कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाखी । ( ६१३ )
बिन रसरी गरसब बँध्यो, तामें बँधा अलेख ॥
दीन्हो दर्पण हाथमें, चशमविना क्यादेख॥२२७॥
गुरुमुख ।
बिनरसरी सबकेंगर बाँधिलियो ऐसो जो है धोखाब्रह्म तामें अलेख जे जीव
हैं ते बँधे हैं साहब कहैं हैं तिनके हाथमें दर्पणदियो रामनाम बताइ दियो सो
चशम तो हैं नहीं कहे रामनामको ज्ञानतो है नहीं; आपनोरूप कैसे देखें किमैं
साहबको अंशहौं मकार स्वरूपहौं जब आपनोरूप न जान्यो तब मोकों
कहां जानै ॥ २२७ ॥
समुझाये समझै नहीं, परहथ आप विकाय ॥
मैंखैंचतहौं आपको, चला सो यमपुर जाय ॥ २२८ ॥
साहब कहैं हैं कि मैं बहुत समझाऊंहौं कि तैं मेरो है मेरे पास आउ आनकें
हाथ कहां बिकान जायहै नानामतनमें लागै है ब्रह्ममें लागै है कि आपहीकों
मालिक मानै है सो मैं बहुत खैंचतहौं अपनी ओर कि तैं मेरे पास आउ यह
यमपुरहीको चलोजायहै ॥ २२८ ॥
लोहे केरी नावरी, पाहन गरुवा भार ॥
शिरमें विषकी मोटरी, उतरन चाहै पार ॥ २२९ ॥
या काया लोहेकी नाव संसारसमुद्र पारजाबेको है मन पाहन ताको
गरुवाभार भरो है तापरं विषयरूप विषकी मोटरी शिरपर लीन्हे है सो जीव
कैसेकै पारजाय ॥ २२९ ॥
कृष्णसमीपी पाण्डवा, गले हेवारहि जाय ॥
लोहाको पारस मिलै, काई काहेक खाय ॥२३० ॥
कृष्णसमीपके बसनवारे पाण्डवा ते हेवारमें गले जाय सो कृष्णचन्द्रकों जौं
वे जानते तो हेवारमें काहेको जाते काहेते जो पारसमें लोहा छुइ जातो है तामें
काई नहीं लगै है अर्थात सोनाहै जायहै साहबको जाननवारो पारसही है जायहै