कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६१४ ) बीजक कबीरदास ।
यामें या हेतुहै कि जे नीकी तरह साहबको जानै हैं ते यही दे है जायहैं सो
गोपी याही देहै गई हैं सो ब्रह्मवैवर्तक में प्रसिद्ध है सो गोपिका नीकी प्रकार
जान्यो है ॥ २३० ॥
पूरबऊगै पश्चिम अथवै, भखै पवनको फूल ॥
ताहूको तो राहुगरासै, मानुषकाढेकभूल ॥ २३१ ॥
पूरबते सूर्य उगै हैं औ पश्चिम अथवै हैं पवनको फूलभखै हैं अर्थात् प्रबल
पवन चलै है वाही भ्रमत रहै हैं ऐसें सूर्य हैं तिनहूं सूर्य को राहुगरासै है अरे
मनुष्य जो तैं भूलै है कि पवनते मैं आत्माको चढ़ाय लेउँगो हजारन वर्षपवनै
खाय जिवोंगो मुक्त है जायगो सो तैं केतेदिन पवनखायगों जे सूर्य केतौदिन
पवनखायो ताहूको कालराहु गरासै है तैं कैसे कालते बचौगे ॥ २३१ ॥
नैनके आगे मन बसै, पलपलकरै जो दौर ॥
तीनि लोक मन भूपहै, मन पूजा सब ठौर ॥ २३२ ॥
ज्ञाननयनके आगे मनहीं बसै है वह धोखाब्रह्म मनहीं को अनुभव है
पलपलमें दौरै है नयन बिषयनमें लगै हैंनाना मतनमें लगै हैं नानाज्ञान बिचा-
रकरै हैं तीनि लोकमें या मनहीं भूपहै मनहीं की पूजा सब ठौर होइहै अर्थात्
मनहीं ब्रह्म है पुजावै है मनहीं जीवात्माको ज्ञान करै है किं मैहीं मालिकहौं
जों मनके परे साहब हैं ताको कोई नहीं जानै हैं ॥ २३२ ॥
मन स्वारथ आपहि रसिक, विषय लहरि फहराय ॥
मनके चलतै तन चलत, ताते सरवसुजाय ॥ २३३ ॥
या आपनो स्वारथ मनहींको मानिलियो मनको रसिक आपही भयो अर्थात्
मनको रस आपही लेइ है मनके किये जे पाप पुण्य तिनको भोगैया आपही
बन्यो है याही हेतुते याके बिषय लहरि फहरायरही है सोई विषयनको जब
मनचल्यो तब जीवहु चल्यो मनके चलते तनहूं चल्यो जाय है बिषय करनकों
ताते सरबसुहानि या जीवकी होती है अर्थात् बिषय लिये पापादिक कर्मकियो
नरकको गयो औ येई बिषयन लिये अप्सरनको भोगकरै है नानायज्ञादिक कियों