कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६०६ ) बीजक कबीरदास ।
बेलि कुठंगी फलबुरो, फुलवा कुबुधि वसाय ॥
मूल विनाशी तूमरी, सरोपात करुआय ॥२१४॥
यह मायारूपी जो बेलि है सो कुठंगी है काहेते कि याको दुःख रूपी फल
बुरो है औ कुबुधि जो है सोई फूलहैं वाकी नाना वासना जें हैं सोई बास बसायहै
सो यह मूल विनाशीहै अर्थात् मिथ्याहै याको मूल नहीं है आपहीते उत्पत्ति
भई है औ जेते भर मायिक पदार्थ हैं ते पातहैं तिनमें सबमें करुआई है अर्थात्
साँचे सुख नहीं हैं ॥ २१४ ॥
पानीते अति पातला, धूवाँते अति झीन ॥
पवनहुँते अति उतला, दोस्त कबीरा कीन ॥२१५॥
पानिहुँते पातर धूमाँ ते झीन औ पवनौते चंचल ऐसो जो क्षुद्रमन ताको
कबीराजे जीव ते दोस्त किये हैं सो चौरासी लक्षयोनिमें डारदियो ॥२१५॥
सतगुरुबचनसुनौहोसन्तौ, मतिलीजैशिरभार ॥
होहजूर ठाढ़ारकहौं, अबतें समर संभार ॥ २१६ ॥
साहब कहैं हैं सतगुरु जो कबीर तिनको वचन सुनिकै हे संतौ आपनेमें
मनको भारामति लेहु तुमसों समर ह्वै रह्यो है सो मनको जीति लेहु मैं हजूरमें
ठाढ़कहौं हौं अर्थात् दूरि नहींहौं जो तुम मनको जीतौ तौ मैं अपनायलेहुं २१६
ये करुआई बेलरी, औ करुवा फलतोर ॥
सिंधुनाम जब पाइये, बेलबिछोहा होर ॥ २१७ ॥
हे कल्पणारूप बेलि! तेरा फल बहुतकडुवाहै जो कल्पना करै है सो नरकही को
जायहै सो तब सिंधुनाम पावैगो जौने जगतमुख अर्थवेद शास्त्रमाया ब्रह्मजीव
सब जगत्भरोहै तौनेको जब पावैगो तब साहबमुख अर्थ जानिकै साहब रत्नको
पावैगो तब कल्पना बेलि को बिछोह ह्वै जायगो ॥ २१७ ॥
परदे पानी ढारिया, संतौ करहु विचार ॥
शरमी शरमा पचि मुआ, काल घसीटन हार॥२१८॥