कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६१० ) बीजक कबीरदास ।
कबीरजी कहै हैं कि आस्तिकमत जो मैं सबको बताऊं हौं तो कोई नहीं पति
आयहैं काहेते कि गुरुवा लोगनकी बाणी मानि उनको सिद्धजानै हैं या नहीं
जानै हैं कि ये आस्तिकनहीं हैं साहब को नहीं जानै हैं इनते संसार न छूटैगौ
साहबके जाननवारे जे सांचे साधु हैं तिन्हीं ते संसार छूटै है काहेते हीरा ही
रैते बेधि जाय है ॥ २१९ ॥
सोना सज्जन साधु जन, टूटि जुरै सौ बार ॥
दुर्ज्जन कुम्भ कुम्हारके, एकै धका दरार ॥ २२० ॥
सज्जन साधुजन जे हैं ते सोना है जो सैकरनवार टूटै फिरि फिरि जुरिजायहै
औ दुर्जन जे हैं कुम्हारके कुम्भ कहे घड़ा जो फूटा तो फिरि नहीं जुरै है अर्थात्
जो साधुजन कहूं मांगमें भूलिहू जायँ परंतु फिरि समझाये वाहीमें लगिजायहैं
खोटी राह छांड़ि देइ हैं औ दुर्जन जे हैं ते घड़ासे फूटिजायहैं अर्थात् जौने
कुसंगमें परे तौनेहीके भये फिरि नहीं बूझै हैं ॥ २२० ॥
काजर केरी कोठरी, बूडन्ता संसार ॥
बलिहारी तेहि पुरुषकी, पैठिकै निकसन हार ॥२२१॥
यह काजरकै कोठरी मायाहै तौने में यह संसार बूड़िगयो सो वह जीवकी
बलिहारी है जो मायामें आय निकसि जाय ॥ २२१ ॥
काजरही की कोठरी, काजरहीका कोट ॥
तौभी कारा ना भया, रहाजो ओटहि ओट ॥ २२२ ॥
गुरुमुख ।
साहबकहै हैं कि यह माया काया काजरकी कोठरी है याके काजरहीके कोट
बने हैं नाना आशा नानामत माने हैं सो यद्यपि ऐसेहू रह्यो परंतु मोको रक्षक
माने रह्यो मेरी भक्तिकी ओट ही ओट बचि गयो अर्थात् मायाते बचिगयों२२२
अर्बखर्ब लौं दर्व है, उदय अस्तलौं राज ॥
भक्ति महातम ना तुलै, ये सब कौने काज ॥ २२३ ॥