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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 659

साखी। (६२१)
द्वारे तेरे राम जी, मिला कबीरा मोहिं ॥
तूतो सबमें मिलि रहा, मैं न मिलौंगा तोहिं ॥ २५२ ॥
साहब कहैं हैं कि हे जीव! तेरे मुखद्वारमें मेरो राम असनाम बनो है ताकों
भजन करि हे कबीर! जीवौ मोको मिलौ जो कहौ कि साहब दयालु हैं वोई
मिलिबेकी सामर्थ्य देइँगे सो सत्यहै तेरी दया मोको लगै है परन्तु तैं सबमें
मिलिरहा है ताते मैं तोको न मिलूंगा तैं सब छोड़िदे तो मैं तोको आपसे
मिलौं आइ ॥ २५२ ॥
भर्मपरातिहुँलोकमें, भर्मबसा सब ठाउँ ॥
कहहि कबीर पुकारिकै, बसै भर्मके गाउँ ॥ २५३ ॥
कबीरजी कहैं हैं कि हे जीव! साहब को तैं कैसे मिलै काहेते कि तीनौँ
लोकमें कर्म भर्म जो है धोखाब्रह्म सो भरो है तिनमें भर्म बसो है भरमहीमें
सब मिलिरहे हैं भरमके पार जे साहबहैं तिन को तो जानबेही न कियो ॥२५३॥
रतन लड़ाइनिरेतमें, कङ्कर चुनिचुनि खाय ॥
कहकवीरयहअवसरवीते, बहुरिचलेपछिताय ॥२५४॥
रतन जो है साहब को ज्ञान ताको रेतमें लड़ाय कहे लगाय दियो अति-
कठोर जो है कङ्कर ब्रह्मज्ञान तामें आत्माको लगायो चुनिचुनि खानलग्यो सो
कबीर जी कहैं हैं कि जब या अवसर बीति जायगो अर्थात् शरीर छूटिजायगो
तब पछितायगो वा धोखाब्रह्म में कुछ न मिलैगो ॥ २५४ ॥
जेते पत्रबनस्पती, औ गङ्गाकी रेणु ॥
पण्डितबिचारा क्याकहै, कविरकहै सुखवेणु ॥२५५॥
सारासारके बिचार करनेवारे पण्डित तोको केतो समुझावेंगे कबीरजी कहैहैं
हैं कि जेतो मैं समुझायो है कि बनस्पती पत्र गिनि जायँ औ गंगाकीरेणु गनी-
गनिजाएँ परन्तु मेरे मुखके बैन गने नहीं गिनिजायहैं तऊन तुम बूझयो॥२५५॥
१ पुरानी प्रतियोंमें इस शब्दके लिये "रमाइन" लिखाहै ।