कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाखी । ( ६११ )
अर्बखर्बलौं द्रव्यभई अथवा अर्बखर्बलौं विद्याको पढजाता भयों साखी शब्द
चौपाई दोहा कंठ भये सब शास्त्र कंठभये औ उदय अस्तलौं राज्यभयो बड़ों
बादशाह भयो सबको अपने बश कैलियों अथवा महंत भयो पंडित भयों
सबको उदय अस्तलौं चेला करिलियो औ शास्त्रार्थ करिकै जीतिलियो औ मन
न जीत्यो तौ कहा कियो भक्तिके माहात्म्यको नहीं तुलैहै ॥ २२३ ॥
मच्छ बिकाने सब चले, ढीमरके दरबार ॥
रतनारी अँखियांतरी, तूं क्यों पहिराजार ॥ २२४ ॥
मनमें लगिकै सबजीव मच्छमायाको अनुभव ब्रह्म है ताहीके हाथ जीव
बिकाय गये औ ढीमरके दरबार सब चले जायहैं अर्थात् काल मनरूपी जालमें
सबको फँदायलेइहै ताहीके दरबार सब चलेजायाँहैं अर्थात् मायाके मारिबेकों
सब उपायकरै हैं कि माया को नाशकैकै ब्रह्महैजायँ मनरूपी जालमें फन्दे
मछरी जो मायाको अनुभव ब्रह्म ताही के साथ बिकाय गये अर्थात् वही में
लीनभये ताहूपै कालते न बचे सो साहब कहै हैं कि तैतो मेराहै तेरे ज्ञान
नयन रतनार रहेहैं कहे मोमें तेरो अनुराग रह्यो है तैं काहे मनरूपी जालमें
परिकै कालके दरबार चलो जायहै जामें मेरो अनुरागहै वे आपनो ज्ञान नयन
खोलु मेरी निर्गुण भक्ति छागुणवारी है सो करु मेरे पास आइकै मन मायाँ
कालते बची जायगो ॥ २२४ ॥
पानी भीतर घरकिया, शय्या किया पतार ॥
पांसापराकरमको, तबमैं पहिरा जार ॥ २२५ ॥
जीवमुख ।
जीवकहै हैं कि मैं वाणीरूप पानीमें घरकियाहै गुरुवालोगँ वाणीको उपदेश
करिकै वही वाणीरूप पानीमें डारि दिये औ संसाररूपी जोपतारहै बन तामें
शय्याकिया तब कर्मको पांसापर्यो तामें मनरूपी जाल मैं पहिरयो अर्थात्
मनरूपजाल में फँदिगयो ॥ २२५ ॥