कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाखी । ( ५८५ )
जाना नहीं बूझा नहीं, समुझि किया नहिं गौन ॥
अन्धेको अन्धा मिला, राह बतावै कौन ॥१५०॥
मनमायादिक जो जगतहै ताको न जान्यो कि यह जड़ है मैं इनको नहीं
हौं इनते भिन्नहौं वा ब्रह्मको न बूझ्यो विचारई करत रहिगये अपने स्वरूपकों
न जान्यो कि मैं साहबको अंशहौं समुझिकै नाना मतनमें गौन न किये कि ये
नरक लैजानवारे हैं सो आँधर जे जीव तिनको आँधरै गुरुवालोग मिलें साहब
के यहाँकी राह कौन बतावै ॥ १५० ॥
जाको गुरु है आँधरा, चेला कहा कराय ॥
अंधे अंधा ठेलिया, दोऊ कूप पराय ॥ १५१ ॥
याको अर्थ स्पष्टही है ॥ १५१ ॥
मानस केरी अथाइया, मति कोइ पैठै धाय ॥
एकइ खेते चरत हैं, बाघ गदहरा गाय ॥ १५२ ॥
या संसारमें मनुष्यकी अथाई है तामें धाय कै कोई मति पैठे काहेतें कि
एकइ खेत जो है संसार तामें बाघ जो है जीव औ गदहा जो है मन औ गाय
जो है माया सो एकई संग चरै हैं गदहा मनको कह्यो सो कर्मको बोझा याहीमें
लादिजायहै औ जीव बाघहै समर्थ जो साहबको जानै तौ गायजो है माया
ताको खायजाय अर्थात् नाशकर देइ ॥ १५२ ॥
चारि मास घन वरसिया, अति अपूर्व शरनीर ॥
पहिरे जड़तर बरुतरी, चुभै न एकौ तीर ॥ १५३ ॥
कबीरजी कहैं हैं कि घन जोहौं मैं सो चारि मास जेहैं चारियुग तामें
अतिअपूर्व जो है शरकहे बाणरूपी नीरज्ञान ताको बरसत भयो कहे उपदेश
करतभयो सबजीवनको परन्तु ऐसो जड़तरकहे जड़ौते जड़ बरुतर पहिरे है कि
तीरकहे एकौ ज्ञान नहीं चुभै है अथवा चारिमास हैं चारिउ वेद ते घनकहे
बहुतज्ञानकी वर्षा कियो कहे सबजीवनको उपदेश कियो परन्तु साहब को