कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५९२ ) बीजक कबीरदास ।
सबको मालिक साहबएकही है औ साहब के जाननवारे बिरलेसाधुहैं जें
रामनाम को जपै हैं वेसब साधुनके शिरमौरहैं तामें प्रमाण ॥ “साधु हमारे
सब खड़े,अपनी अपनी ठौर । शब्द बिबेकी पारखी,सो माथेको मौर”॥तामें या
दृष्टान्त है जैसे मलैगिरी चन्दन एकहै, सिंहएकहै तैसे हीरा जो राम नामहै
तेहिते साहब को ज्ञान होयहै सो एकही है औ ताके जाननवारे साधु एकही हैं,
वे जमाति में नहीं चले हैं ऐसेतो सब साधुही कहावै हैं औ राम नाम वस्तु-
खोयकै औरेमें लागे हैं ते गँवारहैं तामें प्रमाण ॥ “वह हीरा मतिजांनैये,
जेहिलादै वनजार ॥ यह हीरा है मुक्तिको, खोये जात गँवार ॥ १६९ ॥
अपने अपने शीश की, सबन लीन है मानि ॥
हरिकी बात दुरंतरी, परी न काहू जानि ॥ १७० ॥
जौनजाकोमतनीकलाग्यो सोतौनैनमतको शीशचढ़ाय मानि लीन्ह्यो हरिकी
जो दुरंतरी बातहै सबतें दूरकहेपरे सो काहूको न जानिपरी कि सबके रक्षक
साहबै हैं ॥ १७० ॥
हाड़ जरै जस लाकड़ी, तनवा जरै जस घास ॥
कबिरा जरै सो राम रस, जस कोठी जरै कपास॥१७१॥
कबीर जे जीवहैं तिनके रामरसजो है रामभक्ति सो कैसे उनके अंतःकरणमें
जरै है जैसे कोठीमेंकपास भितरैजरै है याहीते उनके हाड़बार लकड़ी घासकी
नाईं जरै हैं ॥ १७१ ॥
घाट भुलाना बाट बिन, भेष भुलाना कानि ॥
जाकी माड़ी जगत में, सो न परौ पहिचानी॥ १७२॥
घाटकहे सत्संग बाट जो है बिचार ताके बिना भूलिगयो अर्थात् साहबको
तौ जान्यो न अपनेहीको ब्रह्म माननलग्यो बिचारभूलि गयो सत्संग काहेको करै
आपने गुरुवनकी कानिमानि भ्रमवारे मत न छाड़तभये भेषवारे साधु सबभुला-
यगये सो जाकी माड़ी कहे माया जगत्में पूरिरही ऐसेजो साहब सो न पहिचानिपरयों
माड़ी मायामें भूलिगये ॥ १७२ ॥