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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 660

( ६२२ ) बीजक कबीरदास ।
हमजान्यो कुलहंसहौ, ताते कीन्हो संग ॥
जो जनत्यौं बकवरणहौ, छुवन न देत्यौंअंग ॥२५६॥
कबीरजीकहें हैं कि हमतो तुमको हंसके कुलमें जानते रहे हैं ताते तुमको
उपदेश कियो तुम्हारो सङ्ग कियो है जो तुमको बकैकै बर्ण जानते कि हंस
नहींहो तो एकौ अंग छुवन न देत्यौ अर्थात् उपदेशकी बातहू न चलावतो उप-
देश को कौन कहै ॥ २५६ ॥
गुणिया तो गुणको गहै, निर्गुण गुणहि घिनाय ॥
बैलहि दीजै जायफर, क्या बूझै क्या खाय ॥ २५७ ॥
गुणियाकहै जोसगुणहोय है सो गुणको गहै है सत रज तमको जो धारण
करै है सो अशुद्धई रहै है ते मायाते नहीं छूटै हैं औजो निर्गुण उपासकहोइ
है सो सगुणको घिनाय है सो निर्गुणैवाले सगुणवाले साहबके गुणको कहा-
जानें वेतो सगुण निर्गुणके परे हैं मायाकृत गुणते रहित हैं दिव्यगुण सहित हैं
काहेते कहै हैं कि बैलके आगे जो जायफर धरिदीजिये तौ कहा बूझै क्याखाय
ऐसे वे साहबके गुणको कहाजानैं ॥ २५७ ॥
अहिरहु तजि खसमहु तज्यो, विना दाँतको ठोर ॥
मुक्तिपरी बिललातिहै, वृन्दावनकी खोर ॥ २५८ ॥
बिनादाँतको ठोरजो है बूढा गाय बैल ताको अहिरौ चराइबो छाँड़िदेइ है
और खसम जो है बैलको मालिक सोऊ छोड़ि देइ है अर्थात् बुढाजानिकै कि
मेरे कामको नहीं है तब वह बैल बृन्दाबनकी खोरि बिललानलग्यो ऐसे जब
मनरूपीदाँत उखारिडारचो तब अज्ञानअहिर याको छोड़िदियो औ याको खसम
जो है माया सबलित ब्रह्म सो जब मन न रहिगयो तब याहू छांड़िदियो तब
आपहीआप मुक्त है गयो सर्वत्र साहबहीको देखन लग्यो जैसे वृन्दावनमें डारमें
पातमें कृष्णदेखिपरेँ हैं मुक्ति परी धिललाइहै काको मुक्तकरै ऐसे यहू सर्वत्र साह-
बको देखनेलग्यो मुक्तही हैगयो मुक्तिकाको मुक्तकरै तामेंप्रमाण ॥ “सवन-
दियाँ गङ्गाभई, सब शिल शालिग्राम ॥ सकलौ बन तुलसी भयो, चीन्ह्यौ
आत्माराम” ॥ २५८ ॥