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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

साखी । ( ६२५ )
यकसाधे सबसाधिया, सबसाधे यकजाय ॥
उलटिजो सींचै मूलको, फूलै फलै अघाय ॥ २६७ ॥
एक जो साहबकी भक्तिहै ताके साधे सब सधिजायहै अर्थात् लोकौ परलोक
बनिजायहै और सब साधेते अर्थात् नानामतनमें लागते एक जो साहबकी भक्ति
सो जातरहै है औ ऊपरते वृक्षके जलमें डारिराखै तौ पत्ता फूलफल सरिजायहैं
औ जो वृक्ष को मूलते सींचै तौ फूलैफलै अघायकै ऐसे सबके मूल साहबहैं
तिनकी भक्ति कीन्हे सब फूलैफलै है दूसरेकी चाह नहीं रहिजायहै दूसरे की
उपासना में संसार नहीं छूटै है ॥ २६७ ॥
जेहि वन सिंह न संचरै, पक्षी नहिं उड़िजाय ॥
सोबन कबीरन हीठिया, शून्यसमाधि लगाय ॥२६८॥
जेहि बाणी रूप बनमें कहे जेहि बाणीतें ब्रह्म ज्ञानौ कथै है तौनी बाणीमें
सिंहजे हैं शुद्धजीव साहबके जाननवारे ते नहीं संचरै हैं कहे नहीं जायहैं औ
पक्षी जे हैं नानामतवारे नानाशास्त्रवारे ते अपने अपने पक्षकारि ब्रह्मको बिचा-
रकरै हैं उड़ै हैं पार कोई नहीं पावै हैं सो तौने बनको कबीर जे हैं जीव सोहीं
ठिया कहे हीठत भयो वही शून्य समाधि लगायकै साहबकी प्राप्ति न भई
तामें प्रमाण चौरासी अङ्गकी साखी ॥ “ शून्य महलमें सुन्दरी, रही अकेले
सोइ । पीउ मिल्यो ना सुखभयो, चली निराशा रोइ ” ॥ २६८ ॥
बोली एकअमोलहै, जो कोइ बोलै जानि ॥
हिये तराजू तौलिकै, तब मुख बाहर आनि ॥ २६९ ॥
सो वे शून्य समाधि लगायकै शून्य ब्रह्ममें जायहैं तिनकों कहि आये अब
ज्ञान करिकै जे ब्रह्ममें लीनहैं तिनको कहै हैं कि वह बोली सोहं अमोल
ताको जो कोई जानिकै हियेके तराजूमें तौलिकै मुखके बाहर लैआइकै बोलै
कहे श्वास श्वासमें यही जपै जातमैं सो आवत में हृदय तराजूमें यँही तौलै
कि सो पारषदरूप हंस साहब को है ॥ २६९ ॥
४०

( ६२६ ) बीजक कबीरदास ।
वोहूतौवैसहिभया, तू मतिहोइ अयान ॥
तूगुणवंता वे निरगुणी, मतिएकैमें सान ॥ २७० ॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि योगी तौ समाधि करिकै शून्यमें गये औ वहू जे हैं
वह ज्ञानी सहजसमाधिद्वारे तौनौ ज्ञानकारिकै वैसेभये कहे वही शून्यमें समाय
रह्यो तू मति अयान होय कहे अज्ञानी होइ तूतो गुणवंता कहे दिव्यगुण सहित
जे साहब हैं तिनको है दिव्यगुण तेरेहू है निर्गुण जो धोखा ब्रह्म तामें तू काहे
सानै है तू मतिसान साँचाद्वैकै तू असाँच काहे होइहै ॥ २७० ॥
साधू होना चहहुजो, पक्काके सँगखेल ॥
कच्चासरसों पेरिकै, खरी भया नहिं तेल ॥ २७१ ॥
जो तुम साधु होना चाहो तौ पक्के जे साहबकें जाननवारे तिनके संग खेल
कहे सत्संगकरौ जो तुम और नाना देवता नाना मतनमें लगौगे तौ तुम्हारो
न लोकै बनैगो न परलोकै बनैगो जैसे कच्चे सरसों को पेरनो न तेलै भयो न
खरी भई ॥ २७१ ॥
सिंहैकेरीखालरी, मेढ़ा ओढ़े जाय ॥
वाणीते पहिंचानिया, शब्दहि देत बताय ॥ २७२ ॥
सिंहकी खालरीकहे शुद्ध जीवनको वेष गुरुवालोग संसार में बनाये कण्ठी
छापा टोपी दीन्हें हैं सबलोग जानैं किं बड़े साधुहैं जैसे सिंहकी
खालरी मेढ़ाकों वढ़ायदेइ अर्थात् मढ़िदेइ तौ सब सिंहैकी नाईं जानै हैं परंतु
जब भ्याँ भ्याँ बोलन लग्यो तब बाणी ते जानि परेउ कि सिंह नहीं है मेढ़ाहे
ऐसे जब गुरुवनको सत् सङ्गकीन्यो तब बाणीते जानिपरे कि ये साहबको
नहीं जानै हैं वेषैभरि बनाये हैं इनते संसार न छूटैगो तामें प्रमाण चौरासी
अङ्गकी साखी ॥ “स्वामी भया तो का भया, जान्यो नहीं बिबेक ॥ छापा
तिलक बनायकै, दग्धे जन्म अनेक ॥ १ ॥ जप माला छापा तिलक, सरै न
एकौ काम ॥ मन कांचे नाचे वृथा, साँचे राचे राम ” ॥ २७२ ॥

साखी । ( ६२७ )
ज्यहि खोजत कलपनभया, घटहीमें सो पूर ॥
बाढ़ॆगर्वगुमानते, ताते परिगो दूर ॥ २७३ ॥
जौने मुक्तिको खोजत खोजत कल्पैभयो अर्थात् कल्पनाकरत करत कल्पना
रूप द्वैगया ब्रह्ममें लीनभया मुक्तिको मूल जों रामनाम सो तेरे घटही में है
ताको अहंब्रह्मास्मिके गर्बते तोको दूरि परिगयो अबहूं समझ तौ तेरे
समीपही हैं ॥ २७३ ॥
दश द्वारेका पीपरा, तामें पक्षी पौन ॥
रहिबेको आश्चर्य्य है, जायतो अचरज कौन ॥२७४॥
रामहि सुमिरहिं रणभिरैं, फिरैं औरकी गैल ॥
मानुषकेरीखालरी, ओढ़िफिरतहैं बैल ॥ २७५ ॥
२७५। रामनामकों तौसुमिरै है परन्तु रामनामजपिबे की बिधिगुरुतें
नहीं पाये बादबिवाद करत साधुनते भिरतफिरै हैं साहबको नहीं जानै हैं ते
मानुषकी खाल ओढ़ेतौ हैं परंतु बैलहैं अर्थात् पशु हैं जानै नहीं हैं ॥ २७५ ॥
खेत भला बीजौ भला, बोइये मुठीफेर ॥
काहे बिरवारूखरा, या गुणखेतै केर ॥ २७६ ॥
खेती तो नौ कई है परंतु तृणादिकनके जरको कारण वामें बनो है त्यहितें
बिरवा उठै नहीं पावै तृणछाय जायहै सो या गुण खेतै को है ऐसे खेत अंतः
करणमें नाना बासनारूप तृण जानिरहे हैं तामें रामनामरूपी बीज फेरि फेरि
बोवै हैं परंतु तृण बासननके मारे लगे नहीं पावै साहबमें प्रीति नहीं होय
देइ जब सत्संग करि कै निराय डारै तौ तृणऔ रामनामरूप अंकुर दृढ़ ह्वैजाय
साहब को जाननलगे संसार छूटिजाय पापजारेमें नामकी बड़ी शक्ति है
तामें प्रमाण ॥ “यावती नाम्निवै शक्तिःपापनिर्दहनेहरेः ॥ तावत्कर्त्तुंनशक्नोति
पातकम्पातकीजनः” ॥ २७६ ॥
गुरु सीढ़ीते ऊतरै, शब्द बिमूखा होइ ॥
ताको काल घसीटिहै, राखिसकै नहिं कोइ ॥ २७७ ॥

( ६२८ ) बीजक कबीरदास ।
गुरुके बताये साधनसीढ़ीमें चढ़ो फिर उतरि और और साधनमें लगो राम
नामते बिमुख द्वैगयो ताको कालनरकमें घसीटिकै डारिही देइगो कोई नहीं
राखिसकैगो ॥ २७७ ॥
आगि जो लगी समुद्रमें; जरै सो कांदौ झारि ॥
पूरब पश्चिम पण्डिता, मुये बिचारि बिचारि ॥२७८॥
या संसार समुद्रमें अज्ञानरूपी अग्नि लगीहै सोपूरंबपश्चिमके पंडित कहे
उदय अस्तके पण्डित बिचारि बिचारिमरे परंतु अज्ञान रूपी अग्नि न बुतानि
उपासना करिकै ज्ञानहू करिकै संसार समुद्र सूखि हू गयो परंतुबामूल अज्ञानरूप
कांदौमें फँसेजरे जायहैं ॥ २७८ ॥
जो मोहिं जानै त्यहिमैं जानौं।लोक वेदका कहा न मानौं ॥
भूमुरघाम सबै घटमाहीं।सबकोउबसै शोककी छाहीं २७९॥
गुरुमुख ।
अज्ञानरूपी घामते अंतःकरणरूपी भूमि सबकै तपिंरही है शोकरूपीजें
नाना उपासना तिनकी छाया चाहै है परंतु वहीते और तप्त होयहै शीतल नहीं
होइहै सो मोको तो जानतही नहीं हैं मैं वाको काहेको जानौं जो कोई मोको
जानै तौ मैं वाको जानौं जानबही करौं लोकवेदतो कहतही है कि जो जाको
है सो ताहूको जनै है सो या लोक वेदको कहा मानबहीकरों अथवा कैसो पापी
होइ जो मेरी शरण आवै तौ मैं लोक वेदका कहा न मानूं वाको शरणमें राख
बई करौं वाके सम्पूर्ण पापमैंहौं छुड़ाय देउँ तामें प्रमाण ॥ “ सकृदेव प्रपन्नाय
तवास्मीति च याचते ॥ अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतमम ” ॥ २७९ ॥
जौन मिलासो गुरुमिला, चेलामिला न कोइ ॥
छहउलाखछानबे रमैनी, एकजीव परहोइ ॥ २८० ॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि एकजीवके उपदेशपर मैं छः लाखछानबे रमैनी
युगयुग कह्यो पै मेरो कह्यो कोई न समझ्यो जो मिलो सो गुरुही मिलो चेला
कोई न मिलो जो मेरो कह्यो बूझै साहबको जानै संसारतें छूटै छानबे रमैनी में
प्रमाण ॥ “ सहसछानबे और छःलाखा ॥ युगपरमाण रमैनी भाखा॥२८०॥

साखी । ( ६२९ )
जहँ गाहक तहँहौं नाहिं, हौं जहँ गाहक नाहिं ॥
बिनबिबेकभटकताफिरै, पकरिशब्दकीछाहिं ॥ २८१ ॥
गुरुमुख ।
जहां नाना ईश्वर नाना उपासना नाना ज्ञान इन एकहूकों जहां गाहकहै
तहां मैं नहीं हौ अथवा जहां कौनिहूं बस्तुकी चाहहै तहां मैं नहीं हौं जहां
कौनिहूं बस्तुकी चाह नहीं है तहांमैं हौं सो बिना बिबेक कहे बिना सांच
असांचके जाने अर्थात् सांच जो रामनाम ताके बिना जाने गुरुवालोगनके
शब्दकी छांह पकरिकै संसार भटकत फिरै है जनन मरण नहीं छूटै है जब
रामनाम जानै तब संसारते छूटै तामें प्रमाण “सप्तकोटि महामन्त्राश्चित्तवि भ्रम
कारकाः ॥ एक एव परो मन्त्रो राम इत्यक्षरद्वयम् ॥ २८१ ॥
शब्दहमाराआदिका, इनते वली न कोइ ॥
आगे पाछे जोकरै, सो बलहीना होइ ॥ २८२ ॥
गुरुमुख ।

( ६३० ) बीजक कबीरदास ।
ताहि नकाहिये पारखी, पाहनलखै जो कोई ॥
नग नल या दिलसों लखै, रतनपारखी सोइ ॥२८४॥
जो कोई पाहनरूपी मनको देखै है अर्थात् जब भरम जाके मन बनो रहै
ताको पारखी न कहिये औ जो कोई नर आपनो आत्मारूप जो है नग स्वस्व-
रूप सो आपने दिलमें रामनाममें देखै है अर्थात् मकार स्वरूप जो है आप
नों स्वस्वरूप ताको रकार रूप जै हैं साहब तिनके समीप देखै सोई पारखी
है जब नग मुन्दरी मे जड़ि जायहै तबहीं शोभा होयहै नहीं तो पाहनै है ॥ २८४ ॥
सारीदुनियाँ बिनशती, अपनी अपनी आगि ॥
ऐसा जियरा नामिला, जासों रहिये लागि ॥२८५॥
सारी दुनियाँ अपनी अपनी आगिमें कहे कोई ब्रह्ममें लागिकै कोई नाना
देवतनमें लागिकै कोई नाना मतनमें लागिकै बिशेषते बिनशि रहे है साहब
को नहीं जानै हैं सो कबीरजी कहै हैं ऐसा जियरा कहे रामोपासक सन्त कोई
न मिला जासों लागि रहे अर्थात् सत् सङ्ग करौं कहे जे साहब को नहीं जानैं
ते बिनशि जायहैं तामें प्रमाण ॥ “यश्चरामनपश्येतयं चरामो न पश्यति ॥ निंदितः
सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनंविगर्हते ॥ २८५ ॥
सपने सोया मानवा, खोलि देखै जो नैन ॥
जीव परा बहु लूटमें, ना कछु लेन न देन ॥ २८६ ॥
जो मानुष अपनी आँखि खोलिकै देखै तो सब स्वप्नै है यह जीव बहुत
लूटमें पर्यो है नाना मतनमें नाना उपासननमें लग्यो है साहब को नहीं जानै
ताते न कछु लेन है न देन है यांते या आयो कि इनमें बृथै लागे हैं मुक्ति
काहूकी दई नहीं दैजायहै या सब स्वप्न है तामें प्रमाण गोरख गोष्ठीकों
कबीरजी को गोरख पूंछै हैं ॥
कर्ताकौ स्वरूप कौन! अण्डका स्वरूप कौन! अण्ड पार बसै कौन? नादबिन्दुयोग
कौन ? जीव ईश्वर भोग कौन ? भूमी अवतार कौन ? निराकार पार कौन ?
पाप पुण्य करै कौन ? वेद औ वेदान्त कौन ? बाचा औ अबाचा कौन ?
चंद्र सूर्य भास कौन ? पश्चमें प्रपंच कौन ? ओहं औ सोहं कौन ? स्वर्ग नरक

साखी । ( ६३१ )
बसै कौन ? पिण्ड औ ब्रह्मांड कौन ? आत्म परमात्म कौन ? जरा मरण काल
कौन ? गुरु शिष्य बोध कौन ? क्षर अक्षर निरक्षर कौन ? तबकबीरजीबोले ।
नाद् बिंदु योग स्वप्न, जीव ईश्वर भोग स्वप्न, भौमी अवतार स्वप्न,
निराकार स्वप्न है ।
पाप पुण्य करै स्वप्न वेद औ बेदान्त स्वप्न बाचा औ अबाचा स्वप्न चंद्र
सूर स्वप्न है ॥ इत्यादिक बहुत बाक्यहैं ॥ २८६ ॥
नष्टैका यह राज्यहै, नफरक वरतै द्वैक ॥
सारशब्द टकसारहै, हिरदयमाहिं विवेक ॥ २८७ ॥
नष्टजो है धोखा ताहीको यहराज्यहै अर्थात् अहंब्रह्मास्मि कहिकै सब नष्टभये
औ नफरजो है काल ताही को छेक संसार बरत रह्यो है अर्थात् सब संसारको
काल छेकिछेकि खाये जायहै सारशब्दजो रामनाम टकसार ताको हृदय में
कोई कोई विवेक करतभये अर्थात् कोई साहेबको न जानतभये संसारते न
छूटतभये ॥ २८७ ॥
दृष्टमान सब बीनशै, अदृष्टलखै ना कोइ ॥
हीनकोइ गाहकमिलै, बहुतैसुख सो होइ ॥ २८८ ॥
जहांभरदृष्टमानहै सो सबबिनशै है नाशहोयहै औ मनबचन के अगोचर जो
ब्रह्महै ताकोतौ कोई देखतै नहीं है धोखही है सो दृष्ट अदृष्ट के परे हीन
कोई कहे कोई हीनहोइ अर्थात् दीन होई ताको गाहक ऐसें जे साहब श्रीराम-
चन्द्रते मिलैं जो जीवको तौ बहुतसुख सो होय अर्थात् जननमरण छूटिजाय
साहबके समीप सेवामें बनोरहै तामें प्रमाण ॥ गोसाईंजीकोदोहा ॥ “ पदगहि
कहति सुलोचना, सुनहु बचनरघुवीर ॥ तुमहिं मिले नहिं होइ भव, यथा सिन्धु-
करनीर ” ॥ २८८ ॥
दृष्टिहि माहिं विचारहै, बूझै बिरला कोइ ॥
चरमदृष्टि छूटै नहीं, ताते शब्द्दी होइ ॥ २८९ ॥
जोकहो साहबको देखै कैसे हैं तौ दृष्टिही में विचारहै साहब को देखै है
या चर्मदृष्टिकरिकै साहबको नहीं देखै या बात कोई बिरला बूझै है या जीवकी

( ६३४ ) बीजक कबीरदास ।
हंसजीव बसै है सो या जीवठौरमें न लग्यो कहे साहबकें पास न गयो वहीमन-
के ओटमें रहिगयो अर्थात् मनरूपी सरोवरमें रहिगयो ॥ २९७ ॥
मधुरबचनहैं औषधी, कटुकबचनहैं तीर ॥
श्रवणद्वार ह्वै संचरैं, शालैं सकल शरीर ॥ २९८ ॥
कटुकबचन तीरहैं औ अधुरबचन औषधहैं ते ये दोऊ श्रवण द्वारह्वैकै सञ्चरै
हैं कहे जाइहैं औसिगरे शरीरमें शालै हैं कहे व्याप्त ह्वैजायहैं जो कोई मीठ बचन
कह्यो तौ वासों रागभयो औ जो कोई कटुकबचन कह्यो तौ वामें द्वेषभयो औ
मधुरबचन ते जहां राग कियो जहांमन लग्यो तहँ जन्मतभयो औ कटुकबचन
सुनि कोप करि बधादिक कियो तेहिते आयु हानिभई मरतभयो याते मधुर
बचन कटुकबचन दोऊ बरोबर शालै हैं ॥ २९८ ॥
ई जगतो जहडेगया, भया योग ना भोग ॥
तिलतिलझारिकबीर लिय, तिलठीझारैलोग ॥ २९९ ॥
या जगतो जहडेगयो कहे द्वैगयो काहेते कि न याको योगही सिद्ध भयो
न भोगही सिद्धभयो कैसेउ हजारन वर्षलों योगकै जिये महाप्रलय भररहें
आखिर नाशही ह्वैजाइहै जो धर्मकरि दिविको भोगकियो तौ जब पुण्यक्षीण
ह्वैजाइहै तबतौ मृत्युही लोकको आवै है याते न भोग सिद्धभयो न योग सिद्ध-
भयो सो तिलजो है रसरूपाभक्ति साहबकी ताकोतों श्रीकबीरजी कहैं कि मैं
झारिलियो तिलठी जो है नानाउपासना तिनकी और लोग झारै हैं नभकरै हैं
जामें रस नहीं है ॥ २९९ ॥
ढाढसदेखुमरजीवको, धसिके पैठिपताल ॥
जीवअटकमानैनहीं, गहिलैनिकरयो लाल ॥ ३०० ॥
मरजीवते कहावैं हैं जेसमुद्रमें पैठिरत्न निकारै हैं ताको ढाढस देखो ढाढस
करिकै पातालमें पैठै हैं जीवको अटक नहीं मानै हैं समुद्रते लालगहि लैआवै हैं
तैसे जीव तैहूं मनादिकनको त्यागिदे मरिबेको नडेराय विश्वासकारिकै साहब
रसरूपसागरमें पैठु ॥ ३०० ॥

साखी । ( ६३५ )
येमरजीवाअमृतपीवा, काधसिमरैपताल ॥
गुरुकीदयासाधुकीसंगति,निकसिआउ यहिकाल३०१
ये मरजीवा कहे तैं तो अमृतको पीवनवारो पातालमें धसिकै कहे संसार
में परिकै कहामरै है औ जियै है नरकको चलाजाइ है सो गुरुकी दयातें
साधुनकी संगतिते तू यहिकालमें संसारते निकसिआउ जो तैं साहबके जाननवारें
साधुनकी शरणहोइ वाही चालचलै ॥ ३०१ ॥
केते बुंद हलफे गये, केते गयो बिलोइ ॥
एक बुंदके कारणे, मानुष काहेको रोइ ॥ ३०२ ॥
हा इति कष्टमें है सो कबीरजी कहै हैं कि हाय केतन्यो जीव लफेकहैं
नैगये अर्थात् ढरकि गये अर्थात् साहबके मार्गचले साहबकी उपासनाकियो पै
गुरुवालोग जो नानामत लखायो तिनहींमें लफेकहै नैगये सो केतौ तौ याभका-
रसों गये औ केतौ पहिलेहीते बिगोयगये कहे बिगरिगये सो हे मानुष! श्रीराम-
चन्द्रको जो आनन्दसमुद्र ताके एकबुन्दके कारण हे संसारीजीव ! तैं काहेरोवै
है धोखाब्रह्मको छांडि साहबको जानु जाते जननमरणछूटै ॥ ३०२ ॥
आगिजो लगीसमुद्रमें, टुटिटुटि खसै जो झोल ॥
रोवै कबिरा डिम्भिया, मोरहीरा जरै अमोल॥३०३॥
या संसारसमुद्रमें अज्ञानरूपी आगिलगी कर्मरूप झोल जे शरीरके कारणहैं
ते या देहते टुटिटुटि वा देहमें गये या देह जारिगई याही रीतिते नानादेह धरै
हैं संसार नहीं छूटैहै सो कबीर जी रोवै हैं कि दम्भीह्वैकै मोर अमोल हीरा-
जीव ते अज्ञानरूपी अग्निमें जरेजायहैं ॥ ३०३ ॥
साँचे शाप न लागिया, साँचे काल न खाय ॥
साँचेसाँचे जो चलै, ताको कहा नशाय ॥ ३०४ ॥
कबीरजी कहै हैं कि दम्भकरिकै काहे अज्ञानरूपी आगिमें जरे जाउहौ
जोसांचे साहबमें लगिकै सांचे साधुहोउ तौ वे सबते जबर होइहैं न वाकोशापलगै
न वाकोकाल खायहै सो जाम्बवंतहनुमानादिक अबतकबने हैं ॥ ३०४ ॥

( ६३६ ) बीजक कबीरदास ।
पूरासाहब सेइये, सबविधि पूरा होइ ॥
ओछे नेह लगाइये, मूलौआवै खोइ ॥ ३०५ ॥
पूरा साहब जे सर्वत्र पूर्ण हैं तिनको जो सेइये तौ सबविधि पूरोहोइ
औ ओछे जेहैं नानामत धोखा तौने में जो लगाइये तो नफाकी कौनचालै मू-
लौकी हानिहैजाय है ॥ ३०५ ॥
जाहुबैद्य घरआपने, बात न पूछै कोइ ॥
जिन यहभार लदाइया, निरबाहै वा सोइ ॥ ३०६ ॥
कबीरजी कहैं हैं कि हे बैद्य ! गुरुवालोगौ तुम अपने घरको जाहु तुमकों
बात कोई नहीं पूछै है जिन यह संसाररूपी भारलदाया है कहे संसार उत्पत्ति
कियाहै तौने निर्बाहैगा अर्थात् न निर्बाहैगा येतो सबमायिकहैं अधिक बाँधनेवारें
हैं छुड़ावनेवारे नहीं हैं ॥ ३०६ ॥
औरनके समुझावते मुखमें परिगो रेत ॥
राशि बिरानी राखते, खाये घरको खेत ॥ ३०७ ॥
औरेनको उपदेश करत करत तुम्हारे मुखमें रेत कहे धूरिपरिगई अर्थात्
कुछ न तुमसों बनिपर्चो बिरानी राशि तो तुम राखतेहौ कहे औरे औरेकों
उपदेश करिकै समुझावतेहौ आपने घरको खेत जो स्वरूप ताको नहीं ताकतेहौ
काल खाये लेइहै सो तुम्हारो स्वरूपखेततौ ताको नहीं रहे औरकी राशिकहें
आत्मा तुमकैसे ताकौगे ॥ ३०७ ॥
मैं चितवतहौं तोहिंको, तुम कह चितवै और ॥
नालत ऐसे चित्तको, चित्त एक दुइ ठौर ॥ ३०८ ॥
गुरुमुख ।
साहब जीवसों कहै हैं कि मैं तो तेरी ओर चितवै हौं सदा सन्मुख बनेरहौं
हौं औ तू कहा और और में चित्त लगावै है सो ऐसे तेरे चित्तकों नालति है
कि एक आपने चित्तकों माया में औ ब्रह्ममें दुइठौर लगाये है ॥ ३०८ ॥

साखी । ( ६३७ )
तकत तकावत तकिरहे, सके न बेझामारि ॥
सबै तीर खालीपरे, चले कमानी डारि ॥ ३०९ ॥
साहब कहै हैं कि जेजीव!मोकों तकै हैं अर्थात् मेरे सन्मुख भये हैं तिनको
माया कालादिक जे हैं ते काम क्रोधादिकनते तकावै हैं कि जबहीं संधिपावैं
तबहीं मारिलेइँ औ आपहू ताके रहे हैं परन्तु जे जेमोको तके रहे चारयो युग
तिनको ये कबहूं न बेझा मारिसकै हैं सो जबसबैतीर खाली परे माया कालादि-
कनते तब कमानी डारिकै चलेगये अर्थात् मोको जे हंसजीव जानै हैं तिन में
माया कालादिकनको जोर नहीं चलै है ॥ ३०९ ॥
जस कथनी तस करनियो, जस चुम्बक तस नाम ॥
कह कबीर चुम्बक विना, क्यों छूटै संग्राम ॥ ३१० ॥
जस साधुनकी कथनी कहे कहै हैं तस करनिउहै कैसे जैसे चुम्बक श्रीरा-
मचन्द्रहैं तैसे उनको नामहूं है सो कबीरजी कहै हैं कि रामनाम चुंबकबिना
कामादिकनको संग्राम याको कैसे छूटै जैसे लोहेकोकना धूरिमें मिलोरहै है जब
चुम्बक देखावो तौ वाही में लपटि आवै है धूरिमें नहीं रहै ऐसे या जीव
साहबको है साहबको नाम लेइहै तबहीं संसारते छूटै है नहीं भटकते रहै है॥३१०॥
अपनी कहै मेरी सुनै, सुनि मिलि एकै होइ ॥
मेरे देखत जगगया, ऐसा मिला न कोइ ॥ ३११ ॥
गुरुमुख ।
साहब कहै हैं कि आपनी शंका मोसों कहै पुनि जौन मैं वेदशास्त्रादिकनमें
कह्यो है ताको सुनै औ वह मेरे वाक्यमें मिलावै देखैतो कोई शंका रहिजाती
है अर्थात् न रहिजायगी तब एकै मत ह्वैजाय एकैजो मैं हौं ताहीको जानिलेइ
और सब छोड़ि देइ सो ऐसा मोको कोई न मिला जो मेरे देखत जगगया
होइ कहे जगतते दूरि भया होइ ॥ ३११ ॥

( ६३८ ) बीजक कबीरदास ।
देशदेशहमबागिया, ग्रामग्रामकी खोरि ॥
ऐसाजियराना मिला, जोलेइफटकिपछोरि ॥ ३१२ ॥
कबीरजी कहै हैं कि मैं देशदेश गाउँ गाउँ खोरि खोरि बाग्यो परन्तु ऐसा
जियरा मोको कोई न मिला कि जो मैं कहौ हौं ताको फटक पछोरि लेइ॥३१२॥
लोहे चुम्बक प्रीति जस, लोहा लेत उठाय ॥
ऐसा शब्द कबीरको, कालते लेइ छुड़ाय ॥ ३१३ ॥
लोहेकी औ चुम्बककी प्रीतिहै जो लोहको चुम्बक देखै है सो उठाय लेइहै
ऐसे कबीर जो है कायाको बीर जीव ताको या शब्द रामनामहै जौन जीवनकों
कालते छड़ाय लेयहै जैसे चुम्बक लोहे के किणकाको आपने में लगाय लेइहै
ऐसे रामनाम जीवको में लगाय लेइहै ॥ ३१३ ॥
गुरू विचारा क्या करै, शिष्यहिमेंहैचूक ॥
शब्द बाण बेधै नहीं, बाँसबजावैं फूंक ॥ ३१४ ॥
कबीरजी कहै हैं कि गुरू जो है साहव सो विचारा कहा करै शिष्य जो है
जीव तांहींमें चूकहै कौन चूकहै यासों कि रामनामरूपी जो शब्दबाण ताकें
साथ छइउजेचक्रहैं तिनको बेधिकै सातों चक्र जे हैं सुरतिचक्र ताको बेधिकै
उहां जो गुरुबतावैं हैं मकरतारडोरि ताही चढ़िकै रामनाम रूपीबाणके साथ
साहबके पास जायबो न जान्यो वहै निर्गुण ब्रह्म जो है झूरबाँस ताहीमें लगिकै
फूकि-फूंकि बजावै हैं अर्थात् वोहीको ज्ञानकथै हैं ॥ ३१४ ॥
दादाबाबाभाई कै लेखै,चरनहोइगे बंधा ॥
अबकी बेरिया जोना समझ्यो,सोईसदाहै अंधा ३१५॥
मानुष शरीर पायकै दादा बाबा भाई सब साहिबैको मानै है सोई साहबके
चरणको बंधा होइहै कहे साहबके चरणमें सदा लगे रहै हैं सो अबकी बेरिया
कहे या मानुष शरीर पायके साहबको न जान्यो सोई सदाको अंधाहै॥३१५॥

साखी । ( ६३९ )
लघुताई सबते भली, लघुताइहिसबहोइ ॥
जसद्वितीयाकोचन्द्रमा, शीशनवै सब कोइ ॥ ३१६ ॥
लघुताई सबते भली है लघुताइन ते सब होइहै सर्वत्र साहब को देखै
अपनेको दासमानै तौ वाकी प्रीति साहबमें बढ़ते जाय है औ सब माथनावै हैं
तामें प्रमाण कबीरजीको ॥ "लघुताते प्रभुता मिलै, प्रभुताते प्रभु दूरि ॥
चींटीलै शक्करचली, हाथी के शिरधूरि" ॥ ३१६ ॥
मरतेमरते जगमुवा, मरण न जानै कोइ ॥
ऐसा है के नामुवाजो, बहुरि न मरना होइ ॥ ३१७ ॥
मरते मरते सब जग मराजायहै मरण कोई नहीं जानै है ऐसा हैकै कोई न
मुवा जाते फेरि मरण न होय अर्थात् इंद्रिनते मन ते शरीरते भिन्न हैकै साहबमें
न लगे जाते पुनि जनन मरण नहीं होय ॥ ३१७ ॥
वस्तुअहै गाहकनहीं, वस्तु सो गरुवामोल ॥
बिनादामको मानवा, फिरै सो डामाडोल ॥ ३१८ ॥
वह गरुवा मोलको जो साहबहै सर्वत्र पूर्ण है परंतु वाको गाहक कोई
नहीं मिलै है औ बिना दामको कहे बिना मोलको यह जीव साहबके ज्ञान
बिना डामाडोलमें फिरै है अर्थात् जैसे बाजार में गयो औ सब साज उहां बनी
है औ हाथमें दाम नहीं है तौ डामाडोल फिरै है लै नहीं सकैहै तैसे साहब
सर्वत्र पूर्ण हैं परंतु सतगुरुको उपदेश रूप दाम नहीं है डामाडोल फिरै है॥३१८॥
सिंह अकेला वनरमै, पलकपलककैदौर ॥
जैसा बनहै आपना, तैसा बनहै और ॥ ३१९ ॥
बन जो है शरीर तामें सिंह जो है जीव सो अकेला रमै है औ पलक पल-
कमै दौरकरिकै गुरुवनसों पूछै है सो असनहीं बिचारै है कि जैसा बन कहै
शरीर मेरोहै तैसे औरहूको है जैसे मोको अज्ञानहै तैसे इनहूंको अज्ञानहै येई
नहीं संसारते छूटें हमको कैसे छुड़ावेंगे ॥ ३१९ ॥

( ६४० ) बीजक कबीरदास ।
मरतेमरते जगमुवा, बहुरि न किया बिचार ॥
एकसयानी आपनी, परबशमुवा संसार ॥ ३२० ॥
मरत मरत सबजग मरिगया औ मरत चलोजायहै पै बहुरि कै कहे उल-
टिकै कोई न बिचार कियो कि काहेते मरे जाय हैं अपनी अपनी सयानी तें
एकएक खाविन्द खोजि लियो साहब को न जान्यो जे जीवके मालिक हैं तेहिते
काल के बशह्वै सब मरे जायँ हैं ॥ ३२० ॥
पैठाहै घर भीतरै, बैठाहै साचेत ॥
जब जैसी गति चाहता, तब तैसीमति देत ॥ ३२१ ॥
साहब जो है सो सब के घटमें पैठाहै औ साचेत बैठाहै जब जैसी गति
जीवचाहै है तबतैसीमति जीवको देइहै जीव अणुचैतन्य है साहब विभुचैतन्यहैं
सो जीव जौनेकर्मको सम्मुख होइहै तब चैतन्यता बढाय देइहै तैसेमति बढ़ाय
देइहै औ बिना साहब के समर्थ जीव कछुनहीं करिसकै तामें प्रमाण ॥ "कर्तृ-
त्वं करणत्वं च स्वभावश्चेतनाधृतिः ॥ यत्प्रसादादिमे संति न संति यदुपेक्षया॥
इतिश्रुतेः " ॥ ३२१ ॥
बोलतहीपहिंचानिये, चोरशाहुके घाट ॥
अंतरकी करणी सबै, निकसै मुखकी बाट ॥ ३२२ ॥
जे साहब में लगै हैं ते औ जे धोखाब्रह्म में लगे हैं ते इनको कैसे पहिंचानि-
ये तौ उनके बोलते अन्तरकी करणी मुखकी बाट निकसै है तबहीं चोर शाहु
पहिंचाने परै हैं इहां चोर जो कह्यो सो यह जीव साहबको है तिनको चोराइकै
कहे छोड़िकै धोखामें लग्यो ताते चोरकह्यो है तामें प्रमाण ॥ " नारिकहावैपी-
उकी, रहै और सँग सोइ॥ जारपुरुष हिरदे बसै, खसमखुशीक्योंहोइ"॥३२२॥
दिलकामहरमकोइनमिलिया, जो मिलियासोगरजी ॥
कहकबीरअसमानैफाटा, क्योंकरिसीवै दरजी॥३२३॥
मन दिलका महरमी कहे निःकामह्वै साहब में लगैया कोई न मिल्यो जो
मिल्यो सो गरजवाला मिल्यो ताको तेतनै मँजूरी दै कै साहब अनृण है जाय हैं

साखी। (६४१)
सो कबीरजी कहै हैं कि जो जीव साहबको है तौ जौन जौन बस्तु साहबकी ह
तौनतौन बस्तुजीवहूकी है पै अपनेको असफाटा कहे जुदाजुदामानै है कि साह-
बसों मांगै है कि फलानी बस्तु मोको देउ या मूर्ख नहीं समुझै है कि साहबकी
शरणभये कौनौ बातकोटोटो न रहिजायगी सो दरजी जो साहबहै सो कहां तक
सीवै कहे आपने में मिलावै ॥ ३२३ ॥
बनाबनायामानवा, बिनाबुद्धि बेतूल ॥
कहा लाललै कीजिये, बिनाबासका फूल ॥३२४॥
यह मानवा जो है मनुष्य सो बनै बनावा औ बेतूल है कहे कौनौ देवता
याकी बराबरीको नहीं है पै बिना बुद्धिको है याही ते सबते नीच ह्वैरह्यो है
बिनाबासको कहे बिना सुगंधको लाल फूल लैके कहाकरै ऐसे जीव बहुत सुंदर
भयो औ साहबको न जान्यो और मतनमें लगिकै लालह्वैरह्यो वा बुद्धिनहीं
जाते साहबको बूझै तौ कहाभयो तामेंप्रमाण ॥ “कहाभयो जो बड़कूल उपजे
बड़ीबुद्धि है नाहिं ॥ जैसे फूलउजारिके वृथालालझरिजाहिं ॥ ३२४ ॥
साँच बरोबर तप नहीं, झूठ बरोबर पाप ॥
जाकेभीतरसाँचहै, ताके भीतरआप ॥ ३२५ ॥
या साखीको अर्थस्पष्ट है ॥ ३२५ ॥
करत्तैकियानविधिकिया, रविशशिपरीनदृष्टि ॥
तीनलोकमें है नहीं, जानतसकलौसृष्टि ॥ ३२६ ॥
कर्त्ता पुरुष भगवान् नहीं किया न करतार किया न रवि शशि दृष्टि परी-
न तीन लोक में खोजेमिलै परंतु सबसृष्टि जानै है सो कबीरजी कहै हैंकि या
झूठ कहांते आई है ॥ ३२६ ॥
आगे आगे दव बरै, पीछे हरियर होइ ॥
बलिहारी वा वृक्षकी, जर काटे फल होइ॥ ३२७ ॥
कर्त्ता जगत्को बनायो सो कैसो है ताको कहैहैं आगे आगे दव बरै आगे शरीर
सबके जरत जायहै औ पीछे हरियर होयहै कहे नये नये शरीर धारण होत हैं
४१

( ६४२ ) बीजक कबीरदास ।
सो ऐसे संसाररूपी बिटपकी बलिहारी है जामें जरकाटे फलहोइ है अर्थात जौने
जीवको संसार निर्मूल ह्वैगयो तौने जीवको साहब रूपी फल मिलै है ॥३२७॥
सरहर पेड़ अगाध फल, अरु बैठा है पूर ॥
बहुत लाल पचि पाचि मरे, फल मीठा पै दूर ॥३२८॥
या शरीर रूपी सरहर वृक्ष बड़ा ऊँचाहै सरलहूहै सबको मिलै है और
शरीर वृक्षको फल कहा है साहबको जानै सरअगाध है औ सर्वत्र पूर्ण है
अन्तर्यामी रूपते सबके हियेमें बैठाहै सो ऐसो साहबको ज्ञानरूपी फल मीठाहै
परन्तु दूरि है बहुत लाल कहे बहुत जे जीव हैं ते पचिपचि मरे पै पाये नहीं
अथवा साहबको ज्ञानरूपी फल सरहरहै कहे चीकनहै चढ़ने माफिक नहीं है
खसिलि परै है तामे प्रमाण कबीरजी को ॥
बहुतकलोगचढ़े बिनभेदा देखाशिख गहिपानी ।
खसिलां पाउं ऊर्ध्वमुख झूले परेनरककीखानी ॥
औशरीरकोफल साहबको भजनहै तामें प्रमाण गोसांईजीको ।
देहधरेको या फलभाई, भजोराम सबकाम बिहाई ॥ ३२८ ॥
बैठ रहे सो बानियाँ, खड़ा रहे सो ग्वाल ॥
जागत रहे सो पाहरू, तिनहुंन खायो काल॥३२९॥
बनियां बैठ रहे हैं दुकान लगाय ते गुरुवालोगहैं जे जौने देवताको मन्त्र मांगै
हैं ताको तौनहीं मन्त्र देइहैं औ ग्वालखड़े गौवनको चरावैं हैं तेवे हैं जे आत्मैको
मालिक मानै हैं इन्द्रिनको चरावैं हैं जौने विषय चाहै हैं तौने भोगैं हैं दूसरो
लोक नहीं मानै हैं शरीरहीको मानै हैं औ जे जागत रहे हैं ते पाहरू हैं अपनी
बस्तु ताकै हैं ते योगी हैं आपनी इन्द्रीको ताके रहे हैं समाधि लगाये सदा जाग-
तरहैं सोये तीनों साहबको न जान्यो ताते तिनहुंनको काल धरिखायो॥३२९॥
युवा जरा बालापन बीतयो, चौथि अवस्था आई ॥
जस मूसवाको तकै बिलैया, तस यम घात लगाई॥३३०॥
तीनिउं अवस्था बीत गईं चौथि अवस्था आय गई जैसे मूसको बिलारी ताकें
है ताको घात लगायेहै तैसे यम तोको घातलगाये हैं सो अजहूं साहबको चेतु ३३०

साखी । ( ६४३ )
भूलासो भूला बहुरिकै चेतु ॥
शब्दकी छुरी संशयको रेतु ॥ ३३१ ॥
गुरुमुख ।
साहब कहै हैं कि हे जीव ! तैं भूला सो भूला भला यह संसार ते बहुरि कहै
उलटिकै तौ चेत करौ सारशब्द जो रामनाम छुरी तेहितैं अपनी संशय रेत
डारु कहे काटिडारु अर्थात् रामनामको अर्थ तो विचारु तैं मेरोई है और पदार्थ
छोड़िदे तामेप्रमाण॥ “यक रामनाम जाने बिना भव बूड़िमुवा संसार” ॥३३१॥
सबही तरुतर जायकै, सबफल लीन्हो चीखि ॥
फिरिफिरि मांगत कबिरहै, दर्शनहींकी भीखि ॥३३२॥
सबही तरुतर जायकै कहे शरीर धारण करिकै सुख दुःखरूप फल सब
चाख्यो नाना उपासना योगज्ञान बैराग्य सब कैचुक्यो शरीरधरेको फल कोई
न पायो सो शरीर धरे को फल साहब को दर्शन है सो फिर फिर कबीर
मांगै है ॥ ३३२ ॥
श्रोता तो घरही नहीं, वक्ता वदै सो वाद ॥
श्रोता वक्ता एकघर, तब कथनीको स्वाद ॥ ३३३ ॥
श्रोतातो घरहीमें नहीं है अर्थात् सुनतै नहीं है औवक्ता आपनो मत बादि-
बादिबदै है श्रोताको समुझावै है सो जब श्रोतावक्ता एक घरहोइ कहेएकै उपा-
सनाहोइ एकै मतहोय तब कथनीको स्वाद है कहे कथाको स्वादत-
बहीं मिलै है जैसे याज्ञवल्क्य भरद्वाज इत्यादिक तामें प्रमाण ॥ “इष्ट मिलै
अरु मन मिलै, मिलै भजन रस रीति । तुलसिदास सोइ संतसों, हठ करि
कीजै प्रीति” १॥ दूसरो प्रमाण राम सखेजीको॥ “शिष्य सांच गुरु सांचहै,झूठन
जियत न मान॥बध्यो शिष्य साची प्रकृति, छोरत गुरुदै ज्ञान”॥२॥औ कबीर-
हूजीको प्रमाण। साखी चौरासी अंगकी। “नाम सत्य गुरु सत्यहै,आप सत्य जब
होइ ॥ तीन सत्य प्रकटैं जबै, गुरुका अमृत होइ” ॥ ३३३ ॥

( ६४४ ) बीजक कबीरदास ।
कंचन भो पारस परसि, बहुरि न लोहा होइ ॥
चंदन बास पलास विधि, ढाक कहै नहिं कोई॥३३४॥
पारसको परसिकै कंचनभयो जो लोह है सो फिरि लोहा नहीं होइहै औ
चंदनकें बासते पलाश जो छिउल है सो बेधिगयो ताको ढाक कोई नहीं कहै है
चंदनै कहै है ऐसे जोंजीव साहबकों ह्वैगयो साहब के पासगयो ताको जीव
नहीं कहै है पार्षद रूप कहन लगै है ॥ ३३४ ॥
बेचूनै जग राचिया, सांई नूर निनार ॥
तब आखिरके बखतमें, किसका करौ दिदार ॥३३५॥
बेचून निराकार जौन जगत्को रचिसि है सो सांई के नूरतें कहै प्रकाशते
निनारहै जुदा है अर्थात् साहबकों प्रकाश न होइ वा नूरही अल्लाह है ऐसा
जो मानो तो हे मुस्लमानौ मैं पूछता हौं कि आखिरके बखतमें कहै क्याम-
तिके बखतमें वह इनसाफ करैगा ऐसा कुरानमें लिखता है सो उसको बेचून
मानते हौ निराकार मानते हौ तौ भला वा किसतरहसे इनसाफ करैगा औ
किसका दीदार करौगे अर्थात् किसकी सूरति देखौगे भावयहै कि वा निराकार
नहीं है साकार है तुमको भ्रम भया है सो या बात सत्ताईस रमैनीके मूलमें
ह साहबको नूरजो है प्रकाश सो सबके भीतर बाहर भराहै कोई जगह उससे
खाली नहीं है औ साहब औ साहबकी सामग्री औ साहबको लोक सब नूरही-
नूर कहै वहां बहुतसा नूर समिटिकै एकसल देखि परै है जिसतरहकी मिसाल
कि जैसा साहबहै तैसासाहबै है दृष्टांतकाकोदेइ सो कबीरजी पूछै हैं कि भला
तुमहूँ तो विचारिदेखो कि जो उसके हाथै पांड न होते तौ जगत्को कैसे रचतो
सो साहबसाकार है तुमको निराकारकी भ्रमभई है तामें प्रमाण ।
कलिमा बाँग निमाज् गुजारै । भरम भई अल्लाह पुकारै ॥
अजब भरम यक भई तमासा । ला मकान बेचून निवासा ।
बे नमून् वै सबके पारा । आखिर काको करौ दिदारा ॥
रगरै महजिद नाक अचेता । भरमाने बुत पूजां होता ।
बावनतीसबरण निरमाना । हिन्दू तुरुक दोउ परमाना ॥

साखी । ( ६४६ )
भरमिरहें सब बरणमहँ, हिन्दुतुरुक बखान ।
कहै कबीर बिचारिकै, बिनगुरूकी पहिंचान ॥
भरमत भरमत सब भरमाना, रामसनेही बिरला जाना ॥ ३३५ ॥
सांई नूरदिल एकहै, सोई नूर पहिंचानि ॥
जाके करते जगभया, सो बेचून क्यों जानि ॥३३६ ॥
सांई जो है साहब श्रीरामचन्द्र ताहिको एक नूर सबके दिलमें है सोई
नूर तैं मकाश पहिंचानु जौनेके करते जग सब उत्पन्न भया है ऐसो जो साहब
ताको तू बेचून कहे निराकार न जान वे साहब साकारहैं औनिर्गुणसगुणके-
परे हैं । तामें प्रमाण कबीरजीको साक्षी ॥
श्रूप अखण्डित ब्यापी चैतन्य शैतन्य ।
ऊंचे नीचे आगे पीछे दाहिन बायँ अनन्य ॥
बड़ा ते बड़ा छोटते छोटा मीहीते सब लेखा ।
सबके मध्य निरन्तर सांई दृष्टि दृष्टि सों देखा ।
चाम चश्मसों नजरिन आवै खोजु रूहकें नैना ॥
चून चगून बजूद न मानु तैं सुभा नमूना ऐना ।
ऐना जैसे सब दरशावै जो कछु वेष बनावै ।
ज्यों अनुमान करै साहबको त्यों साहब दरशावै ॥
जाहि रूह अल्लाहके भीतर तेहि भीतरके ठांई ।
रूप अरूप हमारि आश है हम दूनहुंके सांई ॥
जो कोउ रूह अपनी देखै सो साहबकों पेखा ।
कहें कबीर स्वरूप हमारा साहबको दिल देखा ॥ ३३६ ॥
रेख रूप जेहि है नहीं, अधर धरो नहिं देह ॥
गगन मँडलके मध्यमें, रहता पुरुष बिदेह ॥ ३३७ ॥
कैसो साहब है कि जाके रूप रेखा नहीं है औ बिशेषिकै देह धारण कीन्हे
है अर्थात् रसहीरस देह धारण किये है पाञ्चभौतिक नहीं है । औ अधर जौं
आकाश तामें देह कबहूं नहीं धरै अर्थात् जो कबहूं न रहै तब न देह धारै

( ६४६ ) बीजक कबीरदास ।
वातों सर्वत्र पूर्ण है गगनमण्डल के मध्यमें कहें तीन आकाश हैं एक नीचे
एक मध्यमें एक ऊपर सो तीनों आकाशमें वा विदेह पुरुष पूर्ण है ॥ ३३७॥
धरचो ध्यान वा पुरुषको, लाये बज्र केवाल ॥
देखिकै प्रतिमा अपनी, तीनों भये निहाल ॥३३८॥
वह परम पुरुष साहब जे श्रीरामचन्द्र हैं,नव दूर्बा दल जिनको रसरूप शरीर
है तिनको ध्यान धरो जो कहो आनन्द को रूप तो सफेदको है है नव दूर्बादल
श्याम कैसे कहौ है तो जहां बहुत श्वेताई है तहां हरित रंग देखही परै है जो
कहो यह कैसे अनुभव होइ तो सुनौ सब ते श्वेत स्वच्छ गंगाको जल है सौ
जहां गंगाहूमें बहुत जल है बड़ी गहिराई है तहां हरितई देखि परै है । जौं
कहो साहबको कैसे जानैं सो वज्र कपाट लगाइबेकी बिधि आगे लिखि आयें
हैं जलन्धर बन्ध लगायकै झटकादैकै वज्र कपाट लगायो सुरति कमलमें जों
रकारको उद्गार ओङ्कारै है सो सुनि परी है तब वही रकार को जो ध्यान करै
तब सो ध्यान किये साहब आपही प्रकट होय है । यही ध्यान करिकै तीनों
ब्रह्मा विष्णु महेश अपनी अपनी प्रतिमा देखिकै निहाल भये हैं अर्थात् साह-
बके समीप हजारन ब्रह्मा विष्णु महेश देखिकै या निहाल भये कि धन्य
हमारी भाग्य है कि श्रीरामचन्द्रके द्वारमें हमहूं हैं यहां तो कोटिन ब्रह्मांडकें
ब्रह्मा विष्णु महादेव मोजूद हैं ठाढ़े स्तुति करै हैं ॥ ३३८ ॥
यह मनतो शीतल भया, जब उपजा ब्रह्म ज्ञात ॥
जेहि बैसन्दर जग जरै, सो पुनि उदक समान॥३३९॥
जब ब्रह्मज्ञान भयो तब यह मन शीतल ह्वैगयो अर्थात् संकल्प विकल्प
छोड़ि दियो तपिवो मिटि गयो सो जौने बैसन्दरते कहे ब्रह्म ज्ञानते मनकों
संकल्प विकल्प छूटि गयो जग जरि गयों अर्थात् न रह्यो तौन जो ब्रह्म ज्ञान
सों उदक जो साहबकी प्रेमा भक्ति तामें समान अर्थात् जब साहबकी भक्ति
भई तब वा ब्रह्माभि न रहि गई यामें ते या आयो कि ज्ञानको फल साहबकी
भक्ति है तामें प्रमाण ॥ “ ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति ॥ समः