कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५१६ ) बीजक कबीरदास ।
जो कोउ कहै हम मनको मारा जाकें रूप न रेखा ।
छिन छिनमें केतनौ रंग ल्यावै जें सपनेहुं नाँहिं देखा ॥
रासातल यकईश ब्रह्मण्ड। सब पर अदल चलावै ।
षट रसमें भोगी मन राजा सो कैसे कै पावै ॥
सबके ऊपर नाम निरक्षर तहँ लै मनको राखै ।
तब मनकी गति जानि परै यह सत्य कविर मुख भाखै ॥ १८१ ॥
देश विदेशन हौं फिरा, मनहीं भरा सुकाल ॥
जाको ढूंढत हौं फिरौं, ताको परा दुकाल ॥ १८२ ॥
देशकहे संसार बिदेशकहे ब्रह्म तौने में फिराहै सो ये दूनों मायाको सुका-
लभराहै अर्थात् वह ब्रह्म मनहीं को अनुभवहै और संसार मनहीं को कल्पनाहै
जौन बस्तु को मैं ढूंढत फिरौं हौं जो मन बचनके परे है ताको दुकालपर्यो
वा न ब्रह्ममें है न संसार में है ॥ १८२ ॥
कलि खोटा जग आंधरा, शब्द न मानै कोइ ॥
जाहि कहौं हित आपना, सो उठि वैरी होइ ॥ १८३ ॥
जगत् तो आँधराहै ज्ञानदृष्टि याके नहीं है कुछ समझै नहीं है तौने में या
कलि खोटा प्राप्त भयो सो जाको शब्द जो राम नाम मैं बताउँहौं सोई वैरी
होइहै कहे शास्त्रार्थ करै है मानै नहीं है ॥ १८३ ॥
मसि कागद तो छुवों नहिं, कलम गहो नहिं हाथ ॥
चारिहु युग माहात्म्य जेहि, करिकै जनायो नाथ १८४
गुरुमुख ॥ चारिउ युग में है माहात्म्य जिनको ऐसे जे नाथ रघुनाथहैं
तिनको कबीरजी सबको जनायो न कलमगही न कागद लियो न मसि लियो
मुखहीतें कह्यो ये तो सरल करिकै कह्यो कि जामें एकौ साधन न करनपरै
सो साहब कहै हैं कि जो मोको जानिलेइ तौ संसारते तरिजाय जो कहौ
कबीर जी मुखही तें कह्यो है ग्रन्थकैसे भये हैं तौ कबीर जी कहते गये हैं
शिष्यलोग लिखतें गये हैं ॥ १८४ ॥