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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

विप्रमतीसी, कहरा, बसंत, चांचर, बेलि, बिरहुली एवं हिंडोला प्रकरण

शब्द । ( ३३३ )
जोलहा बीनेहु हो हरि नामा। जाके सुर नर मुनि धरैं ध्याना ।
ताना तनैको अउठा लीन्हे चर्खी चारिहु वेदा
सरखूटी यक राम नरायण पूरण कामहि माना ॥ १ ॥
श्रीकबीरजी कहैहैं कि, जोलहा जो मैं हौं सो हरिके नामको बिनौ हौं । वें
हरि कैसेहैं कि, जिनको सुर नर मुनि ध्यान धरै हैं । कौनी तरहते बिनौहौं सो
उपाय कहौहौं । कोरिनके यहां ताना तनिबेको अउठाने नापिलेइहैं औ इहां
अउठानो शरीरहै ताको साढ़ेतीनिहाथको नापिलियो अथवा अंगुष्ठमात्र लिंगश-
रिरहै सो मनोमय है ताको मैं हरिनाम बिनिबेको धारणकियो है । नहीं तौ मैं
मनके परे रह्यो हौं । औ कोरिनके इहां चर्खीते सूत खैंचिकै केंडा करि लेइहैं,
औ इहां चारो वेद जे हैं तेई चर्खी हैं तिनके तात्पर्यते आत्माको स्वरूप “कि
तैं परमपुरुषपर श्रीरामचन्द्रको है” यहीसूत जीवात्माको निकास्यो । औ कोरि-
नके इहां सर औ खूंटीते तानाको पूरैहैं अरु इहां श्री इहां वैष्णवह्वै गुरुके मंत्र
पावैहै रघुनाथजीको षडक्षर और नारायणको द्वयक्षर औ अष्टाक्षर सो सर खूटी•
राम औ नारायण ये नामहैं । एकनामको सरबनायो एक नामको खूटी बनायो
इनहींको नामलिये हरिनामरूपी कपरा बिनिबे को मैं अधिकारी भयो । यह मैं
मान्यो कि, मैं पूरिदेहौं रामनाम दुइ खूंटी हैं नारायण नामसर है ॥ १ ॥
भव खागर यक कठवत कीन्हो तामें माड़ी सानी ।
माड़ीको तन माड़ि रहोहै माड़ो विरला जाना ।
त्रिभुवन नाथ जो मंजन लागे इयाम मुरारिया दीना ।
चाँद सूर्य दुइ गोड़ाकीन्हो मांझदीप किय ताना ॥ २ ॥
कोरिनके इहां माड़ी सानी जाइहै तब एक कठौतामें धरैं हैं सो इहां भवसा-
गर कठौताहै औ चारों शरीर माड़ी हैं तामें जीव सूतसनो है इहां साधनअव-
स्थामें चारों शरीरमें वह नामको भावनाकरिकै जो जपिबो है मुमुक्षुदशामें
सोई सानिबो है सो नाम उच्चारणकी विधि कोई विरला जानै है सो रामानुजा-
चार्य आपने राममंत्रार्थमें लिख्यो है यह नाम स्मरणको शरीर धारण कियो सों

( ३३४ ) बीजक कबीरदास ।
जब नामस्मरण न कियो सोई शरीर रूपी माड़ी याके माड़ि रह्योहै कहे लपटि
रही है औ कोरिनके जब वाको मांजे हैं तब मांडी सम हैजाइहै औ मैल छूटि
जाइहै। औ इहां त्रिभुवननाथ जो मनहै सो रेचक कुंभक पूरक जे कूचाहैं तिनमें
मांजनलग्यो कहे नामको जपनलग्यो औ जीवको माड़ी जोहै चारो शरीर
तिनको सम कै दियो कहे एक करि दियो औ । कोरिनके मांजत में जब तागा
टूटि जाइहै तौनेको मुरेरिकै जोरि देइहै सो मुररिया कहावैहै इहां नामके स्मरण
में जब बीचपरै है तब कहीं श्याम कहीं गोपाल कहीं कृष्ण इत्यादिक नाम लैके
धागा जोरिदेइहै। औ कोरिनके दुइगोडा कहे दुइ घोरियाके बीचमें ताना तनेंहैं औ
इहां चांद सूर्य जे इड़ा पिंगला तिनके बीचमें दीप जो सुषुम्णा नाड़ी है ताको
ताना कियो। ताना वाको काहेते कह्यो कि, वह साहबके लोकते लै मूलाधारचक्र
लौं रश्मिरूप तनी है जीवही सुषुष्णा नाड़ी है भक्तन को जी उतरै चढ़ै है ॥२॥
पाई करिकै भरना लीन्हो वे बांधै को रामा
वे ये भरितिहुँ लोकै बांधै कोइ न रहे उवाना ।
तीन लोक यक करिगह कीन्हो दिगमग कीन्हो तानै
आदि पुरुष वैठावन बैठे कविरा ज्योति समाना ॥ ३॥
कोरिनके इहां पाई साफ करिबेको कहै हैं औ कमठिनके बीचते
सूत निकासी लेइहै सो भरना कहावै है सो इहां चारो शरीर माड़ी
मांजिकै कहे चारयो शरीर छोड़ायकै जीवको साफ करि कै कहे सूक्ष्म
बिचारते जीव को स्वरूप निकस्यो कि, रामहीको है औरेको नहीं है औ
कोरिनके राक्षकी जो कमठी ताके छिद्र ह्वै सब सूतको निकासीलेई है औ दुइ
सूत बांधिदेइह सो वे कहावैंहैं औ तीनि फेरी करिकै सूतको गांसि देई है सो
तिलोक कहावैहै। औ उबान वह कहावैहै जो बाहर सूत रहिजाइहै सो उबान न
रहिगयो सो इहां दोनों कुंभकमें राम जे दुइबर्ण हैं रकार मकार तिनको बांधि
दियो । बहिरे जब श्वास जाइहै तब जहांते थंभिकै लौटै है सो कुंभक कहावै है
तहां रकार जपै है तब सूर्यके प्रकाशको भावनाकरै है औ जब भीतर श्वास जाइहै
औ थंभिकै लौटै है तहां मकार जपै है तब चन्द्रमाको प्रकाशको भावना करै है

सो जौन साधारण श्वास चलैहै नासिकाते बारह आंगुर भीतर जायहै बारह
आंगुर बाहर जायहै जहां जहांते थंभि थंभिकै लौटै है तहां रकार मकार को
जपिकै वे आंगुरनको घटाइ बूझै दूनों कुंभकनको घटावनलगै इसतरहते वे जो हैं
श्वास ताके बांधतमें जब श्वासके क्रमते घटाइक तहुँलोकै बांधै कहे त्रिकुटीमें
बांधिदेइ अर्थात् एक आंगुर भीतर जानपावै न एक आंगुर बाहर जानपावै औ
एक आंगुर बीचमें राखै सो यहि तरहते जो कोई करै है सोई उबान नहीं रहै है
कहै संकल्प विकल्प मिटि जाइहै जपकरतमें काहेको उबैगो ताको रामनामही
तीनों लोक देख परै है वोत बाहर नहीं देखपरै है। जहां कोरी बीननको बैठै है
सो कारिगह कहावै है जब कपरा बीनि चुके तब तहां तीनि घरी करिकै कपरा
धरि देइहै औ तानाको दिगमग कहे जहां तहां डारिदेइहै इहां तीनि लोकमें
फैली जो जीवकी वृत्ति है ताको जहां अपने स्वरूपमें आत्माकी स्थिति है तहां
कैवल्यमें राख्यो । तीनि आंगुर श्वासा करिकै जो स्मरण करतरह्यो सो मन पव-
नको एक घर कै दियो तब संकल्प विकल्प सब मिटिगयो यह ताना शरीरमें
तन्यो रह्यो ताको दिगमग कियो कहे पृथ्वीको अंश पृथ्वीमें जलको अंश
जलमे तेजको अंश तेजमें वायुको अंश वायुमें आकाशको अंश आकाशमें
मिलाइदियो ये पंच भये औ मनको बुद्धिमें बुद्धिको चित्तमें चित्तको
अहंकारमें अहंकार को जीवात्मामें मिलाइदियो ये पांचभये ये सबताना
दशौ दिशा में फैलाइ दियो तब याको सुधि भूलिगई एक जीवात्माभर रहिगयो
औ जब कपरा तय्यार ह्वैजाइहै तब कोरीके यहां मालिक को पयादा आवै है
तब पयादाके साथ मालिकके यहां कपरा कोरी लैजाइहै औ यहां आदिपुरुष
जे परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्रहैं ते बैठावन देइ हैं कहे याको हंसस्वरूप देइहैं
सोई पयादाहै ताके साथ ह्वैकै कहे तामें स्थितह्वैकै कबीर जो मैंहों सो वह
जोहै कैवल्यरूप ताते छूटि कै पार्षदरूप पाइकै परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्रके
लोकको प्रकाशरूप जोहै ब्रह्म तौने ज्योतिमें समाइकै कहे वाको भेद परम
पुरुष पर श्रीरामचन्द्रके धामकों गयो भाव यह है जैसे कोरी थान मालिक
के नजर कैदेइहै तैसे अपने आत्माको शुद्ध करिकै परम पुरुष पर श्री रामच-

न्द्रको अरपि दीन्ह्यो जाइ ज्योति भेदिकै साहबमें समाइगयो तामें प्रमाण ॥
"तज्ज्योतिर्भेदेनसक्ता रसिका हरिवेदिनः॥" इति॥औ श्रीकबीरहूजीको प्रमाण॥
'जैसे माया मन रमै तैसे राम रमाय । तारामंडल भेदिकै तबै अमरपुर जाय'॥३॥
इति चौंसठवां शब्द समाप्त ।
अथ पैंसठवां शब्द ॥ ६५ ॥
योगिया फिरिगयोनगरमँझारी।जायसमान पांचजहँनारी १
गये देशांतर कोइ न बतावै।योगिया गुफा बहुरि नहीं आवै२
जरि गो कंथ ध्वजागो टूटी।भजिगो दंड खपरगो फूटी॥३॥
कह कबीर यह कलिहै खोटी।जोरह करवा निकलल टोंटी४
योगियाफिरिगयो नगरमँझारी।जाय समानपांचजहँनारी १
जौने ब्रह्मांडमें पांचनारी जे बयारि हैं नाग कूर्म कृकल देवदत्त धनंजय
ई जिनमें समाइहैं ऐसे प्राण अपान व्यान उदान समानते जामें समाइगयेहैं
तौन जोहै नगर ब्रह्मांड ताके मांझते योगिया जो है योगी सो फिरिजाइहै
कहे फिरिफिरि ब्रह्मांडको प्राण चढ़ाइ लैजाइहै ॥ १ ॥
गये देशांतर कोइ नबतावै।योगिया बहुरि गुफानाहिं आवै २
जरिगो कंथ ध्वजागो टूटी।भजिगां दंड खपरगो फूटी॥३॥
जब वह योगी शरीर छोड़्यो तब कोई नहीं बतावै है कि कौन देशांतर
को गयो कौने लोकको गयो काहेते कि कौन्यो लोक को तौ मानतै नहीं है
तेहिते यही शरीर पुनि पावैहै तब वह योगकी सुधि बिसरि जाइहै पुनि
नहीं गुफामें आवैहै कहे पुनि नहीं प्राण चढ़ावत बनै है॥२॥कंथजोहै शरीररूपी
गुदरी सो जरिगयो तब ध्वजा जो है पवन तौनेकी धारा टूटिगई तब मेरुदंड
भंजित द्वैगयो कहे टूटिगयो औ खप्परजो है ब्रह्मांडकी खंपरी सो फूटिगई ॥ ३॥
कह कबीर यह कलिहै खोटी।जोरह करवा निकसलटोंटी४
श्रीकबीरजी कहै हैं कि यह कलि बड़ो खोटोहै अथवा यह कलि जो है
झगड़ा सो बड़ो खोटहै यह कोई नहीं बिचारै है कि जब शरीरही नहीं गयो

तब ब्रह्मांड कहां रहिगयो जहां ब्रह्मांडमें लीनह्वैकै बनो रह्यो सो यह बात
ऐसी है कि, जे ब्रह्मांडमें प्राण चढ़ावैं हैं तिनके जब शरीर छूटिजायहैं तब उनक
गैवगुफा सब मरिजाँयहैं तब गैवगुफा रूपी करवामें जो प्राण चढ़ो रहै है सो
जब दूसर शरीर धर्यो तब नासिका जो है टोटी तहांते वहै पवन निकसैहै
वही वासना लगी रहैहै तेहिते फिरि गुरुसों पूछिकै अभ्यास करनलगे हैं ॥ ४ ॥
इति पैंसठवां शब्द समाप्त ।

अथ छाछठवां शब्द ॥ ६६ ॥
योगिया कि नगरी बसै मतिकोइ। जोरेवसै सो योगिया होइ १
वह योगियाको उलटाज्ञाना। काराचोला नाहीं म्याना२॥
प्रकट सो कंथा गुप्ताधारी । तामें मूल सजीविनि भारी॥३॥
वा योगियाकी युगुति जो बूझै।रामरमै सो त्रिभुवन सूझै ॥४॥
अमृत वेली क्षण क्षण पीवै। कहकबीर सो युग युग जीवै॥५॥
योगिया कि नगरी बसै मति कोइ।जोरे बसै सो योगिया होइ
योगिया जो है योगी ताकी नगरी जो है ब्रह्मांड गैवगुफा तहां कोई न
बसौ अर्थात् हठयोग कोई न करो काहेते कि, जो कोई वह नगरीमें बसै है
अर्थात् हठयोग करै है सो योगियै होइहै कहे फिरि फिरि वही वासना करिकै
योगिया होइहै योग साधै है जन्म मरण नहीं छूटै है ॥ १ ॥
वह योगिया को उलटा ज्ञाना।कारा चोला नाहीं म्याना २
सो वह योगी को उलटा ज्ञान है कहे उलटे पवन चढ़ावै है अर्थात् या
शरीर को वेदांत शास्त्रमें निषेध करै है कि, यही शरीर ते आत्मा भिन्नहै
तौनेही शरीरको योगी प्रधान मानै हैं कि यही शरीर ते मुक्त ह्वैजायेंगे सो
इनको चोला जो है मन जौनेते शरीर पावै है औ मनै गैवगुफामें समाइ
जाइ है नाना प्रकारके जे कुत्सित कर्म हैं तिनते मलीन ह्वै रह्यो है याते
२२

( ३३८ ) बीजक कबीरदास ।
ताको कारकह्यो औ म्याना छोटा को फ़ारसी में कहै हैं सो वह मन छोटा
नहीं है बड़ो है सब संसार अरु चारों शरीर मनमें भराहै ॥ २ ॥
प्रकट सो कंथा गुप्ताधारी । तामें मूल सजीतनि भारी ॥ ३॥
अरु जो बहुत योग करिकै ब्रह्मांडमें प्राण चढ़ाइकैक प्राणको गुप्तकियो है
सो प्रकटै है ते वे योगी कंथाजो है शरीर ताको धारण किये रहे हैं बहुत दिन
जियै हैं ताको हेतु यहहै कि, मूल सजीविनि अमृतहै सो भारी कहे बहुतहै सो
चुवत रहै है जैसे संजीवनी ओषधि महाप्रलय भये नहीं रहि जाइहै सो याको
वह जियावै है सोऊ नहीं रहिजायहै तैसे जो कोई मूड काटि डारचो अथवा
कोई शरीर को खाइलयो तब न वह अमृत रहिजाइ न वे रहिजाइँ ॥ ३ ॥
वा योगिया की युगुति जो बूझै । राम रमै सो त्रिभुवन सूझै४
अमृत वेली क्षण क्षण पीवै । कह कबीर सो युग युग जीवै५
सो ये जो हैं योगी ते युगुति करिकै जिये हैं आखिरमें इनको जन्म मरण
नहीं छूटै सो या जोगियाको हठयोग छोड़िकै जो कोई वा योगी की युगुति बूझै
जे राजयोग करनवारे हैं सो रामरमै तब वाको त्रिभुवनमें रामई सूझिपरे॥४॥
अरु श्री कबीरजी कहै हैं कि, अमृतबेलि जो है रामनाम ताको क्षण क्षण में
पिये कहे श्वास श्वास में राम नाम स्मरण करै है सोई हनुमान बिभीषणा-
दिक के तरह युगयुग जियै है औ जनम मरणते रहित ह्वैजाइहै ॥ ५ ॥
इति छाछठवां शब्द समाप्त ।
अथ सरसठवां शब्द ॥ ६७ ॥
जौपै बीजरूप भगवाना । तौ पंडित का बूझौ आना॥१॥
कहँ मन कहां बुद्धि ओंकारा। रज सत तम गुण तीनि प्रकारा२
विष अमृत फल फलै अनेका।बहुधा वेद कहै तरुवेका ॥३॥
कह कबीर ते मैं का जानो। कोधौं छूटल को अरुझानो॥४॥
जो आगे कहिआये कि जो कोई रामनाम लेइहै सोई जनन मरणते रहित
होइहै सो कहै हैं ॥

शब्द । ( ३३९ )
जोपै बीज रूप भगवाना । तौ पण्डित का बूझौ आना ॥१॥
कहँमन कहां बुद्धि ओंकारा। रज सत तमगुण तीनि प्रकारा२
बीज जो है रामनाम सो भगवान्‌है जनन मरण छोड़ाइ देबेको तौ हे पंडि-
त तुम आनआन जगत् कारण ब्रह्म ईश्वर प्रकृति पुरुष काल शब्द परमाणु
इत्यादिक काहे खोजत फिरौ हौ यह नामही जगतमुख अर्थ करि जगत्‌को कार-
णहै ॥ १ ॥ सो रामनामै जो सब‌को बीज ठहर्‌यो तो मनको बुद्धिको प्रण-
वको कारण कहां रह्यो एते सत रज तम जे गुण हैं तिनके तीनि २ प्रकार हैकै
जगत् कियो है प्रथम मन बुद्धि ओंकार कहां रहे कोई नहीं रहे भाव यहहै
कि प्रथम साहबको सुरति पायकै रामनाम को जगतमुख अर्थ करिकै जीव सम-
ष्टि ते व्यष्टि हैकै संसारी भयो है तबहीं ये सब भये हैं ॥ २ ॥
विष अमृत फल फूल अनेका । बहुधा वेद कहै तरबेका ३
वोई सतोगुणी रजोगुणी तमोगुणी उपासनाते विष अमृत अनेक फल फलत
भये कहैं नाना दुःख सुख जीव पावत भये कोई वे देवतन की उपासना
करिकै उनके लोक जाइकै सुख पायो औ कोई विषय आदिक करिकै दुःख
पायो येई वे गुणन में फल फलेहैं सो सबंके फल स्तुति बहुधा वेद तरिबे को
लिख्योहै ॥ “शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगत्पिता। शीतले त्वं जगद्धात्री
शीतलायै नमो नमः” ॥ इत्यादिक सब ॥ ३ ॥
कह कबीरते मैं का जानो । को धौं छूटल को अरुझानो४
सो कबीरजी कहैहैं कि वेद तो फलस्तुतिमें तरिबे को कहैहैं कछू साच
नहीं कहैहैं ये सब जीव अपनी अपनी उपासना में लगे कहैहैं कि हम मुक्तहै
जाइँगे सो सब उपासना सतोगुण रजोगुण तमोगुण ये तीन गुणमयहैं सो मैं
कहाजानौं को बद्धहै को छूटहै तुम्हीं बिचार कैरि लेउ कि हमारी उपासना
मायाके भीतर है कि माया के बहिरे है अर्थात् वेद में यह दिखायो कि सबकों

( ३४० ) बीजक कबीरदास ।
मूल रकार बीजहै जो सबको परम कारण है सबते पर है सो याही राम
नामको जो कोई साहबमुख अर्थ करिकै जपैगो सोई परम पुरुष पर श्रीरामच-
न्द्र के पास जाइगो और नहीं तरै हैं ॥ ४ ॥
इति सरसठवां शब्द समाप्त ।
अथ अड़सठवां शब्द ॥ ६८ ॥
जो चरखा जरिजाय बढ़ैया ना मरै ।
मैं कातौं सूत हजार चरूखला ना जरै ॥ १ ॥
बाबा ब्याह करायदे अच्छा वर हित काह ।
अच्छा वर जो ना मिलै तुम्हीं मोहिं बिवाह ॥ २ ॥
प्रथमै नगर पहुंचतै परिगो शोक संताप ।
एक अचंभौ हौं देखा बेटी ब्याहै वाप ॥ ३ ॥
समधी के घर लमधी आया आये बहूके भाइ ।
गोड़ चुल्हौने दैरहे चरखा दियो डढाइ ॥ ४ ॥
देवलोक मरि जाहिंगे एक न मरै बढ़ाय ।
यह मन रंजन कारने चरखा दियो दृढ़ाय ॥ ५ ॥
कह कबीर संतो सुनो चरखा लखै न कोइ ।
जाको चरखा लखिपरो आवा गमन न होइ ॥ ६ ॥
नाना उपासना में लगे जीव संसारते नहीं छूटैहैं सो काहेते नहीं छूटै हैं
सो कहैहैं ॥
जो चरखा जरिजाय बढ़ैया ना मरै ।
मैं कातौं सूत हजार चरूखला ना जरै ॥ १ ॥

शब्द । ( ३४१ )
बाबा ब्याह करायदे अच्छा वर हित काह ।
अच्छा वर जो ना मिलै तुम्हीं मोहिं विवाह ॥ २ ॥
यह स्थूल शरीर चरखाहै सो जरिजायहै कहे छूटि जायहै औ बढ़ैया जो
मनहै सो नहीं मरै है वह चरखा शरीर गढ़ि लेइ है कहे बनाइ लेइहै सो जीव
कहैहैं कि, मैं हजार सूत कातौहौं कहे कर्म छूटनेके लिये बहुत उपाय करौहौं
बहुत उपासना बहुत ज्ञान इन्हीं शरीरनते करौहौं परन्तु चरखला जे चारो
शरीर हैं ते नहीं जरै हैं ॥ १ ॥ जीव गुरुवन के इहां जाइकै कहैहै कि हे बाबा
गुरूजी! अच्छा वर हित करनवारो हो तै तासों व्याह कराय देउ अर्थात हित करन
वारो जो अच्छी देवनाकी उपासना कराइदेइ अरु आछो देवता जो तुम्हें न मिलै
कहे मुक्ति करि देनवारो देवना जो तुम्हें न मिलै तौ तुम्हीं मोको बिवाहौ कहे-
ज्ञान उपदेश करिकै अपनो मेरो जो भेद है ताको मेटवाइदेउ ॥ २ ॥
प्रथमै नगर पहुंचतै परिगो शोक सँताप ।
एक अचंभौ हौं देखा बेटी ब्याहै बाप ॥ ३ ॥
प्रथम साधन बतायो गुरुवालोग कि, ईश्वरकी उपासना करौ जामें अभेद
ज्ञान होय सो प्रथम नगर पहुंचतै कहे जब गुरुवा देवताकी उपासना बताइ-
दियो ताही प्रथमही शोक संताप परिगयो कहे तौने देवताको बिरह भयो
सो जरन लग्यो अरु दूसरो ज्ञान उपदेश जो मांग्यो तामें बड़ो आश्चर्य भयो
कि, बेटी बापको बिवाह्यो । जब उन उपदेश कियो कि तुम्हीं ब्रह्महौ तुम्हीं
सर्वत्र पूर्ण हौ सो जीवतौ कबहूं ब्रह्म होतई नहीं है सो ब्रह्मतों न भयो औ न वामे
ब्रह्मके लक्षण आय भयो कहा कि आपने को ब्रह्म मानि कर्म धर्म सब छोड़ि-
दियो सो ज्ञान अज्ञान जीवही को होइ है सो माया जीवहीते भई है सोई
बेटी है सो बाप जीवको बिवाहि लियो कहे बांधि लियो ॥ ३ ॥
समधी के घर लमधीआयो आयो बहू को भाइ ।
गोड़ चुलहौनै दै रहे चरखा दियो डढाइ ॥ ४ ॥

( ३४२ ) बीजक कबीरदास ।
जीवको ब्याही माया जो होइहै सो मनते होइहै सो मन ससुर भयो अरु
शुद्धते अशुद्धभयो सो अशुद्ध जीवको बाप शुद्ध जीव ठहरयो सोई समधी
ठहरयो तौने जीवके घरमें लमधी जो है मन को भाईचित्त सो आयो नाना
स्मरण देवायो तबहूं जो माया है ताको भाई काल आयो । चूल्हा जो है तामें
दुइँ पल्ला होइहैं सो पुण्य पाप जेहैं ते दूनों पल्लाहैं तौने चूल्हामें गोड़ दैकै
चरखा जो शरीर है तिनको डड़ाइदीन्ह्यो कहे लाइदियो काहूको पुण्य करायकै
काहू को पाप करायकै शरीर खाइलीन्ह्यो ॥ ४ ॥
देवलोक मरि जाहिंगे एक न मरै बढ़ाय ।
यह मन रंजन कारने चरखा दियो बढ़ाय ॥ ५ ॥
कह कबीर संतौ सुनौ चरखा लखै न कोइ ।
जाको चरखा लखि परो आवा गवन न होइ ॥ ६ ॥
देवलोक को नरलोक को सबको काल खाइलेइहै यह बढ़ैया जो मनहै
सोनहीं मारो मरै है औ जब वह चरखा टूटैहै तब बढ़ही बनाइ देइहै ऐसें
वह बढ़ई जो मन सो कालके रंजन करिवे को शरीर रूपी चरखा कों दृढ़
करत जाइहै नाना शरीर कालको खवावत जाय है ॥ ५ ॥ श्रीकबीरजी
कहैं हैं कि, चरखा जे चारो शरीरहैं तिनको कोई नहीं लखै है जाको चारों
शरीर लखिपरे अरु पांचौशरीर कैवल्य में प्राप्त भयो कहे केवल चितमात्र
रहिगयो तब वह चरखाको गढ़ैया जो मनहै तेहिते जीव भिन्न ह्वैगयो तब
छठवाँ अंश स्वरूप साहब देइहै तामें स्थित हैकै साहबके लोकको जाइहैं
आवा गवन नहीं होई है ॥ ६ ॥
इति अरसठवां शब्द समाप्त ।
अथ उनहत्तरवां शब्द ॥ ६९ ॥
यंत्री यंत्र अनूपम बाजै । वाके अष्ट गगन मुख गाजै ॥१॥
तूही माजै तूही बाजै तुही लिये कर डोलै ।

शब्द । ( ३४३ )
एक शब्द में राग छत्तिसौ अनहद वाणी बोलै ॥ २ ॥
मुखको नाल श्रवणके तुम्बा सतगुरु साज बनाया ।
जिह्वा तार नासिका चरही माया मोम लगाया ॥ ३ ॥
गगन मँडल मा भा उजियारा उलटा फेर लगाया ।
कह कबीर जन भये विवेकी जिन यंत्री मन लाया ॥ ४ ॥
यंत्री यंत्र अनूपम वाजै । वाके अष्ट गगन मुख गाजै ॥१॥
यंत्री जो है जीव ताको यंत्र जो शरीर है सो अनूपम बीन बाजै है बीनमें
सात स्वर बाजैहैं अरु आठवों जीवके तारमें टीपको स्वर बाजै है औ इहां
यह शरीरमें सात चक्रहैं सहस्तारलों तिनके बीच बीचको जो है आकाश ये सात
गगन भये अरु आठवों सहस्तार के ऊपर को जो आकाश तामें सुरपति कम-
लमें बैठो जो गुरुनाम बतावै है सो वह आठवां गगनमें जाइकै गाज्यो कहैं
रामनाम सुनिकै लेन लग्यो सो इहां सुषुम्णा जो नाड़ी सोई तार है मूलाधार
चक्रसुरति कमल येई तुम्बा हैं ॥ १ ॥
तूही गाजै तूही वाजै तुही लिये करडोलै ।
एक शब्द में राग छत्तिसौ अनहद वाणी बोलै॥२॥
सो या बीणाको तुही गाजै कहै सुरति कमलमें तुही नाम लेइ है औ तुहीं
बाजै कहै तुही सुरति बोले है औ तुही सुरतिको लैके डोलै है कहै तुहीं
सुषम्णा ह्वै चढ़िआइहै अर्थात् शरीरको मालिक तुही है औ बीणामें छत्तिस राग
बोलैहै। औ इहां एक शब्द जो है राम नाम तामें चौंतिस बर्ण औ पैंतीसौंनाद औ
छत्तिसौंबिंदु ई सब हैं बिंदुते आकारादिक स्वर आइगये वही अनहद है कहै वही-
को हद नहीं है तौने रामनाम रूपी बाणी सुरति कमलमें गुरु बोलै है सो तहीं
जपैहै या अंतर बीणा बतायो सो जानु अब बाहर को बीणा बतावै हैं ॥ २ ॥

( ६४४ ) बीजक कबीरदास ।
मुखको नाल श्रवणके तुम्बा सतगुरु साज बनाया ।
जिह्वा तार नासिका चरही माया मोम लगाया ॥ ३ ॥
बीणाके बीचमें डांड़ीहै यहां मुखै नाल डांडी है वीणामें दुइतुम्बा लगैहैं यहां
दूनों जे श्रवणहैं तेई तुम्बाहैं बीणाको स्वर मिलावै हैं औ यहां सतगुरु जेहैं ते साज
बनाइ जीवनको उपदेश करै हैं औ वहा बीणामें तार लागै है अरु यहां जीभ जो
है सोई तार है औ बीणामें चरही कहै सार लाँगैहै औ यहां नासिका चरही कहे
सारहै सारमें मोम जमाया जाइ है यहां माया जो है गुरुकी कृपा माया "दम्भे
कृपायां च॥" सोई मोम जमायो जैसे बीणा में जौन स्वर बजावै तौन बाजै है
तैसे सुरति कमलते गुरु जो राम नामको उपदेश कियो सोई जीभते जपै है ॥३॥
गगन मँडल मा भा उजियारा उलटा फेर लगाया ।
कह कबीर जन भये विवेकी जिन यंत्री मन लाया ॥४॥
बीणा जब सुरते बाजै है तब सब रागनको उजियारा ह्वै जाइहै औ आछो
लगैहै सबराग जानि जाइहैं और दूसरे पक्षमें जीवको उलटो ज्ञान जगत्मुख
ह्वैगयो तैं ब्रह्ममुख ह्वैगयो तैं औ आत्मामुख ह्वैगयो तैं कि महीं ब्रह्महौं ताकों
नाना शब्दमें समुझाइकै अठयें गगनमें जीवको साहब मुख करतभये तब जीव-
को ज्ञान ह्वैगयो सब धोखा छोड़िकै साहब में लग्यो जगत्मुख रह्यो सो
उलटा रह्यो ताको सीधेमें गुरुवालोग फेरि लैआये औ लगायो । पाठ होइतो
साहबमें लगावत भये श्रीकबीरजी कहैहैं कि, यंत्री जो हैं बीणाकार उस्ताद
तौनेते जो बीन बजावै मन लगाय सीखैहै तौ वाको सुरनको रागनको वे ब्यौरा
आइ जाइहैं ऐसे सुरति कमलमें बैठे जे हैं परमगुरु जे राम नामको उपदेश
करै हैं तिनसोंजो कोई यंत्री जीवात्मा मन लगावै है सो बिबेकी होइहै कहे
जगत् को असांच जानिकै सांच साहब में लगि जाइहै ॥ ४ ॥
इति उनहत्तरवां शब्द समाप्त ।

शब्द । ( ३४५ )
अथ सत्तरवां शब्द ॥ ७० ॥
जसमास नरकी तसमास पशुकी रुधिररुधिर यकसाराजी ।
पशुकी मास भखै सबकोई नरहि न भखै सियाराजी ॥ १ ॥
ब्रह्मकुलाल मेदिनी भरिया उपजि विनशि कित गइयाजी ।
मास मछरिया जोपै खैया जो खेतनि में बोइयाजी ॥ २ ॥
माटीको करि देई देवा जीव काटि काटि देइयाजी ।
जो तेरा है सांचा देवा खेत चरत किन लेइयाजी ॥ ३ ॥
कहै कबीर सुनोहो संतो रामनाम नित लैयाजी ।
जो कछुकियो जिह्वाके स्वारथ बदल परारा दैयाजी ॥४॥
जसमासनरकी तसमासपशुकी रुधिररुधिरयकसाराजी ।
पशुको मास भखै सबकोई नरहि न भखै सियाराजी ॥१॥
जस नरकी मास होइ है तस पशुकी मास होइ है अरु रुधिर भी एक
तरह होइ है परंतु पशुके मासको जे भक्षण करै हैं ते सियारई हैं सो
वे मनुष्यते औ सियारते यतनै भेद है कि, सियार मनुष्यको मांस खाइ है अरु
नरपशु की मांस खाइ है मनुष्यको मांस पशु नहीं खाइ है सो कहै हैं कि,
रुधिर मांस तो सब एकई तरह है नर की मांस काहे नहीं खाय हैं ॥ १ ॥
ब्रह्म कुलाल मेदिनी भरिया उपजि विनशि कित गइयाजी ।
मास मछरिया जोपै खैया जो खेतनि में बोइयाजी ॥ २ ॥
जौनेते सब पृथ्वी जगत् भयो है ऐसो जो है ब्रह्मा कुलाल जो कुम्हार औ
सर्वत्र जगत में भरै रहा अर्थात् सब वस्तु ब्रह्मई रह्यो तौ यह सब पृथ्वी
उपजी औ बिनशिकै कहां गई सो एक ब्रह्मही सर्व मानिकै जो मास मछली
खाउ कि सब तो एकई है जो मन चलैगो सो करेंगे नरक स्वर्ग कर्म सब

( ३४६ ) बीजक कबीरदास ।
मिथ्या हैं ऐसो जो मानौगे तौ जो खेतमें बोवनको होइ हैं, सो तुम मुर्दे पशु
की मासकी मास खाउ हौ अरु वे तुम्हारे जीतही यमपुरमें मांस खाइँगे जो
कहौं हम देवताको बलि चढ़ाइकै खाइ हैं तौनेपर कहै हैं ॥ २ ॥
माटीको करि देई देवा जीव काटि काटि देइयाजी ।
जो तेराहै सांचा देवा खेत चरत किन लेइयाजी ॥ ३ ॥
माटीको तौ देवता बनाओहौ उसके आगे जीव काटि काटि के राखौहौ
यह कैसी गाफिली तुमको घेरी है जो माटीको देवता सांच है तो जब बोकरी
खेतमें चरती है तब तुम्हारा देवता काहे नहीं खाता क्या देवताको किसीका
डर है भाव यह है कि, तुम काहेको हत्यारी लेतेहो अंगुरियादेउ जो सांचा
होयगो तौ खाइगो तेहिते तुम्हारी देवता मिथ्या है खेतमें चरत बोकरीको न
खाइ सकैगो ॥ ३ ॥
कहै कबीर सुनोहो संतो रामनाम नित लैयाजी ।
जो कछु कियो जिह्वाके स्वारथ बदल परारा दैयाजी ४॥
सो कबीरजी कहै हैं कि, जिनके जिनके गलाको तुम काटतेहौ ते सब
तुम्हारो नरकमें गला काटेंगे तेहिते रामनामको नितलेउ भाव यह है जब नामा-
पराध छोड़ि रामनाम लेउगे और फिरि पातक न करौगे तबहीं तुम्हारे पातक
जावेंगे तामें प्रमाण ॥ "हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तैरपि स्मृतः । यदृच्छयापि
संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः ॥ रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्। नरो न
लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विंदति " ॥ दशनामापराधमें प्रमाण ॥ "संतां निंदा
नाम्नः परममपराधं वितनुते यतः ख्यातिं जातं कथमयह सहेद्धेलनमदः । शिवस्य
श्रीविष्णोर्य इह गुणनामादिसकलं धिया भिन्नं पश्येत्स खलु हरिनामा हितकरः॥
गुरोरवज्ञा श्रुतिशास्त्रनिंदनं तथार्थवादो हरिनाम कल्पनं । नाम्नो बलाद्यस्य
हि पापबुद्धिर्न विद्यते तस्य यमैर्हि विच्युतिः ॥ श्रुत्वापि नाममाहात्म्यं यः
प्रीतिरहितोधमः । अहं ममादिपरमो नाम्नि सोप्यपराधकृत् ॥ ४ ॥
इति सत्तरवां शब्द समाप्त ।

शब्द । ( ३४७ )
अथ इकहत्तरवां शब्द ॥ ७१ ॥
गुरुमुख ।
चातक कहा पुकारै दूरी । सो जल जगत रहा भरपूरी ॥१॥
जेहि जल नाद विन्दु का भेदा। षटकर्मसहितउपान्यौवेदा २
जेहि जलजीव सीव का वासा। सो जल धरणि अमर परकासा ३
जेहि जलउपजेसकलशरीरा। सो जल भेद न जान कबीरा॥४॥
चातृक कहा पुकारै दूरी। सो जल जगत रहा भरपूरी ॥ १ ॥
जेहि जल नादविन्दु का भेदा। षटकर्मसहित उपान्यौवेदा २॥
सबते गुरु परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्र कहैहैं कि, हे चातक दूरि दूरि तैं कहा
पुकारै है कि पियासोहौं पियासोहौं जैन स्वातीको जल तैं चाहैहै जाते पियास
बंद है जाइहैं सो राम नाम रूपी जल स्वातीको मुख्य मुक्तिको साधन जगत्में
पूरि रह्यो है तैं कहां और और मुक्तिको साधनको खोजत फिरैहै ॥ १ ॥ औ
जौने रामनामरूपी जलमें नादबिंदु को भेद है अपने षट मात्रनते वेदको उपान्यौ
कहै उत्पत्ति कियो है ॥ २ ॥
जेहिजलजीवसीवकावासा। सो जल धरणिअमरपरकासा ३॥
जेहिजलउपजेसकलशरीरा। सो जलभेदनजानकबीरा ॥४॥
जौने रामनामरूपी जलमें जीव जेहैं सीव जे नानाईश्वर तिनको बासैहै औ
सोई रामनामरूपी जब धरणि में जो कोई जैपै ताको अमर करै है या प्रकाश
कहै जाहिरहै अथवा वा अवनीमें नाशमान नहीं होयहै या जाहिरहै
तैं पियासो काहे मरै है ॥ ३ ॥ जेहि राम नामरूपी जलते सकल शरीर उप-
जै है अर्थात् संसारमुख अर्थते अनन्त ब्रह्मा उपजै हैं रामनामरूपी जलको भेद
कबीरा कहै कायाके बीर जे जीव हैं ते नहीं जानै हैं अर्थात् जो रामनाम
मोको बतावै है सो जो विचार करै तौ चिद्विग्रह करिकै सर्वत्र महीं देखों
परौं तौ मेरी भक्ति जलपान करिकै मुक्ति है जाइ है । औ संसारताप बुताइ
जाइ है ॥ ४ ॥
इति इकहत्तरवां शब्द समाप्त ।

( ३४८ ) बीजक कबीरदास ।
अथ बहत्तरवां शब्द ॥ ७२ ॥
चलहु का टेढ़ो टेढ़ो टेढ़ो ।
दशौ द्वार नरकै में बूड़े तू गंधीको बेढो ॥ १ ॥
फूटे नैन हृदय नहिं सूझै मति एकौ नहिं जानी ।
काम क्रोध तृष्णाके मारे बूड़ि मुये बिन पानी ॥ २ ॥
जारे देह भसम हैजाई गाड़े माटी खाई ।
शूकर श्वान कागके भोजन तनकी यहै बड़ाई॥३॥
चेति न देखु मुगुध नर वौरे तूते काल न दूरी ।
कोटिन यतन करै बहु तेरे तनकी अवस्था धूरी॥४॥
वालूके घरवामें बैठे चेतत नाहिं अयाना ।
कह कबीर यक राम भजे बिन बूड़े बहुत सयाना ॥ ५ ॥
चलहुका टेढ़ोटेढ़ोटेढ़ो।दशौ द्वार नरकैमें बूड़ैतू गंधीकोबेढ़ो
तीन बार टेढ़ो टेढ़ो टेढ़ो जो कह्यो सो ज्ञानकांड कर्मकांड उपासना कांड
ये तीनों मार्ग अथवा सतोगुणी रजोगुणी तमोगुणी ये तीनों कर्मते टेढ़े हैं सो
ये मार्ग में कहा चलोहौ दशौ द्वार जे दशौ इन्द्री हैं ते नरकही में लगी हैं
कहे बिषयन ही में लगी हैं सो तेरे बिषयकी गन्धि लगी है ताते तैं गन्धी है
सो तोहीं ऐसे गन्धी को माया बेढ़िलियो कहे तेरो ज्ञान छोड़ाइ लियो । अरु
जो बेड़ो पाठ होइ तौ यह अर्थहै कि तोहीं ऐसे गंधीको जाके दशौद्वार नरक
हीमें बूड़ेहैं ताको बेड़ो नहीं है जाते संसार सागर उतरि जाइ अथवा गन्ध
जगत जो है गन्धी शरीर ताको तैं बेड़ो कहे आधार कहा ह्वैरहैहै टेढ़ो टेढ़ो
चाल चलिकै यहां कहां तेरो पारकियो होइगो संसार सागरते न होइगो
बूड़िही जाइगो ॥ १ ॥
फूटे नैन हृदय नहिं सूझै मति एकौ नहिं जानी ।
काम क्रोध तृष्णाके मारे बूड़ि मुये बिन पानी ॥ २ ॥

  • ा + न.
    "कागके": क + ा + ग + क + े.
    "भोजन": भ + ो + ज + न.
    "तनकी": त + न + क + ी.
    "यहै": य + ह + ै.
    "बड़ाई": ब + ड़ + ा + ई.
    "॥ ३ ॥"

Line 4:
चेति न देखु मुगुध नर बौरे तूते काल न दूरी ।
"चेति": च + े + त + ि.
"न": न.
"देखु": द + े + ख + ु.
"मुगुध": म + ु + ग + ु + ध.
"नर": न + र.
"बौरे": ब + ौ + र + े.
"तूते": त + ू + त + े.
"काल": क + ा + ल.
"न": न.
"दूरी": द + ू + र + ी.
"।"

Line 5:
कोटिन यतन करै बहुतैरे तनकी अवस्था धूरी ॥ ४ ॥
"कोटिन": क + ो + ट + ि + न.
"यतन": य + त + न.
"करै": क + र + ै.
"बहुतैरे": ब + ह + ु + त + ै + र + े.
"तनकी": त + न + क + ी.

( ३५० ) बीजक कबीरदास ।
देहरीलौं वरनारि संगहै आगे संग सहेला ।
मृतकथान सँगदियो खटोला फिरि पुनि हंस अकेला॥३॥
जारे देह भसम हैजाई गाड़े माटी खाई ।
काचे कुंभ उदक जो भरिया तन कै इहै बड़ाई ॥ ४ ॥
राम न रमसि मोहमें माते पर्यो कालवश कूवा ।
कह कबीर नर आपु बँधायो ज्यों नलिनीभ्रम सूव ॥ ५ ॥
फिरहु का फूले फूले फूले ।
जो दश मास अधो मुख झूले सोदिन काहेक भूले ॥१॥
औरे औरे मतनमें लगिकै कहा फूले फूले फिरौहौ कि हमहीं मालिक हैं
हमहीं मुक्तहैं दश महीना अधोमुख गर्भ में झूलतरह तहां कह्यो किं हे
साहब ! मैं तिहारो भजन करौंगो मोको छोड़ावो । सो दिन कांहेको भूलिगयें
अब काहे भजन नहीं करौहौ निकसतही कहां कहां करनलग्यो । जो कहो
जब हम गर्भमें रहे तब हमको साहबै दयालुता करिकै सुरति लगायों अब काहे
दयालुता करिकै सुरति नहीं लगावै हैं सो हम कहाकरैं, हमको साहबई भुलाइ
दियो । अरे मूढ़ साहबतो गोहरावत जाइहै सब शास्त्र वेदके तात्पर्य करिकै बीज-
कमें कि जो मोको जानि भजनकरु तो मैं तेरो उद्धार करौंगो सो गर्भबासमें जो
तैं भजन करिबेको कौल कियो सो भजन न कियो भुलायदियो तामें प्रमाण
कबीरजीके मुक्तिलीला ग्रन्थ को ॥ “ गर्भबासमें रह्यो मैं भजिहौं तोहीं । निशि-
दिन सुमिरौं नाम कष्टसे काढौ मोहीं ॥ यतना कियो करार काढ़ि गुरु बाहर
कीना । भूलिगयो निज नाम भयो माया आधीना ” ॥ सो साहबको कौन दोष-
है तुहीं कौलते चूकि गयो साहबको भजन न कियो ॥ १ ॥
ज्यों माखी स्वादै लहि विहरै शोचि शोचि धनकीन्हा ।
त्योंहीं पीछे लेहु लेहुकर भूत रहनि कछु दीन्हा ॥ २ ॥

शब्द। ( ३५१ )
जैसे माखी फूलनके रसके स्वादको पाइकै बिहार करै है औ ताहीके
सहतको धन जोरि जोरिकै धरै है तैसे तुमहूं विषय भोग करिकै धन जोरि
जोरि धरौहौ सो जैसे कोऊ आइकै मछेहनको लाइकै सहतको लैजाइकै आपसमें
बांटे लेइहै तैसे तोहीं पीछे कहे जब तुम न रहिजाउगे तब तिहारे धनको स्त्री
पुत्रादिक लेहु लेहु करिकै बांटि लेइँगे अरु तुमको भूत की रहनि कहे दशदिन
भूत कहेंगे मरवटामें बैठायेंगे ॥ २
देहरीलौ वरनारि संगहै आगे संग सहेला ।
मृतुकथान सँग दियो खटोला फिरि पुनि हंस अकेला ३
जारे देह भसम हैजाई गाड़े माटी खाई ।
काचे कुंभ उदक जो भरिया तनकै इहै बड़ाई ॥ ४ ॥
ये चारो तुकनको अर्थ स्पष्टहै ॥ ४ ॥
राम न रमसि मोहमें माते पर्यो काल वश कूवा ।
कह कबीर नर आपु बँधायो ज्यों नलिनी भ्रम सूवा ॥५॥
श्री कबीरजी कहै हैं कि हेजीव! मोहमें माते राममें नहीं रमै है कालके वश
ह्वैकै संसार कूपमें पर्यो है वाते बारबार तेरो जन्म मरण होइहै सो तौ अप-
नेही भ्रमते नानादुःख सहै है जैसे नलिनी को सुवा अपनेही चंगुलते धरि लियो
छोड़ै नहीं है मारो जाइहै तैसे तैंहूं नाना मतनमें लगिकै अरु विषयनमें लगिकै
आपहीते यह संसारमें परिकै बँधिगयो संसारको धरैहै भाव यहहै संसार
तोको बांधे नहीं है तें छोड़ि काहे नहीं देइहै अरु जेहि साहबको तैं है जहां
एकउ दुःख नहीं हैं तिनमें काहे नहीं लगे है ॥ ५ ॥
इति तिहत्तरवां शब्द समाप्त ।
अथ चौहत्तरवां शब्द ॥ ७४ ॥
योगिया ऐसोहै बड़ करणी । जाके गगन अकाश न धरणी १
हाथ न वाके पाउँ न वाके रूपनवाके रेखा ।
बिना हाट हटवाई लावै करै ब्याई लेखा ॥ २ ॥

( ३५२ ) बीजक कबीरदास ।
कर्म न वाके धर्म न वाके योग न वाके युगुती ।
सींगी पत्र कछुव नहिं वाके काहेक मांगै भुगुती ॥ ३ ॥
तैं मोहिं जाना मैं तोहिं जाना मैं तोहिं माँह समाना ।
उतपतिप्रलय एक नहिं होती तब कहु कौनको ध्याना ॥४॥
योगिया एक आनि किय ठाढो राम रहा भरिपूरी ।
औषधि मूल कछुव नहिं वाके राम सजीविनि मूरी ॥ ५ ॥
नटवत बाजी पेखनी पेखै बाजीगरकी बाजी ।
कहै कबीर सुनौहो सन्तों भई सो राज विराजी ॥ ६ ॥
योगिया ऐसो है बद करणी। जाके गगन अकाश न धरणी १
हाथ न वाके पाउँ न वाके रूप न वाके रेखा ।
विना हाट हटवाई लावै करै बयाई लेखा ॥ २ ॥
योगिया कहे संयोगी याको ब्रह्मसंयोग करिकै जगत् करैहै याते योगिया
माया सबलित ब्रह्महै सो वह योगिया की बद करणी है कहे निषिद्ध करणी है
जौने चैतन्याकाशमें अहं ब्रह्मास्मि बुद्धि करै है तौन चैतन्याकाश मेरे लोकको
प्रकाशहै तहां आकाश धरणी एकौ नहीं हैं ॥१॥ वह चैतन्याकाशको जो मानि
लियो है कि सो महीं है ऐसा जो समष्टि जीव चैतन्य ब्रह्मरूप सो वाके न हाथ
है न पाउँ हैं न वाके रूप रेखा है जहां जीव नानाकर्म करै है जंगत् अरु बही
जगत् कर्मनको फल पावैहै जहां यही लेनदेन ह्वै रह्यो है सो जो है हाट वाकें
नहीं हैं कहे देश काल वस्तु परिच्छेदतें शून्यहै औ हटवाई लगौतै है माया
कहे सबलित ह्वैकै जगत् करतै है अरु बया और को अनाज और और को नापि
देइहै अरु ब्रह्म जो है बया सो माया सबलित ह्वैकै ईश्वर रूपते जीवनके कियें
जे कर्मके फलहैं ते जीवन को देइहै ॥ २ ॥
कर्म न वाके धर्म न वाके योग न वाके युगुती ।
सींगीपत्र कछुव नहिं वाके काहेको मांगै भुगुती ॥३॥