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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 643

साखी । (६०५)
तीरथ गये सो तीन जन, चितचंचल मन चौर ॥
एकौ पाप न काटिया, लादे दशमन और ॥२१०॥
इनके अर्थ स्पष्टई हैं ॥ २०८ । २०९ । २१० ॥
तीरथ गये ते वहि मुये, जूड़े पानी न्हाय ॥
कह कबीर संतौ सुनौ, राक्षस है पछिताय ॥ २११ ॥
तीर्थ में जे जायं हैं ते तीर्थके जूड़े पानी में नहायकै बहि मुये कहे खराबह्वै
मुये काहे ते कि जौन तीर्थजाबे नहाबेकी विधि है सो एकौ न किये काहूकों
धक्का मार्यो काहूपै कोप कियो सो कबीरजी कहै हैं कि हे सन्तौ सुनौ ते
नर राँक्षक होइकै पछिताय हैं कि हम सों न बनी ॥ २११ ॥
तीरथ भै बिष बेलरी, रही युगन युग छाय ॥
कबिर न मूल निकन्दिया, कौन हलाहल खाय ॥२१२॥
तीरथ कहे तीन हैं रथ जाके सतरजतम ऐसी जो त्रिगुणात्मिका माया सो
विष बेलरीभै चारिउयुगमें छाय रही है कबिरन मूलनिकन्दिया कहे मूल जों
रामनाम है ताको कबीरा जे जीव हैं ते निकन्दिया कहे न ग्रहण करते भयें
जो कोई कहबौकियो ताहूको खण्डि डारत भये सो या नाना कुमति रूप
हलाहल खाय जीव क्यों न नरकै जाय जाबेही चाहै ॥ २१२ ॥
हे गुणवन्ती बेलरी, तव गुण वरणि न जाय ॥
जर काटेते हरि अरी, सींचेते कुंभिलाय ॥२१३॥
हे गुणवंती बेलरी माया बाणी तेरो गुण बरणि नहीं जाय है कहांलौं वर्णन
करें जब तेरी जर काटन चलैं हैं तीर्थ करिकै अहंब्रह्मास्मि कैकै तौ अधिक
हरिअरी होय है महीं ब्रह्महौं या अभिमान बढ़्यो अधिक हरि अरी भई
तामें प्रमाण ॥ “ कुशलाब्रह्मवार्तायां वृत्तिहीनाः सुरागिणः ॥ तेपि यान्तित-
मौनूंनं पुनरायान्तियान्ति च ” ॥ २१३ ॥