कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाखी । (६०९)
ताल मृदङ्ग बजाइकै मङ्गल गाइये ।
साधु सङ्ग लै आरति तबहिं उतारिये ॥
आरति करि पुनि नारियल तबहिं मोराइये ।
पुरुषको भोग लगाइ सखा मिलि खाइये ॥
युग युग क्षुधा बुझाइ तौ पाइ अघाइयें ।
परम अनंदित होइ तौ गुरुहि मनाइये ॥
कहै कबीर सत भाय सो लोक सिधाइये ।
इहां पूजा के मंत्र नहीं लिख्यो सो पुरुष सूक्तनके मंत्र हैं ताते नहीं लिख्यो है॥
“दशौ दिशा कर मेटौ धोखा। सो कड़हार बैठही चोखा।
दशौ दिशा कर लेखा जानै। सो कड़हार आरती ठानै॥
दशइंद्रीकै पारिख पावै। सो कड़हार आरती गावै।
जो नहिं जानै एतिक साजै। चौका युक्ति करै क्यहि काजै॥
हिंस कारण करहिं गुरुआई। बिगरै ज्ञान जो पंथ पराई।
पद साखी अरु ग्रंथ दृढ़ावै। बिन परखन उत्तम घर पावै॥
शब्द साखीसिखिपारस करहीं। होय भूत पुनि नरकहि परहीं।
विना भेद कड़हार कहावै। आगिल जन्म श्वानको पावै॥
पद साखी नहिं करहि बिचारा। भूंकि रजस मरै सियारा।
पद साखी है भेद हमारा। जो बूझै सो उतरहि पारा॥
जबलग पूरा गुरू न पावै। तब लग भवजल फिरिफिरि आवै।
पूरा गुरु जो होय लखावै। शब्द निरखि परगट दिखलावै॥
एक बार जिय परचौ पावै। भव जल तरै बार नहिं लावै।
साखी-शब्द भेद जो जानहीं, सो पूरा कड़हार ॥
कह कबीर धूमक्ष है, सोहं शब्दहि पार ॥ २१८ ॥
आस्ति कहो तो कोइ न पतीजै, बिना आंस्ति को सिद्ध॥
कहै कबीर सुनो हो सन्तो, हीरै हीरा विद्ध ॥ २१९ ॥
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