कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाखी। ( ६१९ )
बारह लक्षमें लगायो अर्थात् छःशास्त्रके सिद्धांतमें छःदरशनमें लगाय दियो
बारह बाट भयो मोको न जान्यो सो जब ज्ञानरूपी कसौटीमें कस्यो कि साहब
को ज्ञानहै कि नहीं तब पीतरही द्वैगयो जगन्मुखै ठहरयो साहबमुख न ठहरयो
सहाबको ज्ञान सोना न ठहरयो ॥ २४४ ॥
कबिरन भक्ति बिगारिया, कंकर पत्थर धोय ॥
अन्दरमें विषराखिकै, अमृत डारै खोय ॥ २४५ ॥
कबीरा जे जीव हैं ते भक्ति को बिगारि डारचो कंकर जो है जौने को पत्थर
जो हे मन तामें धोयकै॥"पाहन फोरि गंगयक निकरी चहुँदिशि पानी पानी॥"
या पदमें पाहन मनको लिखि आये हैं सो पाषाणमें जो कंकरधोवै तौ और
चूरचूरहै जाय सो मेरे भक्तिरूपी जलमें आपने अणुजीव कन्करको तैं नहीं धोये
पाथरमें धोये ताते चूरचूरहै नानामत नानादेवमें लागे आपने स्वरूपको न जाने
अन्दरमें विषयरूपी विषराखि अमृतरूप साहबको ज्ञानताको खोइ डाल्यो॥२४५॥
रही एककी भई अनेककी, वेश्या बहुत भतारी ॥
कहकबीर काके सँगजरिहै,बहुत पुरुषकी नारी २४६॥
गुरुमुख ।
साहब कहै हैं कि हैं जीव! तैं तो मेरो रह्यो है सो तैं अब बहुत मतनमें
लगिकै बहुत मालिक मानन लग्यो सो कौन तेरो उद्धार करैगो बहुत भतारी बेश्या
काके काके साथ जरैगी ॥ २४६ ॥
तनबोहित मन कागहै, लखयोजन उड़ि जाय ॥
कबहीं दरिया अगमवह, कबहीं गगन समाय ॥२४७॥
ये चारिउ शरीर बोहित कहे नावहैं तामें मनरूपी काग बैठा है सो लख यो
जनलौं उड़ि जायहै कबहूं संसार समुद्रमें बहत रहै है औ कबहूं पाँचवां शरीर जो
कैवल्य चैतन्यकाश अगम जायबे लायक नहीं तामें महालयादिकनमें समायहै
सो जे हरिकी शरण जायहैं ते यहि संसार समुद्रको गोखुरकी तुल्य उतरिं