सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 625, कुल 766 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 625

साखी । ( ५८७ )
गुरु सिकिली गर कीजिये, मनहि मसकला देइ ॥
शब्द छोलना छोलिकै, चित दर्पण करिलेइ ॥१५७॥
जो कहौ मनते हम कौनी भाँतिते भिन्नहोइँ तौ गुरु सिकलीगरहै आत्मा तरवारि
है मनादिकनकी काटनवारी है तामें साहबको ज्ञानरूपी मसकलादै रामनाम
छोलनाते अज्ञानरूपी मुरचाछोलि प्रेमकी बाढ़िधरि मनादिकनके काटिबेको समर्थ
करिदेइ अर्थात्चारिउ शरीरको छोड़ि स्वरूपरूपी दर्पण में आपनो हंसशरीर
जानिलेइ कि मैं साहबको अंशहौं ॥ १५७ ॥
मुरुखके समुझावते, ज्ञान गाँठिको जाय ॥
कोइला होइ न ऊजरो, नौ मन साबुन खाय॥१५८॥
यहसाखी को अर्थ प्रसिद्धै है ॥ १५८ ॥
मूढ़ करमिया मानवा, नख शिख पाखर आहि ॥
बाहनहारा का करै, बाण न लागै ताहि ॥ १५९ ॥
मूढ़कर्मी कहे मूढ़ है औ कर्मी है कर्म त्यागको उपाय नहीं करै है ऐसो जो
ह मानुष्य सो नखशिखलौं अज्ञानरूपी पाखरपहिरे है । औ जो मूढ़कर्मी पाठहोय
तौ बानरकी नाईं बाँध्यो है हठ नहीं छांड़ै ॥ १५९ ॥
सेमर केरा सूवना, सिहुले बैठा जाय ॥
चोंच चहोरै शिर धुनै, यह वाहीको भाय ॥ १६० ॥
सेमरका सुवा जोसिहुले कहेमदारेमें बैठिकै चोंच मार्यो जब धुवा निकरचों-
तब शिर धुनै है या कहै है कि या वहीको भाई है अर्थात् जीव संसार सुख लागि-
रह्यो जब कुछ न पायो तब ब्रह्म सुखमें लग्यो कि मोको ब्रह्मानन्द होयगो
सो वहौ बिचार करत जब अठईं भूमिकामें गयो तब अनुभवौ न रहिगयो तब
जान्यो कि जैसे संसारी सुख मिथ्या है तैसे ब्रह्मसुखौ मिथ्या है कुछ नहीं रहि
जाय है अथवा घरछोड़िकै बैरागी भये महन्ती लिये मठ बाँधे चेला भये सो
घरमें एकै मेहरी रही एकै बेटा रहो इहां बहुत चेली भईं बहुत चेला भये