कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाखी। ( ५८३ )
जीव ताको हनै है सो जब जीव मारे परचो तब मनसा जो है मनोरथ सोई
सचनभयो है कहे शार्दूल भयो सो उड़ि उड़ि याको खायहै अर्थात् जब मरन-
लागै है तब जहैं मनोरथ जायहै तहँ जीव जायहै सोई खायबो है औ यन्त्र
मन्त्र जों नाना उपदेश वेदशास्त्र कहै है सो नहीं मानै है ॥ १४२ ॥
मन गयंद मानै नहीं, चलै सुरतिके साथ ॥
दीन महावत क्या करैं, अंकुश नहीं हाथ ॥ १४३ ॥
मनरूपी जो मतंगहै सो नहीं मानै है सुरतिरूपी जो हाथिनी है ताके साथ
चलै है महाउत जो है जीव सो कहाकरै अंकुश जो नामका ज्ञान सो याके-
हांथई नहीं है ॥ १४३ ॥
या माया है चूहरी, औ चूहरकी जोइ ॥
बाप पूत अरुझायकै, संग न काहुकी होइ ॥ १४४ ॥
या माया चूहरी कहे चाण्डालिनी है औ चूहरैकी जोइहै कहे जीवकी जोइ
हैकै जीवहूको चूहर बनायलियो अर्थात् आपने वश कैलियो सो यह माया
काहूकी सँगनहीं है । मन जो है बाप, पूत जो है ब्रह्म ताको पतिजो है जीव
तासों अरुझाय दियो है ॥ १४४ ॥
कनक कामिनी देखिकै, तू मति भूल सुरंग ॥
बिछुरन मिलन दुहेलरा, केचुलि तजै भुजंग ॥१४५॥
साहब कहै हैं कि कनक कामिनीरूप मायाको देखि तू मतिभुलाय तैं तों
सुरंगहै साहब कहै हैं कि मेरे अनुरागमें रंगनवारो है सो आपने स्वरूप तों
बिचारु यह कनक कामिनीरूप जो मायाहै तौनेमें जो रँगोहै ताको जो छोड़िदै
तौ जैसे भुजंग केचुलि छोड़ि देइहै तब वाको स्वरूप निकरि आवै है तैसे तेरे
चारो शरीर छूटि जायँ तब हंसशरीरपाय मेरे पास आवै ॥ १४५ ॥
मायाके बश सब परे, ब्रह्मा विष्णु महेश ॥
नारद शारद सनक औ, गौरी सुत्त गणेश ॥ १४६ ॥
अर्थ याको स्पष्टही है ॥ १४६ ॥