कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६०८ ) बीजक कबीरदास ।
" जहां कालकी गमि नहीं, मुआन सुनिये कोई ।
जो कोइ गमि ताको करै, अजर अमर सो होइ " ॥ १ ॥
साहबते बिमुख करनवाले गुरुवालोग यम दूतहैं तामेंप्रमाण ॥"॥ नानारू-
पधरा दूता जीवानांज्ञानहारकाः ॥ कालाज्ञांसमनुप्राप्य विचरन्तिमहीतले "॥२॥
औ कबीरजी चौकामेंरघुनाथजीकी पूजा षोड़शही प्रकारकी लिख्यो है तामें
प्रमाण ॥
चौकाविधानका शब्द ।
अगर चंदन घसि चौक पुरावा सत सुकृत मन भावा ॥
भर झारी चरणामृत कीन्हा हंसनको बरतावा ।
पूरन मौज और रखवारा सतगुरु शब्द लखावा ॥
लौंग लायची नारियल आरति धोती कलश लसावा ।
श्वेत सिंहासन अगम अपारा सो अति बर ठहराया ॥
छांड़े लोक अमृतकी काया जगमें जोलह कहाया ।
चौरासीकी बंदि छोड़ाया निर अक्षर बतलाया ॥
साधु सबै मिलि आरति गावैं सुकृत भोग लगाया ।
कहै कबीर शब्द टकसारा यमसों जीव छुड़ाया ॥ १ ॥
पूरण मासी आदि जों मङ्गल गाइये ।
सतगुरुके पद परशि परम पद पाइये ।
प्रथमै मँदिर झराय कै चँदन लिपाइये ॥
नूतन बस्त्र अनेक चँदोवा तनाइये ।
तब पूरण गुरु के हेतु तौ आसन बिछाइये ॥
गुरुके चरण परछालि तहाँ बैठाइये ।
गज मोतिनकी चौक सु तहां पुराइये ॥
तापर नारियल धोती मिष्ठान्न धराइये ।
केला और कपूर तौ बहु बिधि ल्याइये ॥
अष्ट सुगंध सुपारी लो पान मँगाइये ।
पलौ सहित सो कलश सँवारिकै ज्योति बराइये ॥