
धाय ॥ प्रेमबुन्दते सींचिकै, हियमें लई लगाय"॥ २६४ ॥
पलमें प्रलयबीतिया, लोगन लगी तमारि ॥
आगिल सोच निवारिकै, पाछे करो गोहारि ॥ २६५ ॥
पलभरमें प्रलयतेरी होती जायहै आयुक्षीण होती जायहै यही तमारि लोगनके
लगी है फिरि वा घरी नहीं मिलै ताते आगिल सोच छाँड़िदेव जौन धन जोरि
जोरि स्त्री लरिकनहेत धरचोहै पाछिल गोहारिकरौ साहब को जानो जाते जनन
मरण छूटै ॥ २६५ ॥
एकसमाना सकलमें, सकलसमाना ताहि ॥
कविरसमाना बूझमें, तहाँ दूसरा नाहि ॥ २६६ ॥
एक जो ब्रह्महै सो सब जीवनमें समाय रह्यो है औ कबीरजी कहैं हैं कि
मैं बूझमें समान्यो है ब्रह्मके प्रकाशी औ सब जगत् के अन्तर्यामी ऐसे जे
श्रीरामचन्द्र तिनको जब बूझ्यो तब वही बूझमें समायरह्यो है सर्वत्र साहबही
को देखनलग्यो दूसरा नं देखत भयो मुक्तद्वै सांचा दासभयो तामें प्रमाण
कबीरजी को ॥ "जीवन मुक्त द्वैरहै, तजै खलककी आश॥ आगे पीछे हरिफिरैं,
क्यों दुखपावै दास "॥ २६६ ॥