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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 617

साखी। (५७९)
मोहरूपी निशा बिहाय जायहै औ जे नहीं जागे हैं तिनकों काल डसिखायहै सो-
जिनको रामोपासना सिद्धह्वै गईहै ऐसे जे भक्तहैं तिनके शरीरं नहीं छूटे हैं सो
हनुमान् कबीरजी प्रकटै हैं ॥ १३० ॥
जो ई घर है सर्पका, सो घर साधुन होइ ॥
सकल संपदा लै भई, विष भर लागी सोइ॥ १३१ ॥
जो घर सर्पकोहै सोघर साधुको न होइ अर्थात् सर्पको घरबेमौरहै तामें
बहुतछिद्र होइहैं सो या शरीरौ बहुत छिद्रकी बाँबी है तामें काल बसैहै सो
बेमोरमें जो जीव जायहै तिनको सर्प खाय लेइहै औ जे या शरीर में कौनौ
जीव बसैहै तिनको काल खाइलेइहै ॥ १३१ ॥ *
मन भरके बोये कबौं, घुंघुची भर ना होइ ॥
कहा हमार मानैं नहीं, अन्तहु चले विगोइ ॥ १३२॥
शरीरमें जों घुँघुची भर बासना उठै तौ मन भर की हैजातीहै कहे मनसं-
कल्पाविकल्पकारिकै और बढ़ाइ देइहै मनमें वही भरि रहती है औ मनभर उप-
देशकरै तौ घुँघुची भर ज्ञाननहीं रहै यह मननीचै में जायहै ऊंचेको नहींजाय
सो श्रीकबीरजी कहै हैं कि, हम केतौ उपदेश करें परंतु कोई नहीं मानैहैं ताते
अन्तमें बिगोइकै कहे बिगरिकै मरिकै नरकमें जायहैं ॥ १३२ ॥
आपा तजो औ हरि भजो, नख शिख तजो बिकार ॥
सब जिउते निरबैर रहु, साधु मता है सार ॥ १३३॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि जबभर तैं यहि शरीरको आपनो मानैगो तब भर
तेरौ जनन मरण न छूटेगो ताते“अहंशरीरः”मैं शरीर हौं यह जोहै आपा ताको
छोड़िदे तैं तो साहबकों पार्षदस्वरूपहै तामें टिकि तिनको भजनकरु औ नख
शिखमें तेरे कामक्रोधादिक बिकारई देखे परैहैं तिनको छोड़दे औ चिदचित

  • इसके आगे की यह साखी छोड़दी है ।
    “घुंघुची भर जो बौ इया, उपजपसेरी आठ । डेरा परा काल घर, सांझ सकारे बाठ”