कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५८४ ) बीजक कबीरदास ।
पीपर एकजो महँगे मान । ताकर मम न कोऊ जान ॥
डारलफायनकोऊखाय।खसमअछतबहुपीपरजाय॥ १४७॥
एकपीपरके वृक्षको सबै महँगे मानिलियो है सो वह ब्रह्महै अनुभवगम्य है वाको
मर्म कोई नहीं जानै है कि पीपरको डार लफायकै कोई नहीं खायहै अर्थात् वा
अलखहै कैसेमिली वातो कथनमात्रही है सो साहब कहै हैं कि जीवनको
खसम अछत मैं बनैहौं ताको तौ नहीं प्राप्ति होय वहपीपरजो ब्रह्म ताहीमें सब
चलेजातेहैं सो वह ब्रह्म झाँईं है तामें प्रमाण मूल रमैनीको ॥
“ निर्गुणअलख अकह निरबाना । मन बुधि इन्द्री जाहि न जाना ॥
बिधिनिषेध जहँवाँ नहीं होई । कह कबीर पद झाँईं सोई ॥
पहिले झाँईं झाँकते, पैठो सन्धिक्काल ।
झाँईंकी झाँईं रही, गुरुबिन सकैको टाल” ॥ १४७ ॥
शाहू ते भो चोरवा, चोरन ते भो जुज्झ ॥
तब जानैगो जीयरा, मार परैगो तुज्झ ॥ १४८ ॥
प्रथम शाहु रहे कहे शुद्धरहेहौ सो ब्रह्ममाया मनचोरहैं तिनमें लगिकै तैंहूं
चोर हैगये अर्थात् उपदेश करिकै जीवन के साहब को ज्ञान चोराय लियो
काहूको कह्यो कि ब्रह्म तूही है काहूको कह्यो कि आदिशक्तिको भजु जगतको
कर्त्ता वही है काहूको कह्यो जो मनमें आवै सो करु बन्धमोक्षको कारण मनै
है याही रीति गुरुवाचोरन ते जुज्झ भयो सो तुज्झ कहे तोहीं तबहीं समुझि
परैगो जब यमको सोंटा शीशमें लगैगो तब तब जानैगो कि रक्षकको
भुलाय दियो ॥ १४८ ॥
ताकी पूरी क्यों परै; गुरु न लखाई वाट ॥
ताको बेरा बूड़िहैं, फिरि फिरि अवघट घाट ॥१४९॥
जाको गुरुने साहब के पास पहुँचिबे की बाट नहीं लखाई ताकी पूरी कैसे
परै ताकी बेरा जो है ज्ञान सो अवघटघाटमें बूडि जाइगो अर्थात् जब उनके
शरीर छूटिजायँगे पुनि पुनि जनम मरण होइगो तब वा ज्ञान भूलिजायगो ,१४९॥