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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 658

( ६२० ) बीजक कबीरदास ।
जाय है तामैं प्रमाण ॥ “इच्छाकर भवसागर बोहित राम अधार॥ कह कबीर
हरि शरण गहु गोबछ खुर बिस्तार ॥ २४७ ॥
ज्ञान रत्नकी कोठरी, चुपकरि दीन्हो ताल ॥
पारखि आगे खोलिये, कुंजी बचन रसाल ॥ २४८ ॥
ज्ञान रत्नकी जो कोठरी है तामैं चुपको तारा दीन्हे ही रहिये जो कोई
समुझनेवारो पारखीहोइ ताहीके आगे रसालबचन कुंजीते चुपको तारा खोलिकै
ज्ञानको प्रकटकरिये काहेते कि जे नहीं समुझैं हैं तिनके आगे न कहिये साह-
बको ज्ञानरत्न वे कहाजानैं ॥ २४८ ॥
स्वर्गपतालके बीचमें, द्वैतुमरीयकबिद्ध ॥
षटदर्शन संशयपरो, लखचौरासीसिद्ध ॥ २४९ ॥
यह स्वर्ग पातालरूपी वृक्षमें जीव ईश्वररूप दुइतुमरीलगी हैं तामैं जीवरूपी
तुमरीबेधी है कहे जीवहीते नानाशब्द निकसै हैं शरीर सारी हैं सो येई जे
जीवहैं षट्दर्शनआदिदै कै तिनको नाना मतकरिकै संशयपरो है साहबको नहीं
जानै हैं एक सिद्धांत नहीं पावैं हैं तिनको चौरासी लाख योनि सिद्धि बनी हैं
भटकतही रहै हैं ॥ २४९ ॥
सकलौदुरमतिदूरिकरु, अच्छाजन्मबनाउ ॥
कागगवन बुधिछोड़िदे, हंसगवनचलिआउ ॥ २५० ॥
साहब कहैं हैं कि अरे जीव ! तेरो जो सकलहै शरीर सोई दुर्मति है सो
पांचौ शरीरनको छोड़िदे औ आपनो अच्छो जन्म बनाउ कागबुद्धि को त्यागू
मेरो दियो हंस शरीर तामैं टिकिकै मेरे पास आउ ॥ २५० ॥
जैसीकहै करै जो तैसी, रागद्वेष निरुवारै ॥
तामैं घटै बढ़ै रति औ नहिं,यहिविधिआपसँभारै॥२५१॥
गुरुमुख ।
साहबक कहैं हैं कि जैसो उपाय मैं तेरे छूटिबेको कहि आयौं है तैसोकरै
औ संसारमें नाना रागद्वेष करि राखै हैं ताको निरुवारै मोमें प्रीति रत्तिउभर
घटै न पावै एकरसही आवै ॥ २५१ ॥