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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

साखी। (५७९)
मोहरूपी निशा बिहाय जायहै औ जे नहीं जागे हैं तिनकों काल डसिखायहै सो-
जिनको रामोपासना सिद्धह्वै गईहै ऐसे जे भक्तहैं तिनके शरीरं नहीं छूटे हैं सो
हनुमान् कबीरजी प्रकटै हैं ॥ १३० ॥
जो ई घर है सर्पका, सो घर साधुन होइ ॥
सकल संपदा लै भई, विष भर लागी सोइ॥ १३१ ॥
जो घर सर्पकोहै सोघर साधुको न होइ अर्थात् सर्पको घरबेमौरहै तामें
बहुतछिद्र होइहैं सो या शरीरौ बहुत छिद्रकी बाँबी है तामें काल बसैहै सो
बेमोरमें जो जीव जायहै तिनको सर्प खाय लेइहै औ जे या शरीर में कौनौ
जीव बसैहै तिनको काल खाइलेइहै ॥ १३१ ॥ *
मन भरके बोये कबौं, घुंघुची भर ना होइ ॥
कहा हमार मानैं नहीं, अन्तहु चले विगोइ ॥ १३२॥
शरीरमें जों घुँघुची भर बासना उठै तौ मन भर की हैजातीहै कहे मनसं-
कल्पाविकल्पकारिकै और बढ़ाइ देइहै मनमें वही भरि रहती है औ मनभर उप-
देशकरै तौ घुँघुची भर ज्ञाननहीं रहै यह मननीचै में जायहै ऊंचेको नहींजाय
सो श्रीकबीरजी कहै हैं कि, हम केतौ उपदेश करें परंतु कोई नहीं मानैहैं ताते
अन्तमें बिगोइकै कहे बिगरिकै मरिकै नरकमें जायहैं ॥ १३२ ॥
आपा तजो औ हरि भजो, नख शिख तजो बिकार ॥
सब जिउते निरबैर रहु, साधु मता है सार ॥ १३३॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि जबभर तैं यहि शरीरको आपनो मानैगो तब भर
तेरौ जनन मरण न छूटेगो ताते“अहंशरीरः”मैं शरीर हौं यह जोहै आपा ताको
छोड़िदे तैं तो साहबकों पार्षदस्वरूपहै तामें टिकि तिनको भजनकरु औ नख
शिखमें तेरे कामक्रोधादिक बिकारई देखे परैहैं तिनको छोड़दे औ चिदचित

  • इसके आगे की यह साखी छोड़दी है ।
    “घुंघुची भर जो बौ इया, उपजपसेरी आठ । डेरा परा काल घर, सांझ सकारे बाठ”

( ५८० ) बीजक कबीरदास ।
बिग्रहते सर्वत्र साहिबहीहैं यह भावना करिकै सब जीवनते निर्बैररहु साधु मतकों
यही सारांशहै सब साहबके शरीरहैं तामें प्रमाण ॥ “खं वायुमग्निं सलिलंमहीञ्च
ज्योतींषि सत्त्वानि दिशोद्रुमादीन् । सरित्समुद्राँश्च हरेःशरीरं यत्किञ्चभूतं प्रण-
मेदनन्यः । ” चित् जो है जीव सोऊ शरीरहै तामें प्रमाण ॥ “यश्चात्मनि तिष्ठ
न्नयमात्मानं वेद यस्य आत्मा शरीरम्” ॥ १३३ ॥
पक्षा पक्षी कारणे, सब जग रहा भुलान ॥
निरपक्षै है हरि भजै, तेई संत सुजान ॥ १३४ ॥
और तो सबमायैमें भुलानहै जिनके कछू समझहै ते आपने आपने मतको
पक्ष कीन्हे हैं आनको पक्ष खण्डन करि दौरै हैं सो जे पक्षापक्षी छोड़िकै साहबको
भजै हैं तेई सुजान सन्तहैं ॥ १३४ ॥
माया त्यागे क्या भया, मान तजा नहिं जाय ॥
जेहि माने मुनिवर ठगे, मान सबनको खाय ॥ १३५ ॥
सन्तलोग जो मायाको छोड़िउ दिये तौ कहा भयो मान बड़ाई तौ छोड़िबे
न कियो याही चाहैं कि, हमारो मान होय सो जौने मानमें मुनिवर ठगिगये
हैं सोई सबको खाये लेइहै सो हम पूछै हैं कि जो तिहारो बड़ो मान भयो बड़ी
बड़ाई भई कि फलानेके समान उपासनामें कोई नहीं है ज्ञानमें विद्यामें कोई
नहीं है तौ यासों कहाभयो जाके निमित्त घरछोड़्यो सोतो मिलबई न भयो तेहितें
जो कोई साहबके मिलिबे की संसार छूटिबेकी बात कहै तौ मानिलेइ चाहै
आपने मतको होइ चाहै बिराने मतको होइ काहेते कि साधुको मत यही है
कि संसारछूटै साहब मिलैं औ मानै प्रतिष्ठा भये साधुकहावै या कौने शास्त्रमें
लिखाहै तेहिते साधु वही है जो साहबको जानै ॥ १३५ ॥
घुंघुची भरजो बोइया, उपज पसेरी आठ ॥
डेरा परा काल घर, सांझ सकारे बाठ ॥ १३६ ॥
— यहशरीररूपी क्षेत्रकैसो है कि जो घुँघुची भर बोइजाय अर्थात् उठै तौ आठ
पसेरी कहे मन उत्पत्ति होयहै कालके घरमें डेरा परयो है तेहिते यहशरीरकों

साखी । ( ५८१ )
कहूंसांझ होइ है कहूं सकार होइहै अर्थात् कबँहूं मरिजयहै कबँहूं उत्पत्ति
होइहै औ बाठकहावै बरेठ सो मनमायामें मिलो जो आत्मा सो बरेंठ होइगयो
बरेठमें तीनलहर होयहैं यामें त्रिगुणात्मिका माया बरिगई है सो एककैतिपुण्यकी
गैलहै जप यज्ञ दानते खैंचिकै स्वर्गको लैजायहैं औ एककैति पापकी गैलहै
कामक्रोधादिकते खैंचिकै नरकमें डारिदेईं हैं जब बरेठ टूटिजायहै तब ख्याल
गुलहैजायहै अर्थात् मुक्ति ह्वै जाय है ॥ १३६ ॥
बड़े ते गयो बड़ापनो, रोम रोम हंकार ॥
सतगुरुकी परिचय बिना, चारयो वर्ण चमार॥१३७॥
सबते बड़े को हैं साधु जे संसारको त्याग कीन्हे हैं तिनमें और दोषतों हई-
नहीं हैं काहेते कि संसारको छोडे हैं परन्तु ये चित्अचित् रूप साहबको नहीं
देखै हैं सर्वत्र ते आपने बड़ापनहीं में गये कि हमारी बराबरीको साधु कोई नहीं
है या अहङ्कार रोमरोम बेधि गयो सो सतगुरुतो पायोइ नहीं जो रामनामकों
बतायदेइ जाते साहब याकी रक्षा करें सो साहबके जाननवारे जेसाधु तिनके
बिना परिचय चारिउं वर्ण चमारके तुल्यहैं ॥ १३७ ॥
मायाकी झक जग जरै, कनक कामिनी लागि ॥
कह कबीर कस बाचिहौ, रुई लपेटी आगि ॥ १३८ ॥
झकवाको कहैं हैं कि जैसे या कहैं हैं कि भूतकी झकलगी है सो कनक
कामिनी में लगि मायाकी झकमें बैकलायकै जरै है सो श्री कबीरजी कहैं हैं कि
कनक कामिनीरूप रुई में लपटिकै बिषय आगिसेवन करौ हौ सोकैसे बाचिहौ
अर्थात् जारिही जायगो ॥ १३८ ॥
माया जग साँपिनि भई, विष लै बैठी बाट ॥
सब जग फंदे फंदिया, गया कबीरा काट ॥ १३९ ॥
संसारमें माया साँपिनिभई है सो बिषलैके संसार की जे हैं सबराहै तन
धन कर्म्म तिनमें बैठी है सो सम्पूर्ण जग वाके फंदे में फंदिगयो जोई कबीर
कहैं जीव वे राहनमें चलै है सोई काटा जाय है अथवा कबीरजी कहैं हैं कि

( ५८२ ) बीजक कबीरदास ।
मैं जौनजौनै राहनमें वहसाँपिनि बैठी रहीं है तौने तौने राहनको काटिकै कहैं
बरायकै औरे राह ह्वै चलो गयो ॥ १३९ ॥
सांप बीछिको मंत्र है, माहुर झारे जाय ॥
बिकट नारिके पाले परा, काटि करेजा खाय॥१४०॥
साँपबीछीको बिषमंत्रन ते झारे जायहै औ वह बिकट नारि जो माया है
ताकेंपाले जो पर्यो ताको करेजा काटिकै खायलेइ है अर्थात् साहबके ज्ञाना-
दिकं जे अंतःकरणमें हैं तिनकोखाय है सोई मायाको रूप कहैं ॥ १४० ॥
तामस केरे तीन गुण; भौंर लेइ तहँ वास ॥
एकै डारी तीन फल, भाँटा ऊँख कपास ॥ १४१ ॥
आदितामस जो है अज्ञान मूल प्रकृति तामें रजोगुणी तमोगुणी सतोगुणी
तीनफल लगेहैं सो सतोगुणी ऊँखहै जो ऊँखचुह्यो तौ पहिले रस पान कियों
कहे यज्ञादिक कर्म्म कियो स्वर्ग में जायकै अप्सरानके साथ सुखकियो जब
पुण्यक्षीणभयो तब फेरि संसारमें परे सो यहै हाथमें लग्यो फिरि चौरासीमें भटक-
नलग्यो । औ रजोगुणी कपास है कपासकोलियो कपरा बिनायो पहिरचो ह्याँई
फटिगयो तैसे रजोगुणी कर्म्म कियो तामें राजाभयो सुख भोगकियो दियों
लियो बड़ो यश कियो फेरि फेरि मरिकै जैसो कर्म्मकियो तैसो भयोजाय । औ
तमोगुणी कर्म्मभाँटाहै टोरचो तब कांटालग्यो औ जब खायो तब पुरुष शक्ति
की हानि ह्वैगई अखाद्य लिखै हैं द्वादशी त्रयोदशी इत्यादिक दिनमें जो खायों
तें नरक को गयो ऐसे तमोगुणी कर्म्मते काहूको मारचो तौ मरिगयो औ
पापलग्यो राजाबाँधिकै शूली दियो मारो गयों दुःख पायो सो इहां दुःख पायौं
औ वहां नरकमें दुःखपायो ॥ १४१ ॥
मन मतंग गैयर हनै, मनसा भई सचान ॥
यंत्र मंत्र मानै नहीं, लागी उड़ि उड़ि खान ॥ १४२ ॥
मनरूपी जो हाथी है मतवार सो गैयर कहे आपने अरतेकहे हंठते गवा जो
है जीव अर्थात् साहबको भूलिगयो जो है जीव अथवा गैयर कहे बड़ा जो है

साखी। ( ५८३ )
जीव ताको हनै है सो जब जीव मारे परचो तब मनसा जो है मनोरथ सोई
सचनभयो है कहे शार्दूल भयो सो उड़ि उड़ि याको खायहै अर्थात् जब मरन-
लागै है तब जहैं मनोरथ जायहै तहँ जीव जायहै सोई खायबो है औ यन्त्र
मन्त्र जों नाना उपदेश वेदशास्त्र कहै है सो नहीं मानै है ॥ १४२ ॥
मन गयंद मानै नहीं, चलै सुरतिके साथ ॥
दीन महावत क्या करैं, अंकुश नहीं हाथ ॥ १४३ ॥
मनरूपी जो मतंगहै सो नहीं मानै है सुरतिरूपी जो हाथिनी है ताके साथ
चलै है महाउत जो है जीव सो कहाकरै अंकुश जो नामका ज्ञान सो याके-
हांथई नहीं है ॥ १४३ ॥
या माया है चूहरी, औ चूहरकी जोइ ॥
बाप पूत अरुझायकै, संग न काहुकी होइ ॥ १४४ ॥
या माया चूहरी कहे चाण्डालिनी है औ चूहरैकी जोइहै कहे जीवकी जोइ
हैकै जीवहूको चूहर बनायलियो अर्थात् आपने वश कैलियो सो यह माया
काहूकी सँगनहीं है । मन जो है बाप, पूत जो है ब्रह्म ताको पतिजो है जीव
तासों अरुझाय दियो है ॥ १४४ ॥
कनक कामिनी देखिकै, तू मति भूल सुरंग ॥
बिछुरन मिलन दुहेलरा, केचुलि तजै भुजंग ॥१४५॥
साहब कहै हैं कि कनक कामिनीरूप मायाको देखि तू मतिभुलाय तैं तों
सुरंगहै साहब कहै हैं कि मेरे अनुरागमें रंगनवारो है सो आपने स्वरूप तों
बिचारु यह कनक कामिनीरूप जो मायाहै तौनेमें जो रँगोहै ताको जो छोड़िदै
तौ जैसे भुजंग केचुलि छोड़ि देइहै तब वाको स्वरूप निकरि आवै है तैसे तेरे
चारो शरीर छूटि जायँ तब हंसशरीरपाय मेरे पास आवै ॥ १४५ ॥
मायाके बश सब परे, ब्रह्मा विष्णु महेश ॥
नारद शारद सनक औ, गौरी सुत्त गणेश ॥ १४६ ॥
अर्थ याको स्पष्टही है ॥ १४६ ॥

( ५८४ ) बीजक कबीरदास ।
पीपर एकजो महँगे मान । ताकर मम न कोऊ जान ॥
डारलफायनकोऊखाय।खसमअछतबहुपीपरजाय॥ १४७॥
एकपीपरके वृक्षको सबै महँगे मानिलियो है सो वह ब्रह्महै अनुभवगम्य है वाको
मर्म कोई नहीं जानै है कि पीपरको डार लफायकै कोई नहीं खायहै अर्थात् वा
अलखहै कैसेमिली वातो कथनमात्रही है सो साहब कहै हैं कि जीवनको
खसम अछत मैं बनैहौं ताको तौ नहीं प्राप्ति होय वहपीपरजो ब्रह्म ताहीमें सब
चलेजातेहैं सो वह ब्रह्म झाँईं है तामें प्रमाण मूल रमैनीको ॥
“ निर्गुणअलख अकह निरबाना । मन बुधि इन्द्री जाहि न जाना ॥
बिधिनिषेध जहँवाँ नहीं होई । कह कबीर पद झाँईं सोई ॥
पहिले झाँईं झाँकते, पैठो सन्धिक्काल ।
झाँईंकी झाँईं रही, गुरुबिन सकैको टाल” ॥ १४७ ॥
शाहू ते भो चोरवा, चोरन ते भो जुज्झ ॥
तब जानैगो जीयरा, मार परैगो तुज्झ ॥ १४८ ॥
प्रथम शाहु रहे कहे शुद्धरहेहौ सो ब्रह्ममाया मनचोरहैं तिनमें लगिकै तैंहूं
चोर हैगये अर्थात् उपदेश करिकै जीवन के साहब को ज्ञान चोराय लियो
काहूको कह्यो कि ब्रह्म तूही है काहूको कह्यो कि आदिशक्तिको भजु जगतको
कर्त्ता वही है काहूको कह्यो जो मनमें आवै सो करु बन्धमोक्षको कारण मनै
है याही रीति गुरुवाचोरन ते जुज्झ भयो सो तुज्झ कहे तोहीं तबहीं समुझि
परैगो जब यमको सोंटा शीशमें लगैगो तब तब जानैगो कि रक्षकको
भुलाय दियो ॥ १४८ ॥
ताकी पूरी क्यों परै; गुरु न लखाई वाट ॥
ताको बेरा बूड़िहैं, फिरि फिरि अवघट घाट ॥१४९॥
जाको गुरुने साहब के पास पहुँचिबे की बाट नहीं लखाई ताकी पूरी कैसे
परै ताकी बेरा जो है ज्ञान सो अवघटघाटमें बूडि जाइगो अर्थात् जब उनके
शरीर छूटिजायँगे पुनि पुनि जनम मरण होइगो तब वा ज्ञान भूलिजायगो ,१४९॥

साखी । ( ५८५ )
जाना नहीं बूझा नहीं, समुझि किया नहिं गौन ॥
अन्धेको अन्धा मिला, राह बतावै कौन ॥१५०॥
मनमायादिक जो जगतहै ताको न जान्यो कि यह जड़ है मैं इनको नहीं
हौं इनते भिन्नहौं वा ब्रह्मको न बूझ्यो विचारई करत रहिगये अपने स्वरूपकों
न जान्यो कि मैं साहबको अंशहौं समुझिकै नाना मतनमें गौन न किये कि ये
नरक लैजानवारे हैं सो आँधर जे जीव तिनको आँधरै गुरुवालोग मिलें साहब
के यहाँकी राह कौन बतावै ॥ १५० ॥
जाको गुरु है आँधरा, चेला कहा कराय ॥
अंधे अंधा ठेलिया, दोऊ कूप पराय ॥ १५१ ॥
याको अर्थ स्पष्टही है ॥ १५१ ॥
मानस केरी अथाइया, मति कोइ पैठै धाय ॥
एकइ खेते चरत हैं, बाघ गदहरा गाय ॥ १५२ ॥
या संसारमें मनुष्यकी अथाई है तामें धाय कै कोई मति पैठे काहेतें कि
एकइ खेत जो है संसार तामें बाघ जो है जीव औ गदहा जो है मन औ गाय
जो है माया सो एकई संग चरै हैं गदहा मनको कह्यो सो कर्मको बोझा याहीमें
लादिजायहै औ जीव बाघहै समर्थ जो साहबको जानै तौ गायजो है माया
ताको खायजाय अर्थात् नाशकर देइ ॥ १५२ ॥
चारि मास घन वरसिया, अति अपूर्व शरनीर ॥
पहिरे जड़तर बरुतरी, चुभै न एकौ तीर ॥ १५३ ॥
कबीरजी कहैं हैं कि घन जोहौं मैं सो चारि मास जेहैं चारियुग तामें
अतिअपूर्व जो है शरकहे बाणरूपी नीरज्ञान ताको बरसत भयो कहे उपदेश
करतभयो सबजीवनको परन्तु ऐसो जड़तरकहे जड़ौते जड़ बरुतर पहिरे है कि
तीरकहे एकौ ज्ञान नहीं चुभै है अथवा चारिमास हैं चारिउ वेद ते घनकहे
बहुतज्ञानकी वर्षा कियो कहे सबजीवनको उपदेश कियो परन्तु साहब को

( ५८६ ) बीजक कबीरदास ।
कोई न समुझत भयो वेदको अर्थ औरईमें लगाय दियो सब शब्द को सार राम
नाम न जाने सब नरकको चलेगये तामें प्रमाण ॥ “ नाम लिया सो सब
किया, वेद शास्त्रको भेद ॥ बिनानाम नरकै गये, पढ़ि पढ़ि चारौ वेद”॥ १५३॥
गरुके भेला जिव डरै, काया छी जन हार ॥
कुमति कमाई मन बसै, लागु जुवाकी लार ॥१५४॥
कबीरजी कहैं हैं कि गुरुके भेलेमें जिउ डरै है वहगुरुकी भेली कैसी है कि
काया जे हैं पांचौ शरीर तिनको छीजनकहे छोड़ायदेन वारी है सो ये संसारी
जीवनके मनमें कुमतिकी कमाई लगी है ताते जुवाकी लार मानुष शरीर में ला-
गहै न कर्म करतबन्यो तौ नरकगयो कर्म करत बन्यो तौ स्वर्गगये कर्म छूटनको
उपाय नहीं करै हैं लारसंगको कहै हैं पश्चिमकी बोली है ॥ १५४ ॥
तन संशय मन सोनहा, काल अहेरी नित्त ॥
एकै डाँग वसेरवा, कुशल पुछौ का मित्त ॥ १५५ ॥
साहब कहैं हैं संशय जो मन सोई तनमें सोनहाहै जीवन को शिकारखेलै है
औ एक यह काल अहेरी है अर्थात् जब कालमारै है तब मनकी सुरति जहां मर-
तमें जायहै तहां आत्मा जात रहै है तौनै शरीर धारण करै है सो मन सोनहा
काल अहेरी जीव सावज ये तीनों एकैडांग जो शरीर तामें बसै हैं सो हे मित्र!
तुम तौ हमारे सखाहौ भूलिकै यहडाँग जो शरीर तामें कहाँ बसेहौ चारौ शरीरन
का छोड़ि हंसशरीरमें बैठि मेरे पास आवो ॥ १५५ ॥
शाहू चोर चीन्है नहीं, अंधा मतिका हीन ॥
पारिख बिना विनाशैहै, करि विचार हो भीन॥१५६॥
हे अंधा ! हेज्ञाननयनकोहीन तैंतो शाहुरह्यो है चोरजौ है मन ताको तैं न
चीन्हें ताते तैंहूं चोर द्वैगये सो बिचार न कियो कि पारिख बिना बिनाशैहै सो पारि
खतो करु तैंतो चित्तहै औ यह मन जड़हैं तेरो वाकों साथ नहीं बनिपरै है सों
जैसे तैं अणुचित्तहै तैसे साहब विभुचित्तहैं चितचितकों साथहोइहै सो बिचारकरि
यहि मनसे भिन्नह्वै मेरे पास आउ ॥ १५६ ॥

साखी । ( ५८७ )
गुरु सिकिली गर कीजिये, मनहि मसकला देइ ॥
शब्द छोलना छोलिकै, चित दर्पण करिलेइ ॥१५७॥
जो कहौ मनते हम कौनी भाँतिते भिन्नहोइँ तौ गुरु सिकलीगरहै आत्मा तरवारि
है मनादिकनकी काटनवारी है तामें साहबको ज्ञानरूपी मसकलादै रामनाम
छोलनाते अज्ञानरूपी मुरचाछोलि प्रेमकी बाढ़िधरि मनादिकनके काटिबेको समर्थ
करिदेइ अर्थात्चारिउ शरीरको छोड़ि स्वरूपरूपी दर्पण में आपनो हंसशरीर
जानिलेइ कि मैं साहबको अंशहौं ॥ १५७ ॥
मुरुखके समुझावते, ज्ञान गाँठिको जाय ॥
कोइला होइ न ऊजरो, नौ मन साबुन खाय॥१५८॥
यहसाखी को अर्थ प्रसिद्धै है ॥ १५८ ॥
मूढ़ करमिया मानवा, नख शिख पाखर आहि ॥
बाहनहारा का करै, बाण न लागै ताहि ॥ १५९ ॥
मूढ़कर्मी कहे मूढ़ है औ कर्मी है कर्म त्यागको उपाय नहीं करै है ऐसो जो
ह मानुष्य सो नखशिखलौं अज्ञानरूपी पाखरपहिरे है । औ जो मूढ़कर्मी पाठहोय
तौ बानरकी नाईं बाँध्यो है हठ नहीं छांड़ै ॥ १५९ ॥
सेमर केरा सूवना, सिहुले बैठा जाय ॥
चोंच चहोरै शिर धुनै, यह वाहीको भाय ॥ १६० ॥
सेमरका सुवा जोसिहुले कहेमदारेमें बैठिकै चोंच मार्यो जब धुवा निकरचों-
तब शिर धुनै है या कहै है कि या वहीको भाई है अर्थात् जीव संसार सुख लागि-
रह्यो जब कुछ न पायो तब ब्रह्म सुखमें लग्यो कि मोको ब्रह्मानन्द होयगो
सो वहौ बिचार करत जब अठईं भूमिकामें गयो तब अनुभवौ न रहिगयो तब
जान्यो कि जैसे संसारी सुख मिथ्या है तैसे ब्रह्मसुखौ मिथ्या है कुछ नहीं रहि
जाय है अथवा घरछोड़िकै बैरागी भये महन्ती लिये मठ बाँधे चेला भये सो
घरमें एकै मेहरी रही एकै बेटा रहो इहां बहुत चेली भईं बहुत चेला भये

( ५८८ ) बीजक कबीरदास ।
बहुत घर भये न गृहस्थीमें बन्यो न बैराग्यमें बन्यो तामें प्रमाण चौरासी
अङ्गकी साखी ॥
“ घरहु तजिनि तौ अस्थल बाँधिनि अस्थल तजिनि तौ फेरी ॥
फेरी तजिनि तौ चेला मूडिनि यहि बिधि माया घेरी ” ॥ १६० ॥
सेमर सुवना बेगि तजु, घनी बिगुर्चन पाँख ॥
ऐसा सेमर जो सेवे, हृदया नाहीं आंख ॥ १६१ ॥
हे सुवा जीव संसार रूप सेमर को तैं छोड़िदे तैं तो पक्षी है तेरे मेर पास
आवनको पक्ष है कहे तेरे स्वरूपमें मेरे पास आवनकों ज्ञान बनो है जों संसारी
है जायगो माया ब्रह्म में लगैगो तौ मेरे पास आवनेकों तेरे पखना बिगुर्चन
है जायंगे कहे धुवा ऐसो चोंथि डारेंगे नाम नाना ज्ञानमें लगाय देइँगे वाज्ञान
न रहि जायगो सो ऐसे संसाररूपी सेमरको सेवै है जाके हृदयमें आंखी नहीं हैं
मेरो ज्ञान नहीं है ॥ १६१ ॥
सेमर सुवना सेइये, दुइ ढेढीकी आश ॥
ढेढी फूटी चटाक दै, सुवना चले निराश ॥ १६२ ॥
हे सुवना ! जीव संसार सेमरकी दुइ ढेढीकी आश सेवै है सेमरकी दुइ ढेंढी
कौनि हैं एक फूलकी है एक फलकी है औ या संसारमें एक तौ संसारी सुख
है एक परलोक सुख है सो सेमरमें रसकी चाह कियो जब चोंच चहोरचो तब
ढेढी चटाकदै फूटिगई धुवा निकस्योसुवा निराश ह्वैकै चले गये रसकी प्राप्ति न
भई तैसे तैं संसारमें पर्यो जनन मरण छुटावे के वास्ते धोखा ब्रह्ममें लाग्यो
परन्तु जनन मरण न छूटयो ॥ १६२ ॥
लोग भरोसे कौनके, जग बैठि रहे अरगाय ॥
ऐसे जियरै यम लुटै, जस मेढ़ै लुटैं कसाय ॥ १६३ ॥
अरे लोगों यहि संसार में कौनके भरोसे अरगायकै कहे चुपाय कै बैठि रहें
हौ ज्ञान करिकै कि मैंहीं ब्रह्महौं अथवा या मानिकै कि मैंहीं जीवका मालिक हौं
अथवा योग करिकै कुंडलिनी के साथ प्राणको चढ़ायकै ज्योतिमें मिलायकै औ

सांखी । ( ५८९ )
चुप ह्वैकै बैठि रहे सो हम पूछे हैं कि तुम कौनके भरोसे बैठि रहे साहबको
तौ जानि बोई न कियो जब उत्पत्ति भई तब ब्रह्मेते माया तुमको धरलै आई
औ पुण्यक्षीण भई तब स्वर्गादिकनते उतरि आये औ जब समाधि छूटी तब
जीव उतरि आयो पुनि जसके तस ह्वैगये औ आपनेहीं को मालिक मान्यो तौ
जब शरीर छूटयो तब यम खूब लूटयो जैसे मेढ़ाको कसाई लूटै हैं तैसे बिना
रक्षक कौन बचावै ॥ १६३ ॥
समुझि बूझि दृढ़ ह्वैरहे, बल तजि निर्बल होय ॥
कह कबीर ता संतको, पला न पकरै कोय ॥ १६४ ॥
सर्वत्र साहबकों समुझिकै औ साहब को रूपबूझिकै कि या भांतिको है
जड़वत ह्वै रहे कि जो करै है सो साहब करै है ऐसे साहब को जो जानै है
ताके बहुत सामर्थ्य ह्वै जायहै जो चाहै सो करिलेइ तौने आपने बलको छपाय
कै आपको निर्बलै मानै है कि हम कहा करै हैं जौन काम करै हैं तौन साहिबै
करै हैं वे समर्थ हैं सो श्री कबीरजी कहै हैं कि ऐसे संतको पला कोई नहीं
पकरै है कहे बाधा कोई नहीं करिसकै है सब साहिबै करै हैं तामें प्रमाण
कबीरजीके ज्ञान संबोधनकी साखी ॥
"पाप पुण्य फल दोय, सबै समर्पै समरथै ॥
निज मन शक्ति न होय,मनसा बाचा कर्मणा" ॥ १६४ ॥
हीरा वही सराहिये, सहै घननकी चोट ॥
कपट कुरंगी मानवा, परखत निकसा खोट ॥१६५॥
हीरा जो है साहबका ज्ञान सोई सराहा जायहै जो घन चोट सहै कहै
नानामत करिकैकोई बादीखंडन न करिसकै औमानुष जे कपटकुरंगी कहे
हरिणी ह्वै रहे हैं अर्थात् चंचल ह्वै रहे हैं सो जब घनकी चोंटलगी कहे गुरु-
वालोग आपनोमत समुझायो तब हृदय फूटिगयो साहबको ज्ञान तो जानो न
रहै तामेंप्रमाण कबीरपरिचयकी साखी ॥

( ६९० ) बीजक कबीरदास ।
"झूठ जवाहरिकों बनिज, तब लगि परि है पूर ।
जबलगि मिलैं न पारखी, घने चढ़ा नहिं कूर" ॥
सो या मायाके रंगवारे मानुष परखतमें खोटही निकसै हैं ॥ १६५ ॥
हरि हीरा जन जौहरी, सबन पसारी हाट ॥
जब आवै जन जौहरी, तबही रोकी साट ॥ १६६ ॥
हरि जे हैं तेई हीरा हैं औ जन जेहैं तेई जौहरी हैं कहे जाननवारे हैं सो
सब जीव हाट लगावन लगे कहे साहब को जानन लगे ज्ञान कथनलगे गुरुवा-
लोग आपने मतमें खैंचिगये सो जब साहबके जाननवारे जनाय देनवारे साहब
जन जौहरी आये तब सबके मत खंडन करि हीराके समीप कनी जे जीव
तिनको पहुँचाय देतभये अर्थात् जीवनको या जनाय दिये कि तुम साहबके हौ
साहब में लगौ या हीरौ के साटको अर्थ है और मतनमें परे जननमरण न छूटै-
गो ये कनफुक्का संसारही को लैजायगो तामें प्रमाण॥ "कनफुक्का गुरु हदका बेहदकः
गुरु और ॥ बेहदका गुरू जो मिलै, तब पावै निज ठौर ॥ १६६ ॥
हीरा तहां न खोलिये, जहाँ कुंजरोंकी हाट ॥
सहजै गांठी बांधिकै, लगो अपनी बाट ॥ १६७ ॥
जहां कुंजरों की हाट है तहां हीरा न खोलिये काहेते कि वे भांटा खीराके
बेंचनवारे हीराको भेद कहां जानैं अर्थात् जहां आपने आपने मतमें काउ काउ करि
रहे हैं तहां साहबके ज्ञानरूपी हीरा न खोलिये साहब में मन लगायें एकान्त
बैठि रहिये यही आपने बाटमें लगे रहिये ॥ १६७ ॥
हीरा परा बजारमें, रहा छार लपटाय ॥
बहुतक मूरख चलि गये, पारिख लिया उठाय ॥१६८॥
हीरा जो है रामनाम जेहिते साहबको ज्ञान होइहै । सो बजारमें परा है कहैं
सब संसार के लोग कहैं हैं छारमें लपटाय रह्यो है । अर्थात् नानामत नाना-
ज्ञान रामनामहीते निकसे हैं, औ सब मत रामनामही ते सिद्ध होय हैं यह
राम नाम साहबको बतावै है ते कोई नहीं जानै हैं । या नहीं जानैं ते ऐसे जे

साखी । ( ५९१ )
मूरख ते केतें संसार बजारमें चलिगये पै जाते साहब को ज्ञान होई ऐसो जों
रामनाम हीरासो न लीन्हे अर्थात् यह रामनाम साहबको बतावन वारो है सों
कोई न समझ्यो । सो जाते साहबको ज्ञान होयहै ऐसो रामनाम हीरा ताके
जे पारखी रहे ते राम नाम हीराको जानिकै उठायो जाते साहबको पहिंचा-
निकै मुक्त ह्रै गये। अथवा रामनाम ऐसो हीरा बजार में कहे संसार में परि छार
में लपट्यो है अर्थात् ज्ञान कांड,कर्म कांड और योग कांडमें लग्यो है और राम
नाम में नही लग्यो हैं, जो साहब को बतावनवारो है जाते मुक्ति ह्रै जाई छार में
कहा लपटो है ? कि, ज्ञान काण्ड कर्म काण्ड आदि कर्मनमें राम नामई को मानै
हैं याही ते काहू को नहीं जानि परै है । राम नाम को और और सिद्धिन में
लगाई देइ हैं तामें प्रमाण श्रीगोसांई जीको ।
नाम जीह जपि जागहिं योगी । विरति बिरंचि प्रपंच वियोगी ॥
ब्रह्म सुखहि अनु भवहि अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा ॥
जाना चहै गूढ मत जोऊ । नाम जीह जपि जानहिं तेऊ ॥
साधक नाम जपहिं लै लाये । होइ सिद्ध अणि यादिक पाये ॥
जपहिं नाम जन आरत भारी । मिटहि कुसंकट होंहि सुखारी ॥
सो येही रामनामको लैकै सब साहबको जान्यो है तामें प्रमाण ॥
श्रीकबीर जीको रेखता ।
रामको नाम चौ मुक्तिका मूल है निचोर रस तत्त्व छानी ।
रामको नाम षट शास्त्रमें मथलिया राम षट दर्शमें है कहानी ॥
रामको नाम लै ध्यान ब्रह्मा किया रंरकारै धुनि सुनि मानी ।
कहैं कबीर अवगाह लीला बड़ी रामको नाम निर्बाण बानी ॥
रामको नाम लै विष्णु पूजा करैं रामको नाम शिव योग ध्यानी ।
रामको नाम लै सिद्ध साधक जियो जियो सनकादि नारदहु ज्ञानी॥
रामको नाम लै राम दीक्षा लिया गुरु वशिष्ठ मिलि मंत्र दानी ।
रामको नाम लै कृष्ण गीता कथी मथी पारथ नहिं ममजानी ॥१६८॥
हीराकी ओबरी नहीं, मलयागिरि नहिं पांति ॥
सिंहनके लेहड़ा नहीं, साधु न चलैं जमाति ॥१६९॥

( ५९२ ) बीजक कबीरदास ।
सबको मालिक साहबएकही है औ साहब के जाननवारे बिरलेसाधुहैं जें
रामनाम को जपै हैं वेसब साधुनके शिरमौरहैं तामें प्रमाण ॥ “साधु हमारे
सब खड़े,अपनी अपनी ठौर । शब्द बिबेकी पारखी,सो माथेको मौर”॥तामें या
दृष्टान्त है जैसे मलैगिरी चन्दन एकहै, सिंहएकहै तैसे हीरा जो राम नामहै
तेहिते साहब को ज्ञान होयहै सो एकही है औ ताके जाननवारे साधु एकही हैं,
वे जमाति में नहीं चले हैं ऐसेतो सब साधुही कहावै हैं औ राम नाम वस्तु-
खोयकै औरेमें लागे हैं ते गँवारहैं तामें प्रमाण ॥ “वह हीरा मतिजांनैये,
जेहिलादै वनजार ॥ यह हीरा है मुक्तिको, खोये जात गँवार ॥ १६९ ॥
अपने अपने शीश की, सबन लीन है मानि ॥
हरिकी बात दुरंतरी, परी न काहू जानि ॥ १७० ॥
जौनजाकोमतनीकलाग्यो सोतौनैनमतको शीशचढ़ाय मानि लीन्ह्यो हरिकी
जो दुरंतरी बातहै सबतें दूरकहेपरे सो काहूको न जानिपरी कि सबके रक्षक
साहबै हैं ॥ १७० ॥
हाड़ जरै जस लाकड़ी, तनवा जरै जस घास ॥
कबिरा जरै सो राम रस, जस कोठी जरै कपास॥१७१॥
कबीर जे जीवहैं तिनके रामरसजो है रामभक्ति सो कैसे उनके अंतःकरणमें
जरै है जैसे कोठीमेंकपास भितरैजरै है याहीते उनके हाड़बार लकड़ी घासकी
नाईं जरै हैं ॥ १७१ ॥
घाट भुलाना बाट बिन, भेष भुलाना कानि ॥
जाकी माड़ी जगत में, सो न परौ पहिचानी॥ १७२॥
घाटकहे सत्संग बाट जो है बिचार ताके बिना भूलिगयो अर्थात् साहबको
तौ जान्यो न अपनेहीको ब्रह्म माननलग्यो बिचारभूलि गयो सत्संग काहेको करै
आपने गुरुवनकी कानिमानि भ्रमवारे मत न छाड़तभये भेषवारे साधु सबभुला-
यगये सो जाकी माड़ी कहे माया जगत्में पूरिरही ऐसेजो साहब सो न पहिचानिपरयों
माड़ी मायामें भूलिगये ॥ १७२ ॥

साखी। (५९३)
मूरुख सा क्या बोलिये, शठसों कहा बसाय ॥
पाहनमें क्या मारिये, चोखा तीर नशाय ॥ १७३ ॥
मूरुख कौन कहावै है कि साधुनके समुझायेतें सूझै परन्तु बूझै नहीं है
तासों क्याबोलिये । शठकौनकहावैहै कि चाहे नीकौ कोऊ बतावै परन्तुछाड़ै न
हठकीन्हे वाहीमें लागरहै । जौन गुरुवा लोग पहिले बतायनिहै चाहे कूपौमा
गिरिपरे पै छाडै न सोऐसेलोगन ते कहा बसाय उनको ज्ञानदीन्हे ज्ञानौ खराब
होयगो पाहनके मारे तीरही टूटैगो शठ मूरुख नहीं समुझै तामें प्रमाण ॥
“पानी कोपाषाण, भीजै तौ बेधै नहीं ॥ त्यों मूरुखको ज्ञान, सूझै तौ
बूझै नहीं” ॥ १७३ ॥
जैसे गोली गुमजकी, नीच परे दुरि जाय ॥
ऐसे हृदया मूर्खके, शब्द नहीं ठहराय ॥ १७४ ॥
जैसे गुम्मजमें जो गोलीमारिये तौ ऊँचेपरै ढरकिजायहै ऐसे मूरुखके हृद्-
यमेंशब्द रामनाम केतौ उपदेशकारिये परन्तु ठहराय नहीं है एकघरीभर तौ
ज्ञानरहो फिरि ज्योंकोत्यों ह्वै गयो ॥ १७४ ॥
ऊपरकी दोऊ गई, हियकी गई हेराय ॥
कह कबीर चारिउगई, तासों कहा बसाय ॥ १७५ ॥
ऊपरकी आँखिनते यादेख हैं कि साहबको भजिकै हनुमानादिक अजर
अमर ह्वैगये जिनकी पूजा देवता करै हैं सब सिद्धिको प्राप्तहैं कालशक्र बिष्णु
सबते अधिकहैं औ हियेकी आँखिनते देखै हैं कि हाथिनको पति ऐरावतहै पक्षि-
नको पति गरुड़है भक्तनमें महादेवपति हैं मनुष्यनमें भूपति है ऐसे सब ईश्व-
रनके मालिक श्रीरामचन्द्र हैं तिनको नहीं भजन करै है सो श्रीकबीरजी कहै
हैं कि जाकीभीतरौबाहरकी आँखिफूटीगई तासोंकहाबसाय ॥ १७५ ॥
केते दिन ऐसे गये, अन रुचे को नेह ॥
बोये उसर न ऊपजै, जो घन वरसैं मेह ॥ १७६ ॥
३८

( ५३४ ) बीजक कबीरदास ।
जैसे ऊसरमें बोवै घन बहुतौ बरसें परन्तु जामै नहीं है तैसे निराकार
धोखामैलख्यो फलकछू न हाथलग्यो वातो कुछ वस्तु ही नहीं है अनरुचेको नेहं
है अर्थात् बावड़ी प्रीतिकियो वातोप्रीति ही नहीं करै ॥ १७६ ॥
मैं रोऊं सब जगतको, मोको रोवै न कोइ ॥
मोको रोवै सो जना, जो शब्द विवेकी होय ॥ १७७॥
साहब कहैं हैं कि मैं सब जगतपर दया करिकै रोऊँहौं कि मेरो अंश
जीवमोको भूलिगयो ताते जगतमें जनन मरणरूपी दुःखसहै है औ जीवमोको
नहीं रोवै है कि हम अपने मालिकको भूलिगये नाना मालिक मानि नाना
दुःख पावै हैं सो मोको सो जन रोवै है जो शब्द जो रामनाम ताको विवेकीहो
य कि रकारके समीप मकार शोभित होईहै मैं साहबको हौं ॥ १७७ ॥
साहब साहब सब कहैं, मोहिं अंदेशा और ॥
साहबसों परिचय नहीं, बैठैगा केहि ठौर ॥ १७८॥
कबीरजी कहैं हैं कि साहब साहब तो सब जीव कहै हैं अर्थात् आपने
आपने इष्टदेवताको सबते परे कहै हैं कि येई सबके मालिकहैं सो येतो सब
एक एक मालिक बनाये हैं पै मोको या और अंदेशाहै कि जौन रामनाम
साहबको बतावै है तौने रामनामको जानि साहबते परिचयतो करिबै न किये
ये कौने ठोर बैठेंगे काके पास जायँगे अर्थात् जनन मरण न छूटैगो ॥ १७८॥
जिव बिन जिव बाचै नहीं, जिवका जीव अधार ॥
जीव दया करि पालिये, पंडित करहु विचार ॥ १७९॥
या जीव बिना जीव कहे सतगुरु बिना नहीं बाचै है जीवको जीव जो
सतगुरुहै सोई आधारहै सो जीवपर दया करि अर्थात् सतगुरुके शरणह्वै जीव
उद्धारकरो हे पंडित ! तुम बिचारकर देखो तो बिना सतगुरु संसार पार
न होउगे ॥ १७९ ॥
हमतो सबहीकी कही, मोको कोइ न जान ॥
तबभी अच्छा अच्छा अबभी, युग युग होंहुँनआन १८०

साखी । ( ५९५ )
· साहब कहै हैं कि हमतो सबके अच्छेकी कही जांते कालते बचिजायँ परंतु
मोको कोई न जानत भयो सो तब भी अच्छा है अबभी अच्छाहै काहेते कि
युगयुगमें मैं आन नहीं होउँहौं वहीवही बनोहौं जो अबहूं मोको जानै तौ मैं
कालते बचायलेउँ तामें प्रमाण गोसाईंजीको ॥
दोहा ॥ "बिगरी जन्म अनेककी, सुधरै अबहीं आज ॥
होय रामको राम जपि, तुलसी तजि कुसमाज" ॥
औ कबीरजीने कह्यो है ॥
"कह कबीर हम युग युग कही । जबही चेतों तबहीं सही" १८०
प्रकट कहौं तौ मारिया, परदा लखै न कोइ ॥
सहनाछपाप्यारतर,को कहिवैरी होइ ॥ १८१ ॥
श्रीकबीरजीकहैं हैं कि जो मैं प्रकट कहौंहौं कि तुम साहबके हौ और के
नहीं हौ तौ मारन धावै है अर्थात् बादविवाद करै है औ जो परदे सों कहौ
हौं तौ कोई समझतै नहीं है काहेते नहीं समझै है

( ५१६ ) बीजक कबीरदास ।
जो कोउ कहै हम मनको मारा जाकें रूप न रेखा ।
छिन छिनमें केतनौ रंग ल्यावै जें सपनेहुं नाँहिं देखा ॥
रासातल यकईश ब्रह्मण्ड। सब पर अदल चलावै ।
षट रसमें भोगी मन राजा सो कैसे कै पावै ॥
सबके ऊपर नाम निरक्षर तहँ लै मनको राखै ।
तब मनकी गति जानि परै यह सत्य कविर मुख भाखै ॥ १८१ ॥
देश विदेशन हौं फिरा, मनहीं भरा सुकाल ॥
जाको ढूंढत हौं फिरौं, ताको परा दुकाल ॥ १८२ ॥
देशकहे संसार बिदेशकहे ब्रह्म तौने में फिराहै सो ये दूनों मायाको सुका-
लभराहै अर्थात् वह ब्रह्म मनहीं को अनुभवहै और संसार मनहीं को कल्पनाहै
जौन बस्तु को मैं ढूंढत फिरौं हौं जो मन बचनके परे है ताको दुकालपर्यो
वा न ब्रह्ममें है न संसार में है ॥ १८२ ॥
कलि खोटा जग आंधरा, शब्द न मानै कोइ ॥
जाहि कहौं हित आपना, सो उठि वैरी होइ ॥ १८३ ॥
जगत् तो आँधराहै ज्ञानदृष्टि याके नहीं है कुछ समझै नहीं है तौने में या
कलि खोटा प्राप्त भयो सो जाको शब्द जो राम नाम मैं बताउँहौं सोई वैरी
होइहै कहे शास्त्रार्थ करै है मानै नहीं है ॥ १८३ ॥
मसि कागद तो छुवों नहिं, कलम गहो नहिं हाथ ॥
चारिहु युग माहात्म्य जेहि, करिकै जनायो नाथ १८४
गुरुमुख ॥ चारिउ युग में है माहात्म्य जिनको ऐसे जे नाथ रघुनाथहैं
तिनको कबीरजी सबको जनायो न कलमगही न कागद लियो न मसि लियो
मुखहीतें कह्यो ये तो सरल करिकै कह्यो कि जामें एकौ साधन न करनपरै
सो साहब कहै हैं कि जो मोको जानिलेइ तौ संसारते तरिजाय जो कहौ
कबीर जी मुखही तें कह्यो है ग्रन्थकैसे भये हैं तौ कबीर जी कहते गये हैं
शिष्यलोग लिखतें गये हैं ॥ १८४ ॥

साखी । ( ५१७ )
फहमै आगे फहमै पाछे, फहमै दहिने डेरी ॥
फहमै परजो फहम करत है, सोई फहम है मेरी॥१८५॥
गुरुमुख ।
फहमजो है ज्ञानस्वरूप ब्रह्म सोई आगे है सोई पाछे है सोई दहिने है सोई
डेरी कहे बायें है अर्थात् सर्वत्रपूर्णहै सो यहजोफहमहै ज्ञानस्वरूप ब्रह्म तौनेके
ऊपर ब्रह्मयाहूके परे साहब है फहम करै है कि वह ज्ञानरूप उनहींको प्रकाश
है याहूके परे साहब हैं तौन फहम मेरी है कहे वहज्ञान मेरोहै ॥ १८५ ॥
हद चलै सो मानवा, बेहद चलै सो साध ॥
हद बेहद दोनों तजै, ताको मता अगाध ॥ १८६ ॥
हद जो चलै है सो मानवाहै कहे उनको मान कहे प्रमाण है अर्थात् जो
जौने देवता की उपासना कियो सो तौने देवता के लोकगये वाको वहैभर
प्रमाणहै वतनैज्ञान होइहै औ जे बेहद चलै हैं ब्रह्ममें लगे हैं ते साधुहैं जो
ब्रह्मको साधन करिकै सिद्धि करिलेइ सो साधु सो हद जो है सगुणसंसार औ
बेहद जोहै निर्गुण ब्रह्म ये दोनोंको जे तजिकै निर्गुण सगुणके परे परम पुरुष
श्री रामचन्द्र के सेवक ह्वैरहे हैं ऐसे जे रामोपासक हैं तिनहीं के मत
अगाधहैं ॥ १८६ ॥
समुझैकी गति एकहै, जिन समुझा सब ठौर ॥
कह कबीर जे बीचके, बल कहि औरै और ॥१८७॥
जे रामोपासक निर्गुण सगुणको समुझिकै ताहूते परे साहब को जान्यों
तिनकी गति एकहै कहे एक साहबहीको सबठौर निर्गुण सगुणमें समुझै हैं
कबीरजी कहै हैं कि जे बीचकेहैं ते और और उपासना करै हैं और और
ज्ञानकरै हैं औ आपने आपनेदेवतनमें बलकै हैं कि येई सबके मालिकहैं॥ १८७॥
राह बिचारी का करै, पथिक न चलै विचारि ॥
आपन मारग छोड़िकै, फिरहि उजारि उजारि॥१८८॥

( ५९८ ) बीजक कबीरदास ।
पथिक जो विचारिकै न चलै तौ राह बिचारी कहाकरै वेद पुराण शास्त्र
येई सब राहैं हैं तिनको तात्पर्य यही है यहजीव साहबको अंशहै उनहींके
जानें संसारते छूटै है सो रामनाम को जपिकै साहबको हैरहै यह जो है आपनों
मारग तौनेको छोड़िकै उनारि उजारि कहे कोई ब्रह्ममें कोई ईश्वरमें कोई नाना
देवतन की उपासनामें फिरे हैं सोउनके जननमरण रूप कण्टक लागिबोई चाहैं
नरकरूप खोह गिरैचाहै औ जीवसाहबको अंशहै तामें प्रमाण ॥ "ममैवांशो-
जीवलोके जीवभूतः सनातनः" ॥ औ ब्रह्ममाया ईश्वर जगत् इनको विचारकरै
तौ भ्रममात्रहै कछू इनसे जीवको उद्धारनहीं होयहै तामें प्रमाण ॥ "ब्रह्मजीव
ईश्वरजगत ईसब अनमिलसैन ॥ निरवारे ठहरै नहीं भाखत झांईं बैन"॥ १८८॥
मूआहै मरि जाहुगे, बिन शर थोथे भाल ॥
परे करहारै बृक्षतर, आजु मरै की काल ॥ १८९ ॥
अरेजीवौ ! तुम केतनौ बार मरतआये हौ औ मरिजाउगे बिना शरकाहेते कि
तुम्हारे भालमें थोथे लिखे हैं बिना फलकें बाणसों तुम यहि संसार वृक्षतरे जो
बोलते बताते हौ सो परे कल्हारते हौ आजु मरिजाउ कि काल्हिमरिजाउ बाड़ा
कछू नहीं है ॥ १८९ ॥
बोली हमारी पूर्वकी, हमैं लखा नहिं कोइ ॥
हमकोतो सोई लखै, घर पूरुबका होइ ॥ १९० ॥
हमारी जो पूर्बकहे पहिलेकी बोली जो साहबकोरूप उपदेश करिआये
जीवको स्वरूप बतायआये सो कोई नहीं लखै है न हम को लखै है सो हमारी-
बाणीको तो सोई लखै है जो कोई पूरुबको कहे शुद्धजीव हैजाय जस पूर्बही
रह्यो है ॥ १९० ॥
जेहि चलतै रवदे परा, धरती होइ विहार ॥
सोइ सावज घामैं जरै, पण्डित करो विचार ॥१९१॥
जेहि जीवके चलतकहे निकसतमें यहशरीर रवदे कहे धूरिमें मिलिजाय है
पुनि वैहैजीव जो कहूं अवतरै है तब यहै शरीर को पाइकै धरती में विहा-